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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

किसी कंपनी पर आपराधिक मनःस्थिति का आरोपण

 08-Sep-2026

सैनोफी इंडिया लिमिटेड बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो 

"वास्तव में, ‘कंपनी अपने आप में’ जैसी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होतीन ही कोई ऐसी वस्तु (ding an sich) जिसका अस्तित्व स्वयं में होअपितु केवल लागू होने वाले विधि के आरोपण संबंधी नियम ही विद्यमान होते हैं। यह कहना कि कोई कंपनी किसी कार्य को नहीं कर सकतीकेवल इतना दर्शाता है कि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हैजिसका उस कार्य का किया जानालागू आरोपण के नियमों के अधीनकंपनी द्वारा किया गया कार्य माना जा सके।" 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ नेसैनोफी इंडिया लिमिटेड बनाम सी.बी.आई. (2026) के मामले मेंभ्रष्टाचार और आपराधिक षड्यंत्र के मामले को रद्द करने से इंकार करने वाले कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध एक दवा कंपनी की अपील को खारिज कर दिया और यह अवधारित करने के लिये एक नया तीन-चरण ढाँचा विकसित किया कि किसी प्राकृतिक व्यक्ति के दोषी आशय को किसी निगम पर कब लागू किया जा सकता है।  

सैनोफी इंडिया लिमिटेड बनाम सी.बी.आई. (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता दवा कंपनी ने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) की एक परियोजना को दवाइयाँ सप्लाई की थीं। 
  • CBI द्वारा दर्ज की गई FIR में उसे अभियुक्त नंबर के रूप में नामित किया गया थाजिसमें आरोप लगाया गया था कि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) में वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. आनंद ने कई दवा कंपनियों के साथ मिलकर दवाओं को बढ़ी हुई दरों पर और अतिरिक्त मात्रा में प्राप्त करने का षड्यंत्र रचा था।  
  • डॉ. आनंद और अपीलकर्त्ता कंपनी के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 120ख के साथ धारा 420 (अब धारा 61 और धारा 318, भारतीय न्याय संहिता, 2023) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 11, 12, 13(2) के साथ 13(1)(ख) और 13(1)(घ) के अधीन 2017 में आरोप पत्र दायर किया गया था। 
  • अपीलकर्त्ता कंपनी के किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को अभियुक्त के रूप में नामित नहीं किया गया था। 
  • अपीलकर्त्ता ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मामले को रद्द करने की मांग कीजिसमें उसने तर्क दिया कि किसी कंपनी पर उसकी ओर से कार्य करने वाले व्यक्तियों से स्वतंत्र रूप से आपराधिक षड्यंत्र का अभियोजन नहीं चलाया जा सकता है। 
  • उच्च न्यायालय नेइरिडियम इंडिया टेलीकॉम लिमिटेड बनाम मोटोरोला इंक. के मामलेपर विश्वास करते हुए इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि किसी कॉर्पोरेट इकाई पर उसके निदेशकों या प्रभारी व्यक्तियों को पेश किये बिना भी अभियोजन चलाया जा सकता है। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियाँ थीं? 

न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रश्न पर: 

न्यायालय ने इस विवाद्यक को इस प्रकार विरचित किया कि क्या उच्च न्यायालय को इस आधार पर कार्यवाही रद्द कर देनी चाहिये थी कि किसी भी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान नहीं की गई थी और न ही उसे कॉर्पोरेट अभियुक्त के साथ पेश किया गया था। 

कॉर्पोरेट आपराधिक दायित्व के दो परस्पर संबंधित प्रश्नों पर: 

पीठ ने माना कि इस विवाद्यक पर दो प्रश्नों के जवाब देने की आवश्यकता है: पहलाक्या किसी निगम के पास आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) हो सकती हैंऔर दूसराकिस आधार पर किसी प्राकृतिक व्यक्ति के मस्तिष्क को निगम पर लागू किया जा सकता है। पीठ ने कहा कि पहले प्रश्न का जवाब भारतीय न्यायालयों द्वारा सकारात्मक रूप से दिया जा चुका हैलेकिन दूसरे प्रश्न पर बहुत कम या न के बराबर चर्चा हुई है। 

अंग्रेजी विधि के अधीन स्थिति पर:  

