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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सांविधानिक विधि

पति की मृत्यु की तिथि से विधवा को देय पारिवारिक पेंशन

 09-Sep-2026

माया बनर्जी बनाम भारत संघ और अन्य 

"एस.के. मस्तान बी का मामला सीधे तौर पर वर्तमान मामले की तरह विधवा द्वारा पारिवारिक पेंशन के दावे से संबंधित है। इस न्यायालय ने तरसेम सिंह मामले में अपना मत देते हुए एसके मस्तान बी मामले में अपने पूर्व मत को ध्यान में नहीं रखा है।" 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ नेमाया बनर्जी बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामलेमेंसेवा के दौरान शहीद हुए एक रेलवे कर्मचारी की विधवा द्वारा दायर अपील को मंजूर करते हुए निदेश दिया कि वह बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय के अनुसार 2014 से नहींअपितु 2000 में अपने पति की मृत्यु की तारीख से पारिवारिक पेंशन की हकदार है। 

माया बनर्जी बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता के पतिजो रेलवे कर्मचारी थेकी मृत्यु 12.11.2000 को हुईजबकि अपीलकर्त्ता और उनके पति एक विवाद के कारण पृथक् रह रहे थेजिससे अपीलकर्त्ता को उनकी मृत्यु के समय उनकी सेवा संबंधी विवरणों की जानकारी नहीं थी। 
  • उनके पति को 2001 में उनकी मृत्यु के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया थाजो रेलवे बोर्ड के अपने ही परिपत्र के अधीन अस्वीकार्य था। 
  • जब अपीलकर्त्ता ने बर्खास्तगी को चुनौती दीतो उसकी याचिका को 2012 में विलंब और मृत्यु की दर्ज तिथि में विसंगति के आधार पर खारिज कर दिया गया। 
  • इसके बाद उन्होंने एक सिविल वाद दायर कियाजिसमें 12.11.2000 को उनके पति की मृत्यु की सही तारीख घोषित की गई। 
  • इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) से संपर्क कियाजिसने समय सीमा समाप्त होने के कारण उनके दावे को खारिज कर दिया। 
  • उन्होंने बॉम्बे उच्च न्यायालय का रुख कियाजिसने पारिवारिक पेंशन के लिये उनके दावे को स्वीकार कर लियालेकिन लाभ को 2014 से आगे तक सीमित कर दिया - जिस वर्ष उन्होंने पहली बार केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) से संपर्क किया था। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

अपीलकर्त्ता के तर्क पर: 

  • अपीलकर्त्ता ने तर्क दिया कि पति की मृत्यु के तुरंत बाद ही उसे पारिवारिक पेंशन प्राप्त करने का अधिकार मिल गया थाऔर इसे बाद की तारीख तक सीमित नहीं किया जा सकता था। 

केंद्र सरकार द्वारा तरसेम सिंह पर निर्भरता के संबंध में:  

  • केंद्र सरकार ने भारत संघ बनाम तरसेम सिंह मामले पर विश्वास करते हुए तर्क दिया कि बार-बार होने वाले गलत कार्यों के लिये बकाया राशि सामान्यतः रिट याचिका दायर करने से पहले के तीन वर्षों तक ही सीमित होती हैऔर इसलिये उच्च न्यायालय द्वारा 2014 तक सीमित करना सही था। 

तरसेम सिंह और एस.के. मस्तान बी के बीच विवाद पर: 

  • न्यायालय ने कहा कि तथापि तरसेम सिंह मामले में बकाया राशि को याचिका दायर करने से पहले के तीन वर्षों तक सीमित रखा गया थालेकिन एस.के. मस्तान बी बनाम जनरल मैनेजरसाउथ सेंट्रल रेलवे के एक पूर्व निर्णय में - जिसमें विशेष रूप से विधवा के पारिवारिक पेंशन के दावे से संबंधित मामला था - एक अलग दृष्टिकोण अपनाया गया थाजिस पर तरसेम सिंह मामले में विचार नहीं किया गया था। 

