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सिविल कानून

परिवीक्षाधीन कर्मचारी भी दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अधीन 'कर्मचारी' है

 04-Aug-2026

संजय चौधरी बनाम राजस्थान राज्य और अन्य 

"यह समझ से बाहर है कि नियमित भर्ती प्रक्रिया के बाद नियुक्त याचिकाकर्त्ता को 2016 के अधिनियम की धारा 20 के अंतर्गत कर्मचारी क्यों नहीं माना जाएगा।" 

न्यायमूर्ति रेखा बोराना 

स्रोत: राजस्थान उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति रेखा बोराना की पीठ नेसंजय चौधरी बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें यह अभिनिर्धारित किया कि सेवा के दौरान दिव्यांगता प्राप्त करने वाले परिवीक्षाधीन कर्मचारी को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 20 के अधीन संरक्षण प्राप्त हैऔर परिवीक्षा पर रहते हुए 100% दिव्यांगता प्राप्त करने के बाद सेवा से हटाए गए पुलिस कांस्टेबल की बर्खास्तगी को अपास्त कर दिया। 

संजय चौधरी बनाम राजस्थान राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता को जून, 2013 को कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया था और वह परिवीक्षा अवधि में था जब 29 जून, 2014 को उसकी दुर्घटना हो गई। 
  • बाद में उन्हें शत प्रतिशत दिव्यांगता से ग्रसित घोषित किया गया और उनकी सेवाएँ इस आधार पर समाप्त कर दी गईं कि वे कांस्टेबल के कर्त्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो गए थे।  
  • याचिकाकर्त्ता ने उच्च न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 20(4) के द्वितीय परंतुक के अधीनसेवा के दौरान दिव्यांगता प्राप्त करने वाले कर्मचारी को सेवा से हटाया नहीं जा सकता है और उसे या तो किसी अन्य उपयुक्त पद पर समायोजित किया जाना चाहियेया सेवानिवृत्ति की आयु तक सेवा में माना जाना चाहिये।  
  • राज्य ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि चूँकि याचिकाकर्ता घटना के समय परिवीक्षाधीन प्रशिक्षु था और सेवा में स्थायी नहीं हुआ थाइसलिये वह अधिनियम की धारा 20 का लाभ उठाने का हकदार नहीं था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अधिनियम के अधीन "कर्मचारी" के अर्थ पर:न्यायालय ने माना कि चूँकि याचिकाकर्त्ता को चयन की नियमित प्रक्रिया के बाद नियुक्त किया गया थाइसलिये वह "कर्मचारी" की श्रेणी में आता हैऔर अधिनियम की धारा 20(4) "कर्मचारी" शब्द को सेवा के किसी विशेष स्थायी वर्ग तक सीमित नहीं करती है। 
  • परिवीक्षाधीन कर्मचारी की स्थिति के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि यह नहीं कहा जा सकता कि सेवा में स्थायीकरण होने तक परिवीक्षाधीन कर्मचारी "कर्मचारी" नहीं हैऔर यह माना कि इसके विपरीत राज्य का निष्कर्ष विधि का पूर्णतः उल्लंघन है। 
  • पूर्व निर्णयों पर निर्भरता के संबंध में:न्यायालय ने वी.पी. आहूजा बनाम पंजाब राज्य और अन्य के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय का हवाला दियाजिसमें यह माना गया था कि परिवीक्षाधीन कर्मचारी भी कुछ सुरक्षाओं का हकदार है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किये बिना उसकी सेवाओं को मनमाने ढंग से समाप्त नहीं किया जा सकता है। 
  • बर्खास्तगी आदेश की वैधता पर:न्यायालय ने माना कि बर्खास्तगी आदेश दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 20 का उल्लंघन करता है और तदनुसार इसे अपास्त कर दिया। 
  • अनुतोष प्रदान किये जाने पर:न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्त्ता अधिनियम की धारा 20 के अधीन सभी लाभों का हकदार हैऔर राज्य को निदेश दिया कि उसे सेवा में माना जाए और उसे तत्काल प्रभाव से बहाल किया जाए। 

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 20 क्या है? 

