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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

पैरोल से इंकार

 06-Aug-2026

दीप राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य 

"एक बार जब किसी दोषी व्यक्ति द्वारा पैरोल के लिये दावा किया जाता है और यह हिमाचल प्रदेश सदाचरण बंदी परिवीक्षात्मक रिहाई अधिनियम और नियमों द्वारा शासित होता हैतो इसके अधीन बनाई गई संविधि और नियम इस पर कोई रोक या प्रतिबंध नहीं लगती हैं कि महीने की अवधि समाप्त होने से पहले दूसरी पैरोल पर विचार/स्वीकृति नहीं दी जा सकती है।" 

न्यायमूर्ति संदीप शर्मा 

स्रोत: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की पीठ नेदीप राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि किसी कैदी की पैरोल की अर्जी को केवल इस आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसकी पिछली पैरोल रिहाई के बाद से छह महीने नहीं बीते हैंऔर यह निर्णय दिया कि हिमाचल प्रदेश जेल नियमावली, 2021 का पैराग्राफ़ 19.12 हिमाचल प्रदेश सदाचरण बंदी परिवीक्षात्मक रिहाई अधिनियम, 1968 के अधीन प्रदत्त पैरोल मांगने के सांविधिक अधिकार को कम नहीं कर सकता है। 

दीप राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता दीप राम अपनी पत्नी के साथजिसे इसी मामले में दोषी ठहराया गया थामादक औषधि एवं मनोरोगी पदार्थ अधिनियम, 1985 के अधीन 20 वर्ष की सजा काट रहा हैदोनों को कांडा स्थित मॉडल सेंट्रल जेल में रखा गया है। 
  • याचिकाकर्त्ता पहले ही नौ वर्ष से अधिक का कारावास भोग चुका है और उसे पहले आठ बार पैरोल पर छोड़ा जा चुका है और उसने हर बार शर्तों का कोई उल्लंघन किये बिना समय पर जेल में आत्मसमर्पण कर दिया था। 
  • याचिकाकर्त्ता ने अपनी पत्नी की देखरेख के लिये 28 दिनों की पैरोल मांगी थीजिनकी शिमला के इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) में कान की सर्जरी होनी थी। 
  • जेल अधिकारियों ने हिमाचल प्रदेश जेल नियमावली, 2021 के पैराग्राफ 19.12 का हवाला देते हुएकेवल इस आधार पर उनकी पैरोल याचिका खारिज कर दी कि उनकी पिछली पैरोल के बाद से छह महीने नहीं बीते थे। 
  • अस्वीकृति से व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर अस्वीकृति आदेश को रद्द करने और उसे पैरोल पर छोड़ने के निदेश देने की मांग की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • सांविधिक प्रतिबंध के अभाव में:न्यायालय ने पाया कि हिमाचल प्रदेश सदाचरण बंदी परिवीक्षात्मक रिहाई अधिनियम, 1968 और उसके अंतर्गत निर्मित नियम पिछली रिहाई के छह महीने की समाप्ति से पहले दूसरी पैरोल पर विचार करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाते हैंऔर दोषी व्यक्ति का पैरोल का दावा पूरी तरह से मूल अधिनियम और नियमों द्वारा नियंत्रित होता है। 
  • जेल नियमावली की स्थिति पर:न्यायालय ने माना कि जेल नियमावली अधीनस्थ विधान है और यह मूल अधिनियम और नियमों के साथ असंगत या विपरीत शर्तें लागू नहीं कर सकता हैऔर इसलिये हिमाचल प्रदेश जेल नियमावली, 2021 के पैराग्राफ 19.12 के अधीन छह महीने की पाबंदी सांविधिक ढाँचे को रद्द नहीं कर सकती है। 
  • याचिकाकर्त्ता के आचरण रिकॉर्ड पर:यह देखते हुए कि याचिकाकर्त्ता को पहले आठ बार पैरोल दी जा चुकी थीउसने हर बार समय पर आत्मसमर्पण किया थाऔर उसके आचरण के विरुद्ध कोई प्रतिकूल रिपोर्ट नहीं थीन्यायालय ने माना कि अधिकारियों के पास केवल इस आधार पर उसके आवेदन को अस्वीकार करने का कोई औचित्य नहीं था कि छह महीने की अवधि समाप्त नहीं हुई थी। 
  • प्रक्रियात्मक गैर-अनुपालन पर:न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्त्ता का आवेदन अधिनियम की धारा के अधीन रिपोर्ट के लिये जिला मजिस्ट्रेट को भेजा ही नहीं गया थाअपितु केवल जेल नियमावली के आधार पर खारिज कर दिया गया थाजिससे अस्वीकृति विधिक रूप से अस्थिर हो गई। 
  • प्रदान किये गए अनुतोष के संबंध में:रिट याचिका को मंजूर करते हुएन्यायालय ने याचिकाकर्त्ता की पैरोल याचिका को खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया। 

पैरोल क्या है? 

