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आपराधिक कानून
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118
05-Sep-2026
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सीमा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य "...यह बिल्कुल स्पष्ट है कि संबंधित न्यायाधीश द्वारा जमानत देने के विवेक का प्रयोग मनमाने ढंग से किया गया है।" न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल इलाहाबाद उच्च न्यायालय |
चर्चा में क्यों?
सीमा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने दहेज मृत्यु के अभियुक्त पति को दी गई जमानत रद्द कर दी और सिफारिश की कि अपर सेशन न्यायाधीश के विरुद्ध जांच शुरू की जाए, जिन्होंने बिना कारण बताए और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 118 के अधीन सांविधिक उपधारणा की अवहेलना करते हुए उसे जमानत दी थी।
सीमा देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला 2025 में जालौन जिले के एक पुलिस थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 और 80(2) तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4 के अधीन एक विवाहित महिला की मृत्यु के बाद दर्ज किया गया था।
- अभियुक्त पति को इससे पहले ओराई स्थित जालौन की न्यायालय नंबर 1 के अपर सेशन न्यायाधीश से जमानत मिल गई थी।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जमानत रद्द करने के लिये एक आवेदन दायर किया गया था, जिसमें यह तर्क दिया गया था कि मृतक के विवाह के सात वर्ष के भीतर अप्राकृतिक परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी, जिसमें मृत्यु से पहले फांसी और दम घुटना शामिल था।
- इसके अलावा यह भी तर्क दिया गया कि ऐसे साक्ष्य विद्यमान हैं जिनसे पता चलता है कि मृतका को उसकी मृत्यु से कुछ समय पहले दहेज की मांग पूरी न करने के कारण क्रूरता का शिकार बनाया गया था, इसके होते हुए भी विचारण न्यायालय ने पति को जमानत दे दी थी।
- इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालय ने पहले अपर सेशन न्यायाधीश को यह स्पष्ट करने का निदेश दिया था कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के अधीन उपधारणा के विपरीत और बिना कारण बताए पति को जमानत कैसे दी गई।
- अपने स्पष्टीकरण में, अपर सेशन न्यायाधीश सतीश चंद्र द्विवेदी ने स्वीकार किया कि अभियुक्त के विरुद्ध दहेज की मांग के कारण उत्पीड़न के सबूत थे, मृतक की मृत्यु विवाह के सात वर्ष के भीतर हुई थी, और धारा 118 भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अधीन उपधारणा लागू होती है। उन्होंने कहा कि मृतक की सास और ससुर के समान होने के आधार पर जमानत दी गई थी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- जमानत देने के विवेकाधिकार के मनमाने प्रयोग पर:
न्यायालय ने माना कि विचारण न्यायालय के न्यायाधीश का स्पष्टीकरण जमानत देने को उचित नहीं ठहराता, यह देखते हुए कि जमानत देने के विवेकाधिकार का मनमाने ढंग से प्रयोग किया गया था। - न्यायाधीश द्वारा आदेश को उचित ठहराने में विफलता पर:
न्यायालय ने पाया कि अपर सेशन न्यायाधीश यह समझाने में असमर्थ थे कि पति के विरुद्ध पर्याप्त सबूत होने, धारा 118 भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अधीन उपधारणा और जमानत आदेश में कारणों के पूर्ण अभाव के होते हुए भी उसे जमानत क्यों दी गई थी। - आदेश से उत्पन्न संदेह पर:
न्यायालय ने टिप्पणी की कि विवेकाधिकार का प्रयोग करने का यह तरीका संदेह पैदा करता है, हालांकि उसने स्पष्ट किया कि वह संबंधित ट्रायल जज की सत्यनिष्ठा पर कोई राय व्यक्त नहीं कर रहा है, और ऐसे पहलू की प्रशासनिक स्तर पर जांच की आवश्यकता होगी। - प्रशासनिक जांच की आवश्यकता पर:
न्यायालय ने निदेश दिया कि मामले को प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा जाए जिससे यह विचार किया जा सके कि क्या धारा 118 भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अधीन उपधारणा लागू होते हुए भी अभियुक्त को जमानत पर छोड़ने में शक्ति के गलत और मनमाने ढंग से प्रयोग के लिये अपर सेशन न्यायाधीश के विरुद्ध जांच की आवश्यकता है। - जमानत रद्द करने के संबंध में:
विचारण न्यायालय के आदेश को पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण पाते हुए, उच्च न्यायालय ने अभियुक्त पति को दी गई जमानत रद्द कर दी और उसे दस दिनों के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निदेश दिया।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 क्या है?