एस.के. मस्तान बी में प्रतिपादित सिद्धांत पर: 

  • न्यायालय ने माना कि नियोक्ता का यह दायित्व है कि वह विधवा को मुकदमेबाजी में धकेलने से पहले पारिवारिक पेंशन की गणना करे और उसे यह पेंशन प्रदान करेऔर इस लाभ से इंकार करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। न्यायालय ने यह भी कहा कि विधवा की निरक्षरता और संसाधनों की कमी उसके पति की मृत्यु की तिथि से पेंशन देने का औचित्य सिद्ध करती है। 

पर इंक्यूरियम (अनजाने में हुई गलती (असावधानी) के कारण) और पूर्व निर्णय के सिद्धांत पर: 

  • डॉ. शाह फैसल बनाम भारत संघ और परवीन कुमार परवीन चौहान बनाम हरियाणा राज्य के मामलों पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने दोहराया कि समान शक्ति वाली समन्वय पीठ मामले को बड़ी पीठ के पास भेजे बिना विपरीत दृष्टिकोण नहीं अपना सकती हैऔर यह कि उसी बिंदु पर पहले के बाध्यकारी निर्णय पर विचार करने में विफल रहने वाला बाद का निर्णय त्रुटिपूर्ण है और उसमें कोई पूर्ववर्ती मूल्य नहीं है। 

एस.के. मस्तान बी की वर्तमान मामले में प्रयोज्यता पर 

  • न्यायालय ने माना कि एस.के. मस्तान बी का मामला विधवा के पारिवारिक पेंशन दावे पर प्रत्यक्षत लागू होता हैऔर तरसेम सिंह ने तीन वर्ष की सीमा निर्धारित करते समय इस पूर्व बाध्यकारी पूर्ण निर्णय पर विचार करने में विफल रहे थे। 

एक अधिकार के रूप में पेंशन की प्रकृति पर 

  • न्यायालय ने माना कि पेंशन एक मूल्यवान अधिकार और संपत्ति हैन कि कोई दानऔर लाभ को 2014 तक सीमित करने से उस गरीब विधवा के साथ अन्याय होगा जो पेंशन का दावा करने में विलंब के लिये दोषी नहीं थी। 

अपीलकर्त्ता की कोई गलती न होने पर 

  • न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ता के पति को रेलवे बोर्ड के अपने ही परिपत्र का उल्लंघन करते हुए उनकी मृत्यु के बाद बर्खास्त कर दिया गया थाकि मृत्यु की तारीख में विसंगति के कारण पारिवारिक पेंशन के लिये उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया थाजबकि उनके पक्ष में एक सांविधिक मृत्यु प्रमाण पत्र पहले से ही मौजूद थाऔर उन्हें इस विसंगति को दूर करने के लिये एक सिविल वाद दायर करने के लिये मजबूर होना पड़ा - इनमें से कोई भी बात उनकी गलती के कारण नहीं थी। 

परस्पर विरोधी पूर्व निर्णयों को नियंत्रित करने वाला सिद्धांत (Per Incuriam) क्या है? 

पर इनक्यूरियम (Per Incuriam) का सिद्धांत न्यायालय को ऐसे पूर्व निर्णय को अनदेखा करने की अनुमति देता है जो किसी बाध्यकारी पूर्व निर्णयसांविधिक प्रावधान या अन्य प्राधिकार की जानकारी के अभाव में दिया गया होजिससे परिणाम प्रभावित हो सकता था। न्यायालय द्वारा दोहराए गए प्रमुख सिद्धांतों में शामिल हैं: 

  • समान सदस्यों वाली समन्वय पीठमामले को किसी बड़ी पीठ के पास भेजे बिनापहले की समन्वय पीठ के निर्णय के विपरीत कोई राय नहीं ले सकती। 
  • बाद में लिया गया कोई भी निर्णयजो उसी विवाद्यक पर पहले लिये गए बाध्यकारी निर्णय पर विचार करने में विफल रहता हैउसे त्रुटिपूर्ण माना जाता है और उसका कोई पूर्ववर्ती मूल्य नहीं होता है। 
  • जहाँ समान शक्ति वाली पीठों के दो परस्पर विरोधी विचार मौजूद होंवहाँ न्यायालयों को बाद के त्रुटिपूर्ण निर्णय के बजाय पहले दिये गएसही ढंग से दिये गए निर्णय को पहचान कर लागू करना चाहिये 

भारत के  संविधान का अनुच्छेद 21 क्या है? 

