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करेंट अफेयर्स और संग्रह
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आपराधिक कानून
शारीरिक दण्ड को लैंगिक हमला नहीं माना जाएगा
14-Sep-2026
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भास्कर पॉल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य "यद्यपि एक शिक्षक के रूप में अपीलकर्त्ता का आचरण उचित नहीं हो सकता है, विशेष रूप से शारीरिक दण्ड का सहारा लेना और छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय असंवेदनशीलता दिखाना... अपीलकर्त्ता की ओर से अपर्याप्तता या शारीरिक दण्ड का सहारा लेना लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 को आकर्षित नहीं करेगा।" न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर |
उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने भास्कर पॉल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2026) के मामले में एक स्कूल शिक्षक के विरुद्ध लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 के अधीन आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया, यह मानते हुए कि उसका आचरण, तथापि अनुचित था, अपराध गठित करने के लिये आवश्यक लैंगिक आशय को प्रकट नहीं करता था।
भास्कर पॉल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- महिला शिक्षकों ने प्रधानाध्यापक को सूचित किया कि अपीलकर्त्ता, जो एक शिक्षक है, ने कक्षा 10 की कुछ छात्राओं को शारीरिक रूप से छुआ था, जिन्होंने उसके विरुद्ध मौखिक रूप से परिवाद किया था।
- इसके बाद, जिला बाल संरक्षण यूनिट (DCPU) ने स्कूल का दौरा किया और एक परामर्श-सह-जांच रिपोर्ट तैयार की, जिसके आधार पर पुलिस ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 के अधीन स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज की।
- जांच रिपोर्ट में अभिलिखित किया गया कि छात्राओं ने बताया कि जब वे कक्षा में ध्यान नहीं देती थीं तो शिक्षक उनकी पीठ के ऊपरी हिस्से पर पीटता था, और जिस प्रकार से वह उन्हें छूता था (उनकी पीठ रगड़ना, कमर पर चुटकी काटना) उससे उन्हें असहज महसूस होता था।
- इसमें एक ऐसी घटना भी दर्ज की गई है जिसमें शिक्षक ने नक्शा न लाने पर एक छात्रा को थप्पड़ मारा और उसकी गर्दन को "अनुचित तरीके से" छुआ। अन्य छात्रों ने बताया कि यद्यपि उसने उन्हें छुआ नहीं, लेकिन उसके देखने का तरीका उन्हें असहज कर रहा था।
- पीड़ितों के कथन भी मजिस्ट्रेट द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 (पूर्व में धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन अभिलिखित किये गए थे।
- अपीलकर्त्ता ने कलकत्ता उच्च न्यायालय (जलपाईगुड़ी स्थित सर्किट बेंच) के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 (पूर्व में धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता) के अधीन दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की, जिसने कार्यवाही को रद्द करने से इंकार कर दिया।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया, जिसने उसके विरुद्ध कार्यवाही पर रोक लगा दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- धारा 7 के अधीन लैंगिक हमला के आवश्यक तत्त्व पर:
न्यायालय ने माना कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 7 के अधीन "लैंगिक हमला" के लिये बालक के निजी अंगों को छूना, या प्रवेश के बिना शारीरिक संपर्क से जुड़ा कोई अन्य कृत्य, "लैंगिक आशय" के साथ किया जाना आवश्यक है – लैंगिक आशय वह आवश्यक तत्त्व है जिसके बिना अपराध नहीं बनता है। - लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 के लिये सीमा:
न्यायालय ने माना कि यद्यपि एक शिक्षक के रूप में अपीलकर्त्ता का आचरण अनुचित था, विशेष रूप से शारीरिक दण्ड का सहारा लेना और छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय संवेदनशीलता की कमी, पीड़ितों के कथनों को ध्यानपूर्वक पढ़ने से धारा 10 को आकर्षित करने के लिये आवश्यक लैंगिक आशय का प्रकटन नहीं हुआ। - अनुचित आचरण और लैंगिक अपराध के बीच अंतर पर:
