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आपराधिक कानून
शून्य द्वितीय विवाह और "पति" का अर्थ
23-Jul-2026
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सर्वेश उर्फ छोटू उर्फ छोटेलाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य "भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 और भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 में 'पति' शब्द का प्रयोग केवल तभी किया जाएगा जब वह विधिक रूप से किसी महिला से विवाहित हो, न कि उस व्यक्ति के लिये जिसका विवाह स्वयं किसी महिला से शून्य हो।" न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल न्यायाधीश पीठ ने सर्वेश उर्फ छोटू उर्फ छोटेलाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि जिस व्यक्ति का द्वितीय विवाह उसके प्रथम विवाह के अस्तित्व में होने के कारण शून्य है, उसे सामान्यतः भररतीय नये संहिता की धारा 80 और 85 के प्रयोजनों के लिये "पति" नहीं माना जा सकता है, जबकि उन मामलों में अपवाद निर्धारित किये गए हैं जहाँ प्रथम विवाह की वैधता संदिग्ध है, जहाँ द्वितीय विवाह को विद्यमान विवाह को छिपाकर प्रेरित किया गया था, या जहाँ विवाह मुस्लिम वैयक्तिक विधि के अधीन वैध हैं।
सर्वेश उर्फ छोटू उर्फ छोटेलाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- आवेदक की द्वितीय पत्नी ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी, और उस पर धारा 80(2) भारतीय न्याय संहिता (दहेज मृत्यु), धारा 85 भारतीय न्याय संहिता (क्रूरता), और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के अधीन आरोप लगाया गया था।
- आवेदक ने जमानत की मांग करते हुए तर्क दिया कि मृतक उसकी द्वितीय पत्नी थी, उसका द्वितीय विवाह तब हुआ था जब उसका प्रथम विवाह अभी भी कायम था, इसलिये द्वितीय विवाह शून्य था, और तदनुसार उसे उपरोक्त दंडात्मक प्रावधानों के प्रयोजनों के लिये "पति" नहीं माना जा सकता था।
- न्यायालय ने इस विधिक प्रश्न को परिभाषित किया कि क्या कोई व्यक्ति जिसने अपनी प्रथम पत्नी के जीवित रहते हुए द्वितीय विवाह किया है, द्वितीय पत्नी के संबंध में धारा 80 और 85 भारतीय न्याय संहिता के प्रयोजनों के लिये "पति" की परिभाषा के अंतर्गत आएगा।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- भर्ती न्याय संहिता की धारा 80 और 85 के दायरे पर: न्यायालय ने दहेज प्रतिषेध अधिनियम के अधीन "दहेज" की परिभाषा और रीमा अग्रवाल बनाम अनुपम (2004), शिवचरण लाल वर्मा बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2002) और शिवकुमार बनाम राज्य (2023) में उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के साथ प्रावधानों की जांच की।
- पूर्व निर्णयों में विरोधाभास पर: न्यायालय ने कहा कि रीमा अग्रवाल ने शून्य विवाहों में महिलाओं को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-क और 304-ख के सुरक्षात्मक दायरे में लाने के लिये एक उद्देश्यपूर्ण निर्वचन अपनाया था, जबकि शिवचरण लाल वर्मा मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ के बाद के एक निर्णय में, जिसका अनुसरण पी. शिवकुमार मामले में किया गया, यह माना गया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498-क के अधीन अभियोजन तब तक मान्य नहीं है जब तक कि विवाह स्वयं अकृत और शून्य न हो।
- दण्ड प्रावधानों की कठोर निर्वचन पर: शिवचरण लाल वर्मा और अखिलेश केसरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने माना कि धारा 80 और 85 भारतीय न्याय संहिता में दण्ड उपबंध हैं जिनके लिये कठोर निर्वचन की आवश्यकता है, और धारा 80 भारतीय न्याय संहिता (धारा 304-ख भारतीय दण्ड संहिता के अनुरूप) के अधीन दहेज मृत्यु की अनुमानित उपधारणा, धारा 118 भारतीय न्याय संहिता के साथ पढ़ी जाए, तो अभियुक्त के पक्ष में निर्वचन किया जाना चाहिये।