  • न्यायालय ने इस सिद्धांत का पतालेनार्ड्स कैरिंग कंपनी बनाम एशियाटिक पेट्रोलियम कंपनी (1915) के मामले से लगाया, जहाँ कंपनी के "निर्देशक मन और इच्छा" की अवधारणा को पहली बार व्यक्त किया गया था। 
  • टेस्को सुपरमार्केट्स लिमिटेड बनाम नैट्रास (1972)के मामले मेंहाउस ऑफ लॉर्ड्स ने यह अभिनिर्धारित किया कि एक दुकान प्रबंधकजो केवल "कंपनी का एक छोटा सा हिस्सा" होता हैको बोर्ड द्वारा अधिकार सौंपे जाने के अभाव में कंपनी के मुख्य संचालक के समान नहीं माना जा सकता। पीठ नेटेस्कोमामले के संदर्भ में दो मार्गों को मान्यता दी: एक प्रत्यायोजन मार्ग और एक पद-आधारित मार्ग। 
  • मेरिडियन ग्लोबल फंड्स मैनेजमेंट एशिया लिमिटेड बनाम सिक्योरिटीज कमीशन (1995)में , लॉर्ड हॉफमैन ने अभिनिर्धारित किया कि अभियोग निर्माण का मामला है जो प्राथमिक नियमों (कंपनी का संविधान)साधारण नियमों (साधारण एजेंसी सिद्धांत) और विशेष नियमों (विधि के उद्देश्य को प्रभावी बनाने के लिये न्यायालयों द्वारा बनाए गए) द्वारा शासित होता है। 
  • न्यायालय ने एक अनुक्रमिकपदानुक्रमित दृष्टिकोण के माध्यम से इन प्राधिकारों में सामंजस्य स्थापित किया: पहले कंपनी के सांविधानिक दस्तावेजफिर निहित प्रत्यायोजनऔर उसके बाद ही सांविधिक उद्देश्य पर आधारित एक विशेष नियमयह देखते हुए कि विनिर्दिष्ट संव्यवहार पर वास्तविक अधिकार के सबूत के बिना केवल स्थिति ही अब आरोपण को उचित नहीं ठहरा सकती है। 

भारतीय विधि के अधीन स्थिति पर: 

  • न्यायालय ने कहा कि भारतीय न्यायालयों को दो अलग-अलग प्रश्नों से जूझना पड़ा है: क्या किसी कंपनी पर अनिवार्य कारावास वाले अपराधों के लिये अभियोजन चलाया जा सकता हैऔर क्या उसे ऐसे अपराधों के लिये उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जिनके लिये आपराधिक मनःस्थिति (mens rea) की आवश्यकता होती है। 
  • दूसरे मामले मेंबॉम्बे उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र राज्य बनाम सिंडिकेट ट्रांसपोर्ट कंपनीऔर मद्रास उच्च न्यायालय ने.डी. जयवीरपांडिया नादर एंड कंपनी बनाम आई.टी.मामलों में यह स्वीकार किया था कि किसी कंपनी के अभिकर्ताओं की मनःस्थिति को कंपनी पर आरोपित करकेकंपनी को आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) अपेक्षित अपराधों के लिये उत्तरदायी ठहराया जा सकता हैतथापियह स्पष्ट नहीं किया गया था कि ऐसा आरोपण किस प्रकार (How) किया जाएगा 
  • पीठ ने माना किवेल्लियप्पा टेक्सटाइल्सऔरइरिडियम इंडिया टेलीकॉम नेकेवल "क्या" प्रश्न का समाधान किया और "कैसे" प्रश्न को "एक खाली बर्तन की तरह छोड़ दियाजिसे अभी भरा जाना बाकी है।" 

अभियोग निर्धारण के लिये तीन-चरणीय परीक्षण पर: 

न्यायालय ने यह निर्धारित करने के लिये एक क्रमबद्धपदानुक्रमित तीन-चरणीय जांच विधि निर्धारित की कि क्या किसी प्राकृतिक व्यक्ति के कृत्य को किसी निगम से जोड़ा जा सकता है: 

