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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सांविधानिक विधि

अपील दायर करने से वादी की स्थिति और खराब नहीं हो सकती

 07-Sep-2026

सऊदी अरब एयरलाइंस बनाम भारत संघ और अन्य 

"अपील दायर करने से किसी भी अपीलकर्त्ता की स्थिति अपील दायर करने से पहले की स्थिति से बदतर नहीं हो सकती।" 

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने मेसर्स सऊदी अरब एयरलाइंस बनाम भारत संघ और अन्य (2026) में वित्त अधिनियम, 1979 की धारा 38(3) के अधीन अधिरोपित किये गए जुर्माने को चुनौती देने वाली अपील को मंजूर कर लिया और ऐसा करते हुए सुधार के विरुद्ध सिद्धांत को स्पष्ट और लागू किया, यह मानते हुए कि एक वादी को केवल अपील के सांविधिक अधिकार का प्रयोग करने के लिये बदतर स्थिति में नहीं डाला जा सकता है। 

मेसर्स सऊदी अरबियन एयरलाइंस बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता एयरलाइन को वित्त अधिनियम, 1979 की धारा 35 के अधीन अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर जाने वाले यात्रियों से विदेशी यात्रा कर (FTT) वसूलने का अधिकार था, और उसने 1994 और 1997 के बीच छह मौकों पर एकत्रित कर को सरकारी खजाने में जमा करने में देरी की थी।  
  • इनमें से पाँच मामलों में, नियत तारीख से पहले ही डिमांड ड्राफ्ट खरीद लिये गए थे, लेकिन सुरक्षा संबंधी प्रतिबंधों के कारण उन्हें समय पर जमा नहीं किया जा सका, जबकि छठे मामले में देरी का कारण संबंधित कर्मचारी का आपातकालीन अवकाश पर होना था।  
  • निर्णयकर्ता प्राधिकरण ने मूल आदेश में, विदेशी यात्रा कर (FTT) जमा करने में देरी के सभी छह मामलों के लिये एयरलाइन पर 12,000 रुपए का जुर्माना अधिरोपित किया था। 
  • इस जुर्माने से असंतुष्ट होकर अपीलकर्त्ता ने अपील दायर की, जिसके परिणामस्वरूप मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिये वापस भेज दिया गया, और पुनर्विचार के बाद न्यायाधिकरण ने एक नया आदेश पारित करते हुए जुर्माने को कई गुना बढ़ाकर 71,29,140 रुपए कर दिया। 
  • अपीलकर्त्ता ने अपीलीय प्राधिकरण, वित्त मंत्रालय के अधीन पुनरीक्षण प्राधिकरण और बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष इस वृद्धि को चुनौती दी, लेकिन वह असफल रहा। अपीलकर्त्ता का तर्क था कि इस वृद्धि ने उसे उस स्थिति से कहीं बदतर स्थिति में डाल दिया है, जिसमें वह अपील न करने की स्थिति में भी नहीं होता, क्योंकि अपील के अपने अधिकार का प्रयोग करने मात्र से ही जुर्माना मूल राशि से 590 गुना से अधिक बढ़ गया था। 
  • अपीलीय प्राधिकारी ने माना था कि 12,000 रुपए का मूल जुर्माना गलत था, क्योंकि यह धारा 38(3) के अधीन विहित सांविधिक न्यूनतम से कम था, और यह त्रुटि केवल पुनर्विचार के दौरान सुधारी गई थी, एक ऐसा दृष्टिकोण जिससे पुनरीक्षण प्राधिकारी और उच्च न्यायालय सहमत थे, यह मानते हुए कि चूँकि पुनर्विचार सीमित नहीं था, इसलिये निर्णय प्राधिकारी विधि के अनुसार जुर्माने की पुनः परीक्षा करने और उसे बढ़ाने के लिये स्वतंत्र था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न पर: पीठ ने इस विवाद्यक को इस प्रकार परिभाषित किया कि क्या किसी वादी को विधि के अधीन प्रदान किये गए अपीलीय मंच का सहारा लेने या विधि के न्यायालय का सहारा लेने से बदतर स्थिति में डाला जा सकता है, और इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक में दिया। 