न्यायालय ने टिप्पणी की कि छात्रों को संभालने में शिक्षक की अपर्याप्तता, या उसके द्वारा शारीरिक दण्ड का सहारा लेना, अपने आप में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 को आकर्षित नहीं करेगा, भले ही ऐसा आचरण अनुशासनात्मक दृष्टिकोण से आपत्तिजनक हो। - लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अभियोजन से होने वाले अपरिवर्तनीय नुकसान पर:
न्यायालय ने कहा कि किसी बालिका विद्यालय या सहशिक्षा संस्थान में शिक्षक के विरुद्ध लैंगिक हमले का आरोप उसे वस्तुतः उसके पूरे करियर और जीवन के लिये दोषी ठहरा देता है, और अंततः दोषमुक्त होना भी आपराधिक विचारण से पहले ही हुए नुकसान की भरपाई के लिये "पूरी तरह से अपर्याप्त" होगा। - विलंब और साक्ष्य की प्रकृति पर:
न्यायालय ने FIR दर्ज करने में हुई देरी पर आपत्ति जताई और कहा कि प्रधानाध्यापक और महिला शिक्षकों के कथन, जिन्होंने आपराधिक प्रक्रिया शुरू की थी, अनुश्रुत साक्ष्य पर आधारित साक्ष्य हैं। - अभियोजन जारी रखना प्रक्रिया का दुरुपयोग है:
न्यायालय ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर अभियोजन जारी रखने की अनुमति देना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और अपीलकर्त्ता को अत्यधिक नुकसान पहुँचाएगा, यद्यपि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इससे उसके आचरण को क्षमा नहीं किया जाता है, और उसे कम आयु के विद्यार्थियों, विशेष रूप से छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय स्वयं को संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। - उपरोक्त के मद्देनजर, न्यायालय ने अलीपुरदुआर स्थित विशेष न्यायालय के समक्ष लंबित मामले से संबंधित संपूर्ण कार्यवाही को रद्द कर दिया और उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया।
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के अंतर्गत लैंगिक हमला को नियंत्रित करने वाली विधि क्या है?
- लैंगिक हमला (धारा 7): जो कोई, लैंगिक आशय से बालक की योनि, लिंग, गुदा या स्तनों को स्पर्श करता है या बालक से ऐसे व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति की योनि, लिंग, गुदा या स्तन का स्पर्श कराता है या लैंगिक आशय से कोई अन्य कार्य करता है जिसमें प्रवेशन किये बिना शारीरिक संपर्क अंतर्ग्रस्त होता है, लैंगिक हमला करता है, यह कहा जाता है।
- लैंगिक हमले के लिये दण्ड (धारा 8): जो कोई, लैंगिक हमला करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम की नहीं होगी किंतु जो पाँच वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुमनि से भी दंडनीय होगा।
- विश्वास या अधिकार के पद पर आसीन व्यक्तियों द्वारा गंभीर यौन उत्पीड़न (धारा 9(च)): जो कोई, किसी शैक्षणिक संस्था के प्रबंधन या कर्मचारियों पर किसी व्यक्ति द्वारा उस संस्था में अध्ययनरत बालक पर किया गया लैंगिक हमला गुरुतर लैंगिक हमला कहलाता है।
- गुरुतर लैंगिक हमले के लिये दण्ड (धारा 10): जो कोई, गुरुतर लैंगिक हमला करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि पाँच वर्ष से कम की नहीं होगी किंतु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुमनि से भी दंडनीय होगा।
शारीरिक दण्ड क्या है?
बारे में:
- संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति द्वारा शारीरिक दण्ड को "कोई भी ऐसा दण्ड जिसमें शारीरिक बल का प्रयोग किया जाता है और जिसका उद्देश्य किसी भी हद तक दर्द या असुविधा पहुँचाना होता है, चाहे वह कितना भी हल्का क्यों न हो" के रूप में परिभाषित किया गया है।
- समिति के अनुसार, इसमें अधिकतर बालकों को हाथ से या लाठी, बेल्ट आदि जैसे उपकरणों से मारना (थप्पड़ मारना, घूंसे मारना) शामिल है।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, शारीरिक दण्ड देना वैश्विक स्तर पर, घरों और स्कूलों दोनों में, बहुत प्रचलित है।
