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करेंट अफेयर्स और संग्रह
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सांविधानिक विधि
उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक सेवा हेतु अधिवक्ता के रूप में आवश्यक अभ्यास अवधि घटाकर 1 वर्ष की
21-Aug-2026
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भूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ और संबंधित मामले (2026) "पूर्व अनुभव की आवश्यकता का उचित आधार होना चाहिये जिससे कोई कठिनाई न हो।" भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (असहमति जताते हुए) की पीठ ने मई 2025 के उस निर्णय को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिकाओं के एक समूह पर अपना निर्णय सुनाया, जिसमें सिविल न्यायाधीश (जूनियर डिवीजन) के रूप में सीधी भर्ती चाहने वाले अभ्यर्थियों के लिये तीन वर्ष के विधिक अभ्यास को अनिवार्य किया गया था। पूर्व के निर्णय के मूल तर्क का पुनर्विलोकन करने से इंकार करते हुए, न्यायालय ने अनिवार्य अभ्यास अवधि को घटाकर एक वर्ष कर दिया और अंतरिम अवधि में फंसे अभ्यर्थियों के लिये एक संक्रमणकालीन योजना निर्धारित की।
इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी ?
- पुनर्विचार याचिकाओं में उच्चतम न्यायालय के मई 2025 के उस निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की गई थी, जिसने प्रवेश स्तर के न्यायिक अधिकारियों के लिये तीन वर्ष के विधिक अभ्यास की आवश्यकता को बहाल कर दिया था।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि यह आदेश मेधावी विधि स्नातकों को स्नातक होने के तुरंत बाद न्यायपालिका में शामिल होने से हतोत्साहित कर सकता है, और यह महिलाओं और दिव्यांग व्यक्तियों को असमान रूप से प्रभावित करेगा।
- न्यायालय ने अधिवक्ताओं, हस्तक्षेपकर्ताओं और एमिकस क्यूरी की दलीलें सुनने के बाद, साथ ही दिव्यांग व्यक्तियों के लिये नियम में छूट की मांग करने वाली एक संबंधित रिट याचिका पर सुनवाई के बाद, 28 जुलाई को अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- मई 2025 के निर्णय के मूलभूत तर्क पर: मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पीठ को पूर्व के निर्णय के मूलभूत तर्क में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं मिला, जिसमें कहा गया था कि न्यायपालिका में शामिल होने से पहले अभ्यर्थी को विधि पेशे का अनुभव होना चाहिये। यद्यपि, न्यायालय ने यह भी कहा कि पूर्व अनुभव की आवश्यकता का उचित संबंध होना चाहिये जिससे कोई कठिनाई न हो।
- सीमित हस्तक्षेप की आवश्यकता पर: न्यायालय ने माना कि बिना किसी संक्रमणकालीन व्यवस्था के तीन वर्ष के अभ्यास नियम की अचानक बहाली ने युवा अधिवक्ताओं और विधि स्नातकों पर कठिनाई उत्पन्न कर दी है, जिसके लिये सीमित हस्तक्षेप आवश्यक है।
- संक्रमणकालीन योजना (20 मई 2025 से 31 मार्च 2027): न्यायालय ने माना कि इस अवधि के दौरान जारी न्यायिक परीक्षा अधिसूचनाओं के अंतर्गत आने वाले अभ्यर्थी तीन वर्ष के अभ्यास की अनिवार्यता के होते हुए भी आवेदन करने के पात्र हैं, और उन्हें अभ्यास प्रमाण पत्र प्रस्तुत किये बिना ही एक वर्ष का सक्रिय अभ्यास पूर्ण किया हुआ माना जाएगा। चयन होने पर, ऐसे अभ्यर्थियों को राज्य न्यायिक अकादमी में एक वर्ष के गहन प्रशिक्षण के लिये प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी के रूप में नियुक्त किया जाएगा, जिसके बाद एक वर्ष का संरचित विधि क्लर्कशिप होगा - पहले छह महीने प्रधान जिला न्यायाधीश या उच्च न्यायिक सेवा के सदस्य के अधीन और शेष छह महीने उच्च न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश के अधीन।
- संक्रमणोत्तर योजना (1 अप्रैल 2027 से) के संबंध में: न्यायालय ने माना कि उम्मीदवारों को कम से कम एक वर्ष का सक्रिय अभ्यास अनुभव आवश्यक होगा, जिसका सत्यापन प्रभावी न्यायिक कार्यवाही में दर्ज भागीदारी के आधार पर जारी किए गए अभ्यास प्रमाण पत्र के माध्यम से किया जाएगा। चयनित उम्मीदवारों को इसी प्रकार राज्य न्यायिक अकादमी में एक वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा, जिसके बाद समान संरचित तरीके से एक वर्ष का क्लर्कशिप कार्य करना होगा।