संबंधित पुराना उपबंध : धारा 113ख, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872
मूल अधिनियम का पाठ:
"118. दहेज मृत्यु के बारे में उपधारणा। — जब प्रश्न यह है कि किसी व्यक्ति ने किसी महिला की दहेज मृत्यु कारित की है और यह दर्शित किया जाता है कि मृत्यु के तुरंत पहले ऐसे व्यक्ति ने दहेज की किसी माँग के लिये, या उसके संबंध में उस महिला के साथ क्रूरता की थी या उसको तंग किया था तो न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि ऐसे व्यक्ति ने दहेज मृत्यु कारित की थी।
स्पष्टीकरण— इस धारा के प्रयोजनों के लिये "दहेज मृत्यु" का वही अर्थ है जो भारतीय न्याय संहिता, 2023 (2023 का 45) की धारा 80 में उसका है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- उपधारणा की प्रकृति: धारा 118 के अधीन उपधारणा विधि की उपधारणा है और यह अनिवार्य ("उपधारणा करेगा") है, विवेकाधीन नहीं - एक बार मूलभूत तथ्य स्थापित हो जाने पर, न्यायालय अभियुक्त के अपराध की उपधारणा के लिये बाध्य है, विवेकाधीन उपधारणा ("उपधारणा कर सकता है") के विपरीत।
- उपधारणा को आकर्षित करने वाले तत्त्व:
- विचाराधीन मृत्यु भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 80 के अधीन परिभाषित "दहेज मृत्यु" होनी चाहिये।
- यह साबित करना होगा कि अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले, अभियुक्त द्वारा महिला के साथ क्रूरता या उत्पीड़न किया गया था।
- इस प्रकार की क्रूरता या उत्पीड़न दहेज की किसी भी मांग के लिये या उससे संबंधित होना चाहिये।
- "मृत्यु से ठीक पूर्व": "उसकी मृत्यु से कुछ समय पहले" अभिव्यक्ति के लिये क्रूरता/उत्पीड़न और मृत्यु के बीच समय की निकटता आवश्यक है; इसका अर्थ मृत्यु से ठीक पहले नहीं है, अपितु एक जीवंत और निकट संबंध होना चाहिये, न कि कोई पुराना या दूरस्थ संबंध।
- विपरीत भार का खंड: एक बार जब अभियोजन पक्ष आवश्यक आधारभूत तथ्य स्थापित कर देता है, तो उपधारणा का खंडन करने का भार अभियुक्त पर स्थानांतरित हो जाता है। अभियुक्त को यह दर्शाना होता है कि उसने दहेज मृत्यु कारित नहीं की है।
- स्पष्टीकरण — "दहेज मृत्यु" का अर्थ: यह शब्द धारा 80 भारतीय न्याय संहिता (जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304ख के समतुल्य है) से लिया गया है, जो दहेज मृत्यु को विवाह के सात वर्षों के भीतर जलने, शारीरिक क्षति या सामान्य परिस्थितियों के विपरीत किसी अन्य कारण से हुई महिला की मृत्यु के रूप में परिभाषित करता है, जहाँ यह सिद्ध हो जाता है कि उसकी मृत्यु से ठीक पहले दहेज की मांग के लिये या उससे संबंधित किसी कारण से उसके पति या उसके नातेदार द्वारा उसके साथ क्रूरता या उत्पीड़न किया गया था।
आपराधिक कानून
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 362 उच्च न्यायालय की निर्णय वापस लेने की अंतर्निहित शक्ति को सीमित नहीं करती है
05-Sep-2026
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महावीर उर्फ अवनीश बनाम मध्य प्रदेश राज्य "दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 362 का प्रतिबंध उस स्थिति में लागू नहीं होगा जहाँ विचाराधीन आदेश या निर्णय अधिकारिता के बिना पारित किया गया हो।" न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर उच्चतम न्यायालय |
