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करेंट अफेयर्स और संग्रह
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आपराधिक कानून
रिश्वत की मांग का सबूत न होने पर रिश्वत की वसूली दोषसिद्धि के लिये अपर्याप्त है
20-Aug-2026
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रफीकमिया अहमदमिया मालेक बनाम गुजरात राज्य "केवल दागी नोट की बरामदगी से उस मामले को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता जहाँ मांग ही साबित नहीं हुई हो।" न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने रफीकमिया अहमदमिया मालेक बनाम गुजरात राज्य और सिराजभाई रसूलभाई वोरा बनाम गुजरात राज्य (2026) के मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन एक तलाटी-सह-मंत्री और एक चपरासी की दोषसिद्धि को बरकरार रखने वाले गुजरात उच्च न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया, यह मानते हुए कि प्रारंभिक मांग के सबूत के बिना, सह-अभियुक्त से मात्र करेंसी नोट की बरामदगी दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रख सकती है।
इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- परिवादकर्त्ता ने आय प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिये मामलतदार से संपर्क किया। आवेदन को ग्राम बेचरी (अभियुक्त 1) के तलाटी-सह-मंत्री को भेज दिया गया।
- आरोप लगाया गया कि अभियुक्त 1 ने प्रमाण पत्र जारी करने के लिये 120 रुपए (स्वयं के लिये 100 रुपए और चपरासी, अभियुक्त 2 के लिये 20 रुपए) की मांग की थी।
- भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो में परिवाद दर्ज कराया गया और एक जाल बिछाया गया। परिवादकर्त्ता ने कथित तौर पर अभियुक्त 2 को 20 रुपए का नोट दिया, जिसे बाद में रंगे हाथों पकड़ा गया।
- विचारण न्यायालय ने दोनों अभियुक्तों को अधिनियम की धारा 7 के साथ धारा 13(1)(घ) के अधीन दोषसिद्द ठहराया, जबकि उन्हें धारा 120ख भारतीय दण्ड संहिता (अब धारा 61 भारतीय नये संहिता) के अधीन आपराधिक षड्यंत्र के आरोप से दोषमुक्त कर दिया। दोनों को छह महीने के कठोर कारावास और 2,000 रुपए के जुर्माने का दण्ड सुनाया गया।
- गुजरात उच्च न्यायालय ने अपील पर दोषसिद्धि को बरकरार रखा और दण्ड बढ़ाने के लिये राज्य की याचिका को खारिज कर दिया, यह देखते हुए कि अभियुक्त को पहले ही सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- परिवादकर्त्ता के कथन में विरोधाभास: परिवादकर्त्ता ने एक पृथक् मामले में पहले कथन किया था कि अभियुक्त 1 ने शुरू में 200 रुपए की मांग की थी, बाद में 120 रुपए पर समझौता हुआ, लेकिन उसने वर्तमान कार्यवाही में ऐसा नहीं कहा। न्यायालय ने माना कि इस मामले में उसका कथन उसके अपने पूर्व कथन से भिन्न है।