  • रिफॉर्मेटियो इन पेइअस (Reformatio in Peius) के सिद्धांत पर: बॉम्बे उच्च न्यायालय के पूर्व के निर्णय ज्योति प्लास्टिक वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ पर काफी हद तक विश्वास करते हुए, जिसे स्वयं न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने लिखा था, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि रेफोर्मेटियो इन पियस” (Reformatio in Peius) का अर्थ है “स्थिति में प्रतिकूल परिवर्तन” अथवा “और अधिक खराब स्थिति की ओर परिवर्तन, न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया कि अनेक न्यायाधिकार क्षेत्रों में उच्चतर मंच द्वारा उस पक्षकार के विरुद्ध, जिसने अपील प्रस्तुत की है, अधीनस्थ प्राधिकारी के आदेश को और अधिक प्रतिकूल बनाना निषिद्ध है। 
  • सिद्धांत की प्रकृति पर: न्यायालय ने पाया कि "नो रिफॉर्मेटियो इन पेइअस" या "रिफॉर्मेटियो इन पेइअस का निषेध" के रूप में समझा जाने वाला सिद्धांत निष्पक्ष प्रक्रिया के एक नियम को दर्शाता है जिसके अधीन विधिक उपचार का उपयोग करने से इसका लाभ उठाने वाले व्यक्ति की स्थिति और खराब नहीं होनी चाहिये, और यह माना कि इसे प्राकृतिक न्याय के साथ-साथ समानता के सिद्धांत के रूप में भी देखा जा सकता है। 
  • पूर्व निर्णयों के समर्थन में: पीठ ने कहा कि बॉम्बे उच्च न्यायालय ने ज्योति प्लास्टिक वर्क्स मामले में जावल नेको लिमिटेड बनाम सीमा शुल्क आयुक्त के मामले का हवाला देते हुए यह पुष्टि की थी कि अपीलकर्त्ता की स्थिति अपील दायर करने के कारण बदतर नहीं हो सकती, और साथ ही नागराजन बनाम तमिलनाडु राज्य के अपने हालिया निर्णय का भी हवाला दिया, जिसमें इस सिद्धांत का समर्थन किया गया था और यह माना गया था कि कोई भी अपीलकर्त्ता, अपील दायर करने से, अपील दायर करने से पहले की स्थिति से बदतर स्थिति में नहीं आ सकता। 
  • मूल त्रुटि की अप्रासंगिकता पर: तथ्यों पर सिद्धांत लागू करते हुए, पीठ ने माना कि जुर्माने की राशि 12,000 रुपए से बढ़ाकर 71,29,140 रुपए करना केवल इसलिये हुआ क्योंकि अपीलकर्त्ता ने अपील करने के अपने अधिकार का प्रयोग किया था, और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता, चाहे मूल जुर्माने की गणना तकनीकी रूप से त्रुटिपूर्ण थी या नहीं। 
  • अंतिम निर्णय: न्यायालय ने अपीलकर्त्ता पर अधिरोपित किये गए जुर्माने को पूर्णतः अपास्त कर दिया, साथ ही बॉम्बे उच्च न्यायालय, पुनरीक्षण प्राधिकारी, प्रथम अपीलीय प्राधिकारी और पुनरीक्षण आदेश-मूल के उन आदेशों को भी अपास्त कर दिया जो FTT जमा में देरी के छह मामलों से संबंधित थे, और जुर्माने के रूप में पहले से भुगतान की गई किसी भी राशि को 9% प्रति वर्ष की ब्याज दर के साथ तीन महीने के भीतर वापस करने का निदेश दिया। 

नो रेफोर्मेटियो इन पियस” (No Reformatio in Peius) का सिद्धांत क्या है? 