बारे में: 

  • पैरोल किसी कैदी की अस्थायी रिहाई हैजिसमें सजा पूरी होने से पहले कैदी कुछ शर्तों को मानने के लिये सहमत होता है। 
  • पैरोल को एक कैदी की सशर्त रिहाई के रूप में परिभाषित किया जाता हैजो सामान्यतः एक पैरोल अधिकारी की देखरेख में होती हैजिसने उस अवधि का कुछ भाग पूरा कर लिया होता है जिसके लिये उसे जेल की सजा सुनाई गई थी। 
  • इन शर्तों में प्राय: पैरोल अधिकारी के साथ नियमित रूप से संपर्क में रहनानियोजन बनाए रखना या शैक्षिक कार्यक्रमों में भाग लेना और आपराधिक क्रियाकलापों से दूर रहना शामिल होता है। 
  • पैरोल सामान्यत: अच्छे व्यवहारअपराध की प्रकृति और पुनर्वास की संभावना जैसे कारकों के आधार पर दी जाती है। 
  • यह व्यक्तियों को निगरानी में रहते हुए धीरे-धीरे समाज में पुनः एकीकृत होने की अनुमति देता है। 
  • पैरोल की शर्तों का उल्लंघन करने पर व्यक्ति को अपने शेष दण्ड को भोगने के लिये वापस जेल भेजा जा सकता है। 

पैरोल का उद्देश्य: 

  • कैदी के लिए पारिवारिक संबंधों को बनाए रखने में सहायता करना और परिवार से संबंधित मामलों का समाधान करना। 
  • कैदी के स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन कारावास के प्रतिकूल प्रभावों को कम करना। 
  • कैदी के आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहयोग करना। 
  • कैदी के लिये सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना और जीवन के प्रति सक्रिय सहभागिता को बढ़ावा देना। 

पैरोल के प्रकार: 

  • अभिरक्षा से पैरोल: 
    • यह आपातकालीन स्थितियों में प्रदान किया जाता है। 
    • विदेशियों और मृत्युदण्ड की सजा काट रहे लोगों को छोड़करपरिवार के किसी सदस्य की मृत्यु या विवाह जैसे कारणों से सभी दोषी व्यक्ति 14 दिनों के लिये इस पैरोल के पात्र हो सकते हैं। 
  • नियमित पैरोल: 
    • जिन अपराधियों ने कम से कम एक वर्ष जेल में बिताया हैवे अधिकतम एक महीने के लिये नियमित पैरोल के पात्र हैं। 
    • यह विवाहदुर्घटनामृत्युपरिवार में बीमारी या बच्चे के जन्म आदि जैसे कुछ आधारों पर आवंटित किया जाता है। 

पैरोल में कौन-कौन से विधिक उपबंध शामिल हैं? 

  • पैरोल देना 1894 के कारागार अधिनियम और 1900 के कारागार अधिनियम के अधीन स्थापित नियमों के दायरे में आता है। 
  • विभिन्न राज्य सरकारों ने विशिष्ट मामलों में पैरोल देने के संबंध में निष्पक्षता सुनिश्चित करने और निर्णय लेने की प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिये दिशानिर्देश तैयार किये हैं। 
  • ये निर्णय समय-समय पर तैयार किये गए दिशा-निर्देशों के अनुसार लिये जाते हैं। 
  • उदाहरण के लियेमहाराष्ट्र मेंकारागार (बॉम्बे फर्लो और पैरोल) नियम, 1959, कारागार अधिनियम, 1984 की धारा 59(5) द्वारा प्रदत्त नियम बनाने की शक्ति के अधीन अधिनियमित किये गए हैं।  
  • ये नियम राज्य में पैरोल के प्रशासन और विनियमन के लिये एक ढाँचा प्रदान करते हैं। 
  • सुनील फुलचंद शाह बनाम भारत संघ, 2000 के मामले मेंइस बात पर बल दिया गया कि "पैरोल का अर्थ दण्ड का निलंबन नहीं है"। 
    • यह अवलोकन इस बात पर बल देता है कि पैरोल को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 में उल्लिखित दण्ड के निलंबन के समान नहीं माना जा सकता है। 

जमानत और पैरोल में क्या अंतर हैं? 