  • पहला चरण:निगम के सांविधानिक दस्तावेजों (ज्ञापन और संघ के लेख) की जांच करके यह निर्धारित करना कि कार्य करने की शक्ति किसके पास निहित है। 
  • दूसरा चरण:जहाँ सांविधानिक दस्तावेज मौन हैंवहाँ यह जांच करना कि क्या फिर भी शक्ति व्यक्ति को सौंपी गई थीएजेंसी के सामान्य सिद्धांतों को लागू करना। 
  • तीसरा चरण:जहाँ पहले दो चरण विफल हो जाते हैंवहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या अपराध को परिभाषित करने वाली संविधि के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुएआरोपण का एक विशेष नियम तैयार किया जाना चाहिये 

रूपरेखा में स्पष्टीकरण के संबंध में: 

  • न्यायालय ने अभियोग के निर्धारण के लिये स्थिति-आधारित एक स्वतंत्र नियम को खारिज कर दियायह मानते हुए कि निगम के भीतर की स्थिति अपने आप में पर्याप्त नहीं हैहालांकि यह तीसरे चरण में एक महत्त्वपूर्ण कारक के रूप में भारी पड़ सकती है। 
  • इसमें दोहराया गया कि यह जांच संव्यवहार-विशिष्ट है और अमूर्त रूप से कंपनी के "मुख्य संचालक" की खोज नहीं है। 
  • इसमें स्पष्ट किया गया कि यह ढाँचा केवल प्राकृतिक व्यक्ति से निगम तक ही लागू होता हैव्यक्ति की स्वयं की देयता पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता हैऔर जहाँ कोई संविधि स्वयं इसका उत्तर प्रदान करती हैअनुमानित या परोक्ष देयता की कल्पना बनाती हैया कठोर या पूर्ण देयता लागू करती हैवहाँ इसे लागू करने की आवश्यकता नहीं है। 
  • पीठ ने विधायिका से कॉरपोरेट आपराधिक दायित्व का व्यवस्थित अध्ययन करने का आग्रह किया और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा जैसे अपराधों को "रोकने में विफलता" को एक संभावित वैकल्पिक मॉडल के रूप में सुझाया।  

किसी व्यक्ति की पहचान न होने और उस पर अभियोग न चलने के संबंध में: 

न्यायालय ने माना कि किसी व्यक्ति की पहचान न होना या उस पर अभियोग न चलनाअपने आप मेंकिसी निगम के अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं है। आरोपपत्र में यह स्पष्ट होना चाहिये कि अपराध निगम ने स्वयं किया हैन कि उस व्यक्ति ने जिसने उसकी ओर से कार्य किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता (अब धारा 528, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) को प्रारंभिक चरण में तब भी लागू किया जा सकता है जब आरोप कम से कम प्रथम दृष्टया यह प्रकट न करें कि (i) किसी व्यक्ति ने निगम की ओर से कार्य किया, (ii) ऐसा कार्य विचाराधीन अपराध से संबंधित हैऔर (iii) आसपास की परिस्थितियाँ आपराधिक मनःस्थिति (mens rea) के अस्तित्व को स्पष्ट रूप से बेतुका या स्वाभाविक रूप से असंभव नहीं बनाती हैं। 

तथ्यों पर लागू होने पर: 

न्यायालय ने माना कि अपीलकर्त्ता के विरुद्ध आरोपपत्र निर्धारित मानदंडों को पूरा करता हैक्योंकि प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि कथित अपराधों के संबंध में प्राकृतिक व्यक्तियों ने उसकी ओर से कार्य किया थाऔर आसपास की परिस्थितियाँ आवश्यक आपराधिक मनःस्थिति (mens rea) की संभावना को जन्म देती हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह ढाँचा सामान्यतः प्राकृतिक व्यक्तियों पर लागू होता हैऔर केवल निदेशकों या प्रभारी व्यक्तियों तक सीमित नहीं है।  

आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) की अवधारणा क्या है? 