अधिनियम के बारे में: 

  • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 को 27 दिसंबर 2016 को अधिनियमित किया गया थाजिसने दिव्यांगजन अधिकार (समान अवसरअधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 का स्थान लिया। 
  • यह अधिनियम 19 अप्रैल 2017 को लागू हुआजो भारत में दिव्यांगजन व्यक्तियों (PwDs) के लिये अधिकार-आधारित ढाँचे की ओर एक परिवर्तन का प्रतीक है। 
  • यह अधिनियम 1995 के अधिनियम के अधीन मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं के दायरे को श्रेणियों से बढ़ाकर 21 स्थितियों तक विस्तारित करता हैजिसमें शारीरिकबौद्धिकमानसिक और संवेदी अक्षमताएं शामिल हैं। 
  • इस अधिनियम के अधीन शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी प्रतिष्ठानों में दिव्यांग व्यक्तियों के लिये सीटें और पद आरक्षित करना अनिवार्य हैजिससे शिक्षा और नियोजन तक उनकी पहुँच सुनिश्चित हो सके। 
  • यह लोक स्थानोंपरिवहन और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकियों में बाधा-मुक्त वातावरण बनाने पर बल देता है जिससे अधिक सुलभता सुनिश्चित हो सके। 
  • यह अधिनियम संबंधित सरकार को दिव्यांग व्यक्तियों की सामाजिक सुरक्षास्वास्थ्य देखरेख और पुनर्वास के लिये योजनाएं और कार्यक्रम तैयार करने के लिये बाध्य करता है। 
  • इसमें सार्वजनिक भवनों के लिये दिशानिर्देश और मानक तैयार करने का प्रावधान है जिससे सभी की पहुँच सुनिश्चित हो सके। 

धारा 20 – नियोजन में विभेद न करना : 

  • धारा 20(1) में उपबंधित किया है कि कोई भी सरकारी प्रतिष्ठान नियोजन से संबंधित किसी भी मामले में किसी दिव्यांग व्यक्ति के साथ विभेद नहीं करेगायद्यपि समुचित सरकार अधिसूचना द्वारा और शर्तों के अधीनकिये जा रहे कार्य के प्रकार को ध्यान में रखते हुए किसी भी प्रतिष्ठान को इस उपबंध से छूट दे सकती है।  
  • धारा 20(2) प्रत्येक सरकारी प्रतिष्ठान पर दिव्यांग कर्मचारियों को उचित आवास और उपयुक्त बाधा-मुक्त और अनुकूल वातावरण प्रदान करने का दायित्व डालती है। 
  • धारा 20(3) में उपबंधित किया गया है कि किसी व्यक्ति को केवल दिव्यांगता के आधार पर पदोन्नति से वंचित नहीं किया जाएगा। 
  • धारा 20(4) में उपबंधित किया है कि कोई भी सरकारी प्रतिष्ठान किसी ऐसे कर्मचारी को सेवामुक्त नहीं करेगा या उसकी रैंक कम नहीं करेगा जो सेवा के दौरान दिव्यांगता प्राप्त कर लेता है।  
  • धारा 20(4) का प्रथम परंतुक यह कहता है कि यदि कोई कर्मचारी दिव्यांगता प्राप्त करने के बाद उस पद के लिये उपयुक्त नहीं है जिस पर वह कार्यरत थातो उसे उसी वेतनमान और सेवा लाभों के साथ दूसरे पद पर स्थानांतरित कर दिया जाएगा। 
  • धारा 20(4) का द्वितीय परंतुक यह कहता है कि यदि कर्मचारी को किसी पद पर समायोजित करना संभव नहीं हैतो उसे किसी अतिरिक्त पद पर तब तक रखा जाएगा जब तक कि कोई उपयुक्त पद उपलब्ध न हो जाए या वह सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त न कर लेजो भी पहले हो। 
  • धारा 20(5) समुचित सरकार को दिव्यांग कर्मचारियों की तैनाती और स्थानांतरण के लिये नीतियां बनाने का अधिकार देती है। 

सिविल कानून

दीर्घ विलंब होने पर विनिर्दिष्ट पालन से इंकार किया जा सकता है

 04-Aug-2026

वी.एन..एस. चंद्रन बनाम एस. वेनिला और अन्य 

"करार की तारीख से लेकर डिक्री जारी होने तक तत्परता और इच्छाशक्ति निरंतर बनी रहनी चाहिये।" 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अंजारिया 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अंजारी की पीठ नेवी.एन.ए.एस. चंद्रन बनाम एस. वेनिला और अन्य (2026)के मामले मेंमद्रास उच्च न्यायालय के उस निर्णय के विरुद्ध संपत्ति स्वामी की अपील को मंजूर कर लियाजिसमें 2004 के विक्रय करार के विनिर्दिष्ट पालन का निदेश दिया गया था। पीठ ने माना कि क्रेता निरंतर तत्परता और इच्छाशक्ति स्थापित करने में विफल रहे थे और न्यायनिर्णय में दीर्घ विलंब ने उन्हें न्यायसंगत अनुतोष के लिये स्वतंत्र रूप से अयोग्य बना दिया था। 