भारतीय विधि मेंपैरोल और जमानत अलग-अलग विधिक अवधारणाएं हैं जिनके अलग-अलग उद्देश्य और निहितार्थ हैं: 

पहलू 

पैरोल 

जमानत 

परिभाषा 

पैरोल का तात्पर्य दोषसिद्ध बंदी को उसकी पूर्ण सजा अवधि समाप्त होने से पूर्व सशर्त रूप से कारागार से अस्थायी रिहाई प्रदान करना हैजो उसके सदाचरण पर निर्भर होती है। 

जमानत का तात्पर्य विचारण लंबित रहने के दौरान अभियुक्त की अस्थायी रिहाई से हैजो सामान्यतः प्रतिभूति या बंधपत्र प्रस्तुत करने के अधीन होती है। 

उद्देश्य 

दीर्घकालिक कारावास का दण्ड भुगत रहे बंदियों के पुनर्वास एवं समाज में पुनर्समावेशन को सुगम बनाने के लिये पैरोल प्रदान किया जाता है। 

जमानत का उद्देश्य अभियुक्त की न्यायालय के समक्ष उपस्थिति सुनिश्चित करना तथा विचारण के दौरान उसे सामान्य जीवन व्यतीत करने की अनुमति देना है। 

पात्रता 

सामान्यतः अच्छे आचरण वाले दीर्घकालिक बंदियों को पैरोल प्रदान की जाती है। हत्या या बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में दोषसिद्ध व्यक्तियों को प्रायः पैरोल का लाभ उपलब्ध नहीं होता। 

जमानत सामान्यतः अधिकांश अभियुक्तों के लिए उपलब्ध होती हैतथापि गंभीर अपराधोंअभियुक्त के फरार होने की आशंका अथवा उससे उत्पन्न खतरे की स्थिति में जमानत से इंकार किया जा सकता है। 

अवधि 

पैरोल कारागार प्राधिकारियों अथवा न्यायालय द्वारासंबंधित विधिक अधिकारिता के अनुसारप्रदान की जा सकती है। 

जमानत न्यायालय द्वारा प्रदान की जाती है। 

शर्तें 

पैरोल की शर्तों में नियमित रूप से पुलिस के समक्ष रिपोर्ट करनाअवैध क्रियाकलापों से विरत रहना तथा कभी-कभी निर्दिष्ट क्षेत्र की सीमाओं के भीतर रहना शामिल हो सकता है। 

जमानत की शर्तों में नियमित रूप से न्यायालय में उपस्थित होनाआपराधिक क्रियाकलापों से विरत रहना तथा कभी-कभी यात्रा पर प्रतिबंध या गृह-नजरबंदी जैसी शर्तें शामिल हो सकती हैं। 

  • पैरोल और जमानत दोनों में ही अभिरक्षा से अस्थायी छोड़ा जाना शामिल होता हैलेकिन भारतीय विधि में इनके उद्देश्य भिन्न होते हैं और इन्हें अलग-अलग परिस्थितियों में प्रदान किया जाता है। 
  • पैरोल उन व्यक्तियों के लिये है जो पहले से ही दण्ड भोग रहे हैंजिसका उद्देश्य पुनर्वास और समाज में पुनः एकीकरण करना हैजबकि जमानत उन लोगों के लिये है जो विचारण की प्रतीक्षा कर रहे हैंजिससे विधिक कार्यवाही में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित हो सके। 
  • अभिरक्षा में रहते हुए शपथ लेने की अनुमति मिलना वास्तव में एक विशेष परिस्थिति हैजो आधिकारिक कर्त्तव्य को पूरा करने के उद्देश्य से अस्थायी रिहाई या विशेष पैरोल के समान है। 
    • इसका अर्थ जमानत पर छोड़ना नहीं हैक्योंकि व्यक्ति उस विशिष्ट घटना या क्रियाकलाप को छोड़कर अभिरक्षा में ही रहता है जिसके लिये उसे बाहर जाने की अनुमति दी जाती है। 

सांविधानिक विधि

उच्चतम न्यायालय के निर्णय भूतलक्षी होते हैं जब तक कि उन्हें स्पष्ट रूप से भावी प्रभाव के लिये निर्धारित न किया गया हो