अनुच्छेद 21 का पाठ: 

प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण  

"किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं।" 

इस अधिकार का दायरा: 

  • यह मनमानी राज्य कार्रवाई के विरुद्ध प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को प्रत्याभूत करता है। 
  • जीवन का अधिकार केवल पशुवत अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है - इसमें गरिमापूर्ण जीवन जीनेआजीविका कमाने और स्वस्थ वातावरण में रहने का अधिकार शामिल है। 
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता में आवागमन की स्वतंत्रतानिवास स्थान चुनने का अधिकार और किसी भी वैध व्यवसाय को करने का अधिकार शामिल है। 
  • राज्य के विरुद्ध उपलब्धवंचना केवल "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" के माध्यम से ही अनुमेय हैजो स्वयं निष्पक्षन्यायसंगत और तर्कसंगत होनी चाहिये 

विधिक मामलों के माध्यम से विकास: 

संकीर्ण व्याख्या (प्रारंभिक चरण) 

  • ए. के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य - इस मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ केवल "शारीरिक स्वतंत्रता" (गिरफ्तारी/निरोध से मुक्ति) हैऔर "विधि" का अर्थ केवल राज्य द्वारा निर्मित विधि है। यह एक संकुचित व्याख्या है। 

व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विस्तार 

  • खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1963) - व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत सभी अधिकार शामिल हैं। 
  • आर. सी. कूपर बनाम भारत संघ (1970) - व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अनुच्छेद 19(1) के अधीन छह स्वतंत्रताओं को शामिल करने के लिये माना गयान कि केवल अनुच्छेद 21 । 

निर्णायक बिंदु  

  • मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) - इस मामले नेगोपालन केसंकीर्णदृष्टिकोण को खारिज कर दियायह माना गया कि "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" निष्पक्षन्यायसंगत और तर्कसंगत होनी चाहियेन कि मनमानी या दमनकारी। इस मामले ने अनुच्छेद 21 को भारत में वास्तविक उचित प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बना दिया। 

"जीवन के अधिकार" का विस्तार 

  • ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम (1985) - अनुच्छेद 21 के भाग के रूप में आजीविका के अधिकार को मान्यता दीवैकल्पिक व्यवस्था के बिना बेदखली को उल्लंघनकारी माना गया। 
  • विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) - सुरक्षित कार्य वातावरण का अधिकार (लैंगिक उत्पीड़न से संरक्षण) अनुच्छेद 21 में पढ़ा गयाविधि बनने तक दिशानिर्देश निर्धारित किये गए। 
  • NALSA बनाम भारत संघ (2014) - लिंग की स्व-पहचान को जीवन के अधिकार के हिस्से के रूप में मान्यता दीट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अधिकार (लोक सुविधाएंचिकित्सा देखरेखअनुच्छेद 15 और 16 के अधीन आरक्षण) प्रदान किये 
  • पशु कल्याण बोर्ड बनाम ए. नागराजा (2014) - पशु कल्याण को सांविधानिक संरक्षण (पेरेंस पेट्रियाऔर अनुच्छेद 51 (छ) के माध्यम से) प्रदान कियाजल्लीकट्टू को असांविधानिक घोषित किया। 
  • एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) - निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत गरिमा के अंतर्निहित मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई। 
  • कॉमन कॉज़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) - निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध बनायागरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दीजिसमें अग्रिम निर्देशों के माध्यम से उपचार से इंकार करने का अधिकार भी शामिल है। 

मनमानी निरोध से संरक्षण और निष्पक्ष विचारण: 

