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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सांविधानिक विधि

अनुच्छेद 226 के अधीन उत्प्रेषण अधिकारिता घोर रूप से अनुचित अधिकरण के निष्कर्षों को रद्द कर सकता है

 01-Sep-2026

श्री प्रकाश नारायण शर्मा (मृत) विधिक उत्तराधिकारी के माध्यम से बनाम मेसर्स बर्मा शेल को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी (रजिस्ट्रीकृत) और अन्य 

"बिना किसी सबूत के या केवल अनुमानों या अटकलों के आधार पर तथ्य का निष्कर्ष निकालना कानून की त्रुटि माना जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ नेश्री प्रकाश नारायण शर्मा (मृत) बनाम मेसर्स बर्मा शेल को-ऑपरेटिव प्रत्यर्थी हाउसिंग सोसाइटी (रजिस्ट्रीकृत) और अन्य (2026) के मामलेमें दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध अपील खारिज कर दीजिसमें अधिकरण के निर्णय को अपास्त करने के लिये अनुच्छेद 226 के अधीन उत्प्रेषण अधिकारिता का प्रयोग किया गया थायह मानते हुए कि हस्तक्षेप तब उचित है जब कोई निष्कर्ष बिना किसी सहायक साक्ष्य के अभिलिखित किया गया हो।  

इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • मूल दावेदार ने दावा किया कि वह प्रत्यर्थी सहकारी आवास समिति का सदस्य बना हुआ है और भूखंड के आवंटन का हकदार है। 
  • सोसाइटी के रिकॉर्ड से पता चला कि दावेदार ने 1951 में सोसाइटी से इस्तीफा दे दिया थाउसका अंश दूसरे सदस्य को अंतरित कर दिया गया थाऔर 1952 में उसके बाद के सदस्यता आवेदन को नामंजूर कर दिया गया था। 
  • इसके होते हुए भीरजिस्ट्रार ने मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हुए यह मान लिया कि दावेदार सदस्य बना रहा और उसने भूखंड उसके विधिक उत्तराधिकारी को आवंटित कर दिया। 
  • दिल्ली सहकारी अधिकरण ने मध्यस्थ के पंचाट को बरकरार रखा। 
  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 226 के अधीन रिट अधिकारिता का प्रयोग करते हुएमध्यस्थ के पंचाट और अधिकरण के आदेश दोनों को अपास्त कर दियायह पाते हुए कि महत्त्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्यों की अनदेखी की गई थी। 
  • इससे व्यथित होकर मूल याचिकाकर्त्ता के विधिक प्रतिनिधियों ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • उत्प्रेषण अधिकारिता के दायरे पर:  
    न्यायालय ने माना कि यद्यपि उत्प्रेषण अधिकारिता के प्रयोग में हस्तक्षेप का दायरा सीमित रहता हैफिर भी अभिलेख से स्पष्ट विधि की त्रुटि को उच्च न्यायालय द्वारा सुधारा जा सकता हैऔर बिना किसी साक्ष्य या सहायक दस्तावेज़ के अभिलिखित किया गया निष्कर्ष विधि की ऐसी त्रुटि के समान है। 
  • मध्यस्थ के निष्कर्ष पर: 
    न्यायालय ने पाया कि मध्यस्थ का यह निष्कर्ष कि दावेदार सोसायटी के सदस्य के रूप में बना रहापूरी तरह से अनुमान पर आधारित थाजिसका कोई दस्तावेजी आधार नहीं थाऔर यह माना कि बिना किसी सबूत के या मात्र अनुमान या अटकल के आधार पर दिया गया तथ्य का निष्कर्ष विधि की त्रुटि माना जा सकता है। 
  • दिल्ली उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप पर: 
    न्यायालय ने पुष्टि की कि उच्च न्यायालय द्वारा अधिकरण के आदेश में हस्तक्षेप करना पूरी तरह से उचित थाक्योंकि संबंधित दस्तावेजों पर विचार करने से सोसायटी के पक्ष में निर्णय होताऔर उच्च न्यायालय द्वारा उत्प्रेषण अधिकारिता के प्रयोग में कोई त्रुटि नहीं पाई गई। 
  • न्यायसंगत विचारों पर: 
    न्यायालय ने कहा कि चूँकि मूल दावेदार को कभी भी वैध रूप से सोसायटी के सदस्य के रूप में भर्ती नहीं किया गया थाइसलिये वह भूखंड के आवंटन की मांग करने का हकदार नहीं थाऔर उच्च न्यायालय ने न्यायसंगत विचारों को सही ढंग से ध्यान में रखा थाविशेष रूप से यह देखते हुए कि चार पूर्व दावेदार भी उसी भूखंड के आवंटन की मांग कर रहे थे। 
  • निष्कर्ष: 
    न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और अनुच्छेद 226 के अधीन दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा उत्प्रेषण अधिकारिता के प्रयोग को बरकरार रखा। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 क्या है? 

पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य: 

  • प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपनी अधिकारिता में आने वाले सभी क्षेत्रों में किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारीजिसमें कोई भी सरकार शामिल हैको मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और किसी अन्य प्रयोजन के लिये निदेशआदेश या रिट जारी करने का अधिकार है। 
  • इस शक्ति का प्रयोग तब भी किया जा सकता हैभले ही ऐसी सरकार या प्राधिकारी का मुख्यालय या ऐसे व्यक्ति का निवास स्थान उन क्षेत्रों के भीतर न होबशर्ते कि वाद-हेतुक पूर्णत: या भागत: उच्च न्यायालय के राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर उत्पन्न होता हो। 
  • अनुच्छेद 32 के विपरीतअनुच्छेद 226 के अधीन शक्ति केवल मौलिक अधिकारों तक ही सीमित नहीं है और साधारणत: विधिक अधिकारों के प्रवर्तन तक विस्तारित है। 

अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट के प्रकार: 

  • बंदी-प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)— "बंदी को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करो”यह अवैध निरोध अथवा अवैध अभिरक्षा के विरुद्ध व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है 
  • परमादेश (Mandamus) — "हम आदेश देते हैं"यह किसी लोक प्राधिकारी को उस कर्त्तव्य का पालन करने का निदेश देता है जिसे निभाने में वह असफल रहा है। 
  • उत्प्रेषण (Certiorari) — "प्रमाणित किया जाना"किसी अधीनस्थ न्यायालयअधिकरण या प्राधिकारी के उस आदेश को रद्द करता है जो अधिकारिता संबंधी त्रुटि या अभिलेख में स्पष्ट रूप से विद्यमान विधि की त्रुटि से दूषित हो — वर्तमान मामले में विचाराधीन रिट। 
  • प्रतिषेध (Prohibition) - प्रकृति में निवारकयह किसी अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण को अंतिम आदेश पारित होने से पहले अपनी अधिकारिता से बाहर जाने से रोकता है। 
  • अधिकार-पृच्छा(Quo Warranto) — "किस अधिकार से"यह किसी लोक पद पर आसीन व्यक्ति के विधिक अधिकार पर प्रश्न उठाता है। 

पारिवारिक कानून

शेष विवाह अधिनियम के अधीन विवाह संपन्न कराने के लिये विवाह अधिकारी अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र पर बल नहीं दे सकता

 01-Sep-2026

राकेश कल्लमपादथ बनाम केरल राज्य और अन्य 

"तीसरे प्रत्यर्थी को निदेश दिया जाएगा कि वह नोटिस बोर्ड पर प्रकाशित प्रस्तावित विवाह की सूचना के आधार पर कार्रवाई करे और याचिकाकर्त्ता को आवेदन के अनुसार विवाह संपन्न करने की अनुमति दे।" 

न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन 

केरल उच्च न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन नेराकेश कल्लमपडथ बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें एक रिट याचिका का निपटारा करते हुए उप-पंजीयक/विवाह अधिकारी को याचिकाकर्त्ता के नेपाली नागरिक के साथ विवाह के संपन्न होने की अनुमति देने का निदेश दियायह मानते हुए कि समाप्त हो चुका "अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र" विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन इंकार का वैध आधार नहीं हो सकता। 

राकेश कल्लमपडथ बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता ने एक नेपाली नागरिक महिला से विवाह करने के प्रस्तावित विवाह की सूचना प्रस्तुत कीजिसमें नेपाल दूतावास द्वारा जारी किया गया "अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र" भी संलग्न किया गया था। 
  • तत्पश्चात विवाह अधिकारी ने इस आधार पर विवाह संपन्न कराने से इंकार करने का आदेश पारित किया कि अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र की वैधता समाप्त हो गई थी। 
  • इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ता ने विवाह अधिकारी के इंकार को चुनौती देते हुए केरल उच्च न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र की आवश्यकता पर:न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता  के प्रस्तुतीकरण पर विश्वास कियाजो दो पूर्व निर्णयों (W.P.(C) No. 15665 of 2026 and W.P.(C) No. 249 of 2019) द्वारा समर्थित थाजिसमें यह माना गया था कि विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन विवाह को रजिस्ट्रीकृत करने के लिये "अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र" पर बल नहीं दिया जा सकता है। 
  • राज्य की स्थिति पर:न्यायालय ने कहा कि राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकारी वकील ने स्वीकार किया कि अधिनियम के अधीन विवाह संपन्न कराने के लिये अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र की आवश्यकता वाला कोई सांविधिक आदेश मौजूद नहीं है। 
  • दिये गए अनुतोष के संबंध में:न्यायालय ने उप-पंजीयक/विवाह अधिकारी को नोटिस बोर्ड पर पहले से प्रकाशित विवाह संबंधी सूचना के आधार पर कार्रवाई करने और याचिकाकर्त्ता को आवेदन के अनुसार विवाह संपन्न करने की अनुमति देने का निदेश दिया। 
  • निष्कर्ष:न्यायालय ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए विवाह अधिकारी को निदेश दिया कि वह वैध अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र पर बल दिये बिना विवाह संपन्न कराने की अनुमति दे। 

विशेष विवाह अधिनियम, 1954 क्या है? 

पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य: 

  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954 विभिन्न धर्मों या जातियों से संबंधित व्यक्तियों के विवाह के लिय एक विधिक ढाँचा प्रदान करता हैजो धर्म के बजाय राज्य द्वारा स्वीकृत सिविल विवाह को नियंत्रित करता है। 
  • यह विवाह के प्रति एक धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण को दर्शाता हैजो अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय जोड़ों को किसी भी पक्ष द्वारा दूसरे के धर्म में परिवर्तित हुए बिना या अपनी व्यक्तिगत धार्मिक पहचान का त्याग किये बिना विवाह करने में सक्षम बनाता है - जो व्यक्तिगत विधियों से एक महत्त्वपूर्ण अंतर है। 

विवाह की प्रयोज्यता और मान्यता: 

  • यह अधिनियम भारत भर में हिंदुओंमुसलमानोंसिखोंईसाइयोंजैनियों और बौद्धों सहित सभी धर्मों के व्यक्तियों पर लागू होता हैऔर धार्मिक पृष्ठभूमि की परवाह किये बिना सिविल विवाह के लिये एक समान ढाँचा प्रदान करता है। 
  • इसमें विवाह के रजिस्ट्रीकरण का प्रावधान हैजिससे विधिक मान्यता प्राप्त होती है और साथ ही विरासत के अधिकारउत्तराधिकार के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा संरक्षण जैसे लाभ भी मिलते हैं। 
  • यह अधिनियम बहुविवाह को प्रतिबंधित करता हैऔर विवाह के समय यदि किसी भी पक्ष का कोई जीवित पति/पत्नी हो तो विवाह को शून्य घोषित करता हैऔर साथ ही उस स्थिति में भी शून्य घोषित करता है जब कोई भी पक्ष चित्त विकृति के कारण वैध सहमति देने में असमर्थ हो। 

धारा और के अंतर्गत नोटिस की आवश्यकता: 

  • धारा के अनुसारविवाह करने के इच्छुक पक्षकारों को जिले के विवाह अधिकारी को विवाह संबंधी लिखित सूचना देनी होगीजिसमें से कम से कम एक पक्ष को सूचना देने से ठीक पहले कम से कम 30 दिनों तक उस जिले में निवास करना आवश्यक होगा। 
  • धारा किसी भी व्यक्ति को नोटिस के प्रकाशन की तारीख से 30 दिनों के भीतर विवाह पर आपत्ति जताने की अनुमति देती है - यह उपबंध कपटपूर्ण या अवैध विवाहों को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया हैतथापि यह सहमति से विवाह करने वाले दंपति के दुरुपयोग और उत्पीड़न का भी एक स्रोत रहा है। 
  • अधिनियम में विवाह संपन्न कराने के लिये "अविवाहित स्थिति प्रमाण पत्र" प्रस्तुत करने को सांविधिक रूप से अनिवार्य नहीं किया गया हैऔर विवाह अधिकारी स्पष्ट सांविधिक समर्थन के अभाव में ऐसी आवश्यकता को लागू नहीं कर सकते हैं - यही वह विवाद्यक है जिसे वर्तमान मामले में संबोधित किया गया है। 

आयु संबंधी आवश्यकता: 

  • विशेष विवाह अधिनियम के अधीन विवाह के लिये न्यूनतम आयु पुरुषों के लिये 21 वर्ष और महिलाओं के लिये 18 वर्ष हैऔर वैध विवाह के लिये ये आवश्यकताएं अनिवार्य हैं। 

उत्तराधिकार अधिकारों पर प्रभाव: 

  • विशेष विवाह अधिनियम के अधीन विवाह करने वाले व्यक्ति को व्यक्तिगत विधि के अधीन विरासत के अधिकारों के प्रयोजनों के लिये अपने परिवार से अलग माना जाता हैएक ऐसा परिणाम जिसने कुछ दंपति को अधिनियम के अधीन विवाह करने का विकल्प चुनने से हतोत्साहित किया है। 

अधिनियम से जुड़े प्रमुख विवाद्यक: 

  • धारा के अधीन आपत्ति दर्ज कराने के लिये दी गई 30 दिन की समय सीमा का अक्सर प्रयोग दंपतियों को परेशान करने और परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह में देरी या बाधा डालने के लिये किया जाता है। 
  • नोटिसों का अनिवार्य प्रकाशन निजता संबंधी चिंताओं को जन्म देता हैजिससे दंपतियों की व्यक्तिगत जानकारी और विवाह योजनाओं का अवांछित रूप से निरीक्षण किया जा सकता है। 
  • विशेष विवाह अधिनियम के अधीन विवाह करने वाले अंतरजातीय और अंतरधार्मिक दंपतियों को सामाजिक कलंकविभेद और चरम मामलों में उत्पीड़न या हिंसा का सामना करना पड़ता है।