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आपराधिक कानून
वरिष्ठ अधिकारी द्वारा मात्र आधिकारिक फटकार आत्महत्या के लिये दुष्प्रेरण नहीं है
18-Aug-2026
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने विनोद शिवकुमार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय (नागपुर पीठ) और अपर सेशन न्यायाधीश द्वारा उन्मोचन से इंकार करने के आदेशों को अपास्त कर दिया और यह अभिनिर्धारित किया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 108) के अधीन आत्महत्या के दुष्प्रेरण के आवश्यक तत्त्व अपीलकर्त्ता के विरुद्ध सिद्ध नहीं हुए थे।
विनोद शिवकुमार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- हरिसल रेंज में तैनात एक वन रेंज अधिकारी ने 25.03.2021 को आत्महत्या कर ली, और एक वरिष्ठ वन अधिकारी, अपनी माता और अपने पति को संबोधित तीन आत्महत्या पत्र छोड़े, जिनमें अपीलकर्त्ता और मनीषा उइके के विरुद्ध आरोप लगाए गए थे।
- आत्महत्या पत्र के आधार पर अपीलकर्त्ता के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 312 के अधीनन गर्भपात कराने का आरोप उच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर दिया गया, जबकि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306, 504 और 506 के अधीन आरोप जारी रहे।
- आत्महत्या पत्र में आरोप लगाया गया है कि अपीलकर्त्ता ने मृतक को बार-बार फटकारा और निलंबित किया, उसकी छुट्टी के आवेदनों को खारिज कर दिया, गर्भावस्था के दौरान उसे लगातार तीन दिनों तक पैदल चलने के लिये मजबूर किया (जिसके परिणामस्वरूप कथित तौर पर गर्भपात हो गया), उसके विरुद्ध अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अधीन FIR दर्ज करवाई और उसके साथ अनुचित व्यवहार किया। मृतक ने कहा कि उसकी मृत्यु के लिये अपीलकर्त्ता "पूरी तरह से उत्तरदायी" है।
- अपीलकर्त्ता की बर्खास्तगी याचिका को अचलपुर के अपर सेशन न्यायाधीश ने खारिज कर दिया था, और बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के समक्ष उसकी पुनरीक्षण याचिका भी खारिज कर दी गई थी, जिसके कारण उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की गई।
- अपीलकर्त्ता ने तर्क दिया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन दुष्प्रेरण के लिये आत्महत्या से ठीक पहले हुई कोई घटना आवश्यक है, और कथित घटनाओं में से कोई भी आत्महत्या के तुरंत बाद घटित नहीं हुई थी। अभियोजन पक्ष ने आत्महत्या नोट में लगातार गाली-गलौज और सार्वजनिक अपमान के आरोपों और एक चपरासी द्वारा 2018 में दर्ज कराई गई एक अलग FIR पर विश्वास किया, जिसमें अपीलकर्त्ता द्वारा अपने अधीनस्थ के साथ क्रूर व्यवहार का आरोप लगाया गया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन दुष्प्रेरण के तत्त्व: न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 को धारा 107 (दुष्प्रेरण की परिभाषा) के साथ पढ़ा और माना कि तीन आवश्यक शर्तें पूरी होनी चाहिये: (i) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उकसावा; (ii) आत्महत्या करने के समय से निकटता; और (iii) आत्महत्या का दुष्प्रेरण की स्पष्ट आपराधिक मनःस्थिति (mens rea) ।