- 2 से 14 वर्ष की आयु के लगभग 60% बालक नियमित रूप से अपने माता-पिता या अन्य देखरेख करने वालों द्वारा शारीरिक दण्ड का शिकार होते हैं।
- भारत में बालकों को लक्षित करके दिये जाने वाले 'शारीरिक दण्ड' की कोई सांविधिक परिभाषा नहीं है।
शारीरिक दण्ड के प्रकार:
- राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) द्वारा परिभाषित शारीरिक दण्ड में कोई भी ऐसा कार्य शामिल है जिससे बालक को दर्द, क्षति या असुविधा पहुँचाई जाती है।
- इसमें बालकों को असहज स्थितियों में खड़ा करना शामिल है, जैसे कि बेंच पर खड़ा करना, कुर्सी की तरह दीवार के सहारे खड़ा करना, या उनके सिर पर स्कूल बैग रखना।
- इसमें पैरों के बीच कान पकड़ना, घुटने टेकना, जबरन नशीले पदार्थों का सेवन कराना और बलकों को स्कूल परिसर के भीतर बंद स्थानों में कैद करना जैसी प्रथाएं भी शामिल हैं।
- मानसिक उत्पीड़न से तात्पर्य गैर-शारीरिक दुर्व्यवहार से है जो बालक की शैक्षणिक और मनोवैज्ञानिक भलाई को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।
- इस प्रकार की सजा में व्यंग्य, गाली-गलौज, अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हुए डांटना, धमकाना और अपमानजनक टिप्पणियों का प्रयोग जैसे व्यवहार शामिल हैं।
- इसमें बालक का मजाक उड़ाना, उसे नीचा दिखाना या उसे शर्मिंदा करना जैसी हरकतें भी शामिल हैं, जिससे भावनात्मक तनाव और असहजता का माहौल बनता है।
वाणिज्यिक विधि
आयकर अधिनियम की धारा 147क असांविधानिक है
14-Sep-2026
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ज्योति सरीन बनाम भारत संघ और अन्य "विधानमंडल स्पष्ट रूप से सांविधानिक न्यायालयों द्वारा दिये गए निष्कर्षों के ऊपर अपनी राय थोपने की कोशिश कर रहा है, जो विधिक रूप से अग्राह्य है।" न्यायमूर्ति दीपक सिब्बल और न्यायमूर्ति रूपिंदरजीत चहल |
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति दीपक सिबल और न्यायमूर्ति रूपिंदरजीत चहल की खंडपीठ ने ज्योति सरीन बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामले में, 500 से अधिक रिट याचिकाओं के एक समूह में, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 147क को असांविधानिक घोषित किया, यह मानते हुए कि यह नौ उच्च न्यायालयों द्वारा पहचाने गए वास्तविक दोष को दूर करने में विफल रही और बाध्यकारी न्यायिक निर्णयों को रद्द करने का अनुचित प्रयास किया।
ज्योति सरीन बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता, जो एक अधिवक्ता और आयकर निर्धारक हैं, ने इससे पहले उसी उच्च न्यायालय के समक्ष 2024 के एक निर्णय में सफलता प्राप्त की थी, जिसमें उनके अधिकारिता के निर्धारण अधिकारी (JAO) द्वारा धारा 148 के अधीन जारी किये गए पुनर्मूल्यांकन नोटिस को रद्द कर दिया गया था, इस आधार पर कि ऐसे नोटिस केवल धारा 151क के अधीन एक फेसलेस निर्धारण अधिकारी द्वारा "ई-असेसमेंट ऑफ इनकम एस्केपिंग असेसमेंट स्कीम, 2022" के साथ जारी किये जा सकते हैं, जिसे 29.03.2022 को अधिसूचित किया गया था।
- इस दृष्टिकोण को अधिकांश उच्च न्यायालयों (तेलंगाना, बॉम्बे, राजस्थान, मद्रास, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुवाहाटी और स्वयं पंजाब और हरियाणा) ने साझा किया, जबकि अल्पमत (कलकत्ता, दिल्ली, गुजरात) ने माना कि अधिकारिता के निर्धारण अधिकारी (JAO) के पास समवर्ती अधिकारिता बरकरार है।
- इस मतभेद के संबंध में परस्पर विशेष अनुमति याचिकाएँ (Cross-Special Leave Petitions) उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित रहने के दौरान, संसद ने वित्त अधिनियम, 2026 के माध्यम से धारा 147क को 01.04.2021 से भूतलक्षी प्रभाव से अधिनियमित किया। इस प्रावधान में उपबंध किया गया कि धारा 148 एवं धारा 148क के प्रयोजनों के लिये “निर्धारण अधिकारी” से राष्ट्रीय फेसलेस निर्धारण केंद्र से भिन्न कोई अधिकारी अभिप्रेत होगा और सदैव से अभिप्रेत माना जाएगा, किसी न्यायिक निर्णय, धारा 151क अथवा उसके अधीन बनाई गई किसी योजना में किसी बात के होते हुए भी।
