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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

आपराधिक पृष्ठभूमि को दबाने के लिये बर्खास्तगी से पूर्व जांच आवश्यक है

 12-Aug-2026

शत्रुघ्न यादव बनाम द फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स त्रावणकोर लिमिटेड (F.A.C.T.) और अन्य 

"इसलियेआपराधिक पृष्ठभूमि के प्रकटीकरण का स्वतः परिणाम बर्खास्तगी नहीं होता हैअपितुकर्मचारी के विशिष्ट मामले पर विचार किया जाना चाहियेऔर नियोक्ता को निर्णय लेने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार करना चाहिये।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय की एक पीठ नेजिसमें न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थेनेशत्रुघ्न यादव बनाम द फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स त्रावणकोर लिमिटेड (F.A.C.T.) और अन्य (2026) के मामले मेंनिर्णय दिया कि सेवा में शामिल होने के बाद किसी कर्मचारी द्वारा आपराधिक पृष्ठभूमि का प्रकटीकरण करने से स्वतः बर्खास्तगी नहीं होगी। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि बर्खास्तगी का आदेश पारित करने से पहलेनियोक्ता को यह निर्धारित करने के लिये एक जांच करनी होगी कि क्या जानकारी को जानबूझकर छिपाया गया था और यह निष्कर्ष अभिलिखित करना होगा कि कर्मचारी का काम जारी रखना संभव नहीं हैऔर ऐसी जांच के लिये दो-स्तरीय परीक्षण निर्धारित किया। 