 06-Aug-2026

भारत सरकार एवं अन्य. बनाम श्री देवराज उर्स मेडिकल कॉलेज 

"यदि उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान नहीं है कि यह भविष्य में लागू होगातो यह स्थापित विधि है कि इस न्यायालय के सभी निर्णय भूतलक्षी रूप से लागू होते हैं।" 

न्यायमूर्ति शील नागू और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ नेभारत सरकार और अन्य बनाम श्री देवराज उर्स मेडिकल कॉलेज (2026)के मामले में दोहराया कि उच्चतम न्यायालय का निर्णय भूतलक्षी रूप से लागू होता है जब तक कि इसमें स्पष्ट रूप से अन्यथा न कहा गया होऔर कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस निदेश को अपास्त कर दिया जिसमें मेडिकल कॉलेज के छात्रों के लिये अनुदान योजना का लाभ बढ़ाया गया थाजबकि इस योजना को ग्यारह न्यायाधीशों की संविधान पीठ नेटी.एम.. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002) में असांविधानिक घोषित कर दिया था। 

भारत सरकार और अन्य बनाम श्री देवराज उर्स मेडिकल कॉलेज (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • उच्चतम न्यायालय के अंतरिम निर्देशों के अनुसार 1995 में शुरू की गई एक अनुदान योजना में कुछ मेडिकल कॉलेज के छात्रों को अनुदान राशि के संदाय का प्रावधान था। 
  • TMA पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य के मामले में ग्यारह न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 31 अक्टूबर, 2002 को अपना निर्णय सुनाते हुए योजना को असांविधानिक घोषित कर दिया। 
  • विवाद इस बात को लेकर उठा कि क्या शैक्षणिक वर्ष 2002-03 में पूरे पाँच वर्षीय पाठ्यक्रम के लिये प्रवेश लेने वाले छात्रों के लिये अनुदान योजनायोजना के निरस्त किये जाने के बावजूदबरकरार रही। 
  • प्रत्यर्थी संस्था ने तर्क दिया कि "यथास्थिति" का निदेश देने वाले बाद के स्पष्टीकरण आदेश से संकेत मिलता है कि संविधान पीठ का निर्णय भविष्य में लागू होने के लिये थाजिससे मौजूदा लाभार्थियों के लिये योजना को संरक्षित किया जा सके। 
  • अपीलकर्त्ता सरकारों ने तर्क दिया कि TMA पाई फाउंडेशन में संभावित संरक्षण केवल उन सांविधिक प्रावधानों तक सीमित था जिनमें विधायी या नियामक संशोधन की आवश्यकता थीऔर यह अनुदान योजना तक विस्तारित नहीं था। 
  • कर्नाटक उच्च न्यायालय की एकल और खंडपीठ ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए 2002-03 में प्रवेश लेने वाले छात्रों को पूरे पाँच वर्षों के लिये अनुदान राशि के संदाय का निदेश दियाजबकि 2003-04 में प्रवेश लेने वाले छात्रों को इस लाभ से वंचित कर दिया। 
  • 2002-03 में प्रवेश पाने वाले छात्रों पर भी इस योजना का विस्तार करने के निदेश से व्यथित होकर केंद्र और राज्य सरकारों ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • निर्णयों के भूतलक्षी प्रभाव के संबंध में:न्यायालय ने माना कि जब तक उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय में स्पष्ट रूप से यह न कहा गया हो कि वह भविष्य में लागू होगातब तक विधि की स्थापित स्थिति यह है कि उसके सभी निर्णय भूतलक्षी रूप से लागू होते हैं। 
  • TMA पाई फाउंडेशन के प्रभाव पर:पीठ ने टिप्पणी की कि चूँकि ग्यारह न्यायाधीशों के निर्णय में भावी आवेदन के लिये स्पष्ट रूप से प्रावधान नहीं किया गया थाइसलिये यह योजना 31 अक्टूबर, 2002 को "स्वयं ही समाप्त हो गई"जिससे यह निर्णय की तारीख से ही नहीं अपितु अपनी शुरुआत से ही असांविधानिक हो गई। 
  • उच्च न्यायालय की त्रुटि पर:न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने 2002-03 में प्रवेश लेने वाले छात्रों पर अनुदान योजना का दायरा बढ़ाने में त्रुटि कीजबकि योजना को पहले ही असांविधानिक घोषित किया जा चुका थाऔर यह माना कि योजना के निरस्त होने के बाद ऐसा करना अनुमेय नहीं था। 
  • चरणबद्ध संदाय के संबंध में:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के लिये पूरे पाँच वर्षीय पाठ्यक्रम के लिये अनुदान राशि का संदाय एक बार में करना अनिवार्य नहीं थाऔर उच्च न्यायालय द्वारा 2002-03 बैच के लिये भी पूरी पाँच वर्षीय राशि जारी करने का निदेश देना गलत था। 
  • अंतिम निर्णय पर:न्यायालय ने वर्ष 2002-03 में प्रवेश लेने वाले छात्रों को पूरे पाँच वर्षों तक अनुदान लाभ देने के उच्च न्यायालय के निदेश को अपास्त कर दियाजबकि वर्ष 2003-04 में प्रवेश लेने वाले छात्रों को यह लाभ न देने के उच्च न्यायालय के निदेश को बरकरार रखा। तदनुसारअपील आंशिक रूप से मंजूर की गई। 