- उकसाने के अर्थ पर: उदे सिंह बनाम हरियाणा राज्य के मामले पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि उकसाने का अर्थ है किसी व्यक्ति को कार्य करने के लिये प्रेरित करना, उकसाना, भड़काना या प्रोत्साहित करना, और क्रोध या भावना में बोले गए शब्द, जिनका परिणाम अपेक्षित न हो, उकसाने की श्रेणी में नहीं आते। न्यायालय ने प्रकाश बनाम महाराष्ट्र राज्य और मदन मोहन सिंह बनाम गुजरात राज्य के मामलों पर भी विश्वास करते हुए यह माना कि यह सिद्ध होना चाहिये कि अभियुक्त ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, निकटवर्ती समय में, आत्महत्या में योगदान दिया है, जिससे स्पष्ट आपराधिक मनःस्थिति (mens rea) प्रकट होता हो। आत्महत्या पत्र में केवल आरोपी पर लगाए गए आरोप, इस बात के सबूत के बिना कि अभियुक्त का आशय था या उसे पता था कि मृतक आत्महत्या कर लेगी, अपर्याप्त हैं।
- "निकटवर्ती घटना" की आवश्यकता पर: न्यायालय ने अभिनव मोहन डेलकर बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में अपने हालिया निर्णय पर बहुत अधिक विश्वास किया और इस आवश्यकता को " वह अंतिम घटना जिसने स्थिति को असहनीय बना दिया" के रूप में वर्णित किया - आत्महत्या से ठीक पहले कोई निकटवर्ती घटना होनी चाहिये, जिसे प्रत्यक्ष और अंतिम कारण माना जा सके। निरंतर उत्पीड़न जिसके परिणामस्वरूप आत्महत्या होती है, अपने आप में उकसावे का प्रमाण नहीं है; पीड़ित के मन में जो कुछ चल रहा था, उससे आपराधिक मनःस्थिति (mens rea) का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
- आरोपों का वर्गीकरण: आरोपों को चार शीर्षों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया था — (i) आधिकारिक फटकार और कारण बताओ नोटिस; (ii) अतिक्रमण हटाने और ग्राम पुनर्वास से संबंधित कार्य सौंपना; (iii) मनीषा उइके के साथ मिलीभगत से FIR दर्ज करना; और (iv) कथित रूप से गर्भपात का कारण बनने वाली पदयात्रा। न्यायालय ने माना कि सभी आरोपों को सत्य मान लेने पर भी, वे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के आवश्यक तत्त्वों को प्रकट नहीं करते हैं, क्योंकि आत्महत्या से ठीक पहले उकसाने वाली किसी भी प्रत्यक्ष घटना का कोई प्रमाण नहीं था।
- समयसीमा और निकटता का अभाव: न्यायालय ने कहा कि गर्भपात की घटना अक्टूबर 2020 में हुई थी, जो आत्महत्या से पाँच महीने से अधिक पहले की बात है, जबकि अतिक्रमण संबंधी विवाद और FIR का पंजीकरण मार्च 2020 में हुआ था। आत्महत्या के ठीक पहले दी गई फटकार के संबंध में, न्यायालय ने माना कि वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दिये गए सामान्य प्रशासनिक निर्देश, अनुशासनात्मक निगरानी, प्रदर्शन पर प्रतिकूल टिप्पणी या कठोर व्यवहार - चाहे वह अधीनस्थ को कितना भी अप्रिय क्यों न लगे - को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन दुष्प्रेरण के रूप में नहीं माना जा सकता, जब तक कि अधीनस्थ को आत्महत्या के लिये प्रेरित करने के सचेत आशय को दर्शाने वाली अतिरिक्त सामग्री मौजूद न हो।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 504 और 506 पर: न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ता वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी के बिना मृतक को निलंबित करने के लिये सक्षम प्राधिकारी नहीं था, और तदनुसार यह माना कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 504 (लोक शांति भंग कराने को प्रकोपित करने के आशय से साशय अपमान) या भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 (आपराधिक अभित्रास) के अधीन कोई मामला नहीं बनता है।
- अनुतोष प्रदान किये जाने पर: यह मानते हुए कि आपराधिक कार्यवाही जारी रखना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, न्यायालय ने अपील मंजूर कर ली, उच्च न्यायालय और सेशन न्यायालय के आदेशों को अपास्त कर दिया और अपीलकर्त्ता को उन्मोचित कर दिया।
भारतीय न्याय संहिता के अधीन आत्महत्या का दुष्प्रेरण क्या है?