  • अर्थ: Reformatio in Peius लैटिन सूत्र का अर्थ है “स्थिति में प्रतिकूल परिवर्तन” अथवा “और अधिक खराब स्थिति की ओर परिवर्तन”। इसके नकारात्मक रूप “No Reformatio in Peius” का तात्पर्य उस सिद्धांत से है, जिसके अनुसार कोई पक्षकार, जो अपील या पुनरीक्षण जैसे किसी विधिक उपचार का अवलंब लेता है, उस स्थिति की अपेक्षा अधिक प्रतिकूल स्थिति में नहीं पहुँचाया जाना चाहिये, जिसमें वह उस विधिक उपचार का अवलंब न करने की दशा में होता। 
  • आधार: यह सिद्धांत प्राकृतिक न्याय और समता के सिद्धांतों पर आधारित है, और इस तर्क पर आगे बढ़ता है कि अपील का सांविधिक अधिकार निरर्थक हो जाएगा, और मुकदमेबाज अपीलीय मंचों पर जाने से हतोत्साहित होंगे, यदि ऐसा करने से उन्हें मूल रूप से अधरोपित किये गए परिणाम से भी कठोर परिणाम का जोखिम उठाना पड़े। 
  • इस मामले में आवेदन: इस सिद्धांत को यह मानने के लिये लागू किया गया था कि केवल अपीलकर्त्ता की अपनी अपील के कारण दण्ड में वृद्धि, इस बात से अप्रभावित रहते हुए कि मूल आदेश में गणना संबंधी या सांविधिक त्रुटि थी या नहीं, को बरकरार नहीं रखा जा सकता है। 

वित्त अधिनियम, 1979 क्या है? 

वित्त अधिनियम, 1979 भारत की संसद द्वारा पारित एक वार्षिक वित्त विधि है, जिसका उद्देश्य उस वर्ष के लिये केंद्र सरकार के वित्तीय प्रस्तावों को प्रभावी बनाना है, और यह मुख्य रूप से कराधान से संबंधित है। 

  • प्रकृति: अन्य वित्त अधिनियमों के समान, इसे केंद्रीय बजट के कर प्रस्तावों को लागू करने के लिये प्रतिवर्ष पारित किया जाता है, जिसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर विधियों में संशोधन और नए करों की शुरुआत शामिल है। 
  • विदेशी यात्रा कर (FTT): वित्त अधिनियम, 1979 ने विदेशी यात्रा कर की शुरुआत की, जो भारत से हवाई या समुद्री मार्ग से यात्रा करने वाले यात्रियों पर उनके टिकट किराए के अतिरिक्त लगाया जाने वाला कर है। 
  • धारा 35: इस उपबंध ने वाहकों (जैसे एयरलाइनों) को सरकार की ओर से अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर यात्रियों से विदेशी यात्रा कर एकत्र करने के लिये अधिकृत किया, जिससे एयरलाइन अंततः कर वहन करने वाली पार्टी के बजाय एक संग्रहकर्ता एजेंट बन गई। 
  • धारा 38(3): इस उपबंध में एकत्रित FTT को सरकारी खजाने में जमा करने में विलंब के परिणाम से संबंधित प्रावधान है, जिसमें ऐसे विलंब के लिये जुर्माना निर्धारित किया गया है - जो कि कर की राशि से कम नहीं होगा, और उस राशि के दोगुने तक बढ़ाया जा सकता है। 
  • निरसन/समाप्ति: इस अधिनियम के अंतर्गत विदेशी यात्रा कर को बाद में (1989 में) समाप्त कर दिया गया था, लेकिन यह अधिनियम न्यायिक और कराधान परीक्षा उद्देश्यों के लिये प्रासंगिक बना हुआ है, मुख्य रूप से इसके दण्ड प्रावधानों और उनका निर्वचन करने वाले विधिक मामलों, जैसे कि ऊपर चर्चा किये गए सऊदी अरब एयरलाइंस मामले के कारण। 

सिविल कानून

अलग रह रहे पति/पत्नी की जिज्ञासा पर निजता का अधिकार सर्वोपरि

 07-Sep-2026

विजेंद्र कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य 

"हमें अभिलेख में ऐसी कोई सामग्री नहीं मिली है जो किसी लोकहित की संलिप्तता को इंगित करती हो, जो निजी पक्ष के निजता के अधिकार से अधिक महत्त्वपूर्ण हो।" 