  • अनुच्छेद 21 मनमानी या विधिविरुद्ध निरोध को प्रतिबंधित करता है और स्वतंत्रता से वंचित करने से पहले उचित प्रक्रिया का उपबंध करता है। 
  • यह निष्पक्ष विचारण के अधिकार को प्रत्याभूत करता है — विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकारसुने जाने का अधिकार और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अधिकार। 
  • ए. के. रॉय बनाम भारत संघ (1982) (NSA मामला) - यह माना गया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांततथापि महत्त्वपूर्ण हैंनिरपेक्ष नहीं हैं और विधि के उद्देश्य और संदर्भ के आधार पर निवारक निरोध विधियों (जैसेराष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम) के अधीन सीमित किये जा सकते हैं।  

मुख्य बातें: 

  • अनुच्छेद 21 न्यायिक रूप से विकसित होकर अधिकारों की एक विस्तृत श्रृंखला की बात करता है - गरिमाआजीविकानिजतास्वस्थ पर्यावरणअभिरक्षा में हिंसा और यातना से सुरक्षा। 
  • अनुच्छेद 21 के अधिकारों पर कोई भी प्रतिबंध निष्पक्षन्यायसंगततर्कसंगत और आनुपातिक होने की कसौटी पर खरा उतरना चाहिये - न कि केवल रूप में वैध होना। 
  • अब इस उपबंध को मेनका गांधीके बाद प्रक्रियात्मक और वास्तविक दोनों तरह की उचित प्रक्रिया को प्रत्याभूति के रूप में समझा जाता है । 

सिविल कानून

अंतरिम प्रक्रम में अंतिम अनुतोष प्रदान करने पर वर्जन पूर्णतः लागू नहीं होता

 09-Sep-2026

डॉ. आमोद कुमार सचान बनाम ऋचा मिश्रा और अन्य 

"यह कहना कि अंतिम अनुतोष के समान अंतरिम अनुतोष बिल्कुल भी नहीं दी जा सकताविधि की गलत व्याख्या होगी।" 

न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह नेडॉ. अमोद कुमार सचान बनाम ऋचा मिश्रा और अन्य (2026) के मामलेमें एक अपर जिला न्यायाधीश के उस आदेश को अपास्त कर दियाजिसमें अंतरिम प्रक्रम में अंतिम अनुतोष प्रदान करने के आधार पर अस्थायी व्यादेश को रद्द कर दिया गया थायह मानते हुए कि विधि में ऐसा कोई पूर्ण वर्जन मौजूद नहीं है और यह प्रश्न प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। 

डॉ. अमोद कुमार सचान बनाम ऋचा मिश्रा और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अमोद कुमार सचान ने सिविल जज (सीनियर डिवीजन)लखनऊ के समक्ष नियमित वाद संख्या 455/2026 दायर कियाजिसमें हिंद चैरिटेबल ट्रस्ट के संबंध में घोषणा और व्यादेश की मांग की गईऔर यह अभिवचन किया गया कि वह हमेशा से इसके अध्यक्ष रहे हैं। 
  • उन्होंने आरोप लगाया कि जब वे दिल्ली में थेतब कुछ न्यासियों ने ट्रस्ट के प्रशासनिक कार्यालयों के ताले तोड़ दिये और अभिलेखों को हटा दियाऔर 03.02.2026 को हुई एक बैठक के कार्यवृत्त को उन्हें अध्यक्ष पद से हटाने और प्रबंधन को प्रत्यर्थी संख्या को अंतरित करने के लिये गढ़ा गया था। 
  • उन्होंने आगे आरोप लगाया कि 16.01.2026 की मनगढ़ंत कार्यवृत्त रिपोर्ट के माध्यम सेन्यासियों के पहले से स्वीकृत इस्तीफे रद्द कर दिये गए और एक नए संस्थापक न्यासी को नियुक्त किया गया। 
  • उन्होंने यह घोषणा करने की मांग की कि कार्यवाही के दोनों कार्यवृत्त प्रारंभ से ही शून्य हैंऔर अंतरिम अनुतोष के लिये आदेश 39 नियम और सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन आवेदन किया। 
  • दिनांक 02.04.2026 के आदेश द्वाराविचारण न्यायालय ने न्याय विलेख के अधीन नए चुनाव होने तक प्रतिवादियों को अध्यक्ष के रूप में उनके कामकाज में हस्तक्षेप करने से रोक दिया। 
  • अपर जिला न्यायाधीश ने 08.07.2026 को आदेश 43 नियम 1(सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर दो अपीलों को स्वीकार करते हुए यह माना कि विचारण न्यायालय ने अंतरिम प्रक्रम में अंतिम अनुतोष प्रदान कर दिया थाकि अपील न्यायालय का स्वयं का निर्विवाद अंतरिम आदेश पूर्व- न्याय के रूप में लागू होता हैकि विसंगतियां न्यास विलेख के अधीन एक "आकस्मिक लोपथाऔर वादी ने साफ नीयत से न्यायालय का रुख नहीं किया था। 
  • वादी ने संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