शत्रुघ्न यादव बनाम फैक्ट (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता को फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स त्रावणकोर लिमिटेड द्वारा 05.05.2021 को दो वर्ष की प्रारंभिक अवधि के लिये समेकित वेतन पर तकनीशियन (प्रक्रिया) के पद पर नियुक्त किया गया था। 
  • छह महीने बादनियोक्ता ने जिला मजिस्ट्रेट से अपीलकर्त्ता के आपराधिक इतिहास के सत्यापन की मांग कीजिन्होंने बताया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 323 और 504 के अधीन अपीलकर्त्ता के विरुद्ध दिनांक 03.04.2019 को एक असंज्ञेय रिपोर्ट दर्ज की गई थी। 
  • अपीलकर्त्ता को 30.04.2022 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया थाजिसमें उसे यह बताने का निदेश दिया गया था कि मिथ्या जानकारी देने के लिये उसकी सेवाएं समाप्त क्यों नहीं की जानी चाहिये 
  • अपीलकर्त्ता ने कार्यभार ग्रहण करते समय अपने विरुद्ध किसी आपराधिक मामले की जानकारी होने से इंकार कियाऔर इसके लिये उसने 06.06.2023 के एक बाद के कथन का हवाला दिया जिसमें अभिलिखित था कि पुलिस को उसके विरुद्ध कोई सबूत नहीं मिला था और उसका नाम अभियुक्तों की सूची से हटा दिया गया था। 
  • कथित जानकारी को छिपाने की सच्चाई की जांच किये बिना या यह अभिलिखित किये बिना कि उसका काम जारी रखना क्यों संभव नहीं थानियोक्ता ने अपीलकर्त्ता की सेवाओं को समाप्त करने का आदेश पारित कर दिया। 
  • अपीलकर्त्ता ने केरल उच्च न्यायालय का रुख किया। एकल न्यायाधीश ने माना कि NCR के बारे में अनभिज्ञ होने का उनका दावा तथ्य का एक विवादित प्रश्न है जिसके लिये सबूत की आवश्यकता हैऔर खंडपीठ ने इस दृष्टिकोण को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • जांच की आवश्यकता पर:न्यायालय ने माना कि आपराधिक पृष्ठभूमि का प्रकटीकरण होने पर बर्खास्तगी स्वतः ही नहीं हो जाती। नियोक्ता को कर्मचारी के मामले के विशिष्ट तथ्यों पर विचार करना चाहिये और बर्खास्तगी का निर्णय लेने से पहले गहन विवेक का प्रयोग करना चाहिये 
  • दो-स्तरीय परीक्षण पर:न्यायालय ने निर्धारित किया कि आपराधिक पृष्ठभूमि को छिपाने के लिये किसी कर्मचारी को बर्खास्त करने से पहलेनियोक्ता को दो-स्तरीय जांच करनी होगी। पहला स्तर तथ्यात्मक है - क्या वास्तव में कोई जानकारी छिपाई गई थी या गलत जानकारी दी गई थीजिसमें कर्मचारी की उस समय की जानकारी और घोषणा की परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाएगा। दूसरे स्तर पर अधिकारियों को विशिष्ट तथ्यों पर विचार करना होगाजिसमें जानकारी छिपाने का प्रकारआरोपों की प्रकृतिअपराध की भूमिका और गंभीरतापद की प्रकृति और आपराधिक कार्यवाही का अंतिम परिणाम शामिल हैताकि यह निर्धारित किया जा सके कि सेवा में बने रहना संभव है या नहीं। 
  • जानकारी छिपाने के लिये ज्ञान की पूर्व शर्त:न्यायालय ने पाया कि किसी तथ्य का ज्ञान उसे न प्रकट करने के लिये आवश्यक शर्त हैक्योंकि जानकारी छिपाने के लिये उस तथ्य की जानकारी होना अनिवार्य है जिसे छुपाया जा रहा है। न्यायालय ने माना कि किसी उम्मीदवार को ऐसी जानकारी छिपाने के लिये उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता जो कभी उसके संज्ञान में ही नहीं थीऔर यदि यह सिद्ध नहीं होता कि उम्मीदवार को आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी थीतो जानकारी छिपाने का कोई मामला नहीं बनता। 
  • तथ्यों पर विचार करने पर:न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ता ने लगातार यह दावा किया था कि उसे अपने विरुद्ध किसी भी आपराधिक मामले के दर्ज होने की जानकारी नहीं थीइस बात का समर्थन पुलिस चरित्र प्रमाण पत्र और अन्य प्रमाण पत्रों से होता है जो किसी भी मामले के लंबित न होने की पुष्टि करते हैंऔर यह कि उसे संबंधित अवधि के दौरान न तो पुलिस स्टेशन बुलाया गया था और न ही गिरफ्तार किया गया था। 
  • दूसरी जांच न करने पर:न्यायालय ने पाया कि यद्यपि अपीलकर्त्ता को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर दिया गया थाफिर भी अधिकारियों ने इस धारणा पर कार्रवाई की कि आपराधिक पृष्ठभूमि होने के कारण वह स्वतः ही अयोग्य हो जाता हैअपराध की प्रकृतिपद पर उसके प्रभाव या अपीलकर्त्ता की बाद में बर्खास्तगी के संबंध में कोई विशिष्ट निष्कर्ष अभिलिखित किये बिना। 
  • बर्खास्तगी की वैधता पर:न्यायालय ने माना कि बर्खास्तगी परीक्षण के दोनों पहलुओं पर खरी नहीं उतरी और यह अवैध होने के साथ-साथ बिना सोचे-समझे की गई थीऔर तदनुसार उच्च न्यायालय के निर्णयों को अपास्त कर दिया। 

सेवा विधि में आपराधिक पृष्ठभूमि को दबाने के संबंध में विधिक स्थिति क्या है? 

  • भले ही आपराधिक पृष्ठभूमि का प्रकटीकरण न किया गया होमात्र से कोई व्यक्ति लोक नियोजन के लिये अयोग्य नहीं हो जाता या स्वतः ही बर्खास्तगी का औचित्य सिद्ध नहीं हो जाता। 
  • नियोक्ता को कर्मचारी के उस समय के वास्तविक ज्ञान को ध्यान में रखते हुएस्वतंत्र रूप से यह आकलन करना आवश्यक है कि क्या जानकारी छिपाना जानबूझकर किया गया था। 
  • जहाँ कर्मचारी को अपने विरुद्ध किसी मामले के अस्तित्व की जानकारी नहीं थीवहाँ तथ्यों को छिपाने का कोई मामला नहीं हो सकताक्योंकि छिपाने के लिये यह आवश्यक है कि कर्मचारी को छिपाए गए तथ्य की जानकारी हो। 
  • जहाँ दमन साबित हो जाता हैवहाँ भी नियोक्ता को यह निष्कर्ष निकालने से पहले कि सेवा में बने रहना संभव नहीं हैअपराध की प्रकृति और गंभीरतापद से इसकी प्रासंगिकता और आपराधिक कार्यवाही के परिणाम की आगे जांच करनी चाहिये 
  • इस जांच के दोनों चरणों को पूरा किये बिना पारित किया गया बर्खास्तगी का आदेश विधि की दृष्टि से मान्य नहीं है। 