- उच्चतम न्यायालय ने दिनांक 10.04.2026 के आदेश द्वारा इस सीमित आधार पर विवादित उच्च न्यायालय के निर्णयों को अपास्त कर दिया, सभी मामलों को संबंधित अधिकारिता वाले उच्च न्यायालयों को वापस भेज दिया, करदाताओं को धारा 147क को चुनौती देने की स्वतंत्रता दी, अधिमानतः 30.09.2026 तक निपटारे का निदेश दिया और पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि धारा 151क या 2022 की योजना में संशोधन किये बिना, संसद केवल भूतलक्षी गैर-बाधा खंड के माध्यम से बाध्यकारी न्यायिक निर्णयों को रद्द नहीं कर सकती है, और यह शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन करते हुए विधायी अतिचार के समान है।
- राजस्व विभाग ने तर्क दिया कि संबंधित प्रावधानों को सामंजस्यपूर्ण ढंग से पढ़ने से पता चलता है कि अधिकारिता के निर्धारण अधिकारी (JAO) के पास धारा 148 के अधीन नोटिस जारी करने का अधिकार बरकरार है, कि 95% से अधिक करदाताओं ने पहले ही JAO द्वारा जारी नोटिसों का पालन कर लिया है, और प्रतिकूल निर्णय का वित्तीय प्रभाव लगभग ₹17 लाख करोड़ होने का अनुमान है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर:
न्यायालय ने माना कि यद्यपि यह संविधान का स्पष्ट भाग नहीं है, शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत इसकी संरचना से स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, और संविधान न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका को अलग-अलग परिभाषित करता है, और किसी भी अंग द्वारा इसका उल्लंघन अनुच्छेद 14 के अधीन गारंटीकृत समता को नकारता है। - विधि बनाने बनाम न्यायिक निष्कर्षों को घोषित करने की विधायिका की शक्ति पर:
न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 245, 246 और सातवीं अनुसूची के अधीन, विधायिका को विधि बनाने और संशोधित करने की शक्ति है, लेकिन वह यह घोषित नहीं कर सकती कि सांविधानिक न्यायालयों द्वारा निर्धारित विधि का क्या अर्थ था, न ही वह पक्षकारों के बीच अंतिम रूप प्राप्त कर चुके न्यायिक निर्णय को सीधे रद्द कर सकती है या विधायी रूप से निरस्त कर सकती है। - भूतलक्षी वैधता प्रदान करने वाले विधान के अनुमेय दायरे पर:
न्यायालय ने माना कि विधायिका, न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किये गए किसी विधि को भूतलक्षी रूप से भी वैध ठहरा सकती है, बशर्ते वह न्यायालय द्वारा पूर्व विधि में पहचाने गए आधार या दोष को दूर कर दे; वैधीकरण विधि ऐसी होनी चाहिये कि यदि वैधीकरण विधि उसके निर्णय के समय मौजूद होती तो न्यायालय उसी निर्णय पर नहीं पहुँच सकती थी। - न्यायिक निर्णयों को दरकिनार करने के साधन के रूप में निरसन पर:
न्यायालय ने माना कि विधायिका द्वारा किसी प्रतिकूल न्यायिक निर्णय को दरकिनार करने के लिये निरसन का उपयोग नहीं किया जा सकता है, और केवल न्यायिक घोषणा की अवहेलना करने के लिये अधिनियमित विधि को वैध बनाना विधायी अतिचार है और असांविधानिक है। - धारा 147क द्वारा अनसुलझे वास्तविक दोष पर:
न्यायालय ने पाया कि धारा 147क में निहित गैर-बाधा खंड में अधिनियम की धारा 130 और इसकी दिनांक 28.03.2022 की योजना का कोई उल्लेख नहीं है, और इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि धारा 151क और "आय मूल्यांकन योजना, 2022" को पूरी तरह से अपरिवर्तित और यथावत छोड़ दिया गया है, जिसका अर्थ है कि उच्च न्यायालयों द्वारा पहचाना गया वास्तविक दोष अनसुलझा रह गया है। - बहिष्करण के लिए वैधानिक विंडो के बंद होने पर:
न्यायालय ने नोट किया कि धारा 151क (2) के प्रथम परंतुक के अधीन, केंद्र सरकार धारा 148 को फेसलेस योजना से केवल 31.03.2022 से पहले जारी अधिसूचना द्वारा ही बाहर कर सकती थी, एक विंडो जिसे संसद पहले ही समाप्त कर चुकी थी, और यह माना कि जो सांविधिक रूप से बंद कर दिया गया था उसे धारा 147क के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता था। - निश्चितता के घोषित विधायी उद्देश्य पर:
