9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से






करेंट अफेयर्स और संग्रह

होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह

सिविल कानून

न्यायिक कार्यवाही पूरी होने तक ग्रेच्युटी रोकी जा सकती है

 10-Sep-2026

भारत संघ एवं अन्य बनाम श्री जमुना दास 

"'न्यायिक कार्यवाहीअभिव्यक्ति में प्रत्यर्थी द्वारा दायर आपराधिक अपील भी शामिल होगीजो अभी भी लंबित है।" 

न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति विनोद कुमार 

दिल्ली उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

दिल्ली उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ जिसमें न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति विनोद कुमार शामिल थेनेभारत संघ एवं अन्य बनाम श्री जमुना दास (2026) के मामले मेंकेंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के एक निर्णय को अपास्त कर दिया और यह माना कि सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की ग्रेच्युटी को तब तक वैध रूप से रोका जा सकता है जब तक उसकी आपराधिक अपील लंबित रहती हैभले ही उसके विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू न की गई हो। 

भारत संघ एवं अन्य बनाम श्री जमुना दास (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी आयकर आयुक्त के कार्यालय में कर सहायक के रूप में कार्यरत था। 
  • उनके सेवाकाल के दौरान उसके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही शुरू की गईजिसके परिणामस्वरूप दोषसिद्धि का आदेश आया और CBI के विशेष न्यायाधीश ने 23 जनवरी, 2012 को दण्डादेश का आदेश पारित किया।  
  • दण्ड के आदेश से पहलेप्रत्यर्थी 31 दिसंबर, 2011 को सेवानिवृत्त हो गया था। 
  • उसने आपराधिक अपील के माध्यम से विशेष न्यायाधीश के निर्णय को चुनौती दीजो दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित रही और जिसमें उच्च न्यायालय ने दण्डादेश के आदेश को निलंबित कर दिया था।  
  • प्रत्यर्थी ने तर्क दिया कि याचिकाकर्त्ता ने अवैध रूप से उसकी ग्रेच्युटी और अवकाश नकदीकरण रोक रखा था। 
  • उसने मूल आवेदन दाखिल करके केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण से संपर्क कियाजिसे इस आधार पर मंजूर कर लिया गया कि उसके विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की गई थीऔर उसकी सेवानिवृत्ति के बाद से चार वर्ष से अधिक समय बीत जाने के कारणपेंशन नियमों के नियम 9(2)()(3) के अधीन चार वर्ष से अधिक पुरानी घटनाओं के लिये सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने पर रोक के मद्देनजर ऐसी कोई कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती थी। 
  • अधिकरण के निर्णय से असंतुष्ट होकर भारत सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • पेंशन नियमों के नियम 69(1)(ग) के दायरे पर: 
    खंडपीठ ने माना कि नियम 69(1)(ग) न केवल लंबित विभागीय कार्यवाही पर अपितु समान रूप से लंबित न्यायिक कार्यवाही पर भी लागू होता हैऔर याचिकाकर्त्ता का यह तर्क सही था कि अधिकरण इस अंतर को समझने में असफल रहा। 
  • क्या आपराधिक अपील "न्यायिक कार्यवाही" की श्रेणी में आती है: 
    न्यायालय ने माना कि न्यायिक कार्यवाही का सामना कर रहे कर्मचारी को ग्रेच्युटी जारी करने पर रोक तब तक जारी रहती है जब तक कि ऐसी कार्यवाही समाप्त नहीं हो जातीऔर "न्यायिक कार्यवाही" अभिव्यक्ति में कर्मचारी द्वारा दायर की गई आपराधिक अपील भी शामिल हैजो वर्तमान मामले में लंबित है। 
  • अधिकरण की त्रुटि पर: 
    न्यायालय ने माना कि अधिकरण ने प्रत्यर्थी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही के अभाव पर ही विचार करने में त्रुटि कीजबकि उसने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि उसके विरुद्ध लंबित आपराधिक अपील के रूप में न्यायिक कार्यवाही जारी थी। 
  • ग्रेच्युटी रोकने की वैधता पर: 
    न्यायालय ने माना कि आपराधिक अपील लंबित रहने तक प्रत्यर्थी की ग्रेच्युटी को रोकने के याचिकाकर्त्ता के निर्णय में कोई त्रुटि नहीं थीऔर स्पष्ट किया कि अपील का निपटारा होने के बाद प्रत्यर्थी का ग्रेच्युटी का दावा फिर से जीवित हो जाएगाचाहे निर्णय किसी भी प्रकार से हो। 
  • उपरोक्त के मद्देनजरअधिकरण का निर्णय अपास्त कर दिया गया और भारत संघ द्वारा दायर रिट याचिका को मंजूर कर लिया गया। 

ग्रेच्युटी (उपदान) क्या है? 

ग्रेच्युटी एकमुश्त मौद्रिक लाभ है जो नियोक्ता द्वारा कर्मचारी को लंबी और निरंतर सेवा के सम्मान के रूप में दिया जाता हैऔर यह कर्मचारी की सेवानिवृत्तिअधिवर्षिताइस्तीफेमृत्यु या निःशक्तता पर देय होता है। 

  • लाभ की प्रकृति:ग्रेच्युटी एक सांविधिक सेवानिवृत्ति लाभ हैजो पेंशन और अवकाश नकदीकरण से अलग हैऔर इसका उद्देश्य नियोक्ता को प्रदान की गई न्यूनतम अवधि की अर्हक सेवा के लिये कर्मचारी को पुरस्कृत करना है। 
  • नियमन ढाँचा:केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लियेग्रेच्युटी (जिसे "सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी" ​​या "मृत्यु ग्रेच्युटी​​कहा जाता हैकेंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 द्वारा शासित होती हैनिजी क्षेत्र और इसके अंतर्गत आने वाले अन्य प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों के लियेग्रेच्युटी भुगतान ग्रेच्युटी अधिनियम, 1972 द्वारा शासित होती है। 
  • पात्रता (ग्रेच्युटी संदाय अधिनियम, 1972):ग्रेच्युटी संदाय अधिनियम की धारा के अधीनग्रेच्युटी सामान्यतः उस कर्मचारी को देय होती है जिसने कम से कम पाँच वर्ष की निरंतर सेवा की होसेवानिवृत्तित्यागपत्रया दुर्घटना या बीमारी के कारण मृत्यु या निःशक्तता के कारण नियोजन की समाप्ति परहालांकि मृत्यु या निःशक्तता के मामलों में पाँच वर्ष की आवश्यकता लागू नहीं होती है।  
  • ग्रेच्युटी की दर:ग्रेच्युटी की गणना सामान्यतः कर्मचारी के अंतिम प्राप्त वेतन के आधार परसेवा के प्रत्येक पूर्ण वर्ष (या छह महीने से अधिक के उसके भाग) के लिये पंद्रह दिनों के वेतन की दर से की जाती है। 
  • ज़ब्ती और रोक:कुछ विशेष परिस्थितियों में ग्रेच्युटी को पूर्ण या आंशिक रूप से ज़ब्त या रोका जा सकता हैजैसे कि दंगा या अव्यवस्थित आचरणहिंसा का कृत्यया नियोजन के दौरान किये गए नैतिक पतन से संबंधित अपराध के लिये सेवा समाप्तिसरकारी कर्मचारियों के मामले मेंकेंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियमों का नियम 69 विभागीय या न्यायिक कार्यवाही के निष्कर्ष तक ग्रेच्युटी को रोकने की अनुमति देता हैजैसा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने वर्तमान मामले में पुनः पुष्टि की है।  

सिविल कानून

निवर्तमान भागीदार के अंश का मूल्यांकन, विघटन की तिथि पर नहीं अपितु मूल्यांकन की तिथि पर किया जाना चाहिये