सिविल कानून

धारा 9: असाधारण मामलों में असफल पक्ष द्वारा आवेदन पोषणीय है

 12-Aug-2026

नेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम इश्वको (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड 

"न्यायालय दुर्लभ और बाध्यकारी मामलों मेंअपूरणीय क्षति को रोकने और धारा 34 के अधीन चुनौती की वैधता को बनाए रखने के लिये असफल पक्ष को धारा का सहारा लेने की अनुमति दे सकती है।" 

न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ नेनेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम इश्वको (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि पंचाट धारक द्वारा बैंक प्रत्याभूति के माध्यम से अनुचित संवर्धन को रोकने के लियेजबकि पंचाट चुनौती के अधीन हैमाध्यस्थम्और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा के अधीन अंतरिम अनुतोष पंचाट देनदार के आवेदन पर धारा 34 के अधीन चुनौती की प्रभावकारिता को संरक्षित करने के लिये दिया जा सकता है। 

  • न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस निर्णय में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दियाजिसमें प्रत्यर्थी -पंचाट देनदार के धारा के अधीन दायर उस आवेदन को स्वीकार कर लिया गया थाजिसमें अपीलकर्त्ता-पंचाट धारक द्वारा धारा 34 के आवेदन के लंबित रहने के दौरान लगभग 3.5 करोड़ रुपए की बैंक प्रत्याभूति से कथित अनुचित लाभ के विरुद्ध अंतरिम अनुतोष की मांग की गई थी। 

नेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम इश्वको (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • वर्ष 2002 में नेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड और इश्वको (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए थेजिसके अधीन प्रत्यर्थी को बैंक प्रत्याभूति के बदले 3.5 करोड़ रुपए का अग्रिम राशि जुटाने का काम सौंपा गया था। 
  • 2005 मेंउच्च न्यायालय ने धारा के अधीन दायर एक आवेदन का निपटारा इस समझ के साथ किया कि अपीलकर्त्ता बैंक प्रत्याभूति का उपयोग तब तक नहीं करेगा जब तक कि वे सक्रिय रखी जाती हैंऔर प्रत्याभूति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब माध्यस्थम्अपीलकर्त्ता को राशि वसूल करने का हकदार पाए। 
  • प्रत्यर्थी प्रत्याभूति को बरकरार रखने में विफल रहाजिसके कारण अपीलकर्त्ता ने सितंबर 2017 में उनका सहारा लिया। 
  • मध्यस्थ ने दिसंबर, 2017 को पंचाट देते समय प्रत्यर्थी के दावों को खारिज कर दिया और इस बात से अनभिज्ञ रहा कि बैंक प्रत्याभूति पहले ही भुनाई जा चुकी थी। 
  • प्रत्यर्थी ने धारा 34 के अधीन पंचाट को चुनौती दी और इसके लंबित रहने के दौरानराशि की वापसी की मांग करते हुए एक नया धारा आवेदन दायर किया। 
  • एकल न्यायाधीश ने आवेदन मंजूर कर लिया और अपीलकर्त्ता को रजिस्ट्री में 3.5 करोड़ रुपए जमा करने का निदेश दियाएक ऐसा आदेश जिसे खंडपीठ ने बरकरार रखाजिसके कारण पंचाट धारक ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • पंचाट के बाद धारा के अधीन दायर आवेदनों की स्वीकार्यता पर:न्यायालय ने कहा कि पूर्व निर्णयों से यह मान्यता मिलती है कि पंचाट के बाद धारा के अधीन दायर आवेदन स्वीकार्य हैलेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी कि अंतरिम अनुतोष प्रदान करने की सीमा तब अधिक होती है जब आवेदन किसी पंचाट देनदार द्वारा दायर किया जाता है। 
  • उपचार की असाधारण प्रकृति पर:न्यायालय ने माना कि न्यायालय दुर्लभ और बाध्यकारी मामलों मेंअपूरणीय पूर्वाग्रह को रोकने और धारा 34 के अधीन चुनौती की प्रभावकारिता को बनाए रखने के लिये असफल पक्ष को धारा का आह्वान करने की अनुमति दे सकता है। 
  • अनुचित संवर्धन के संबंध में:न्यायालय ने माना कि धारा 34 के आवेदन के निपटारे तक अपीलकर्ता को धन रखने की अनुमति देने से अपीलकर्ता को अनुचित रूप से लाभ होगाऔर उच्च न्यायालय द्वारा ऐसा अवलोकन करना उचित था। 
  • धारा के अधीन अनुतोष के लिये निर्धारित मापदंडों की पूर्ति पर:न्यायालय ने माना कि प्रत्यर्थी ने अनुतोष के लिये एक दुर्लभ और बाध्यकारी मामला प्रस्तुत किया हैक्योंकि उसने धारा के अधीन अनुतोष प्राप्त करने के लिये आवश्यक मापदंडों को पूरा किया है - अर्थात्प्रथम दृष्टया मामला और सुविधा का संतुलन - क्योंकि धारा 34 के आवेदन के लंबित रहने के दौरान अपीलकर्त्ता द्वारा धन को अपने पास रखना अपीलकर्त्ता को अनुचित रूप से समृद्ध करेगा। 
  • अनुतोष प्राप्त होने पर:न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और अपीलकर्त्ता को बैंक प्रत्याभूति राशि उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री को सौंपने का निदेश दियासाथ ही अपीलकर्त्ता को दिल्ली उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री में 3.5 करोड़ रुपए जमा करने के लिये चार सप्ताह का समय दियाजिसे धारा 34 के आवेदन के निपटारे तक स्वतः नवीनीकरण के आधार पर सावधि जमा में रखा जाएगा।