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेकर की पीठ ने महावीर उर्फ अवनीश बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (ग्वालियर पीठ) के 2018 के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि को वापस लेने से इंकार कर दिया गया था, इस तथ्य के होते हुए भी कि वह अपराध की तारीख पर अवयस्क था। उच्च न्यायालय ने यह माना कि उसने धारा 362 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 403) को धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528) के अधीन अपनी अंतर्निहित अधिकारिता के प्रयोग पर रोक के रूप में गलत तरीके से माना था।
महावीर उर्फ अवनीश बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता महावीर उर्फ अवनीश को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 201 भाग II (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 238) के अधीन एक महिला और उसकी नवजात पुत्री की मृत्यु के संबंध में साक्ष्य को गायब करने के लिये दोषी ठहराया गया था।
- अभियुक्तों के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 और 304ख के अधीन हत्या और दहेज मृत्यु के आरोप साबित नहीं हुए, लेकिन अपीलकर्त्ता और अन्य अभियुक्तों को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 भाग II के अधीन दोषी ठहराया गया और इस दोषसिद्धि को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 2017 में बरकरार रखा।
- इसके बाद अपीलकर्त्ता ने धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन उच्च न्यायालय में अपीलीय निर्णय को वापस लेने की मांग करते हुए याचिका दायर की, इस आधार पर कि अपराध किये जाने के समय वह अवयस्क था।
- उच्च न्यायालय के निदेश पर, किशोर न्याय बोर्ड ने एक जांच की और स्कूल रिकॉर्ड, जन्म प्रमाण पत्र और अन्य साक्ष्यों पर विश्वास करते हुए पाया कि घटना की तारीख को अपीलकर्त्ता की आयु 17 वर्ष, 2 महीने और 12 दिन थी।
- किशोर होने के इस निष्कर्ष के होते हुए भी, उच्च न्यायालय ने इस आधार पर मामले को फिर से खोलने से इंकार कर दिया कि उच्चतम न्यायालय तक पहुँचने के बाद दोषसिद्धि अंतिम रूप ले चुकी थी।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने अपील में उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- अंतिम निर्णय के संबंध में उच्च न्यायालय की त्रुटि: न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय ने अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि को अंतिम रूप देने में अभिलेख संबंधी त्रुटि की है, क्योंकि केवल अपीलकर्त्ता के माता-पिता द्वारा दायर की गई SLPs पर ही सुनवाई हुई थी और दण्ड में कमी के साथ गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया गया था, जबकि अपीलकर्त्ता की अपनी SLP को गुण-दोष के आधार पर किसी भी निर्णय के बिना केवल वापस ले लिये जाने के कारण खारिज कर दिया गया था।
- किशोर अवस्था के दावे की विश्वसनीयता पर: न्यायालय ने पाया कि यह बात तर्कसंगत नहीं है कि अपीलकर्त्ता ने बिना किसी कारण के अपनी याचिका वापस ले ली होगी जबकि उसके माता-पिता को दण्ड में राहत मिल गई थी, और यह माना कि इससे उसके इस दावे को बल मिलता है कि उसने उच्च न्यायालय के समक्ष किशोर अवस्था के अभिवचन को आगे बढ़ाने के लिये ही SLP वापस ली थी।