निर्णयों का भूतलक्षी और भावी संचालन का सिद्धांत क्या है? 

  • भूतलक्षी प्रभावका अर्थ है कि कोई निर्णय उस तारीख से लागू होता है जब संबंधित विधि या अधिकार मूल रूप से अस्तित्व में आया था या जिस घटना से वह संबंधित हैन कि केवल निर्णय की तारीख से।  
  • भावी संचालन (या भावी निरसन) का अर्थ है कि कोई निर्णय केवल उसी तिथि से लागू होता है जिस तिथि को वह सुनाया जाता हैया न्यायालय द्वारा निर्दिष्ट भविष्य की तिथि सेपूर्ववर्ती विधिक स्थिति के अधीन संपन्न पिछले संव्यवहार को प्रभावित किये बिना। 
  • सामान्य नियम:संविधान के अनुच्छेद 141 के अधीनउच्चतम न्यायालय के निर्णय सामान्यतः भूतलक्षी प्रभाव वाले होते हैंक्योंकि एक निर्णय नई विधि का निर्माण करने के बजाय यह घोषित करता है कि विधि हमेशा से क्या थी 
  • अपवाद:उच्चतम न्यायालय केवल विशिष्ट परिस्थितियों में ही अनुतोष को स्पष्ट रूप से आकार दे सकता है और किसी निर्णय को भविष्य में लागू होने योग्य घोषित कर सकता हैसामान्यतः पहले की विधि स्थिति पर विश्वस करते हुए की गई पिछली कार्रवाइयों को अस्थिर करने से उत्पन्न होने वाली अनुचित कठिनाई या प्रशासनिक अराजकता से बचने के लिये 
  • स्पष्ट घोषणा का भार:यह सिद्धांत न्यायालय पर ही यह भार डालता है कि वह स्पष्ट रूप से बताए कि कोई निर्णय भविष्य में किस प्रकार लागू होगाऐसी स्पष्ट घोषणा के अभाव मेंन्यायालयों और अधिकारियों को भूतलक्षी अनुप्रयोग मान लेना चाहिये 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 141 

  • आजादी के बादजब हमारा संविधान लागू हुआतोअनुच्छेद 141 को लागू किया गयाजिसनेभारतीय विधिक प्रणाली में न्यायिक पूर्व निर्णयों की स्थिति को मजबूत किया। 
  • अनुच्छेद 141 में कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा द्वारा घोषित विधि भारत के भूभाग के भीतर सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होगी 
  • घोषित विधि को विधि के एक सिद्धांत के रूप में समझा जाना चाहिये जो उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए किसी निर्णयया विधि के निर्वचनया निर्णय से उत्पन्न होता हैजिसके आधार पर मामले का निर्णय किया जाता है। 
  • अनुच्छेद 141 में ऐसा कोई अपवाद या उपबंध नहीं है जो उच्चतम न्यायालय को इस संबंध में टिप्पणी करने की अनुमति देता हो कि किसे पूर्व निर्णय के तौर पर नहीं माना जाएगा। 
  • एक बार निर्णय सुना दिये जाने के बादउच्चतम न्यायालय की भूमिका वहीं समाप्त हो जाती हैऔर अनुच्छेद 141 लागू हो जाता है। 
  • उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय पूर्णतः बाध्यकारी होता है। 
  • निर्णय का केवल निर्णय का आधार (ratio decidendi) वाला भाग ही बाध्यकारी होता है और समान विवाद्यकों और तथ्यों पर आधारित विधिक प्रश्नों का निर्णय करते समय इसे ध्यान में रखा जाएगा।