- वेतन और मूल्यांकन के संबंध में: न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रशिक्षुओं को अकादमी प्रशिक्षण अवधि के दौरान प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के सकल वेतन के आधे के बराबर वेतन मिलेगा, और क्लर्कशिप के दौरान भी यही वेतन मिलेगा। क्लर्कशिप पूरी होने पर, पर्यवेक्षक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को प्रशिक्षु की प्रगति और उपयुक्तता पर एक तर्कसंगत मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, और केवल संतोषजनक रिपोर्ट मिलने पर ही अधिकारी को नियमित वेतनमान और सेवा लाभों के साथ नियमित पद पर नियुक्त किया जाएगा।
- योजना की आवधिक समीक्षा पर: न्यायालय ने माना कि वर्तमान व्यवस्था अपरिवर्तनीय नहीं है और निर्देश दिया कि इसके प्रभाव का आकलन संचालन के तीन वर्षों के बाद किया जाए, यह देखते हुए कि यह अवधि योजना के वांछित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये पर्याप्त संस्थागत अनुभव प्रदान करेगी।
- असहमति पर: न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने बहुमत के मत से असहमति व्यक्त की और कहा कि पुनर्विलोकन याचिकाओं को खारिज कर दिया जाना चाहिये।
3-वर्षीय अभ्यास नियम क्या है?
- उत्पत्ति: यह आवश्यकता उच्चतम न्यायालय के मई 2025 के निर्णय से जुड़ी है, जिसने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर सीधी भर्ती के लिये अनिवार्य पूर्व विधिक अभ्यास को एक पूर्व शर्त के रूप में बहाल किया, उस स्थिति को उलट दिया जिसमें नए विधि स्नातकों को पूर्व अभ्यास के बिना न्यायिक सेवा में प्रवेश करने की अनुमति थी।
- तर्क: यह नियम इस तर्क पर आधारित है कि न्यायिक पद ग्रहण करने से पहले अभ्यर्थियों को विधिक पेशे से परिचित होना चाहिये – न्यायालय प्रक्रिया, मुवक्किलों के साथ बातचीत और व्यावहारिक मुकदमेबाजी का अनुभव होना चाहिये।
2026 के संशोधन की मुख्य विशेषताएं:
- अभ्यास की आवश्यकता तीन वर्ष से घटाकर एक वर्ष कर दी गई है।
- 20 मई 2025 और 31 मार्च 2027 के बीच जारी अधिसूचनाओं में अभ्यर्थियों के लिये संक्रमणकालीन छूट।
- सभी चयनित अभ्यर्थियों के लिये राज्य न्यायिक अकादमी में एक वर्ष का अनिवार्य प्रशिक्षण।
- जिला न्यायपालिका और उच्च न्यायालय के पर्यवेक्षण के बीच विभाजित अनिवार्य एक वर्षीय संरचित क्लर्कशिप।
- यह योजना तीन वर्ष तक प्रभावी रहने के पश्चात पुनर्विलोकन के अधीन होगी।
सिविल कानून
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96
21-Aug-2026
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बाबू बनाम भूमि अधिग्रहण अधिकारी एवं विशेष उप कलेक्टर एवं अन्य "इस प्रकार के निर्णय के विरुद्ध अपील का उपचार विधि अधिनियम की धारा 54 में निहित विशेष उपबंध द्वारा नियंत्रित होता है, न कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 के अधीन साधारण उपबंध द्वारा।" न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति सुभेंदु सामंत |
स्रोत: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति सुभेंदु सामंता की खंडपीठ ने पी. बाबू बनाम भूमि अधिग्रहण अधिकारी और विशेष उप कलेक्टर और अन्य (2026) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 18 या 30 के अधीन कार्यवाही में संदर्भ न्यायालय द्वारा पारित डिक्री के विरुद्ध अपील केवल अधिनियम की धारा 54 के अधीन ही की जा सकती है, न कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 96 के अधीन।
पी. बाबू बनाम भूमि अधिग्रहण अधिकारी एवं विशेष उप कलेक्टर एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 30 के अधीन विशेष उप कलेक्टर द्वारा अधिग्रहित भूमि के लिये दिये गए प्रतिकर के हकदार व्यक्तियों के संबंध में किये गए संदर्भ से उत्पन्न प्रतिकर के बंटवारे से संबंधित भूमि अधिग्रहण विवाद में प्रधान वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश और डिक्री को चुनौती दी।
- अपील को क्रमांकित करने के प्रक्रम में, रजिस्ट्री ने धारा 54 के अधीन इसकी स्वीकार्यता पर आपत्ति जताई। एक समन्वय पीठ ने स्वीकार्यता के प्रश्न को अंतिम निर्णय के लिये खुला छोड़ते हुए अपील के रजिस्ट्रीकरण का निदेश दिया।