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 362 और धारा 482 के बीच संबंध पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जबकि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 362 किसी न्यायालय को लिपिकीय या अंकगणितीय त्रुटि को सुधारने के अलावा अपने निर्णय में परिवर्तन या समीक्षा करने से रोकती है, यह उच्च न्यायालय की उस अंतर्निहित शक्ति को नहीं छीनती है जिसके अधीन वह अधिकारिता से बाहर, प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन में, या किसी पक्ष को हानि पहुँचाने वाली त्रुटि के अधीन पारित आदेश को वापस ले सकता है। गणेश पटेल बनाम उमाकांत राजोरिया, पंजाब राज्य बनाम दविंदर पाल सिंह भुल्लर और अन्य, और मधु लिमये बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामलों पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने माना कि इस प्रकार की वापसी एक प्रक्रियात्मक समीक्षा है, जो दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 362 द्वारा वर्जित वास्तविक समीक्षा से भिन्न है।
- पूर्ण न्याय प्रदान करने के लिये उच्च न्यायालय की अंतर्निहित अधिकारिता पर: ए.आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक मामले का हवाला देते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि प्रक्रियात्मक नियम न्याय की सेवा के लिये बनाए गए हैं, न कि उसे विफल करने के लिये, और न्यायालय की गलती से उत्पन्न अन्याय का निवारण न्यायिक तंत्र के दायरे में रहते हुए किया जाना चाहिये। पीठ ने माना कि जब तक उच्च न्यायालय मामले पर विचार करता है, तब तक उसे न्यायिक औचित्य के आत्मसंयम के अधीन रहते हुए, ऐसे मामलों में अपने ही आदेश को सुधारने की अंतर्निहित अधिकारिता प्राप्त है, जहाँ कोई मौलिक मुद्दा हो जो परिणाम को बदल सकता है, और यह शक्ति दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 में निहित सीमाओं द्वारा वर्जित नहीं है।
- किशोरता संबंधी निष्कर्ष के प्रभाव पर: न्यायालय ने माना कि जहाँ किसी किशोर को किशोर न्याय ढाँचे के सांविधिक लाभ से वंचित किया गया है और इस प्रकार उसे गंभीर नुकसान हुआ है, वहाँ उच्च न्यायालय के पास न्याय के हित में स्थिति को सुधारने की शक्ति है।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 201 भाग II के अधीन दोषसिद्धि की वैधता पर: यह देखते हुए कि अपीलकर्त्ता को हत्या और दहेज मृत्यु के आरोपों से पहले ही दोषमुक्त कर दिया गया था, न्यायालय ने माना कि धारा 201 भाग II भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषसिद्धि के लिये यह साबित होना आवश्यक है कि अपराध किया गया था और अभियुक्त ने अपराधी को बचाने के आशय से उस अपराध के साक्ष्य को गायब कर दिया था। मूल अपराध के संबंध में किसी भी निष्कर्ष के अभाव में, इस उपबंध के अधीन अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता और इसे अवैध घोषित किया गया।
- अपील को मंजूर करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश और अपीलकर्त्ता की दोषसिद्धि दोनों को अपास्त कर दिया और उसे जमानत बंधपत्र से मुक्त कर दिया।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 403 और 528 क्या हैं ?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 403:
संबंधित पुराना उपबंध : धारा 362, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973
मूल अधिनियम का पाठ:
- न्यायालय का अपने निर्णय में परिवर्तन न करना। — इस संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई न्यायालय जब उसने किसी मामले को निपटाने के लिये अपने निर्णय या अंतिम आदेश पर हस्ताक्षर कर दिये हैं तब लिपिकीय या गणितीय भूल को ठीक करने के सिवाय उसमें कोई परिवर्तन नहीं करेगा या उसका पुनर्विलोकन नहीं करेगा।
प्रमुख विशेषताएँ:
- अंतिम निर्णय का नियम: एक बार जब कोई आपराधिक न्यायालय किसी मामले का निपटारा करने वाला अपना निर्णय या अंतिम आदेश पर हस्ताक्षर कर देता है, तो वह उस मामले के संबंध में निष्क्रिय हो जाता है और गुण-दोष के आधार पर अपने ही निर्णय पर पुनर्विचार नहीं कर सकता है।
- सीमित अपवाद: केवल लिपिकीय या अंकगणितीय त्रुटि का सुधार ही अनुमेय है - अर्थात्, अभिलेख में स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाली त्रुटि, न कि तर्क या निष्कर्ष की पुन: परीक्षा।
- "जब तक अन्यथा उपबंधित न हो": यह बार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के भीतर (जैसे पुनर्विचार, संशोधन या अपील के उपबंध) या किसी अन्य प्रवृत्त विधि के अधीन किसी विपरीत उपबंध के अधीन संचालित होता है, जिसका अर्थ है कि धारा 403 अन्यत्र पाए जाने वाले पुनर्विचार के स्पष्ट सांविधिक अधिकारों को अधिभावी नहीं करती है।
- हस्ताक्षरित निर्णयों/अंतिम आदेशों पर लागू: यह वर्जन तभी लागू होता है जब निर्णय या अंतिम आदेश पर हस्ताक्षर हो जाते हैं; यह किसी न्यायालय को मसौदा या अहस्ताक्षरित आदेश में परिवर्तन करने से प्रतिबंधित नहीं करती है।
- उद्देश्य: इस उपबंध का उद्देश्य आपराधिक कार्यवाही में निश्चितता और अंतिम निर्णय को बढ़ावा देना और न्यायालयों को अपने ही निर्णयों पर अपील प्राधिकरण बनने से रोकना है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528:
संबंधित पुराना उपबंध: धारा 482, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973
मूल अधिनियम का पाठ:
- उच्च न्यायालय की अन्तर्निहित शक्तियों की व्यावृत्ति। - इस संहिता की कोई बात उच्च न्यायालय की ऐसे आदेश देने की अन्तर्निहित शक्ति को सीमित या प्रभावित करने वाली नहीं समझी जाएगी, जो इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिये या किसी न्यायालय की कार्यवाही का दुरुपयोग निवारित करने के लिये या किसी अन्य प्रकार से न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक हो।
प्रमुख विशेषताएँ:
धारा 528 कोई नई शक्ति प्रदान नहीं करती है, अपितु उच्च न्यायालय में पहले से निहित अंतर्निहित शक्तियों की तीन श्रेणियों को संरक्षित और मान्यता देती है:
- संहिता के अंतर्गत पारित किसी भी आदेश को प्रभावी बनाना।
- किसी भी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये।
- न्याय के उद्देश्यों को सुनिश्चित करने के लिये।
- केवल उच्च न्यायालयों पर लागू: यह अंतर्निहित शक्ति केवल उच्च न्यायालय द्वारा ही प्रयोग की जा सकती है, न कि अधीनस्थ आपराधिक न्यायालयों द्वारा।
- व्यापक किंतु निरंकुश नहीं: यद्यपि यह शक्ति व्यापक शब्दों में अभिव्यक्त की गई है, तथापि इसका प्रयोग अत्यंत संयमपूर्वक, सावधानी एवं विवेक के साथ तथा केवल विरलतम मामलों में किया जाना चाहिये। इसका प्रयोग अपील या पुनरीक्षण जैसे सांविधिक उपचारों के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता।
- स्व-संयम, न कि सांविधिक परिसीमा: इस शक्ति के प्रयोग पर सीमाएँ संहिता में निहित किसी अभिव्यक्त वैधानिक निर्बंधन के कारण नहीं, अपितु न्यायिक स्व-संयम एवं औचित्य के सिद्धांतों के कारण उत्पन्न होती हैं।