- निर्देशानुसार भुगतान न करने पर: ब्यूरो ने परिवादकर्त्ता को निदेश दिया था कि मांग किये जाने पर पूरे 120 रुपए (तीन नोटों में) सौंप दिये जाएं। यद्यपि, प्रमाण पत्र जारी करने के बाद कथित तौर पर अभियुक्त 1 द्वारा पूरी राशि की मांग किये जाने के बावजूद, परिवादकर्त्ता ने अभियुक्त 2 को केवल एक 20 रुपए का नोट दिया, और इस विचलन का कोई स्पष्टीकरण अभिलेख में अभिलिखित नहीं है।
- अभियुक्त 2 का मौन और आचरण: अभियुक्त 2 पास में ही मौजूद होने के बावजूद, आंशिक भुगतान किये जाने पर कोई प्रश्न नहीं उठाया, और परिवादकर्त्ता ने स्वयं प्रतिपरीक्षा में स्वीकार किया कि अभियुक्त 2 ने कोई मांग नहीं की थी। न्यायालय ने माना कि इस आचरण से पूरा मामला संदिग्ध हो जाता है।
- षड्यंत्र के आरोप से दोषमुक्त होने पर: चूँकि मांग का आरोप केवल अभियुक्त 1 (जिसके पास कभी कोई पैसा नहीं मिला) पर लगाया गया था और स्वीकृति का आरोप केवल अभियुक्त 2 (जिसके विरुद्ध मांग साबित नहीं हुई) पर लगाया गया था, और दोनों को धारा 120ख भारतीय दण्ड संहिता के अधीन षड्यंत्र के आरोप से दोषमुक्त कर दिया गया था, इसलिये मांग और स्वीकृति को जोड़ने वाली साक्ष्य श्रृंखला टूट गई।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 20 के अधीन उपधारणा पर: एन. विजयकुमार बनाम तमिलनाडु राज्य के मामले पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने माना कि धारा 20 के अधीन उपधारणा तभी उत्पन्न होती है जब प्रारंभिक मांग संदेह से परे साबित हो जाती है; यदि मांग ही साबित नहीं होती है, तो केवल अभियुक्त -2 से 20 रुपए की बरामदगी अभियोजन पक्ष के मामले को पुनर्जीवित नहीं कर सकती। उच्च न्यायालय ने केवल इस आधार पर उपधारणा करने में त्रुटि की थी कि अभियुक्त लोक सेवक थे और बरामद नोट दूषित था।
- भुगतान के समय के संबंध में: परिवादकर्त्ता को आय प्रमाण पत्र दिये जाने के बाद ही 20 रुपए का नोट सौंपा गया, जिससे कथित मांग पर और भी संदेह उत्पन्न हो गया।
- स्वीकृति की वैधता पर: न्यायालय ने माना कि उप जिला विकास अधिकारी द्वारा अभियुक्त-1 के विरुद्ध अभियोजन चलाने के लिये दी गई स्वीकृति अमान्य थी, क्योंकि गुजरात पंचायत अधिनियम, 1961 के अधीन केवल जिला विकास अधिकारी ही तलाटी-सह-मंत्री को हटाने के लिये अधिकृत था। यद्यपि, दोषसिद्धि को केवल इसी आधार पर अपास्त नहीं किया गया; न्यायालय ने स्वतंत्र रूप से पाया कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्य आरोप को संदेह से परे साबित करने में अपर्याप्त थे।
- अभियुक्त 2 की प्रतिरक्षा पर: न्यायालय ने अभियुक्त 2 के इस स्पष्टीकरण को संभावित पाया कि उसे परिवादकर्त्ता से ईद अगले दिन होने के कारण 20 रुपए मिले थे।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 क्या है?
पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य:
- सरकारी कर्मचारियों और सरकारी एजेंसियों के बीच भ्रष्टाचार विरोधी विधियों को मजबूत करने और रिश्वतखोरी से निपटने के लिये अधिनियमित किया गया।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1947 (संथनम समिति की सिफारिशों के आधार पर 1952 और 1964 में संशोधित) की नींव पर निर्मित।
प्रमुख परिभाषाएँ:
- "लोक कर्त्तव्य" (धारा 2(ख)): कोई भी कर्त्तव्य जिसमें राज्य, जनता या समाज का हित हो।
- "लोक सेवक" (धारा 2(ग)): इसमें सरकारी कर्मचारी, स्थानीय निकाय कर्मचारी, न्यायाधीश, मध्यस्थ, निर्वाचन अधिकारी, सहकारी समिति के पदाधिकारी, विश्वविद्यालय कर्मचारी और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों के कर्मचारी शामिल हैं।
- इस अधिनियम के अधीन मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को लोक सेवक माना जाता है, भले ही धारा 21 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन विधायक लोक सेवक के रूप में योग्य न हो।
मुख्य अपराध (धारा 7-13):
- धारा 7 - लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कार्य के लिये विधिक पारिश्रमिक के अतिरिक्त रिश्वत प्राप्त करना; इसके लिये केवल धन का कब्ज़ा ही नहीं, अपितु मांग का सबूत भी आवश्यक है।
- धारा 8 – लोक सेवक को प्रभावित करने के लिये भ्रष्ट/अवैध साधनों के माध्यम से रिश्वत प्राप्त करना (निजी व्यक्तियों पर भी लागू होता है)।
- धारा 9 – लोक सेवक पर व्यक्तिगत प्रभाव का प्रयोग करके रिश्वत प्राप्त करना।
- धारा 11 – लोक सेवक द्वारा किसी कार्यवाही/संव्यवहार में शामिल व्यक्ति से कोई मूल्यवान वस्तु स्वीकार करना।
- धारा 12 – धारा 7-11 के अधीन अपराधों का दुष्प्रेरण।
- धारा 13 - आपराधिक कदाचार, जिसमें भ्रष्ट/अवैध साधनों से मूल्यवान वस्तुएं प्राप्त करना, आधिकारिक पद का दुरुपयोग करना या अनुपातहीन संपत्ति रखना शामिल है।
अन्वेषण का ढाँचा :
- धारा 17 – केवल निर्दिष्ट रैंक ही अन्वेषण कर सकते हैं: इंस्पेक्टर (CBI/दिल्ली), सहायक पुलिस आयुक्त (महानगर), डिप्टी SP या उससे ऊपर (अन्यत्र)।
- धारा 17क (2018 संशोधन) - लोक सेवक की आधिकारिक सिफारिश/निर्णय से जुड़े अपराधों के अन्वेषण के लिये सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है, जब तक कि उसे रंगे हाथों न पकड़ा गया हो।
- धारा 18 – अन्वेषण अधिकारी बैंकर्स की पुस्तकों की परीक्षा कर सकते हैं, जिनमें उन व्यक्तियों की पुस्तकें भी शामिल हैं जिन पर अभियुक्त की ओर से धन रखने का संदेह है।
उपधारणा और छूट:
- धारा 20 – यह खंडनीय उपधारणा है कि अभियुक्त के पास पाई गई मूल्यवान वस्तुएं/प्रतिदान अवैध प्रयोजनों के लिये प्राप्त किये गए थे — लेकिन यह उपधारणा तभी उत्पन्न होती है जब अभियोजन पक्ष पहले मांग को साबित कर देता है।
- धारा 24 - रिश्वत देने वाले को प्रतिरक्षा प्रदान करती है जिसका कथन लोक सेवक के विरुद्ध प्रयोग किया जाता है; उसकी संस्वीकृति का प्रयोग उस पर अभियोजन चलाने के लिये नहीं किया जा सकता है।
दण्ड :
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अपराध |
दण्ड |
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धारा 7 — विधिक पारिश्रमिक के अतिरिक्त परितोषण |
माह से 5 वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना |
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धारा 8 — भ्रष्ट साधनों द्वारा प्रभावित करना |
3 वर्ष से 7 वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना |
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धारा 9 — व्यक्तिगत प्रभाव का प्रयोग |
6 माह से 5 वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना |
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धारा 13 — आपराधिक कदाचार |
4 वर्ष से 10 वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना |
2018 संशोधन अधिनियम — प्रमुख परिवर्तन:
- अस्पष्ट प्रोत्साहन संबंधी भाषा के स्थान पर "अनुचित लाभ" शब्द का प्रयोग किया गया।
- आपराधिक कदाचार के लिये धारा 13 के आधारों को संकुचित करके दुर्विनियोग और अनुपातहीन संपत्ति तक सीमित कर दिया गया है।
- धारा 7, 11, 13 और 15 के अधीन किसी लोक सेवक पर अभियोजन चलाने से पहले पूर्व स्वीकृति अनिवार्य कर दी गई।
- रिश्वत देना अपराध घोषित किया गया (धारा 8) लेकिन दबाव में काम करने वाले उन व्यक्तियों को छूट दी गई है जो 7 दिनों के भीतर रिपोर्ट करते हैं।
- वाणिज्यिक संगठनों और उनके अधिकारियों के लिये कॉर्पोरेट दायित्व पेश किया गया (धारा 9-10)।
- विचारण पूरा करने के लिये समय सीमा निर्धारित करें (जिसे 6 महीने की वृद्धि में 4 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है)।
आपराधिक कानून
पुलिस गर्भाधान-पूर्व और प्रसव-पूर्व निदान-तकनीक अधिनियम के अधीन अपराधों के लिये प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं कर सकती और न ही अन्वेषण कर सकती है
20-Aug-2026
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उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बृज पाल सिंह "पुलिस को इस अधिनियम के अधीन अपराधों का अन्वेषण करने का अधिकार नहीं है।" न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बृज पाल सिंह (2026) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि पुलिस गर्भाधान पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 (PC & PNDT Act) के अधीन अपराधों के लिये प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं कर सकती और प्राथमिक अन्वेषण प्राधिकरण के रूप में कार्य नहीं कर सकती, और यह स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट पुलिस चार्जशीट के आधार पर ऐसे अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता।
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम बृज पाल सिंह (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर 2024 के एक निर्णय से उत्पन्न हुआ, जिसमें पुलिस की FIR दर्ज करने और गर्भाधान पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम के अधीन अपराधों का अन्वेषण करने की शक्तियों के दायरे से संबंधित तीन प्रश्न उच्चतम न्यायालय को भेजे गए थे।
- ये प्रश्न अधिनियम की धारा 27 (अधिनियम के अंतर्गत घोषित अपराध संज्ञेय, अजमानतीय और अश्मनीय हैं) और धारा 28 (उचित प्राधिकारी, अधिकृत अधिकारी या 15 दिन का पूर्व नोटिस देने वाले व्यक्ति के परिवाद के अलावा संज्ञान का वर्जन) के बीच परस्पर संबंध पर आधारित थे।
- मुख्य विवाद्यक यह था कि क्या धारा 27 के अधीन अपराधों को संज्ञेय घोषित करने से पुलिस को FIR दर्ज करने और उसके अन्वेषण करने की अनुमति स्वतंत्र रूप से मिल जाती है, या क्या धारा 28 की विशेष प्रक्रिया कार्यवाही शुरू करने को अधिनियम के अधीन विहित तंत्र तक ही सीमित रखती है।
- वरिष्ठ अधिवक्ता मुक्ता गुप्ता ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नितिन सलूजा के साथ एमिकस क्यूरी के रूप में न्यायालय की सहायता की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- केवल संज्ञेय अपराध होने के आधार पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने पर: न्यायालय ने माना कि अधिनियम की धारा 27 और 28 की भाषा, अधिनियम के अन्य प्रावधानों के साथ-साथ इसके सामाजिक हित और संवेदनशीलता एवं चिकित्सा-तकनीकी विशेषज्ञता को ध्यान में रखते हुए, यह दर्शाती है कि पुलिस को अधिनियम के अंतर्गत अपराधों की अन्वेषणकर्त्ता के रूप में नियुक्त नहीं किया गया है। पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR को अधिनियम में विहित प्रक्रिया के अनुसार उसके तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुँचाया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह निर्बंधन केवल गर्भाधान पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराधों पर लागू होता है और पुलिस को सामान्य आपराधिक विधि के अंतर्गत स्वतंत्र अपराधों का अन्वेषण और अभियोजन से नहीं रोकता है।