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा क्या है? 

  • धारा न्यायालयों को माध्यस्थम् कार्यवाही से पूर्वउसके दौरान या उसके पश्चातलेकिन माध्यस्थम् पंचाट के प्रवर्तन से पहले, सुरक्षा के अंतरिम उपचार प्रदान करने का अधिकार देती है ।  
  • माध्यस्थम् करार का कोई भी पक्ष माध्यस्थम् प्रक्रिया के दौरान विभिन्न सुरक्षात्मक उपायों के लिये अंतरिम अनुतोष की मांग करते हुएन्यायालय से संपर्क कर सकता है। 
  • इस प्रावधान के अंतर्गत माध्यस्थम् कार्यवाही के प्रयोजनों के लियेन्यायालय अवयस्कों या विकृत चित्त व्यक्तियों के लिये संरक्षक नियुक्त कर सकता है । 
  • न्यायालयों को माध्यस्थम् करार की विषय-वस्तु से संबंधितवस्तुओं को संरक्षित करनेअंतरिम अभिरक्षा प्रदान करने या उनकी बिक्री का आदेश देने का अधिकार है । 
  • यह उपबंध न्यायालयों को अंतिम निर्णय के प्रभावी प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिये माध्यस्थम् मेंविवादित राशि को सुरक्षित करने की अनुमति देता है ।  
  • न्यायालय माध्यस्थम् विवाद से संबंधितकिसी भी संपत्ति को अभिरक्षा में रखनेसंरक्षित करने या निरीक्षण करने का आदेश दे सकते हैं और आवश्यक अवलोकन या प्रयोगों के लिये परिसर में प्रवेश को अधिकृत कर सकते हैं। 
  • इस धारा के अधीन न्यायालयों द्वारा अंतरिम व्यादेश और रिसीवर की नियुक्ति कीजा सकती है जिससे माध्यस्थम् के दौरान यथास्थिति बनाए रखी जा सके। 
  • एक बार माध्यस्थम् अधिकरण का गठन हो जाने के बादन्यायालय धारा के अधीन आवेदनों पर विचार नहीं कर सकते, जब तक कि ऐसी परिस्थितियाँ मौजूद न हों जो धारा 17 के उपचारों (अधिकरण के अंतरिम उपायों) को अप्रभावी बना दें। 
  • यदि माध्यस्थम् प्रारंभ होने से पहले अंतरिम उपचार प्रदान किये जाते हैंतो माध्यस्थम् की कार्यवाहीन्यायालय के आदेश के 90 दिनों के भीतर या न्यायालय द्वारा निर्धारित विस्तारित समय सीमा के भीतर शुरू होनी चाहिये