विधिक परिभाषा और ढाँचा :
- आत्महत्या का दुष्प्रेरण भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 107 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 45) के अधीन परिभाषित है।
- इस अपराध में जानबूझकर किये गए ऐसे कृत्य शामिल हैं जो किसी अन्य व्यक्ति को आत्महत्या करने में सहायता या प्रोत्साहन प्रदान करते हैं।
उकसाने के तीन आवश्यक घटक:
- प्रत्यक्ष उकसावा : इसमें शब्दों, हावभाव या आचरण के माध्यम से किसी व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिये सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करना, उकसाना या प्रेरित करना शामिल है, जिससे पीड़ित व्यक्ति अपनी जान लेने के लिये प्रेरित हो जाए।
- षड्यंत्र : यह तब होता है जब दो या दो से अधिक व्यक्ति आत्महत्या को सुविधाजनक बनाने के लिये एक षड्यंत्र में शामिल होते हैं, और उस षड्यंत्र के अनुसरण में कोई कार्य या अवैध लोप होता है।
- जानबूझकर सहायता प्रदान करना : इसमें किसी भी ऐसे कार्य या अवैध लोप के माध्यम से सहायता प्रदान करना शामिल है जो व्यक्ति को आत्महत्या करने में सहायता करता है, जिसमें जानबूझकर दुर्व्यपदेशन या तात्विक तथ्यों को छिपाना शामिल है।
विधिक उपबंध और दण्ड :
धारा 108 भारतीय न्याय संहिता (धारा 306 भारतीय दण्ड संहिता) के अधीन आत्महत्या के दुष्प्रेरण पर निम्नलिखित दण्ड मिलता है:
- किसी भी प्रकार के कारावास से, जिसकी अवधि 10 वर्ष तक हो सकती है।
- आर्थिक दण्ड के रूप में अतिरिक्त जुर्माना।
- यह अपराध संज्ञेय, अजमानतीय और अशमनीय है।
- मामलों की विचारण सेशन न्यायालयों में होता है।
असुरक्षित व्यक्तियों के लिए विशेष उपबंध:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 107 में उस स्थिति में वर्धित दण्ड का उपबंध किया गया है, जब पीड़ित बालक, विकृतचित्त व्यक्ति, उन्मत्त व्यक्ति अथवा मत्त व्यक्ति हो। ऐसी परिस्थितियों में अपराध के लिये मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास, अथवा दस वर्ष तक के कारावास तथा अर्थदंड से दण्डित किये जाने का प्रावधान है।
सबूत का भार संबंधी आवश्यकताएँ:
- प्रत्यक्ष कारण : अभियुक्त के कार्यों और पीड़ित द्वारा आत्महत्या करने के निर्णय के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करने वाले सबूत होने चाहिये।
- विशिष्ट आशय : अभियुक्त का आशय व्यक्ति को आत्महत्या के लिये प्रेरित करना होना चाहिये, न कि केवल सामान्य कष्ट पहुँचाना।
- निकटवर्ती संबंध : न्यायालयों को आत्महत्या के समय के निकट घटित ऐसे कृत्यों के साक्ष्य की आवश्यकता होती है जिन्होंने पीड़ित को यह चरम कदम उठाने के लिये सीधे तौर पर विवश किया हो।
- सक्रिय भागीदारी : केवल निष्क्रिय उपस्थिति या सामान्य उत्पीड़न पर्याप्त नहीं है; उकसाने या सहायता करने के सकारात्मक कार्य होने चाहिये।
प्रमुख विधिक अंतर:
- दुष्प्रेरण का गठन करने वाले कृत्य: आत्महत्या कारित करने के आशय से किया गया सक्रिय उकसावा, आत्महत्या को सुगम बनाने के लिए किया गया षड्यंत्र, अथवा आत्महत्या किये जाने में जानबूझकर सहायता प्रदान करना।
