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सांविधानिक विधि
सप्रतिबंध मुक्ति (पैरोल)
« »07-Jun-2024
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
परिचय:
हाल के लोकसभा चुनावों में एक दिलचस्प घटना प्रकाश में आई है, जिसमें अमृतपाल सिंह और शेख अब्दुल रशीद की अप्रत्याशित जीत शामिल है, जेल में बंद होने तथा विधिक चुनौतियों के बावजूद उनकी चुनावी जीत भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं को प्रकट करती है। हालाँकि, विधिक प्रतिबंधों के कारण विधायी मामलों में शामिल होने में उनकी असमर्थता संसद सदस्यों (MP) के रूप में उनकी भूमिका को चुनौती देती है। फिर भी, सांसद के रूप में पद ग्रहण करने का उनका अधिकार आगामी 18वीं लोकसभा के लिये एक अनोखी दुविधा प्रस्तुत करता है।
निर्वाचित उम्मीदवारों को शपथ ग्रहण के लिये पैरोल पर रिहा किये जाने से संबंधित अतीत के क्या उदाहरण हैं?
- जॉर्ज फर्नांडिस ने वर्ष 1977 में आपातकाल के दौरान जेल से ही मुज़फ्फरपुर सीट का प्रतिनिधित्व करते हुए एक ऐतिहासिक चुनाव जीता था। उन्हें शपथ ग्रहण समारोह से पहले रिहा कर दिया गया था।
- मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में तिहाड़ जेल में निरुद्ध, नेता संजय सिंह को न्यायालय द्वारा राज्यसभा सांसद के तौर पर शपथ लेने की अनुमति दी गई। उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच संसद ले जाया गया।
- वर्ष 2021 में, असम के सिबसागर से चुनाव जीतने के बाद अखिल गोगोई को असम विधानसभा के सदस्य के रूप में शपथ लेने के लिये, NIA अदालत द्वारा अस्थायी रूप से जेल से बाहर निकलने की अनुमति दी गई थी।
पैरोल क्या है?
- परिचय:
- पैरोल एक कैदी की अस्थायी रिहाई है जब वह अपनी सज़ा पूरी होने से पहले कुछ शर्तों पर सहमत होता है।
- पैरोल को एक कैदी की सशर्त रिहाई के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो सामान्यतः पैरोल अधिकारी की देखरेख में होता है, जब उस कैदी ने उस अपराध की दण्ड अवधि का कुछ भाग पूरा कर लिया हो जिसके लिये उसे कारावास का दण्ड दिया गया था।
- इन शर्तों में अक्सर पैरोल अधिकारी के साथ नियमित जाँच, कोई आर्थिक गतिविधि करना या शैक्षिक कार्यक्रमों में भाग लेना तथा आपराधिक गतिविधियों से दूर रहना शामिल होता है।
- पैरोल सामान्यतः अच्छे आचरण, अपराध की प्रकृति तथा पुनर्वास की संभावना जैसे कारकों के आधार पर दी जाती है।
- यह व्यक्तियों को, निगरानी में रहते हुए धीरे-धीरे समाज में पुनः एकीकृत होने की अनुमति देता है।
- पैरोल की शर्तों का उल्लंघन करने पर व्यक्ति को शेष दण्ड अवधि पूर्ण करने के लिये पुनः जेल भेजा जा सकता है।
- पैरोल का उद्देश्य:
- कैदी के पारिवारिक संबंधों को बनाए रखना तथा उसके द्वारा परिवार से संबंधित मामलों का समाधान करना।
- लंबे समय तक कारावास में रहने से कैदी के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम करना।
- कैदी के आत्मविश्वास को बढ़ाना।
- कैदी में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना तथा जीवन के प्रति सक्रिय सहभागिता उत्पन्न करना।
- पैरोल के प्रकार:
- अभिरक्षा पैरोल:
- यह आपातकालीन स्थितियों में प्रदान किया जाता है।
- विदेशियों और मृत्युदण्ड की सज़ा काट रहे व्यक्तियों को छोड़कर, सभी दोषी व्यक्ति परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु या विवाह जैसे कारणों से 14 दिनों के लिये इस पैरोल के लिये पात्र हो सकते हैं।
- नियमित पैरोल:
- जिन अपराधियों ने कम-से-कम एक वर्ष जेल में बिताया है, वे अधिकतम एक महीने के लिये नियमित पैरोल के लिये पात्र हैं।
- इसे विवाह, दुर्घटना, मृत्यु, परिवार में बीमारी या बच्चे के जन्म आदि जैसे कुछ आधारों पर आवंटित किया जाता है।
- अभिरक्षा पैरोल:
पैरोल में क्या विधिक प्रावधान शामिल है?