 10-Sep-2026

सुमित्रा रेड्डी और अन्य बनाम के. रंगनाधा रेड्डी और अन्य 

"इस तिथि का उल्लेख करने का महत्त्व केवल लाभ और हानि का निर्धारण करने तक ही सीमित है और इसका भागीदारों के परिसंपत्तियों के शेष भाग में मूल्य प्राप्त करने के अधिकार से कोई संबंध नहीं है।" 

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ नेवी. सुमित्रा रेड्डी और अन्य बनाम के. रंगनाधा रेड्डी और अन्य (2026)में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय की पुष्टि की और यह माना कि भंग भागीदारी फर्म की अचल संपत्ति में निवर्तमान भागीदार के अंश का मूल्यांकन वास्तविक मूल्यांकन या विक्रय की तारीख पर किया जाना चाहियेन कि विघटन की तारीख पर। 

वी. सुमित्रा रेड्डी और अन्य बनाम के. रंगनाधा रेड्डी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद हैदराबाद में 3.27 एकड़ जमीन की स्वामी मेसर्स विराज कंस्ट्रक्शंस नामक एक भागीदारी फर्म के विघटन से उत्पन्न हुआ।   
  • भागीदारों में से एक ने स्वेच्छा से भागीदारी को भंग करने की मांग कीऔर फर्म 18 अक्टूबर, 1983 से प्रभावी रूप से भंग हो गई। 
  • न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि फर्म की अचल संपत्ति में निवर्तमान भागीदार के अंश का मूल्यांकन 18 अक्टूबर, 1983 (विघटन की तिथि) को किया जाना थाया उस मूल्य पर किया जाना था जो संपत्ति के वास्तव में मूल्यांकन या विक्रय के समय प्रचलित था। 
  • यह भी सामने आया कि शेष भागीदारों में से कुछ ने भंग की गई फर्म की संपत्तियों को बरकरार रखते हुए और उनका उपयोग करते हुए एक नई भागीदारी बनाकर व्यवसाय को जारी रखा था। 
  • आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने निवर्तमान भागीदार के अंश का मूल्यांकन वास्तविक मूल्यांकन की तिथि के अनुसार करने के पक्ष में निर्णय सुनायाऔर अपीलकर्त्ताओं के इस तर्क के विरुद्ध निर्णय सुनाया कि नवगठित फर्म द्वारा शेष परिसंपत्तियों का उपयोग बिना निपटान के किया जा सकता है। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • लाभ और हानि का निर्धारण करने के लिये सुसंगत तिथि के संबंध में: 
    न्यायमूर्ति भुयान द्वारा लिखित एक निर्णय में न्यायालय ने यह माना कि यद्यपि भागीदारी व्यवसाय के लाभ या हानि का निर्धारण विघटन की तिथि के अनुसार किया जाना चाहियेयह तिथि केवल लाभ और हानि का निर्धारण करने के लिये सुसंगत हैऔर परिसंपत्तियों के शेष भाग में भागीदार के अंश के मूल्य पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।  
  • निवर्तमान भागीदार के अंश के मूल्यांकन पर: 
    न्यायालय ने माना कि भागीदारी की परिसंपत्तियों के शेष भाग में अपना अंश प्राप्त करने का निवर्तमान भागीदार का अधिकार विघटन की तिथि पर स्थिर नहीं होता हैऔर भागीदार परिसंपत्तियों के वास्तविक मूल्यांकन की तिथि पर उनके मूल्य के आधार पर अपना अंश निर्धारित करवाने का हकदार है। 
  • विघटन पर परिसमापन की आवश्यकता के संबंध में: 
    न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक भागीदारी फर्म के विघटन के लिये सामान्यतः उसकी परिसंपत्तियों का परिसमापन आवश्यक होता हैजब तक कि एक या अधिक भागीदार अन्य भागीदारों की सहमति से परिसमापन के बदले उनके अंशों का बाजार मूल्य चुकाने के लिये आगे न आएं। 
  • पुनर्गठित भागीदारी के अधिकारों पर: 
    न्यायालय ने यह माना कि पुनर्गठित फर्म को भंग की गई फर्म की परिसंपत्तियों का उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं हैजब तक कि भंग की गई फर्म के सभी भागीदार हिसाब-किताब निपटाने और निवर्तमान भागीदार को उसका अंश देने के लिये एक करार पर न पहुँच जाएँऐसे करार के अभाव मेंपरिसंपत्तियों का परिसमापन किया जाना चाहिये और प्राप्त मूल्य को भागीदारों के बीच उनके अंशों के अनुपात में वितरित किया जाना चाहिये 
  • नई भागीदारी द्वारा परिसंपत्तियों को अपने पास रखने के संबंध में: 
    न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि नवगठित भागीदारी अपने भागीदारों के अधिकारों का निपटारा किये बिना पूर्ववर्ती फर्म की परिसंपत्तियों को अपने पास रख सकती है और उनका उपयोग कर सकती है। न्यायालय ने यह माना कि विचाराधीन भूमि पूर्ववर्ती भागीदारीमेसर्स विराज कंस्ट्रक्शंस की ही थी और नई भागीदारी इसे भंग की गई फर्म से खरीदकर ही अपने पास रख सकती थी।   
  • समझौते के बिना भूमि को अपने पास रखने की वैधता पर: 
    न्यायालय ने माना कि चूँकि नई भागीदारी ने पूर्ववर्ती फर्म से भूमि नहीं खरीदी थीइसलिये भूमि को अपने पास रखना अवैध था। 
  • उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुएअपील खारिज कर दी गई। 

भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के अंतर्गत विघटन और खातों के निपटान को नियंत्रित करने वाली विधि क्या है? 

भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 भागीदारों के अधिकारों और दायित्वों को नियंत्रित करता हैजिसमें फर्म के विघटन की स्थिति में भी शामिल है:  

  • फर्म का विघटन (धारा 39):किसी फर्म के सभी भागीदारों के बीच भागीदारी का विघटन "फर्म का विघटन" कहलाता है।  
  • करार द्वारा विघटन (धारा 40):सभी भागीदारों की सहमति से या भागीदारों के बीच संविदा के अनुसार किसी फर्म का विघटन किया जा सकता है।  
  • इच्छा से विघटन (धारा 43):जहाँ भागीदारी इच्छा से होवहाँ कोई भी भागीदार अन्य सभी भागीदारों को फर्म को भंग करने के अपने आशय की लिखित सूचना देकर फर्म को भंग कर सकता हैफर्म सूचना में उल्लिखित तिथि से भंग हो जाती हैया यदि कोई तिथि उल्लिखित नहीं हैतो सूचना के संसूचना की तिथि से भंग हो जाती है। 
  • लेखा-निपटान (धारा 48):फर्म के विघटन के बाद लेखा-निपटान करते समयहानि का भुगतान पहले लाभ में सेफिर पूंजी में सेऔर अंत में भागीदारों द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाएगाफर्म की परिसंपत्तियोंजिनमें पूंजी की कमी को पूरा करने के लिये भागीदारों द्वारा योगदान की गई कोई भी राशि शामिल हैका उपयोग पहले पर-व्यक्ति को ऋण चुकाने मेंफिर प्रत्येक भागीदार को आनुपापातिक रूप से अग्रिम भुगतान करने मेंऔर अंत में पूंजी चुकाने में किया जाएगाऔर यदि कोई शेष राशि बचती हैतो उसे भागीदारों के बीच लाभ में उनके अंश के अनुपात में विभाजित किया जाएगा। 
  • निवर्तमान भागीदार का लाभ में हिस्सेदारी का अधिकार (धारा 37):जहाँ किसी भागीदार की मृत्यु हो जाती है या वह अन्यथा भागीदार नहीं रहता और जीवित अथवा निरंतर व्यवसाय करने वाले भागीदार लेखा का अंतिम निपटारा किए बिना व्यवसाय को जारी रखते हैंवहाँ निवर्तमान भागीदार अपने विकल्प परअपनी संपत्ति में हिस्से के उपयोग से अर्जित लाभ में अपने हिस्से का अथवा अपने अंश की राशि पर प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज का हकदार होगा