वी.एन.ए.एस. चंद्रन बनाम एस. वेनिला और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • पक्षकारों ने अप्रैल, 2004 को विक्रय के लिये एक करार कियाजिसके अधीन अपीलकर्त्ता ने ऊधगमंडलम में एक संपत्ति को ₹2.25 करोड़ में बेचने पर सहमति व्यक्त की। 
  • विचारण न्यायालय द्वारा यह पाया गया कि क्रेताओं ने 85 लाख रुपए का अग्रिम संदाय किया था। 
  • अग्रिम संदाय अभिलिखित होते हुए भी विचारण न्यायालय ने विनिर्दिष्ट पालन का विवेकाधीन अनुतोष देने से इंकार कर दिया। 
  • अपील परमद्रास उच्च न्यायालय ने इस निर्णय को पलट दिया और क्रेताओं के पक्ष में विक्रय विलेख को निष्पादित करने का निदेश दिया। 
  • संपत्ति के स्वामी ने उच्च न्यायालय के निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • निरंतर तत्परता और इच्छाशक्ति के संबंध में:न्यायालय ने माना कि विनिर्दिष्ट पालन की मांग करने वाले वादी को करार के तुरंत बाद से लेकर डिक्री के निष्पादन तकप्रत्येक महत्त्वपूर्ण चरण में धन की उपलब्धता और संविदा को पूरा करने के लिये निरंतर तत्परता और इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करना होगान कि केवल मुकदमेबाजी के अलग-अलग बिंदुओं पर। 
  • अपील के दौरान प्रस्तुत मांग ड्राफ़्ट पर:न्यायालय ने 2011 में अपीलीय कार्यवाही के दौरान ही क्रेताओं द्वारा प्रस्तुत ₹1.40 करोड़ के मांग ड्राफ़्ट पर उच्च न्यायालय के विश्वास को खारिज कर दियायह मानते हुए कि मुकदमे के वर्षों बाद व्यवस्थित की गई धनराशि भूतलक्षी रूप से निरंतर वित्तीय तत्परता को स्थापित नहीं कर सकती है। 
  • क्रेताओं की वित्तीय स्थिति के संबंध में:पीठ ने पाया कि वाद दायर करते समय क्रेताओं ने पर्याप्त धनराशि होने का सबूत नहीं दिया थायह देखते हुए कि धन जुटाने के लिये जिस समझौता ज्ञापन पर वे निर्भर थेउसका उल्लेख न तो उनके विधिक नोटिस में किया गया था और न ही वादपत्र में। 
  • चेकों के अनादरण के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि क्रेताओं द्वारा विक्रय मूल्य के लिये जारी किये गए दो चेकक्रमशः 25 लाख रुपए और लाख रुपए केअपर्याप्त धनराशि के कारण अनादृत हो गएजिससे उनकी वित्तीय तत्परता का दावा कमजोर पड़ गया। 
  • क्रेताओं द्वारा अपनी संपत्ति के विक्रय के समय के संबंध में:पीठ ने पाया कि क्रेताओं ने चेन्नई में अपनी संपत्तियां मई 2006 में ही बेचींजबकि वाद सितंबर 2005 में पहले ही दायर किया जा चुका थाजिससे यह संकेत मिलता है कि वाद संस्थित करते समय उनके पास आवश्यक धनराशि का अभाव था। 
  • पूर्व निर्णयों पर निर्भरता:न्यायालय ने एन.पी. थिरुग्ननम बनाम डॉ. आर. जगन मोहन राव और जनार्दन दास बनाम दुर्गा प्रसाद अगरवाला (2024) पर विश्वास करते हुए दोहराया कि निरंतर तत्परता और इच्छाशक्ति विनिर्दिष्ट पालन के लिये एक पूर्व शर्त हैजिसका आकलन करार और डिक्री के बीच की पूरी अवधि में वादी के आचरण से किया जाना चाहिये 
  • क्रेताओं के असंगत आचरण पर:न्यायालय ने माना कि एक क्रेता द्वारा अग्रिम राशि की वसूली के लिये आपराधिक परिवाद दर्ज करनासाथ ही साथ सिविल वाद में विनिर्दिष्ट पालन की मांग करनाऔर किसी पर-व्यक्ति को संविदात्मक अधिकारों के हस्तांतरण पर विरोधाभासी रुख अपनानाक्रेताओं को न्यायसंगत अनुतोष से और भी वंचित करता है। 
  • विलंब को एक स्वतंत्र आधार मानते हुए:पीठ ने माना कि करार के बाद से दो दशकों से अधिक का समय बीत जानाअपने आप मेंविनिर्दिष्ट पालन प्रदान करने के विरुद्ध एक कारक हैऔर सरदामणि कंदप्पन और नंजप्पन के अपने पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि प्रतिवादी को होने वाली कठिनाई - एक पक्ष की अधिक आयु और दूसरे पक्ष की मुकदमेबाजी के दौरान मृत्यु हो जाने के कारण – विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 20 के अधीन एक मान्यता प्राप्त विचारणीय बिंदु है। 
  • अनुतोष प्राप्त होने पर:उच्चतम न्यायालय ने विचारण न्यायालय के उस निर्णय को बहाल कर दिया जिसमें 85 लाख रुपए ब्याज सहित वापस करने का निदेश दिया गया था और क्रेताओं को उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार पहले से जमा किये गए 1.40 करोड़ रुपएसाथ ही अर्जित ब्याज को निकालने की अनुमति दी गई थी। 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 के अंतर्गत विशिष्ट निष्पादन क्या है? 