अंतरिम प्रक्रम में अंतिम अनुतोष प्रदान करने पर वर्जन के संबंध में: 

  • न्यायालय ने माना कि यह कहना विधि की गलत व्याख्या होगी कि अंतिम अनुतोष के समान अंतरिम अनुतोष कभी नहीं दिया जा सकताऔर अपील न्यायालय व्यादेश को तभी रद्द कर सकता था जब उसने अभिलेख पर मौजूद तथ्यों और सामग्री पर विचार किया होता और विचारण न्यायालय के निष्कर्षों पर विचार किया होता। 

प्रथम अपील न्यायालय की शक्तियों पर: 

  • न्यायालय ने यह माना कि व्यादेश आदेश के विरुद्ध अपील की सुनवाई करने वाला प्रथम अपील न्यायालययद्यपि विचारण न्यायालय के समान शक्तियों का प्रयोग करता हैविचारण न्यायालय के निष्कर्षों पर विचार किये बिना और यह प्रदर्शित किये बिना कि वे गलत क्यों हैंअपना स्वयं का दृष्टिकोण प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है। 
  • इसमें कहा गया कि अपील न्यायालय प्रथम दृष्टया मामलेसुविधा के संतुलन और अपूरणीय क्षति के आधार पर आदेश की जांच करने के लिये बाध्य हैजबकि एक संक्षिप्त विचारण से बचना चाहिये 

विचारण न्यायालय के निष्कर्षों पर: 

  • न्यायालय ने कहा कि विचारण न्यायालय ने व्यादेश देने के लिये तीनों आवश्यक तत्त्वों पर निष्कर्ष अभिलिखित किये थेजिनमें फरवरी, 2026 की बैठक के कार्यवृत्त में विसंगतियां शामिल थींजो बैठक की प्रामाणिकता पर संदेह उत्पन्न करती हैंदोनों बैठकों के लिये किसी भी एजेंडा का अभाव और बिना कारण बताओ नोटिस या जांच के प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) के आधार पर वादी को हटाना शामिल है। 

अपील न्यायालय द्वारा अपने ही अंतरिम आदेश पर निर्भरता के संबंध में: 

  • न्यायालय ने माना कि अपील न्यायालय का तर्क दोनों तरह से लागू होता हैक्योंकि उसी तर्क के आधार पर, 10.04.2026 को विचारण न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने वाला उसका अपना अंतरिम आदेश भी अंतरिम प्रक्रम में अंतिम अनुतोष प्रदान करने के समान होगा। 
  • इसमें चेतावनी दी गई कि तथ्यों से अलगअमूर्त रूप से विधिक प्रस्तावों को लागू करने से "विधि को बनाए रखने के नाम पर न्याय का मजाक" उड़ाने का जोखिम होता है। 

अंतरिम अवलोकनों की अनिश्चित प्रकृति पर: 