- पैरोल प्रदान करना जेल अधिनियम, 1894 और जेल अधिनियम, 1900 के तहत स्थापित नियमों के दायरे में आता है।
- विभिन्न राज्य सरकारों ने विशिष्ट मामलों में पैरोल देने के संबंध में निष्पक्षता सुनिश्चित करने तथा निर्णय लेने में सुविधा प्रदान करने के लिये दिशा-निर्देश तैयार किये हैं।
- ये निर्णय समय-समय पर तैयार किये गए दिशा-निर्देशों के अनुसार लिये जाते हैं।
- उदाहरण के लिये, महाराष्ट्र में कारागार (बॉम्बे फरलो और पैरोल) नियम, 1959 को कारागार अधिनियम, 1984 की धारा 59(5) द्वारा प्रदत्त नियम बनाने की शक्ति के अंतर्गत अधिनियमित किया गया है।
- ये नियम राज्य में पैरोल के प्रशासन और विनियमन के लिये एक रूपरेखा प्रदान करते हैं।
- सुनील फूलचंद शाह बनाम भारत संघ, 2000 में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि “पैरोल दण्ड के निलंबन के समान नहीं है”।
- यह अवलोकन इस बात को रेखांकित करता है कि पैरोल को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 में उल्लिखित दण्ड के निलंबन के समान नहीं माना जा सकता है।
ज़मानत एवं पैरोल में क्या अंतर है?
- भारतीय विधि में, पैरोल एवं ज़मानत अलग-अलग विधिक अवधारणाएँ हैं जिनके उद्देश्य तथा निहितार्थ अलग-अलग हैं:
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स्थिति |
पैरोल |
ज़मानत |
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परिभाषा |
पैरोल के तहत दण्ड अवधि पूरी करने से पहले कारावास से सशर्त रिहाई मिलती है, जो अच्छे आचरण पर निर्भर है। |
ज़मानत में वाद की प्रतीक्षा कर रहे आरोपी व्यक्ति की अनंतिम रिहाई शामिल होती है, जो अक्सर प्रतिभूति या बांड के प्रावधान के अधीन होती है। |
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उद्देश्य |
लंबे समय से कारावास में बंद कैदियों के पुनर्वास या समाज में पुनः एकीकरण की सुविधा के लिये पैरोल प्रदान की जाती है। |
ज़मानत, न्यायालय में अभियुक्त की उपस्थिति को सुनिश्चित करती है, तथा वाद प्रारंभ होने तक उसे अपना सामान्य जीवन व्यतीत करने की अनुमति देती है।
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योग्यता |
यह पैरोल सामान्यतः अच्छे आचरण वाले दीर्घकालिक कैदियों को दी जाती है, परंतु हत्या या बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के लिये दोषी ठहराए गए व्यक्तियों के लिये यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। |
सामान्यतः अधिकांश अभियुक्तों को ज़मानत मिल जाती है, सिवाय उन मामलों को छोड़कर जिनमें गंभीर अपराध शामिल हों या जहाँ अभियुक्त के भागने का खतरा हो। |
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अवधि |
अधिकार क्षेत्र के आधार पर, जेल प्राधिकारियों या न्यायालय द्वारा दी जाने वाली अनुमति। |
न्यायालय द्वारा स्वीकृत। |
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शर्तें |
पैरोल की शर्तों में पुलिस को नियमित रूप से सूचित करना, अवैध गतिविधियों से दूर रहना तथा कभी-कभी निर्दिष्ट क्षेत्र में ही रहना शामिल हो सकता है। |