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय 

उत्तराखंड उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने विजेंद्र कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य (2026) के मामले में अपीलकर्त्ता की अलग हुई पत्नी की सरकारी सेवा के बारे में सूचना के अधिकार (RTI) सूचना से इंकार को चुनौती देने वाली विशेष अपील को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(ञ) और 11 के अधीन निजता के अधिकार से अधिक लोकहित दिखाने के लिये कोई सामग्री विद्यमान नहीं थी। 

विजेंद्र कुमार बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता ने सूचना के अधिकार अधिनियम के अधीन अपनी अलग रह रही पत्नी की सरकारी सेवा के संबंध में जानकारी मांगी थी, जो एक सरकारी जूनियर हाई स्कूल में सहायक शिक्षिका के रूप में कार्यरत थी। 
  • सूचना के अधिकार आवेदन दाखिल किये जाने के समय अपीलकर्त्ता और प्रत्यर्थी पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद कुटुंब न्यायालय में लंबित थे। 
  • प्रत्यर्थी पत्नी ने प्रकटीकरण का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि आवेदन गलत हेतु से किया गया था और अपीलकर्त्ता ने पहले भी विभिन्न अधिकारियों के समक्ष उसके विरुद्ध कई परिवाद दर्ज करवाए थे, जिससे उसे गंभीर मानसिक उत्पीड़न हुआ था। 
  • उनकी आपत्ति को ध्यान में रखते हुए, लोक सूचना अधिकारी ने सूचना का अधिकार आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके बाद अपीलकर्त्ता की प्रथम अपील सांविधिक समय सीमा के भीतर अनिर्णीत रही, जिसके कारण मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष द्वितीय अपील दायर की गई। 
  • मुख्य सूचना आयुक्त ने 1 अप्रैल, 2026 को द्वितीय अपील खारिज कर दी और इस आदेश के विरुद्ध अपीलकर्त्ता की बाद की रिट याचिका को भी एकल न्यायाधीश ने 20 मई, 2026 को खारिज कर दिया। 
  • एकल न्यायाधीश ने सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(ञ) और 11 तथा पक्षकारों के बीच तनावपूर्ण संबंधों पर विश्वास करते हुए यह माना कि अधिकारियों द्वारा सूचना का प्रकटन करने से इंकार करने में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। 
  • खंडपीठ के समक्ष, अपीलकर्त्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि कई सहायक शिक्षकों की कथित रूप से हेरफेर की गई नियुक्ति की लंबित लोकहित याचिका और चल रही विशेष जांच टीम की जांच से पता चलता है कि प्रकटीकरण लोकहित में था, और यह कि प्रत्यर्थी -पत्नी की स्वयं की नियुक्ति भी इसी प्रकार हेरफेर के माध्यम से प्राप्त की गई थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • सहायक सामग्री के अभाव पर: खंडपीठ ने कहा कि अपीलकर्त्ता द्वारा संदर्भित लोकहित याचिका अभी भी लंबित है, और याचिका के साथ ऐसा कोई सबूत संलग्न नहीं किया गया है जिससे प्रथम दृष्टया भी यह साबित हो सके कि प्रत्यर्थी की नियुक्ति किसी भी अनुचित तरीके से प्राप्त की गई थी। 
  • प्रत्यर्थी की आपत्ति और उत्पीड़न के आरोप पर: न्यायालय ने प्रत्यर्थी -पत्नी द्वारा प्रकटीकरण पर की गई कड़ी आपत्ति और उसके इस आरोप पर ध्यान दिया कि अपीलकर्त्ता ने अतीत में उसे उत्पीड़न का शिकार बनाने के उद्देश्य से उसके विरुद्ध परिवाद दर्ज कराया था। 
  • निजता के विरुद्ध लोकहित को संतुलित करने पर: पीठ ने माना कि यथास्थिति के अनुसार, अभिलेखों में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था जो किसी ऐसे लोकहित की संलिप्तता को इंगित करता हो जो प्रत्यर्थी के निजता के अधिकार से अधिक महत्त्वपूर्ण हो, और तदनुसार अधिनियम के अंतर्गत अधिकारियों के आदेशों या एकल न्यायाधीश के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं पाया।
  • परिणाम के संबंध में: विशेष अपील खारिज कर दी गई, और इस मामले में लंबित सभी आवेदनों का भी निपटारा कर दिया गया, जिससे CIC और एकल न्यायाधीश के प्रकटीकरण से इंकार करने के आदेश बरकरार रहे। 

सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(ञ) और 11 क्या हैं? 

अधिनियम के बारे में: 

  • अधिनियमित: 2005, भारत की संसद द्वारा 
  • उद्देश्य: नागरिकों को लोक अधिकारियों के पास मौजूद जानकारी तक स्वतंत्र रूप से पहुँच प्रदान करना।     
  • उद्देश्य: सरकारी संस्थानों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना। 
  • प्रयोज्यता: यह सरकार के सभी स्तरों - केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों - पर लागू होता है। 
  • प्रदत्त अधिकार: नागरिक बिना किसी कारण बताए जानकारी का अनुरोध कर सकते हैं। 
  • समय सीमा: जानकारी सामान्यतः अनुरोध प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर प्रदान की जानी चाहिये (यदि यह जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित है तो 48 घंटे के भीतर)। 
  • प्रथम सूचना के अधिकार आवेदन: पुणे में शाहिद रजा बर्नी द्वारा दायर किया गया। 
  • प्रमुख छूटें (धारा 8): राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, रणनीतिक/वैज्ञानिक/आर्थिक हितों या व्यक्तिगत निजता को प्रभावित करने वाली जानकारी को छूट दी गई है, जब तक कि लोकहित प्रकटीकरण को उचित न ठहराए। 
  • अधिभावी प्रभाव (धारा 22): सूचना के अधिकार अधिनियम, आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 और किसी भी अन्य असंगत विधि पर प्रभावी होगा। 
  • कार्यान्वयन निकाय: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) और राज्य सूचना आयोग (SIC) अपीलीय प्राधिकरणों के रूप में कार्य करते हैं। 
  • संशोधन: सूचना अधिकार (RTI) (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने केंद्र सरकार को सूचना आयुक्तों की अवधि, वेतन और सेवा शर्तों को निर्धारित करने का अधिकार दिया।  

सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(ञ): 

मूल अधिनियम का पाठ: 

सूचना के प्रकटीकरण से छूट.—(1)इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, किसी नागरिक को सूचना देने का कोई दायित्व नहीं होगा,— 

(j) ऐसी सूचना जो व्यक्तिगत सूचना से संबंधित हो और जिसका प्रकटीकरण किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से संबंधित न हो, या जिससे व्यक्ति की निजता का अनुचित उल्लंघन हो, जब तक कि केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी या अपीलीय प्राधिकारी, जैसा भी मामला हो, संतुष्ट न हो कि व्यापक लोकहित ऐसी सूचना के प्रकटीकरण को उचित ठहराता है: बशर्ते कि जो सूचना संसद या राज्य विधानमंडल को देने से इंकार नहीं किया जा सकता है, वह किसी भी व्यक्ति को देने से इंकार नहीं किया जाएगा। 

प्रमुख विशेषताएँ:   