- अधिनियम के अंतर्गत परिवादों का अन्वेषण कौन कर सकता है: न्यायालय ने माना कि अधिनियम की धारा 17(4) के अधीन परिवादों के अन्वेषण का दायित्व समुचित प्राधिकारी पर है। न्यायालय ने नियम 18क(3)(iv) का भी हवाला दिया, जो सांविधिक रूप से प्रभावी है और यह अनिवार्य करता है कि जहाँ तक संभव हो पुलिस की सहायता लेने से बचा जाए। अतः पुलिस अधिनियम के अंतर्गत मुख्य अन्वेषण प्राधिकारी नहीं हो सकता और वह केवल अनुपूरक भूमिका निभा सकता है, वह भी तब जब अधिनियम के अनुसार समुचित प्राधिकारी द्वारा इसकी आवश्यकता हो।
- पुलिस चार्जशीट के आधार पर संज्ञान लेना: न्यायालय ने माना कि धारा 28 संज्ञान लेने के लिये एक पूर्ण सांविधिक तंत्र प्रदान करती है, जो केवल उस उपबंध में विशेष रूप से निर्धारित स्थितियों के अधीन है। परिणामस्वरूप, एक सक्षम मजिस्ट्रेट पुलिस अन्वेषण के बाद दायर आरोपपत्र के आधार पर अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता।
- मामले के निपटारे पर: न्यायालय ने मामले को विधि के अनुसार निर्णय लेने के लिये इलाहाबाद उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया।
गर्भाधान पूर्व एवं प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 क्या है?
- यह क्या है: एक संसदीय अधिनियम जिसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश लगाना और प्रसवपूर्व लिंग अवधारण पर प्रतिबंध लगाकर भारत के घटते लिंग अनुपात को रोकना है।
- उद्देश्य: गर्भाधान से पूर्व या पश्चात में लिंग चयन तकनीकों पर प्रतिबंध लगाना और लिंग-चयनात्मक गर्भपात के लिये प्रसवपूर्व निदान तकनीकों के दुरुपयोग को रोकना।
मुख्य उपबंध :
- यह विधि प्रसवपूर्व निदान तकनीकों (जैसे, अल्ट्रासाउंड) के उपयोग को विनियमित करता है, और उन्हें केवल आनुवंशिक असामान्यताओं, चयापचय संबंधी विकारों, गुणसूत्र संबंधी असामान्यताओं, कुछ जन्मजात विकृतियों, हीमोग्लोबिनोपैथी और लिंग-संबंधी विकारों का पता लगाने की अनुमति देता है।
- यह विधेयक किसी भी प्रयोगशाला, केंद्र या क्लिनिक को भ्रूण का लिंग अवधारण करने के लिये अल्ट्रासोनोग्राफी सहित कोई भी परीक्षण करने से रोकता है।
- यह विधि किसी भी माध्यम से (शब्दों, संकेतों या अन्य किसी भी तरीके से) गर्भवती महिला या उसके रिश्तेदारों को भ्रूण के लिंग के बारे में सूचित करने पर रोक लगाता है।
- प्रसवपूर्व/गर्भाधानपूर्व लिंग अवधारण सुविधाओं के लिये किसी भी रूप में (मुद्रित, इलेक्ट्रॉनिक, होर्डिंग, दीवार पेंटिंग, सिग्नल, ध्वनि आदि) विज्ञापन प्रतिबंधित है, जिसके लिये 3 वर्ष तक के कारावास और 10,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।
इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध:
- अपंजीकृत संस्थानों में प्रसवपूर्व निदान तकनीकों का संचालन करना या उसमें सहायता करना।
- किसी पुरुष या महिला के लिंग का चयन।
- अधिनियम में निर्दिष्ट उद्देश्यों के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिये प्रसवपूर्व निदान तकनीकें करना।
- अधिनियम के उल्लंघन में अल्ट्रासाउंड मशीनों या भ्रूण के लिंग का पता लगाने में सक्षम किसी भी उपकरण की बिक्री, वितरण, आपूर्ति या किराए पर देना।