- दुष्प्रेरण का गठन न करने वाले कृत्य: सामान्य उत्पीड़न, आत्महत्या के लिये किसी विशिष्ट आशय के अभाव में व्यावसायिक या पेशेगत दबाव, कार्यस्थल का सामान्य तनाव, निकटवर्ती एवं प्रत्यक्ष उकसावे के अभाव में वैवाहिक कलह, अथवा दैनिक जीवन के सामान्य संघर्षों से उत्पन्न भावनात्मक व्यथा।
विधिक मामले:
मदन मोहन सिंह बनाम गुजरात राज्य (2010):
- इस मामले में अभियुक्त पर मृतक को निरंतर परेशान करने और अपमानित करने का आरोप लगाया गया था। मृतक एक ड्राइवर था जिसने आत्महत्या पत्र छोड़ा था, जिसमें उसने अपने नियोक्ता पर निरंतर उत्पीड़न और अपमानजनक व्यवहार के माध्यम से उसे आत्महत्या के लिये मजबूर करने का आरोप लगाया था।
- उच्चतम न्यायालय ने माना कि यद्यपि आत्महत्या पत्र में प्रत्यक्षत अभियुक्त नियोक्ता को दोषी ठहराया गया था, फिर भी आत्महत्या पत्र या प्रथम सूचना रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन अपराध का गठन करने वाला माना जा सके।
- न्यायालय ने यह स्थापित किया कि निरंतर उत्पीड़न और अपमान के मात्र आरोप, भले ही वे आत्महत्या नोट में दर्ज हों, आत्महत्या के दुष्प्रेरण के अपराध का गठन करने के लिये अपर्याप्त हैं, जब तक कि उकसाने वाले विशिष्ट कृत्य न हों जो प्रत्यक्षत इस चरम कदम की ओर ले गए हों।
अमलेंदु पाल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2010):
- इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने आत्महत्या के दुष्प्रेरण के मामलों में निकटवर्ती कारण की आवश्यकता के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया।
- न्यायालय ने कहा कि "केवल उत्पीड़न के आरोप के आधार पर, घटना के समय के निकट अभियुक्त की ओर से कोई ऐसी सकारात्मक कार्रवाई न होने पर, जिसके कारण व्यक्ति ने आत्महत्या की हो, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन दोषसिद्धि विधिसम्मत रूप से स्थिर नहीं रह सकती।"
- इस निर्णय ने यह स्थापित किया कि अभियुक्त के कृत्यों और आत्महत्या के बीच एक स्पष्ट समयिक संबंध होना आवश्यक है। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि उत्पीड़न के आरोप मात्र, आत्महत्या के समय के आसपास घटित ऐसे प्रत्यक्ष कृत्यों के बिना, जो पीड़ित को यह चरम कदम उठाने के लिये प्रत्यक्षत विवश करते हों, उकसाने के आरोप में दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते।
- दोनों मामलों ने इस सिद्धांत को पुष्ट किया कि अभियोजन पक्ष को न केवल उत्पीड़न स्थापित करना होगा, अपितु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन आत्महत्या के दुष्प्रेरण को साबित करने के लिये निकटवर्ती कारण के साथ उकसाने के विशिष्ट कृत्यों को भी स्थापित करना होगा।
सांविधानिक विधि
त्वरित विचारण भी पीड़ित का अधिकार है
18-Aug-2026
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने केशवेंद्र सिंह बनाम शंकर सिंह एवं अन्य (2026) के मामले में परिवादकर्त्ता की अपील मंजूर करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986 के अधीन अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही लंबित होने के आधार पर हत्या के विचारण को स्थगित कर दिया गया था। न्यायालय ने माना कि गिरोहबंद अधिनियम की धारा 12 को अन्य विचारणों पर रोक लगाना अनुच्छेद 21 के अधीन पीड़ित के त्वरित विचारण के अधिकार का हनन होगा।