न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि धारा 147क को निश्चितता प्राप्त करने और मुकदमेबाजी से बचने के लिये अधिनियमित किया गया था, यह देखते हुए कि इसके बजाय यह "मुकदमेबाजी का गढ़" बन गया, जिसमें कम से कम आठ उच्च न्यायालयों में हजारों याचिकाएं लंबित हैं। - धारा 148 नोटिसों की वैकल्पिक चुनौती पर:
न्यायालय ने माना कि, यदि धारा 147क जांच में खरी भी उतरती है, तो भी विवादित नोटिस स्वतंत्र रूप से रद्द किये जाने योग्य हैं क्योंकि वे धारा 151क के अधीन तैयार की गई 29.03.2022 की योजना के खंड 3(ख) के अनुसार यादृच्छिक स्वचालित आवंटन के माध्यम से जारी नहीं किये गए थे। - राजस्व विभाग द्वारा धारा 144ख और CBDT अधिसूचनाओं पर निर्भरता के संबंध में:
न्यायालय ने राजस्व विभाग के इस तर्क को खारिज कर दिया कि "धारा 144ख में दिये गए प्रावधान के अनुसार" वाक्यांश धारा 148 के अधीन जारी नोटिसों को फेसलेस आवश्यकता से बाहर रखता है, यह मानते हुए कि इससे योजना निरर्थक हो जाएगी, और आगे यह भी कहा कि धारा 120 के अधीन जारी CBDT की आंतरिक अधिसूचनाएं धारा 151क के अधीन तैयार की गई और संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित सांविधिक योजना को अधिभावी नहीं कर सकतीं। - अन्य उच्च न्यायालयों के साथ संरेखण के संबंध में:
न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के निर्णयों की बहुमत पंक्ति (तेलंगाना, बॉम्बे, पंजाब और हरियाणा के अपने पूर्व निर्णय, राजस्थान, मद्रास, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुवाहाटी) से स्पष्ट रूप से सहमति व्यक्त की और दिल्ली, गुजरात और कलकत्ता उच्च न्यायालयों के अल्पमत दृष्टिकोण से सम्मानपूर्वक असहमति व्यक्त की। - उपरोक्त को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने सभी रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया, आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 147क को असांविधानिक घोषित कर निरस्त कर दिया, और स्वतंत्र रूप से सभी विवादित धारा 148 नोटिसों को यादृच्छिक स्वचालित, फेसलेस आवंटन के माध्यम से जारी न किये जाने के कारण अपास्त कर दिया।
आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 147क क्या है?
बारे में:
- धारा 147क को धारा 148 और 148क के प्रयोजनों के लिये निर्धारण अधिकारी (AO) के पदनाम को स्पष्ट करने के लिये पेश किया गया था, जिसमें यह निर्दिष्ट किया गया था कि AO में राष्ट्रीय फेसलेस आकलन केंद्र या धारा 144ख (3) के अधीन आकलन इकाइयां शामिल नहीं हैं।
- इसे मूल रूप से स्वचालित और गुमनाम प्रणाली के बजाय पारंपरिक अधिकारिता निर्धारण अधिकारियों (JAOs) द्वारा जारी किये गए नोटिसों की वैधता के संबंध में संदेह को दूर करने के लिये अधिनियमित किया गया था।
धारा 147क के मुख्य विवरण:
- अधिकारक्षेत्रीय भूमिका: यह पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही में अधिकारक्षेत्रीय निर्धारण अधिकारियों (JAOs) के अधिकार और भूमिका को संबोधित करता है, और यह पुष्टि करने का प्रयास करता है कि JAOs के पास पुनर्मूल्यांकन नोटिस जारी करने की शक्ति बरकरार है।
- हालिया विधिक स्थिति: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने धारा 147क को असांविधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया, यह निर्णय सुनाते हुए कि विधायिका यादृच्छिक, गुमनाम आवंटन योजना के अनुपालन न करने के संबंध में न्यायालय निर्णयों को भूतलक्षी रूप से रद्द करने के लिये इसका उपयोग नहीं कर सकती है।
आयकर अधिनियम 1961
- आयकर अधिनियम 1961 भारत में एक व्यापक विधान है जो व्यक्तियों और व्यवसायों के लिये आय पर कराधान को नियंत्रित करता है।
- यह 1 अप्रैल, 1962 को लागू हुआ और देश में आयकर और सुपर-टैक्स की गणना, लगाने और वसूली के लिये ढाँचा प्रदान करता है।
- यह अधिनियम पिछले वर्ष (जब आय अर्जित की जाती है) और मूल्यांकन वर्ष (जब आय पर कर लगाया जाता है) जैसी महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं को परिभाषित करता है और कर अधिकारियों, मूल्यांकनों और उच्च न्यायालयों में अपील के लिये संरचना स्थापित करता है।