  • व्यक्तिगत जानकारी से छूट: सार्वजनिक गतिविधि या हित से कोई संबंध न रखने वाली जानकारी को अनिवार्य प्रकटीकरण से छूट दी गई है, जिससे विशुद्ध रूप से निजी मामलों को सूचना के अधिकार की जांच से बचाया जा सके।  
  • निजता की सुरक्षा: ऐसा प्रकटीकरण जिससे किसी व्यक्ति की निजता का अनुचित उल्लंघन हो, उसे छूट दी गई है, क्योंकि निजता को एक ऐसे मूल्य के रूप में मान्यता दी गई है जिसे अधिनियम स्वयं संरक्षित करना चाहता है। 
  • व्यापक जनहित को प्राथमिकता देना: यह छूट पूर्ण नहीं है – लोक सूचना अधिकारी या अपीलीय प्राधिकारी अभी भी प्रकटीकरण का निदेश दे सकते हैं यदि वे संतुष्ट हैं कि व्यापक लोकहित इसे उचित ठहराता है, जिसके लिये प्रकटीकरण के पक्ष में उपधारणा के बजाय एक सकारात्मक निष्कर्ष की आवश्यकता होती है। 
  • संसदीय विशेषाधिकार का परंतुक: संसद या राज्य विधानमंडल से जो जानकारी छिपाई नहीं जा सकती, उसे किसी भी नागरिक को देने से इंकार नहीं किया जा सकता, यह सुनिश्चित करते हुए कि सूचना के अधिकार में छूट से पारदर्शिता का स्तर विधानमंडल के प्रति अपेक्षित स्तर से कम न हो जाए। 

सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 11: 

मूल अधिनियम का पाठ: 

  • पर-व्यक्तिसूचना.—(1) जहाँ, यथास्थिति, किसी केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी का, इस अधिनियम के अधीन किये गए अनुरोध पर कोई ऐसी सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग को प्रकट करने का आशय है, जो किसी पर व्यक्ति से संबंधित है या उसके द्वारा इसका प्रदाय किया गया है और उस पर व्यक्ति द्वारा उसे गोपनीय माना गया है, वहाँ, यथास्थिति, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी अनुरोध प्राप्त होने से पाँच दिन के भीतर ऐसे पर व्यक्ति को अनुरोध की और इस तथ्य की लिखित रूप में सूचना देगा कि, यथास्थिति, केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी या राज्य लोक सूचना अधिकारी का उक्त सूचना या अभिलेख या उसके किसी भाग को प्रकट करने का आशय है, और इस बारे में कि सूचना प्रकट की जानी चाहिये या नहीं, लिखित में या मौखिक रूप से निवेदन करने के लिये पर व्यक्ति को आमंत्रित करेगा तथा सूचना के प्रकटन के बारे में कोई विनिश्वय करते समय पर व्यक्ति के ऐसे निवेदन को ध्यान में रखा जाएगा। 

प्रमुख विशेषताएँ: 

  • पर-व्यक्ति को अनिवार्य सूचना: जहाँ अनुरोधित जानकारी किसी पर-व्यक्ति से संबंधित है या उसके द्वारा प्रदान की गई है और उसे गोपनीय माना गया है, वहाँ PIO को अनुरोध प्राप्त होने के पाँच दिनों के भीतर उस पर-व्यक्ति को लिखित सूचना जारी करनी होगी।  
  • प्रतिनिधित्व का अधिकार: पर-व्यक्ति को यह बताने का अधिकार है कि क्या जानकारी का प्रकटीकरण किया जाना चाहिये, और इस संबंध में लिखित या मौखिक रूप से अपनी राय प्रस्तुत करने का अधिकार है, और निर्णय लेने से पहले इस राय पर विचार किया जाना चाहिये। 
  • PIO द्वारा बरकरार रखा गया निर्णयात्मक विवेक: पर-व्यक्ति की आपत्ति एक अनिवार्य विचार है लेकिन वीटो नहीं है - PIO या अपीलीय प्राधिकरण अंततः धारा 8(1)(ञ) और संबंधित प्रावधानों के अधीन लोकहित परीक्षण के विरुद्ध आपत्ति का वजन करके प्रकटीकरण का निर्णय लेता है। 
  • उद्देश्य: यह उपबंध प्रकटीकरण प्रक्रिया में प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को शामिल करके सूचना के अधिकार अधिनियम के पारदर्शिता उद्देश्यों के विरुद्ध किसी पर-व्यक्ति के गोपनीयता और निजता हितों को संतुलित करता है।