  • आपराधिक विधि का एक मूलभूत सिद्धांतआपराधिक मनःस्थिति (mens rea) का सिद्धांतअपराध करते समय अपराधी की मनःस्थिति का पता लगाता है 
  • यह एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है "दोषी मन (guilty mind)"। 
  • इसमें यह विचार समाहित है कि किसी कृत्य को आपराधिक माने जाने के लियेउसके पीछे एक संबंधित आपराधिक आशय या मानसिक स्थिति होनी चाहिये 
  • इस सिद्धांत के मूल आधार में यह मान्यता है कि आपराधिक दायित्व केवल किसी सदोष कार्य के किये जाने के आधार पर अधिरोपित नहीं किया जाना चाहिये 
  • इसके बजायइसमें अपराधी की मानसिक स्थिति का व्यक्तिपरक मूल्यांकन आवश्यक हैजिसमें आशयज्ञानलापरवाही या उपेक्षा जैसे कारकों की पड़ताल की जाती है। 
  • संक्षेप मेंआपराधिक मनःस्थिति (mens rea) इस सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है कि दोष का निर्धारण केवल कृत्य से ही नहीं अपितु कर्त्ता की दोषी मानसिकता से भी होता है। 
  • इससे यह सुनिश्चित होता है कि व्यक्तियों को केवल उन्हीं कृत्यों के लिये जवाबदेह ठहराया जाए जो वे जानबूझकर और स्वेच्छा से आपराधिक आशय से करते हैं। 

कॉर्पोरेट आपराधिक दायित्व में अभियोग का सिद्धांत क्या है? 

इस सिद्धांत की उत्पत्ति: 

  • परंपरागत रूप सेपरोक्ष दायित्व का प्रयोग निगमों को उनके अभिकर्त्ताओं द्वारा किये गए सिविल अपराधों के लिये उत्तरदायी ठहराने के लिये किया जाता थाजिसके अधीन उन्हें नियोजन के दौरान हुए नुकसान की भरपाई करनी पड़ती थी। यद्यपिइस सिद्धांत को आपराधिक अपराधों तक विस्तारित नहीं किया गया थाजिससे निगमों को ऐसे मामलों में दण्ड से मुक्ति मिल जाती थी। 
  • इस कमी को दूर करने के लियेअंग्रेजी न्यायालयों ने कॉर्पोरेट पर्दे को हटा दिया और निगमों को आपराधिक और सिविल सदोष कृत्यों के लिये उत्तरदायी ठहरायाजहाँ अपराध निगम के "निर्देशित मस्तिष्क और इच्छा" के माध्यम से किया गया था। इसेएट्रीब्यूशन का सिद्धांत (Doctrine of Attribution) कहा जाने लगा । 

इरिडियम से पहले भारतीय दृष्टिकोण: 

  • उच्चतम न्यायालय द्वाराइरिडियम मामलेमें दिये गए निर्णय से पहलेभारतीय उच्च न्यायालय कंपनियों को आपराधिक रूप से उत्तरदायी ठहराने में काफी हद तक अनिच्छुक थे। 
  • महाराष्ट्र राज्य बनाम सिंडिकेट ट्रांसपोर्ट कंपनी (पी.) लिमिटेड (1964) के मामलेमेंबॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाते हुए यह माना कि क्या कोई निगमित निकाय किसी व्यक्ति के आपराधिक कृत्यों के लिये उत्तरदायी होना चाहियेयह अपराध की प्रकृतिकंपनी के सापेक्ष अधिकारी की स्थिति और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है जो यह दर्शाती हैं कि निगमित निकाय ने स्वयं ही उस कृत्य का आशय किया था। 
  • एसो स्टैंडर्ड इंक. बनाम उदराम भगवानदास जापानवाला (1975)के मामले में, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि किसी कंपनी का आशय केवल तभी माना जा सकता है जब इसे उसकी साधारण सभाबोर्ड की बैठक के माध्यम से या उसके ज्ञापन या एसोसिएशन के लेखों के अनुसार व्यक्त किया गया हो।  
  • एम.वी. जावली बनाम महाजन बोरवेल (1997)मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि जहाँ कारावास और जुर्माने का अनिवार्य दण्ड निर्धारित हैवहाँ केवल जुर्माना अधिरोपित किया जाएगा जहाँ कारावास संभव नहीं है। इस "एक ही नियम सब पर लागू" दृष्टिकोण को बाद मेंसहायक आयुक्त बनाम वेल्लियप्पा टेक्सटाइल्स (2003) के मामले में अस्वीकार कर दिया गया, जहाँ न्यायालय ने यह माना कि यद्यपि किसी कंपनी को कारावास नहीं दिया जा सकता हैलेकिन जहाँ विधि में कारावास और जुर्माने दोनों का प्रावधान हैवहाँ न्यायालयों के पास कारावास के स्थान पर जुर्माना लगाने का कोई विवेकाधिकार नहीं है। 
  • स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक बनाम डायरेक्टोरेट ऑफ एनफोर्समेंट (2005)में, उच्चतम न्यायालय ने आरोपण के सिद्धांत का संदर्भ दिये बिनायह माना कि किसी कंपनी पर अनिवार्य कारावास से दंडनीय अपराधों के लिये अभियोजन चलाया जा सकता हैलेकिन आपराधिक मनःस्थिति -आधारित अपराधों का प्रश्न खुला छोड़ दिया। 
  • इरिडियम मामलेसे पहलेउच्च न्यायालय के परस्पर विरोधी निर्णयों के कारण किसी कंपनी पर आपराधिक आशय का आरोप लगाने की स्थिति अनिश्चित बनी हुई थी। 

इरिडियम द्वारा समाधान: 

  • इरिडियम इंडिया टेलीकॉम लिमिटेड बनाम मोटोरोला इंक.के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने निदेशकों की देयता निर्धारित करने के लिये नहींअपितु स्वयं निगम की देयता निर्धारित करने के लिये दायित्व निर्धारण के सिद्धांत पर चर्चा की। 
  • न्यायालय ने माना कि आपराधिक दायित्व तब उत्पन्न होता है जब अपराध व्यवसाय के संबंध में किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा किया जाता है जो उसके मामलों को नियंत्रित करते हैंऔर इस हद तक नियंत्रण रखते हैं कि उन्हें निगम का "मार्गदर्शक मस्तिष्क और इच्छा" माना जा सकता है। 
  • इस प्रकार के आपराधिक आशय को निगम पर 'अल्टर ईगो (alter ego)' सिद्धांत केआधार पर लागू माना गयाऔर न्यायालय नेस्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक मामलेमें अपने पहले के निर्णय को बरकरार रखाजिससे उस समय कॉर्पोरेट आपराधिक दायित्व की स्थिति स्पष्ट हो गई। 
  • जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने अबसैनोफी इंडिया मामलेमें स्पष्ट किया है, इरिडियम नेकेवल "क्या" प्रश्न का उत्तर दिया था - आरोपण के "कैसे" प्रश्न को ऊपर चर्चा किये गए तीन-चरण ढाँचे के माध्यम से हल करने के लिये छोड़ दिया था। 

पारिवारिक कानून

राज्य के विरुद्ध विवाह-विच्छेद की अपील पोषणीय नहीं: दिल्ली उच्च न्यायालय

 08-Sep-2026

पूनम बनाम दिल्ली राज्य (NCT) 

"केवल इस आधार पर कि पक्षकार लगभग डेढ़ वर्ष तक संगम विहार में रहेमाननीय कुटुंब न्यायालय को क्षेत्रीय अधिकारिता प्रदान नहीं की जा सकतीजबकि यह स्वीकार किया जाता है कि पक्षकार इसके बाद गुरुग्राम चले गए और अंततः वहाँ एक साथ रहने लगे।" 

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर 

दिल्ली उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की खंडपीठ नेपूनम बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी (2026) के मामले में, एक पत्नी द्वारा दायर अपील को खारिज कर दियाजिसमें उसने कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें क्षेत्रीय अधिकारिता के अभाव में उसकी तलाक याचिका वापस कर दी गई थी। खंडपीठ ने यह माना कि अपील राज्य के विरुद्ध पोषणीय नहीं थी और यह गुण-दोष के आधार पर भी विफल रही। 