बारे में: 

  • विनिर्दिष्ट पालन न्यायालय द्वारा पक्षकारों के बीच संविदात्मक प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने के लिये प्रदान किया गया एक न्यायसंगत उपचार है। 
  • क्षतिपूर्ति के दावे के विपरीतजिसमें संविदात्मक शर्तों को पूरा न करने के लिये प्रतिकर की मांग की जाती हैविनिर्दिष्ट पालन एक ऐसे उपचार के रूप में कार्य करता है जो पक्षकारों के बीच सहमत शर्तों को लागू करता है। 
  • यह विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (SRA) द्वारा शासित है।  
  • विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 10 संविदाओं के संबंध में विनिर्दिष्ट पालन से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि: 
    • किसी संविदा का विनिर्दिष्ट पालन न्यायालय द्वारा धारा 11 की उपधारा (2), धारा 14 और धारा 16 में निहित उपबंधों के अधीन लागू किया जाएगा। 
  • उच्चतम न्यायालय नेकट्टा सुजाता रेड्डी बनाम सिद्दामसेट्टी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स (पी.) लिमिटेड (2023) के मामलेमें यह अभिनिर्धारित किया कि किसी संविदा के विनिर्दिष्ट पालन का अनुतोष तभी प्रदान किया जा सकता है जब ऐसे अनुतोष का दावा करने वाला पक्षकार संविदा के अधीन अपने दायित्वों को पूरा करने के लिये अपनी तत्परता और इच्छाशक्ति दिखाए। 

ऐतिहासिक निर्णय : 

  • परम पूज्य आचार्य स्वामी गणेशदासजी बनाम सीताराम अपार (1996): 
    • इस निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने 'तैयारीऔर 'इच्छाके बीच अंतर स्पष्ट किया। 
    • 'तैयारीसे तात्पर्य वादी की वित्तीय क्षमता और संविदा को पूरा करने की योग्यता से हैजबकि 'इच्छाका संबंध वादी के आचरण और संविदात्मक दायित्वों को पूरा करने के आशय से है। 
  • मान कौर बनाम हरतार सिंह संघा (2010): 
    • इस मामले मेंउच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि भले ही प्रतिवादी ने संविदा का भंग किया होवादी विनिर्दिष्ट पालन के लिये डिक्री प्राप्त नहीं कर सकता है यदि वादी संविदात्मक दायित्वों के अपने भाग को पूरा करने के लिये  अपनी निरंतर तत्परता और इच्छा को साबित करने में विफल रहता है। 
  • सारदामणि कंदप्पन बनाम एस. राजलक्ष्मी (2011): 
    • इस महत्त्वपूर्ण निर्णय मेंउच्चतम न्यायालय ने कहा कि अचल संपत्ति की कीमतों में भारी वृद्धि के साथयदि क्रेता विक्रेता की ओर से उचित कारण बताए बिना संदाय में विलंब करता हैतो विनिर्दिष्ट पालन प्रदान करना अनुचित हो जाता है। 
    • ऐसे मामलों में न्यायालयों को अधिक गहन जांच-पड़ताल करने की आवश्यकता है। 
  • राजेश कुमार बनाम आनंद कुमार (2024): 
    • उच्चतम न्यायालय के इस हालिया निर्णय में पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा दिये गए परिसाक्ष्य के साक्ष्य मूल्य से संबंधित मुद्दे पर विचार किया गया। 
    • इसमें कहा गया है कि पावर ऑफ अटॉर्नी धारक किसी पक्षकार की ओर से साक्षी नहीं बन सकता और संविदा को पूरा करने के लिये उस पक्षकार की तत्परता और इच्छा को साबित करने के लिये कथन नहीं दे सकता।