  • न्यायालय ने माना कि किसी याचिका या अपील पर विचार करते समय की गई टिप्पणियां पूरी तरह से अस्थायी होती हैंमामले के गुण-दोष को प्रभावित नहीं करती हैंऔर अंतिम सुनवाई में न्यायालय को बाध्य नहीं करती हैंऔर अपील न्यायालय का विपरीत दृष्टिकोण विधिक प्रस्तावों के बारे में उसकी समझ को खराब ढंग से दर्शाता है। 

'अनजाने में हुए लोप’ के आधार पर: 

  • न्यायालय ने माना कि अपील न्यायालय ने न्यास विलेख के पाठ से "अनजाने में हुए लोपके अभिवचन को अनुचित रूप से उठाया थाजबकि किसी भी प्रतिवादी ने उस खंड पर विश्वास करने का अभिवचन नहीं किया थाऔर ऐसे अभिवचन विचारण के दौरान स्थापित किये जाने चाहियेन कि अंतरिम प्रक्रम में पूर्व-निर्णयित किया जाना चाहिये 

स्वच्छ हस्त सिद्धांत (Clean Hands) पर आपत्ति के संबंध में: 

  • न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अपीलीय न्यायालय को कथित रूप से छिपाए गए तथ्यों और वादी के व्यादेश प्राप्त करने के अधिकार के मध्य संबंध (Nexus) के संबंध में स्पष्ट निष्कर्ष अभिलिखित करना चाहिये था। ऐसा करने में विफल रहने परअपील न्यायालय तथ्यों के प्रकटीकरण न किये जाने को व्यादेश को उन्मोचित करने के आधार के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता था 

अनुच्छेद 227 के दायरे पर: 

  • न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 227 उसे साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करने या अपने स्वयं के निष्कर्षों को प्रतिस्थापित करने की अनुमति नहीं देता हैऔर तदनुसार अपील न्यायालय के आदेश को अपास्त करते हुएदोनों अपीलों को नए सिरे से निर्णय के लिये बहाल कर दिया। 

नई सुनवाई लंबित रहने तक अंतरिम निर्देशों पर: 

  • यह देखते हुए कि विवाद से ट्रस्ट द्वारा संचालित अस्पतालों और एक मेडिकल कॉलेज के कामकाज पर प्रभाव पड़ रहा थान्यायालय ने निदेश दिया कि ट्रस्ट के बैंक खातों का संचालन याचिकाकर्त्ता और एक अन्य संस्थापक न्यासी (प्रत्यर्थी संख्या नहीं) द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएऔर निकासी केवल वेतनसांविधिक देय राशि और इसी प्रकार के संदायों तक सीमित होजिनमें से प्रत्येक को अपील न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। 

सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 39 (अस्थायी व्यादेश) क्या है? 

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का आदेश 39 सिविल न्यायालयों को अंतिम निर्णय लंबित रहने तक वाद की विषयवस्तु को संरक्षित रखने के लिये अस्थायी व्यादेश जारी करने का अधिकार देता है। इस प्रकार का अनुतोष प्रदान करने वाले न्यायालयों को तीन निर्धारित तत्त्वों से संतुष्ट होना चाहिये: 

  • प्रथम दृष्टया मामला - एक गंभीर प्रश्न जिस पर विचार किया जाना हैन कि गुण-दोष पर कोई निर्णायक निष्कर्ष। 
  • सुविधा का संतुलन — व्यादेश को अस्वीकार करने से उसे प्रदान करने की तुलना में अधिक कठिनाई उत्पन्न होगी। 
  • अपूरणीय क्षति — इंकार के कारण हुई वह हानि जिसकी क्षतिपूर्ति प्रतिकर के रूप में पर्याप्त रूप से नहीं की जा सकती। 

आदेश 39 के अधीन दिये गए आदेश के विरुद्ध अपीलआदेश 43 नियम 1(सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत की जाती है। यद्यपि अपील न्यायालय विचारण न्यायालय के समान शक्तियों का प्रयोग करता हैउसे विचारण न्यायालय के तर्क पर विचार करना चाहिये और उसे चुनौती देनी चाहियेन कि बिना किसी आधार के अपना स्वयं का दृष्टिकोण थोपना चाहिये