केशवेंद्र सिंह बनाम शंकर सिंह और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अभियुक्त के विरुद्ध हत्या का विचारण लंबित था।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस आधार पर हत्या के विचारण को स्थगित कर दिया कि अभियुक्त के विरुद्ध उत्तर प्रदेश गिरोहबंद अधिनियम के अधीन एक कार्यवाही भी लंबित है।
- अभियुक्त ने उत्तर प्रदेश गिरोहबंद अधिनियम की धारा 12 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि गिरोहबंद अधिनियम के अधीन मामले का निर्णय होने तक हत्या का विचारण जारी नहीं रह सकता, क्योंकि यह धारा नियमित आपराधिक कार्यवाही पर उस अधिनियम के अधीन कार्यवाही को प्राथमिकता देती है।
- परिवादकर्त्ता ने उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी, यह तर्क देते हुए कि अभियुक्त गिरोहबंद अधिनियम की कार्यवाही लंबित होने का उपयोग हत्या के विचारण को अनिश्चित काल तक टालने के लिये नहीं कर सकता।
- इस बीच, सेशन न्यायालय के पूर्व अंतरिम आदेश के अनुसार विचारण आगे बढ़ा और इसके परिणामस्वरूप प्रत्यर्थी को दोषी ठहराया गया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- पीड़ित के त्वरित विचारण के अधिकार पर: न्यायालय ने माना कि त्वरित विचारण का अधिकार केवल अभियुक्त तक ही सीमित नहीं है, अपितु यह पीड़ित का भी उतना ही महत्त्वपूर्ण अधिकार है, और विचारण को समाप्त करने में अनुचित विलंब का समाज पर व्यापक रूप से हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है।
- अभियुक्त के तर्क को स्वीकार करने के परिणाम पर: न्यायालय ने पाया कि धारा 12 की अभियुक्त के निर्वचन को स्वीकार करने से यह उपबंध अनुच्छेद 21 के विपरीत होने के कारण असांविधानिक हो जाएगा, क्योंकि इससे अभियुक्त को केवल गिरोहबंद अधिनियम की समानांतर कार्यवाही का सहारा लेकर अन्य सभी लंबित मामलों में अनिश्चित काल तक विलंब करने की अनुमति मिल जाएगी। न्यायालय ने कहा कि ऐसे निर्वचन को स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया कमजोर होगी।
- गिरोहबंद अधिनियम की धारा 12 के वास्तविक उद्देश्य पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 12 का उद्देश्य कभी भी गिरोहबंद अधिनियम के मामले के निपटारे तक किसी अभियुक्त के विरुद्ध अन्य कार्यवाही को रोकना नहीं था। इसका उद्देश्य केवल अन्य मामलों के साथ सुनवाई की तारीखों के टकराव की स्थिति में गिरोहबंद अधिनियम की कार्यवाही को प्राथमिकता देना था।
- पूर्व निर्णय पर विश्वास किया गया: न्यायालय ने विचारण न्यायालय द्वारा धर्मेंद्र कीर्थल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2013) पर विश्वास करने को मंजूरी दी, जिसमें इसी प्रकार यह माना गया था कि धारा 12 का उद्देश्य अन्य मामलों में विचारण की कार्यवाही में विलंब करना नहीं था, विशेष रूप से जहाँ ऐसी कार्यवाही पहले ही काफी हद तक आगे बढ़ चुकी थी।
- अनुतोष प्रदान किये जाने पर: न्यायालय ने परिवादकर्त्ता की अपील मंजूर कर ली, हत्या के विचारण पर रोक लगाने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया, और यह माना कि चूँकि सेशन न्यायालय में पहले ही एक अंतरिम आदेश के अधीन दोषसिद्धि हो चुकी थी, इसलिये वह दोषसिद्धि अंतिम मानी जाएगी।
त्वरित विचारण का अधिकार क्या है?