- "पति" के अर्थ पर: न्यायालय ने तदनुसार यह माना कि धारा 80 और 85 भारतीय न्याय संहिता के अधीन "पति" शब्द में केवल वही व्यक्ति सम्मिलित है जो विधिक रूप से महिला से विवाहित है, न कि वह व्यक्ति जिसका विवाह स्वयं ही शून्य है।
- अपवादों के संबंध में: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उपरोक्त सिद्धांत दो स्थितियों में लागू नहीं होगा – प्रथम जहाँ प्रथम विवाह की वैधता पर संदेह हो, वहाँ कथित द्वितीय विवाह में "पति" के रूप में रहने वाला व्यक्ति भी इसके दायरे में आएगा; और द्वितीय, जहाँ किसी व्यक्ति ने अपने वैध विवाह का प्रकटन किये बिना द्वितीय विवाह किया हो और द्वितीय पत्नी के साथ उसके पति के रूप में रहता रहा हो, और द्वितीय पत्नी को अपराध होने तक इस बात की जानकारी न हो, तब भी उसे "पति" ही माना जाएगा क्योंकि उसे अपने ही गलत काम का फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
- वैयक्तिक विधि में भिन्नताओं के संबंध में: न्यायालय ने कहा कि प्रथम विवाह के अस्तित्व में रहते हुए किया गया द्वितीय विवाह विशेष विवाह अधिनियम, विदेशी विवाह अधिनियम, ईसाई विवाह अधिनियम, पारसी विवाह ओर विवाह-विच्छेद अधिनियम और हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत शून्य है। इसने मुस्लिम वैयक्तिक विधि के अंतर्गत विवाहों को अलग करते हुए कहा कि जहाँ शरिया विधि के अनुसार विवाह संपन्न होता है, वहाँ द्वितीय, तीसरा या चौथा विवाह भी वैध होता है, और ऐसी किसी भी पत्नी के साथ पति के रूप में रहने वाला मुस्लिम पुरुष धारा 80 और 85 भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत "पति" की परिभाषा में आता है।
- दिये गए अनुतोष पर: यह देखते हुए कि आवेदक का द्वितीय विवाह उसके प्रथम विवाह के अस्तित्व के कारण शून्य था, न्यायालय ने उसे जमानत दे दी।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 80 और 85 क्या हैं?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 – दहेज मृत्यु:
उपबंध:
- जहाँ किसी महिला की मृत्यु किसी दाह या शारीरिक क्षति द्वारा कारित की जाती है या उसके विवाह के सात वर्ष के भीतर सामान्य परिस्थितियों से अन्यथा हो जाती है और यह दर्शित किया जाता है कि उसकी मृत्यु के कुछ पूर्व उसके पति ने या उसके पति के किसी नातेदार ने, दहेज की किसी मांग के लिये, या उसके संबंध में, उसके साथ क्रूरता की थी या उसे तंग किया था वहाँ ऐसी मृत्यु को 'दहेज मृत्यु' कहा जाएगा और ऐसा पति या नातेदार उसकी मृत्यु कारित करने वाला समझा जाएगा।
- स्पष्टीकरण: इस उपधारा के प्रयोजनों के लिये, "दहेज" का वही अर्थ है, जो दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 (1961 का 28) की धारा 2 में है।
- दण्ड: कम से कम 7 वर्ष का कारावास, जिसे आजीवन कारावास में परिवर्तित किया जा सकता है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का वर्गीकरण:
- संज्ञेय
- अजमानतीय
- सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय
भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 - किसी महिला के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना:
उपबंध:
- जो कोई भी किसी स्त्री का पति या पति का नातेदार होकर उस पर क्रूरता करता है, उसे दण्डित किया जाएगा।
- दण्ड: जुर्माने के साथ-साथ 3 वर्ष तक का कारावास।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का वर्गीकरण:
- यह संज्ञेय है, लेकिन केवल तभी जब पीड़ित महिला स्वयं, या उसके रक्त, वैवाहिक या दत्तक संबंध से संबंधित किसी नातेदार द्वारा, या ऐसे नातेदार की अनुपस्थिति में, अधिसूचित वर्ग/श्रेणी के किसी लोक सेवक द्वारा पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को सूचना दी जाए।