पूनम बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता पत्नी ने कुटुंब न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 19 के अधीन कुटुंब न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध अपील दायर की थीजिसमें सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7 नियम 10 के अधीन उसकी विवाह विच्छेद याचिका को उचित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने के लिये वापस कर दिया गया था। 
  • कुटुंब न्यायालय ने यह माना था कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 19 के अधीन उसके पास पत्नी की क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद की मांग वाली याचिका पर क्षेत्रीय अधिकारिता का अभाव है। 
  • दोनों पक्षकारों ने 18 जनवरी, 2019 को गुरुग्राम में विवाह किया था और उसके बाद लगभग डेढ़ से दो वर्ष तक पति के वैवाहिक घर संगम विहारदिल्ली में एक साथ रहे थे। 
  • पति को गुरुग्राम में नौकरी मिलने के बाददोनों पक्षकार वहाँ किराए के मकान में रहने लगे और चार वर्ष से अधिक समय तक साथ-साथ रहते रहे। 
  • पत्नी ने आरोप लगाया कि विवाह के दौरान उसे क्रूरता का शिकार होना पड़ाविशेषत: उसके पति के शराब के अत्यधिक सेवन के कारणऔर विवाह-विच्छेद की याचिका दायर करने से लगभग दो सप्ताह पहले उसे वैवाहिक घर से निकाल दिया गया थाजिसके बाद वह अपने माता-पिता के घर के पास पृथक् रहने लगी। 
  • कुटुंब न्यायालय ने पाया कि यद्यपि पक्षकार पहले संगम विहार में एक साथ रहते थेउनका अंतिम साझा निवास गुरुग्राम में थाऔर यह माना कि पूर्व दिल्ली निवास हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) के अधीन अधिकारिता प्रदान करने के लिये अपर्याप्त थी 
  • पत्नी ने पति को पक्षकार बनाए बिनादिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विरुद्ध यह अपील दायर की है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • राज्य के विरुद्ध अपील की स्वीकार्यता पर: 
    • न्यायालय ने कहा कि वह यह नहीं समझ पा रहा है कि पत्नी और पति के बीच विवाह-विच्छेद की कार्यवाही में पारित आदेश को चुनौती देने वाली अपील दिल्ली राज्य के विरुद्ध कैसे दायर की जा सकती हैविशेषत: तब जब पति को अपील में पक्षकार के रूप में शामिल नहीं किया गया था। 
  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) के संबंध में पत्नी की दलील पर: 
    • न्यायालय ने पत्नी की इस दलील पर ध्यान दिया कि लगभग डेढ़ से दो वर्ष तक संगम विहार में पक्षकारों का निवास दिल्ली में कुटुंब न्यायालय को अधिकारिता  प्रदान करने के लिये पर्याप्त थाऔर धारा 19(iii) के लिये संयुक्त निवास को समय के हिसाब से अंतिम होना आवश्यक नहीं था। 
  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) के दायरे पर: 
    • इस दलील को खारिज करते हुएन्यायालय ने माना कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) विशेष रूप से उस न्यायालय को अधिकारिता प्रदान करती है जिसकी क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर "विवाह के पक्षकार अंतिम बार एक साथ रहे थे"जिससे उस उपबंध के प्रयोजन के लिये संयुक्त निवास का अंतिम स्थान निर्णायक हो जाता है। 
  • तथ्यों पर उपबंध के लागू होने के संबंध में: 
    • न्यायालय ने माना कि संगम विहार में पक्षकारों के पूर्व निवास पर विश्वास करने से कुटुंब न्यायालय को क्षेत्रीय अधिकारिता प्राप्त नहीं हो सकतीजबकि पक्षकारों ने यह स्वीकार किया था कि वे बाद में गुरुग्राम चले गए थे और अंतिम बार चार वर्ष से अधिक समय तक वहाँ एक साथ रहे थे। 
  • अंतिम परिणाम पर:  
    • पीठ ने अपील को पोषणीय होने और गुण-दोष दोनों आधारों पर खारिज कर दिया। 

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 19 क्या है? 

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19 उन न्यायालयों का उल्लेख करती है जिनमें अधिनियम के अंतर्गत याचिका प्रस्तुत की जानी है। इसमें उपबंधित किया गया है कि प्रत्येक याचिका उस जिला न्यायालय में प्रस्तुत की जाएगी जिसकी साधारण आरंभिक सिविल अधिकारिता की स्थानीय सीमा के भीतर स्थित है। 

  • विवाह का अनुष्ठान हुआ थाया  
  • याचिका प्रस्तुत किये जाने के समय प्रत्यर्थी निवास करता हैया 
  • विवाह के पक्षकार अंतिम बार एक साथ रहे थेया 
  • यदि याचिकाकर्त्ता पत्नी हैतो याचिका प्रस्तुत करने की तिथि पर वह कहाँ निवास कर रही हैया 
  • याचिकाकर्त्ता याचिका के प्रस्तुत करने के समय निवास कर रहा हैउस दशा मेंजब प्रत्यर्थी उस समय पर ऐसे राज्यक्षेत्र के बाहर निवास करता है जिस पर इस अधिनियम का विस्तार है या उसके जीवित होने के बारे में सात वर्ष या उससे अधिक की कालावधि तक उन्होंने कुछ नहीं सुना हैजिन्होंने उसके बारे मेंयदि वह जीवित होता तोस्वभावतः सुना होता