सांविधानिक आधार:
- त्वरित विचारण के अधिकार के अधीन आपराधिक कार्यवाही को उचित समय के भीतर, अनावश्यक विलंब के बिना समाप्त करना आवश्यक है।
- संविधान में इसका स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है; लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इसे अनुच्छेद 21 के अधीन प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के भाग के रूप में मान्यता दी है।
- यह सभी प्रक्रमों पर लागू होता है: अन्वेषण, जांच, विचारण, अपील, पुन:विचारण और पुनरीक्षण।
- अपराध की गंभीरता की परवाह किये बिना, प्रत्येक अभियुक्त को यह सुविधा उपलब्ध है।
न्यायिक विकास:
- हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य: विचाराधीन कैदियों की लंबे निरोध को उजागर किया; अनुच्छेद 21 के अधीन त्वरित विचारण को एक अनिवार्य घटक माना।
- आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक: ने स्पष्ट किया कि कोई निश्चित/कठोर समय सीमा समान रूप से लागू नहीं होती; विलंब का आकलन मामले-दर-मामले के आधार पर किया जाना चाहिये:
- विलंब की अवधि
- विलंब के कारण
- अभियुक्त का आचरण और अभियोजन पक्ष
- मामले की जटिलता
- साक्षियों/अभियुक्त की संख्या
- अभियुक्त को हुई हानि
- यह अधिकार केवल तत्काल निर्णय के बारे में नहीं है - यह राज्य को एक ऐसी न्याय प्रणाली बनाए रखने के लिये बाध्य करता है जो मामलों का उचित समय सीमा के भीतर निर्णय करने में सक्षम हो।
महत्त्व:
- अभियुक्त के लिये, विलंब से निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं:
- दीर्घ अवधि का पूर्व-विचारण निरोध
- नियोजन/आय का नुकसान
- सामाजिक कलंक और मानसिक पीड़ा
- कमजोर प्रतिरक्षा
- साक्षियों/साक्ष्यों का नुकसान
- दोषसिद्धि से पूर्व वास्तविक दण्ड
- पीड़ितों के लिये, विलंब से न्याय, प्रतिकर और मामले का निपटारा टल जाता है।
- इस प्रणाली के लिये, लंबे समय तक चलने वाले मामले:
- जनता के विश्वास को कम करना
- जेलों में भीड़भाड़ बढ़ाना
- मुकदमेबाजी की लागत बढ़ाना
- निवारण को कमजोर करना
- साक्षियों को धमकाने/साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने में सक्षम बनाना
- किसी भी पक्ष के लिये प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की कीमत पर गति नहीं आनी चाहिये।
विलंब के कारण:
- न्यायिक और कर्मचारी पदों की रिक्तियां
- अभियोजकों/विधिक सहायता अधिवक्ताओं की कमी
- बार-बार स्थगन
- फोरेंसिक/अन्वेषण रिपोर्टों में विलंब
- साक्षी की अनुपस्थिति
- कमजोर अन्वेषण और एजेंसियों के बीच खराब समन्वय
- अपर्याप्त न्यायालयी अवसंरचना
- केस बैकलॉग
- प्रक्रियात्मक अनुप्रयोगों का दुरुपयोग
- समन/वारण्ट की तामील में विलंब
- विचाराधीन कैदियों को निरोध में रखना तब विशेष रूप से अन्यायपूर्ण हो जाता है जब अभिरक्षा की अवधि संभावित दण्ड के करीब या उससे अधिक हो जाती है।
उपचार और सुधार:
- न्यायिक उपचार : जमानत, समयबद्ध अन्वेषण/विचारण निर्देश, पुराने/विचाराधीन मामलों को प्राथमिकता, दंडादेश में कमी, असाधारण मामलों में प्रतिकर, विलंब के कारण गंभीर, अपूरणीय पूर्वाग्रह होने पर मुकदमे को रद्द करना।
- उपचार तथ्यों पर निर्भर करता है – विलंब से अभियोजन की समाप्ति स्वतः ही सुनिश्चित नहीं हो जाती, विशेषत: जटिल/गंभीर मामलों में।
- दीर्घकालिक सुधार: न्यायिक/अभियोजन संबंधी रिक्तियों को भरना, जिला न्यायालयों को मजबूत करना, अनावश्यक स्थगनों को सीमित करना, फोरेंसिक क्षमता में सुधार करना, विधिक सहायता का विस्तार करना, ई-समन/केस प्रबंधन को अपनाना, कैदियों की सुरक्षित वीडियो रिकॉर्डिंग का उपयोग करना, विचाराधीन कैदियों की नियमित समीक्षा करना, अन्वेषण और साक्षियों की सुरक्षा में सुधार करना।