ज़मानत की शर्तों में आम तौर पर न्यायालय की सुनवाई में नियमित रूप से उपस्थित होना, आपराधिक आचरण से दूर रहना तथा कभी-कभी यात्रा पर प्रतिबंध या घर में नज़रबंद रखना शामिल होता है। |
- पैरोल और ज़मानत दोनों में अभिरक्षा से अस्थायी रिहाई शामिल है, वे अलग-अलग उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं तथा भारतीय विधि में अलग-अलग परिस्थितियों में दिये जाते हैं।
- पैरोल उन व्यक्तियों के लिये है जो पहले से ही सज़ा काट रहे हैं, इसका उद्देश्य पुनर्वास और पुनः एकीकरण है, जबकि ज़मानत उन लोगों के लिये है जो वाद की प्रतीक्षा कर रहे हैं, ताकि विधिक कार्यवाही में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित हो सके।
- अभिरक्षा में रहते हुए शपथ लेने की अनुमति मिलना वास्तव में एक विशेष परिस्थिति है, जो आधिकारिक कर्त्तव्यों को पूरा करने के उद्देश्य से अस्थायी रिहाई या विशेष पैरोल के समान है।
- पैरोल, ज़मानत पर रिहा होने के समान नहीं है, क्योंकि व्यक्ति उस विशिष्ट घटना या गतिविधि के अतिरिक्त (जिसके लिये उसे बाहर जाने की अनुमति दी गई है), अभिरक्षा में ही रहता है।
भारतीय संविधान, 1950 का अनुच्छेद 101(4) क्या है?
- भारतीय संविधान, 1950 का अनुच्छेद 101 सीटों के रिक्तीकरण से संबंधित है।
- अनुच्छेद 101(4) में कहा गया है कि यदि संसद के किसी भी सदन का कोई सदस्य साठ दिन की अवधि तक सदन की अनुमति के बिना, उसकी सभी बैठकों से अनुपस्थित रहता है, तो सदन उसकी सीट रिक्त घोषित कर सकता है:
- परंतु साठ दिन की उक्त अवधि की गणना करते समय उस अवधि को ध्यान में नहीं रखा जाएगा जिसके दौरान सदन का सत्रावसान हो जाता है या वह लगातार चार दिन से अधिक के लिये स्थगित हो जाता है।
- पद की शपथ लेने की अनुमति मिलना ज़मानत मिलने के बराबर नहीं है। यह एक विशेष दिन की पैरोल जैसा है।
- जेल में बंद सांसद को बाद में लिखित रूप से अध्यक्ष को कार्यवाही में उपस्थित होने में अपनी असमर्थता की सूचना देनी होगी।
- यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 101(4) में प्रावधान है कि यदि कोई सांसद बिना अनुमति के 60 दिनों से अधिक समय तक सभी बैठकों से अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सीट रिक्त घोषित कर दी जाएगी।
निष्कर्ष:
निर्वाचित उम्मीदवारों को शपथ ग्रहण के लिये पैरोल पर रिहा किये जाने के उदाहरण विधि, लोकतंत्र और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच के अंतर्विभाजन को रेखांकित करते हैं तथा अपरंपरागत परिस्थितियों में भी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये विधिक प्रणाली की अनुकूलन क्षमता को प्रदर्शित करते हैं। पैरोल, पुनर्वास और सार्वजनिक सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन स्थापित करने के लिये एक तंत्र के रूप में कार्य करता है, जिससे पर्यवेक्षण के अंतर्गत रहते हुए व्यक्तियों को धीरे-धीरे समाज में पुनः एकीकृत किया जा सके।