- अजमानतीय
- प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय
सांविधानिक विधि
भारत के संविधान का अनुच्छेद 142
23-Jul-2026
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विजयलक्ष्मी आर. बनाम सी.एल. बालाजी "भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत प्राप्त अधिकारिता, चाहे वह कितना भी व्यापक क्यों न हो, पक्षकारों के बीच सहमति से हुए करार की अंतिम और क्रियान्वित शर्तों को प्रतिस्थापित करने के लिये प्रयोग नहीं किया जा सकता है।" न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने विजयलक्ष्मी आर. बनाम सी.एल. बालाजी (2026) के मामले में, पत्नी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने संविधान के अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए तलाक समझौते को फिर से बनाने और अपने पुत्र की उच्च शिक्षा के लिये लगभग छह करोड़ से छह करोड़ पचास लाख रुपए का अतिरिक्त कोष बनाने की मांग की थी। पीठ ने कहा कि ऐसी अधिकारिता का प्रयोग उस समझौते को फिर से खोलने के लिये नहीं किया जा सकता है जो पूरी तरह से निष्पादित और समाप्त हो चुका है।
विजयलक्ष्मी आर. बनाम सी.एल. बालाजी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पति-पत्नी का विवाह 2015 में पारस्परिक सहमति से तलाक समझौते के अधीन समाप्त हो गया था।
- समझौते के अधीन, पति अपने अवयस्क पुत्र के भरण-पोषण के लिये एकमुश्त 2.20 करोड़ रुपए का संदाय करने और बच्चे के भरण-पोषण के लिये अपनी वार्षिक आय का 20% संदाय करने पर सहमत हुआ।
- समझौते में एक और शर्त यह थी कि एक बार 1 करोड़ रुपए का संदाय हो जाने के बाद, पति किसी भी प्रकार का और भरण-पोषण देने के लिये उत्तरदायी नहीं होगा, यद्यपि समझौते के अधीन शेष 1.20 करोड़ रुपए अभी भी देय थे।
- पति ने जुलाई 2017 तक पूरे 2.20 करोड़ रुपए का संदाय कर दिया था।
- लगभग पाँच वर्ष बाद, पत्नी ने पति की वार्षिक आय का 20% संदाय करने की शर्त को लागू कराने के लिये एक निष्पादन याचिका दायर की।
- कुटुंब न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि समझौता पूरी तरह से समाप्त हो चुका है।
- व्यथित पत्नी ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और संविधान के अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए पुत्र की उच्च शिक्षा के लिये एक कोष बनाने की भी मांग की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- अनुच्छेद 142 की अधिकारिता के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 142 के अधीन उसकी अंतर्निहित अधिकारिता, यद्यपि व्यापक है, पक्षकारों के बीच सहमति से किए गए करार की अंतिम और लागू शर्तों को प्रतिस्थापित करने के लिये प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
- समझौते को फिर से परिभाषित करने के संबंध में: न्यायालय ने टिप्पणी की कि पुत्र की उच्च शिक्षा के लिये एक कोष बनाने का निदेश जारी करना, सार रूप में, एक ऐसे समझौते को फिर से परिभाषित करने के समान होगा जो पहले ही पूरा हो चुका है और समाप्त हो चुका है, और इसके लिये भरण-पोषण की राशि का नए सिरे से अवधारण करना होगा, जो निष्पादन कार्यवाही में संभव नहीं है।
- समझौते की समाप्ति पर: न्यायालय ने कहा कि पति ने जुलाई 2017 तक पूरे 2.20 करोड़ रुपए का संदाय कर दिया था, और इस संदाय के बाद समझौता पूरी तरह से और अंतिम रूप से समाप्त हो गया था।
- अनुतोष प्रदान करने पर: न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय और उच्च न्यायालय के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया, पत्नी की अतिरिक्त कोष बनाने की मांग को मानने से इंकार कर दिया और अपील खारिज कर दी।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 142 क्या है?
