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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

21 वर्ष की आयु पूर्ण होने के पश्चात अनिवार्य मूल्यांकन न किया जाना दंडादेश के निलंबन को आवश्यक बनाता है

 14-Aug-2026

बनाम पंजाब राज्य 

"चूँकि संविधि उस अवस्था में विधि का उल्लंघन करने वाले बालक को बहुमूल्य अधिकार प्रदान करती हैइसलिये अपील लंबित रहने के दौरान दंडादेश के निलंबन की प्रार्थना पर विचार करते समय उक्त अनिवार्य प्रक्रिया का अनुपालन न करना एक प्रासंगिक परिस्थिति है।" 

न्यायमूर्ति मनदीप पन्नू 

स्रोत: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की एक एकल पीठजिसमें न्यायमूर्ति मनदीप पन्नू शामिल थेने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act) के अधीन अनिवार्य सुधारात्मक मूल्यांकन प्रक्रिया का अनुपालन न करने को निलंबन प्रदान करने के लिये एक सुसंगत परिस्थिति मानते हुएलैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण के एक दोषी के दंडादेश को उसकी अपील के लंबित रहने के दौरान निलंबित कर दिया। 

इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • आवेदक-अपीलकर्त्ता को होशियारपुर स्थित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट के अपर सेशन न्यायाधीश द्वारा 16 मार्च 2023 को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के साथ लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा तथा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 363 (व्यपहरण), 366, 354 (लज्जा भंग करना) और 452 (अतिचार) के अधीन दोषी ठहराया गया था।
  • उसे लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन 10 वर्ष के कठोर कारावास का दंडादेश सुनाया गयाजिसमें सभी मामलों में दंडादेश एक साथ चलने का निदेश दिया गया। 
  • अपराध करते समय आवेदक विधि का उल्लंघन करने वाला एक बालक थालेकिन उस पर एक वयस्क के रूप में विचारण चलाया गया। 
  • उसने अपील लंबित रहने तक दंडादेश को निलंबित करने की मांग कीयह तर्क देते हुए कि वह पहले ही लगभग वर्ष, 3 महीने और दिन की वास्तविक अभिरक्षा भोग चुका हैजिसमें दंडादेश में परिहार भी शामिल है। 
  • आगे यह तर्क दिया गया कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 19 और 20 के अधीन अनिवार्य प्रक्रियाकिशोर न्याय मॉडल नियम, 2016 के नियम 13 के साथ पढ़ी जाएका पालन बाल न्यायालय द्वारा नहीं किया गया था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • किशोर न्याय अधिनियम के अधीन सांविधिक दायित्व पर:न्यायालय ने माना कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 19, 20 और 21, किशोर न्याय मॉडल नियम, 2016 के नियम 13 के साथ पढ़ी जाने पर यह दर्शाती हैं कि जहाँ विधि का उल्लंघन कर रहे किसी बालक पर वयस्क के रूप में विचारण चलाया जाता है और उसे 21 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक किसी सुरक्षित स्थान पर रखा जाता हैतो बालक के 21 वर्ष का होने के बाद और विहित अवधि पूरी होने से पहलेबाल न्यायालय का यह सांविधिक दायित्व है कि वह उसकी सुधारात्मक प्रगति का नए सिरे से मूल्यांकन करे और यह आकलन करे कि क्या वह समाज का एक उपयोगी सदस्य बनने में सक्षम है। 
  • वर्तमान मामले में अनुपालन न करने पर:न्यायालय ने पाया कि अभिलेख से यह संकेत नहीं मिलता कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 20 के अधीनकिशोर न्याय मॉडल नियम, 2016 के नियम 13(8)(vi) के साथ पढ़ा गया यह अनिवार्य अभ्यास बाल न्यायालय द्वारा आवेदक के 21 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद किया गया था। 
  • अनुपालन न करने के प्रभाव पर:न्यायालय ने माना कि चूँकि संविधि उस अवस्था में विधि का उल्लंघन कर रहे बालक को मूल्यवान अधिकार प्रदान करता हैइसलिये अपील लंबित रहने के दौरान दंडादेश के निलंबन के लिये प्रार्थना पर विचार करते समय इस अनिवार्य प्रक्रिया का अनुपालन न करना एक सुसंगत परिस्थिति है। 
  • अनुतोष प्रदान करने पर:दोषसिद्धि के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किये बिनाऔर पहले से ही अभिरक्षा में बिताए गए समयविधि का उल्लंघन कर रहे बालक के रूप में आवेदक की स्थितिऔर सांविधिक प्रक्रिया के स्पष्ट गैर-अनुपालन को ध्यान में रखते हुएन्यायालय ने आवेदन मंजूर कर लिया और अपील लंबित रहने के दौरान मूल दंडादेश को निलंबित कर दियाबशर्ते आवेदक संबंधित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट/ कार्यरत मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के अनुरूप पर्याप्त जमानत और जमानत बंधपत्र प्रस्तुत करे। 
  • बाल न्यायालयों के लिये निदेश:न्यायालय ने रजिस्ट्री को पंजाबहरियाणा और चंडीगढ़ के सभी बाल न्यायालयों/विशेष लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों और चंडीगढ़ न्यायिक अकादमी को आदेश प्रसारित करने का निदेश दियाजिसमें इस बात पर बल दिया गया कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 19 और 20 तथा आदर्श नियमों के नियम 13 का कठोरता से अनुपालन इस विधि के सुधारात्मक उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये आवश्यक है।  

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 क्या है? 

बारे में: 

  • किशोर न्याय अधिनियम, 2015 उन बालकों से संबंधित विधि को समेकित और संशोधित करता है जिन पर विधि का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है और जो दोषी पाए गए हैंऔर उन बालकों से संबंधित विधि को भी संशोधित करता है जिन्हें देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता है। 
  • यह उचित देखरेखसंरक्षणविकासउपचार और सामाजिक पुनर्एकीकरण के माध्यम से उनकी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करता हैऔर उनके सर्वोत्तम हित में मामलों के न्यायनिर्णय और निपटान में बाल-हितैषी दृष्टिकोण अपनाता है। 
  • इसमें "विधि का उल्लंघन कर रहे बालक" के मामले में एक विशेष दृष्टिकोण का भी प्रावधान हैजिस पर अपराध करने का आरोप है या जो अपराध करने का दोषी पाया गया हैजिसमें सुधारात्मक और पुनर्वास के उद्देश्य को ढाँचे के केंद्र में रखा गया है। 

इस मामले से संबंधित प्रमुख उपबंध: 

  • धारा 19 - बाल न्यायालय को विधि का उल्लंघन रहे बालक के संबंध में वयस्क के रूप में विचारण चलाने के आदेश पारित करने का अधिकार देती हैजिसमें बालक के 21 वर्ष की आयु पूरी होने तक उसे सुरक्षित स्थान पर रखने के आदेश शामिल हैंजिसके बाद एक नया मूल्यांकन किया जाएगा। 
  • धारा 20 - बाल न्यायालय द्वारा आवधिक अनुवर्ती कार्रवाई अनिवार्य करती है जिससे यह मूल्यांकन किया जा सके कि क्या किसी सुरक्षित स्थान पर रहने वाले बालक में सुधारात्मक परिवर्तन हुए हैं और 21 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर उसे समाज में पुनः एकीकृत करने के लिये उपयुक्त है। 
  • धारा 21 – विधि का उल्लंघन कर रहे बालक पर मृत्युदण्ड या ऐसे अपराध के लिये छोड़े जाने की संभावना के बिना आजीवन कारावास अधिरोपित करने पर रोक लगाती है। 
  • किशोर न्याय मॉडल नियम, 2016 का नियम 13 – सुरक्षा के स्थान पर बालक के आवधिक अनुवर्ती और सुधारात्मक मूल्यांकन की प्रक्रिया निर्धारित करता हैजिसमें बालक के 21 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर नियम 13(8)(vi) के अधीन आवश्यक विशिष्ट मूल्यांकन शामिल है। 

सिविल कानून

निर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 14(3)(ग)

 14-Aug-2026

राहुल गणेश मेहता बनाम नारायण गणपत गायकवाड़ 

"करार में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था जिसमें वादी पक्ष की ऐसी योग्यताओं को साबित करने की आवश्यकता हो।" 

न्यायमूर्ति शर्मिला यू. देशमुख 

स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

बॉम्बे उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति शर्मिला यू. देशमुख ने राहुल गणेश मेहता बनाम नारायण गणपत गायकवाड़ (2026) के मामलेमें अपील पर सुनवाई करते हुएयह अभिनिर्धारित किया कि किसी भूखंड के संपूर्ण विकास से संबंधित और विकासकर्ता द्वारा उसमें अंश आरक्षित रखने से जुड़ा विकास करार विशुद्ध निर्माण संविदा नहीं हैऔर इस प्रकार के करार के विनिर्दिष्ट पालन को वर्जित करने के लिये विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14(3)(ग) लागू नहीं की जा सकती। न्यायालय ने विचारण न्यायालय द्वारा वादियों के अस्थायी व्यादेश के आवेदन को अस्वीकार करने के निर्णय को अपास्त करते हुए उसे मंजूर कर लिया। 

राहुल गणेश मेहता बनाम नारायण गणपत गायकवाड़ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • वादी पक्ष ने एक विकास करार में प्रवेश किया जिसके अधीन उन्हें पूरी विवादित भूमि का विकास करना था और निर्मित क्षेत्र का 50% अंश प्रतिवादी संख्या को अंतरित करना थाजबकि शेष 50% भूमि त्रिपक्षीय करार के माध्यम से वादी पक्ष के पक्ष में अंतरित की जानी थी। 
  • करार के खंड में यह प्रावधान था कि एक बार CIDCO द्वारा प्लॉट का भौतिक कब्जा सौंप दिये जाने के बादप्रतिवादी नंबर वादी या उनके नामित व्यक्तियों के पक्ष में त्रिपक्षीय करार पर हस्ताक्षर करेगा। 
  • वादी पक्ष करार के अधीन पहले ही 70,80,000 रुपए का संदाय कर चुका था। 
  • यह आरोप लगाया गया था कि प्रतिवादियों ने संपत्ति को किसी तीसरे पक्ष (प्रतिवादी संख्या 3) को अंतरित करने का प्रयास कियाजिसके कारण वादियों ने अस्थायी व्यादेश के लिये आवेदन के साथ-साथ विनिर्दिष्ट पालन के लिये एक वाद दायर किया। 
  • विचारण न्यायालय ने व्यादेश आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया कि वादी ने कोई दस्तावेज पेश नहीं किया था जिससे यह पता चलता हो कि वे डेवलपर थे या उन्होंने कोई विकास कार्य किया थाऔर करार को विशुद्ध निर्माण संविदा माना जो विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 14(3)(ग) के अंतर्गत आता है। 
  • विचारबन न्यायालय ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया कि प्रतिवादी नंबर बिना किसी सूचना के मूल्य के लिये एक वास्तविक क्रेता था। 
  • इससे व्यथित होकर वादीगण ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष आदेश के विरुद्ध अपील दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • करार की प्रकृति पर:न्यायालय ने माना कि पक्षकारों के बीच संविदा संपूर्ण वाद भूखंड के विकास के लिये थाजिसमें निर्मित क्षेत्र का 50% भाग वादी द्वारा प्रतिवादी संख्या को सौंपा जाना थाजबकि शेष 50% भाग वादी के पास रहेगा। न्यायालय ने माना कि वादी केवल निर्माण कार्य करने के लिये नियुक्त ठेकेदार नहीं थेऔर विचारण न्यायालय ने करार को विशुद्ध निर्माण संविदा मानकर धारा 14(3)(ग) लागू करने में त्रुटि की थी। 
  • विकासकर्ता होने के सबूत के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि करार में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था जिसमें वादी पक्ष को विकासकर्ता के रूप में कोई सबूत प्रस्तुत करने की आवश्यकता होऔर वादी पक्ष के पास वास्तविक निर्माण कार्य के लिये किसी ठेकेदार को नियुक्त करने का विकल्प खुला था। न्यायालय ने यह माना कि इसलिये  वादी पक्ष को यह साबित करने की आवश्यकता नहीं है कि वे विकासकर्ता हैं या उन्होंने पहले कोई विकास कार्य किया है। 
  • धारा और त्रिपक्षीय करार पर:न्यायालय ने पाया कि विचारण न्यायालय विकास करार के खंड पर ध्यान देने में विफल रहीजिसमें CIDCO द्वारा कब्जा सौंपे जाने के बाद वादी या उनके नामित व्यक्तियों के पक्ष में त्रिपक्षीय करार के निष्पादन का प्रावधान था। 
  • विकास करारों के दायरे पर:सुशील कुमार अग्रवाल बनाम मीनाक्षी साधु (2019) के मामलेमें उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक विकास करार व्यवस्थाओं की एक विस्तृत श्रृंखला का वर्णन कर सकता है और इसे यंत्रवत् रूप से निर्माण संविदा के समान नहीं माना जा सकता है। 
  • प्रतिधारण खंड के प्रभाव पर:न्यायालय ने माना कि वादी के पूरे भूखंड को विकसित करने के अधिकार को केवल इस आधार पर कम नहीं किया जा सकता कि भूमि का 50% भाग बाद में उनके पक्ष में अंतरित कर दिया जाएगा। 
  • वास्तविक क्रेता के संबंध में:न्यायालय कहा कि विचारण न्यायालय ने स्वयं इस तर्क को स्वीकार नहीं किया था कि प्रतिवादी संख्या बिना सूचना के मूल्य के लिये एक वास्तविक क्रेता थाजो व्यादेश अनुतोष प्रदान करने के पक्ष में था। 
  • तदनुसारन्यायालय ने दिनांक 19 जून 2024 के विवादित आदेश को अपास्त कर दिया और वादी के अस्थायी व्यादेश के आवेदन को मंजूर कर लिया। 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14 क्या है? 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14 — ऐसी संविदाएंजो विनिर्दिष्टतया प्रवर्तनीय नहीं हैं: 

उपधारा (1) — चार श्रेणियों की संविदाएं विनिर्दिष्ट पालन को वर्जित करती है: 

  • (क)वे संविदाएं जिनमें मौद्रिक प्रतिकर पर्याप्त अनुतोष है।  
  • (ख)ऐसी संविदाएं जो बहुत सूक्ष्म होंविवरणों से भरपूर होंया पक्षकारों की व्यक्तिगत योग्यताओं/इच्छाशक्ति पर निर्भर होंउन्हें न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं किया जा सकता है। 
  • (ग)वे संविदाएं जो प्रकृति में निर्धारणीय हैं।  
  • (घ)ऐसी संविदाएं जिनमें निरंतर कर्तव्य शामिल हो और जिसकी न्यायालय निगरानी नहीं कर सकता।   

उपधारा (2) — वर्तमान या भविष्य के विवादों को माध्यस्थम् के लिये संदर्भित करने वाले करारों के विनिर्दिष्ट प्रवर्तन को वर्जित करती है (सिवाय माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 के अधीन दिये गए प्रावधानों के)। यद्यपियदि ऐसा करार करने वाला पक्षकार इसका पालन करने से इंकार करता है और माध्यस्थम् खंड के अंतर्गत आने वाले विषय पर वाद करता हैतो उस संविदा का अस्तित्व वाद के वर्जन के रूप में कार्य करता है। 

उपधारा (3) — उपधारा (1) के खंड (क), (ग) और (घ) के अपवाद बनाता हैजिससे तीन स्थितियों में विनिर्दिष्ट पालन की अनुमति मिलती है: 

  • (क)बंधक निष्पादित करने या ऋण की चुकौती के लिये प्रतिभूति प्रदान करने की संविदाजिसे उधारकर्ता तुरंत चुकाने को तैयार नहीं है (बशर्ते ऋणदाता ऋण के किसी भी शेष भाग को अग्रिम करने को तैयार हो)। 
  • (ख)संविदाएं(i) औपचारिक भागीदारी विलेख के निष्पादन के लिये जहाँ भागीदारी व्यवसाय पहले ही शुरू हो चुका हैया (ii) किसी फर्म में भागीदार के अंश की खरीद के लिये 
  • (ग)किसी भवन के निर्माण या भूमि पर अन्य कार्य के निष्पादन के लिये संविदातीन शर्तों के संतुष्ट होने के अधीन: 
    • कार्य का वर्णन इतनी सटीकता से किया गया है कि न्यायालय उसकी सटीक प्रकृति का निर्धारण कर सके; 
    • वादी का संविदा के पालन में पर्याप्त एवं महत्त्वपूर्ण हित हैऐसा कि मौद्रिक प्रतिकर पर्याप्त अनुतोष नहीं होगाऔर 
    • संविदा के अनुसारप्रतिवादी ने उस भूमि के पूर्ण या आंशिक भाग पर कब्जा प्राप्त कर लिया है जिस पर कार्य किया जाना है।