- प्रत्यर्थी ने प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए तर्क दिया कि विवादित आदेश धारा 2(2) कसिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन एक डिक्री है और इसलिये धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन अपील की जा सकती है। यह भी तर्क दिया गया कि धारा 54 केवल किसी पंचाट या पंचाट के भाग पर लागू होती है, जबकि विवादित आदेश प्रतिकर के बंटवारे से संबंधित धारा 30 के संदर्भ से उत्पन्न हुआ है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- धारा 54 के पीछे विधायी आशय पर: न्यायालय ने माना कि जहाँ तक विधायी न्यायालय अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही में दिये गए किसी निर्णय या उसके किसी भाग का संबंध है, वहाँ विधानमंडल ने अधिनियम की धारा 18 और 30 के अंतर्गत विशेष उपचार प्रदान किया है। यदि विधानमंडल का उद्देश्य धारा 30 के अंतर्गत संदर्भ न्यायालय द्वारा पारित निर्णयों को धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अपील योग्य बनाना होता, तो धारा 54 के अंतर्गत विशेष अपील उपबंध बनाने की आवश्यकता नहीं होती। धारा 54 का समावेश ही यह दर्शाता है कि अधिनियम के अंतर्गत दिये गए निर्णयों के विरुद्ध अपीलें विशेष रूप से इसी विशेष उपबंध द्वारा शासित होती हैं।
- धारा 18 और धारा 30 के अधीन संदर्भित मामलों का समान महत्त्व : न्यायालय ने माना कि धारा 30 के अधीन संदर्भित मामला और धारा 18 के अधीन संदर्भित मामला, दोनों ही कलेक्टर द्वारा संदर्भित न्यायालय को भेजे गए सांविधिक मामले हैं। धारा 18 तब लागू होती है जब कोई हितधारक पंचाट पर विवाद करता है, जबकि धारा 30 तब लागू होती है जब प्रतिकर के बंटवारे या उन व्यक्तियों के संबंध में विवाद उत्पन्न होता है जिन्हें यह देय है।
- धारा 26(2) के अधीन डीम्ड डिक्री और लागू अपीलीय उपचार पर: न्यायालय ने माना कि जबकि धारा 18 और 30 के अधीन निर्णय अधिनियम की धारा 26 के मद्देनजर डिक्री के समान है, ऐसी डिक्री के विरुद्ध अपील उपचार भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 54 में निहित विशेष उपबंध द्वारा शासित है, न कि धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन साधारण उपबंध द्वारा।
- धारा 54 के अंतर्गत "कार्यवाही" के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि धारा 54 में "कार्यवाही" में धारा 18 और 30 के अंतर्गत संदर्भों पर निर्णय शामिल है, जबकि धारा 54 अपील का अधिकार प्रदान करती है और सिविल प्रक्रिया संहिता केवल ऐसी अपील की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है।
- निर्णय पर: न्यायालय ने सुनवाई की स्वीकार्यता संबंधी आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि धारा 18 या 30 के अधीन संदर्भित न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अपीलें भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 54 के अधीन दायर की जाती हैं, न कि धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन। अब इस मामले की गुण-दोष के आधार पर सुनवाई की जाएगी।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 क्या है?
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 - मूल डिक्री की अपील
- उपधारा (1): वहाँ के सिवाय जहाँ इस संहिता के पाठ में वा तत्समय प्रवृत्त किसी जन्य विधि द्वारा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित है, ऐसी हर डिक्री की, जो आरंभिक अधिकारिता का प्रयोग करने वाले किसी न्यायालय द्वारा पारित की गई है, अपील उस न्यायालय में होगी जो ऐसे न्यायालय के विनिश्चयों की अपीलों को सुनने के लिये प्राधिकृत है ।
- उपधारा (2): एकपक्षीय पारित मूल डिक्री की अपील हो सकेगी।
- उपधारा (3): पक्षकारों की सहमति से जो डिक्री न्यायालय ने पारित की है उसकी कोई अपील नहीं होगी।
- उपधारा (4): लघुवाद न्यायालयों द्वारा संज्ञेय वाद में किसी डिक्री से कोई अपील, यदि ऐसी डिक्री की रकम या उसका मूल्य दस हजार रुपए से अधिक नहीं है तो, केवल विधि के प्रश्न के संबंध में ही होगी।