बारे में:
- भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत प्राप्त शक्ति उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्ण न्याय करने के लिये प्रयोग की जाने वाली एक अंतर्निहित शक्ति है।
- इसका उद्देश्य न्यायालय को विधि घोषित करने और ऐसे निदेश या आदेश जारी करने में सक्षम बनाना है जो उसके समक्ष किसी मामले या विवाद में पूर्ण न्याय प्राप्त करने के लिये आवश्यक हों।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 142:
अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय की डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन और प्रकटीकरण संबंधी आदेशों का उपबंध करता है।
- अनुच्छेद 142(1): उच्चतम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए, अपने समक्ष लंबित किसी भी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक कोई भी डिक्री या आदेश पारित कर सकता है। ऐसी डिक्री या आदेश संसद द्वारा विहित विधि से, या जब तक ऐसा कोई विधि न बन जाए, राष्ट्रपति द्वारा विहित विधि से पूरे भारत में लागू की जा सकती है।
- अनुच्छेद 142(2): संसद द्वारा बनाई गई किसी भी विधि के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय को किसी भी व्यक्ति की उपस्थिति सुनिश्चित करने, दस्तावेजों की खोज या उत्पादन, या स्वयं की अवमानना का अन्वेषण या दण्ड देने के लिये आदेश देने की सभी शक्तियां प्राप्त हैं।
पिछले कुछ वर्षों में, इस उपबंध का मुख्य रूप से दो उद्देश्यों के लिये उपयोग किया गया है: पहला, किसी दिये गए मामले में "पूर्ण न्याय" करने के लिये, और दूसरा, विधायी कमियों को दूर करने के लिये।
अनुच्छेद 142 को विकसित करने वाले महत्त्वपूर्ण न्यायिक मामले:
- प्रेम चंद गर्ग बनाम उत्तर प्रदेश उत्पाद शुल्क आयुक्त (1963): एक संविधान पीठ ने इस बात पर विचार किया कि क्या उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों के विपरीत कोई नियम बना सकता है या आदेश जारी कर सकता है। न्यायमूर्ति गजेंद्रगडकर ने माना कि यद्यपि अनुच्छेद 142 के अंतर्गत शक्तियां व्यापक हैं, फिर भी न्यायालय किसी भी सांविधानिक उपबंध के स्पष्ट रूप से विपरीत कोई आदेश जारी नहीं कर सकता। न्यायालय ने इस उपबंध का एक सीमित निर्वचन अपनाया।
- सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य और अन्य (1967): भावी निरसन के सिद्धांत का आह्वान करते हुए, न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 142 के अधीन शक्ति व्यापक और लचीली है, जो इसे न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिये विधिक सिद्धांतों को तैयार करने में सक्षम बनाती है।
- यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन बनाम भारत संघ (1991): न्यायालय ने यह माना कि सामान्य विधियों में निहित सीमाएं या निषेध स्वतः ही अनुच्छेद 142 के अधीन शक्ति के प्रयोग को प्रतिबंधित नहीं करते हैं। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार और यूनियन कार्बाइड के बीच हुए समझौते को बरकरार रखा और मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिये UCC के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में लंबित सभी सिवल और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
- दिल्ली न्यायिक सेवा संघ बनाम गुजरात राज्य (1991): न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 142 के अधीन उसकी अंतर्निहित शक्ति, अनुच्छेद 32 और 136 के अधीन शक्तियों के साथ मिलकर, उसे किसी भी न्यायालय के समक्ष कार्यवाही को रद्द करने का अधिकार देती है जिससे उसके समक्ष मामले में पूर्ण न्याय किया जा सके।
- सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1998): न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 142 के अंतर्गत प्राप्त पूर्ण शक्तियां विभिन्न विधियों द्वारा विशेष रूप से प्रदत्त शक्तियों की अंतर्निहित और अनुपूरक हैं, और उन विधियों द्वारा सीमित नहीं हैं। ये शक्तियां बहुत व्यापक हैं और प्रकृति में अनुपूरक हैं। यह पूर्ण अधिकारिता शक्ति का एक अवशिष्ट स्रोत है जिसका उपयोग उच्चतम न्यायालय तब कर सकता है जब ऐसा करना न्यायसंगत और उचित हो, विशेष रूप से विधि के अनुसार न्याय प्रदान करते समय पक्षकारों के बीच विधि की उचित प्रक्रिया और पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिये।