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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सांविधानिक विधि

क्या धर्मांतरण से अनुसूचित जनजाति का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता?

 15-Sep-2026

ननकी उर्फ नैमुन्निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"...अनुसूचित जनजाति का दर्जा निर्धारित करने के लिये यह देखना आवश्यक है कि क्या आवेदक में जनजातीय पहचान के आवश्यक गुण मौजूद हैं और क्या उसे इन गुणों के लिये मान्यता प्राप्त हैजिनमें प्रथागत रीति-रिवाजसामाजिक संगठनसामुदायिक जीवन और संबंधित जनजातीय समुदाय द्वारा स्वीकृति शामिल है।" 

न्यायमूर्ति अरुण कुमार 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अरुण कुमार नेननकी उर्फ नैमुन्निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें यह अभिनिर्धारित किया कि किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जा स्वतः समाप्त नहीं हो जाता हैऔर ऐसे दर्जे की निरंतरता का निर्धारण जनजातीय विशेषताओंरीति-रिवाजों और जनजातीय समुदाय के साथ निरंतर संबंध के संदर्भ में एक तथ्यात्मक प्रश्न के रूप में किया जाना चाहियेजिसमें उन्होंनेचिंताडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य के मामले में उच्चतम न्यायालय के 2026 के निर्णय पर व्यापक रूप से विधवास किया। 

ननकी उर्फ नैमुन्निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता ने भुइयां अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित होने का दावा करते हुएदुद्धीसोनभद्र के उप कलेक्टर द्वारा पारित तीन आदेशों को चुनौती दीजिनमें उसके पक्ष में किये गए तीन भूमि अंतरणों को शून्य घोषित किया गया था। 
  • यह पाया गया कि ये अंतरण उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 157-ख और उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 99 का उल्लंघन थेजो अनुसूचित जनजाति की भूमि को ऐसे व्यक्तियों को अंतरित करने पर रोक लगाते हैं जो अनुसूचित जनजाति के सदस्य नहीं हैंऔर तदनुसार भूमि को राज्य सरकार में निहित करने का निदेश दिया गया। 
  • याचिकाकर्त्ता ने दावा किया कि वह भुइयां अनुसूचित जनजाति समुदाय में पैदा हुई थी और उसके पास तहसीलदार द्वारा जारी किया गया वैध अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र थाऔर विक्रेता भी अनुसूचित जनजाति (गौर) से संबंधित थेजिससे संव्यवहार वैध हो जाता है। 
  • राज्य ने उसके अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे को जारी रखने पर आपत्ति जताईऔर इसके लिये ऐसे सबूतों का हवाला दिया जिनसे पता चलता है कि उसने इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार एक मुस्लिम व्यक्ति से शादी की थीजिसे नैमुन्निशा के नाम से जाना जाने लगावह कई दशकों तक उसके साथ रहीउसके दो बच्चे थे जिनके मुस्लिम नाम थेऔर पारिवारिक रजिस्टर में उसे मुस्लिम के रूप में दर्ज किया गया था।  
  • याचिकाकर्त्ता ने इसके जवाब में कहा कि उसने अपने मूल धर्म या आदिवासी पहचान को नहीं त्यागा हैवह अपने गाँव में ही रहती हैभुइयां रीति-रिवाजों का पालन करती हैऔर ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है जो समुदाय से उसके अलगाव को दर्शाता हो।      

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • धर्मांतरण के पश्चात् स्वतः अपवर्जन के अभाव के संबंध में 
    न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि ऐसा कोई व्यापक विधिक सिद्धांत नहीं है कि केवल धर्म परिवर्तन के कारण कोई व्यक्ति अनुसूचित जनजाति का सदस्य होना समाप्त कर देता है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्मांतरण के पश्चात् भी कोई व्यक्ति जनजातीय समुदाय का सदस्य बना रह सकता है 
  • अनुसूचित जनजाति का दर्जा जारी रहना एक तथ्यात्मक प्रश्न है: 
    न्यायालय ने माना कि कोई व्यक्ति अनुसूचित जनजाति से संबंधित बना रहता है या नहींइसका निर्धारण जनजातीय लक्षणोंरीति-रिवाजोंपरंपराओं और जनजातीय समुदाय के साथ निरंतर संबंध के संदर्भ में किया जाना चाहियेऔर इसके लिये उसनेचिंथदा आनंदमामले में उच्चतम न्यायालय के स्पष्टीकरण पर विश्वास किया कि संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में धर्म के आधार पर किसी प्रकार के अपवर्जन का प्रावधान नहीं है।                   
  • साक्ष्यों के संचयी मूल्यांकन पर: 
    न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता की ओर से भुइयां समुदाय के साथ उसके निरंतर संबंध को दर्शाने वाले ठोस साक्ष्यों का अभाव पाया और अपने निष्कर्ष को किसी एक कारक के बजाय परिस्थितियों के संचयी प्रभाव - उसके विवाहबाद के नामपारिवारिक जीवनबच्चों के नाम और परिवार-रजिस्टर प्रविष्टि - पर आधारित किया।          
  • कठोर परीक्षण की अस्वीकृति पर:  
    न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी दावेदार से यह साबित करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उसने अपने पूरे जीवन में हर रीति-रिवाज का पालन किया हैऔर किसी व्यक्ति को मुस्लिम बताने वाला एक दस्तावेज़ अपने आप में अनुसूचित जनजाति का दर्जा निर्धारित नहीं कर सकतामूल्यांकन समग्र रूप से किया जाना चाहिये 
  • अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र के साक्ष्य मूल्य पर: 
    न्यायालय ने माना कि अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र निस्संदेह साक्ष्य का एक सुसंगत हिस्सा हैलेकिन इसका अस्तित्व अधिकारियों को यह परीक्षा करने से नहीं रोकता है कि क्या धारक के पास बाद में उस स्थिति से संबंधित कोई महत्त्वपूर्ण सामग्री सामने आने पर भी आवश्यक अनुसूचित जनजाति स्थिति बनी रहती है।                 
  • अंतिम निष्कर्ष के आधार पर: 
    न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका निष्कर्ष केवल याचिकाकर्त्ता के विवाहधर्मांतरण के आरोपया उसके धर्म को मुस्लिम के रूप में दर्ज करने वाली एक अलग प्रविष्टि पर आधारित नहीं थाअपितु रिकॉर्ड में दर्ज लंबी परिस्थितियों और भुइयां रीति-रिवाजों के निरंतर पालनसामुदायिक जीवन में भागीदारी और समुदाय द्वारा स्वीकृति को दर्शाने वाली ठोस सामग्री के अभाव पर आधारित था। उपरोक्त के मद्देनजरन्यायालय ने माना कि याचिकाकर्त्ता विवादित विक्रय विलेखों के निष्पादन की तिथियों पर अपनी भुइयां अनुसूचित जनजाति की स्थिति की निरंतरता स्थापित करने में विफल रही हैकि ये संव्यवहार गैर-अनुसूचित जनजाति व्यक्तियों को अंतरण पर सांविधिक निषेध के अधीन थेऔर तदनुसार राजस्व प्राधिकरण के आदेशों की पुष्टि करते हुए रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया। 

अनुसूचित जनजातियाँ (STs) क्या हैं? 

परिभाषा:  

  • वे समुदाय जिन्हें स्वदेशी या जनजातीय आबादी के रूप में मान्यता प्राप्त है। 
  • सामान्यतः इनकी विशेषता विशिष्ट संस्कृतिभाषा और सामाजिक रीति-रिवाजों से होती है। 

वर्गीकरण के मानदंड: 

  • सांस्कृतिक पहचान 
    • अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक प्रथाएं। 
  • भौगोलिक अलगाव 
    • यह प्राय दूरस्थ या वन क्षेत्रों में पाया जाता है। 
  • आर्थिक भेद्यता 
    • आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच का अभाव होता है। 

महत्त्व: 

  • अनुसूचित जनजातियों (ST) को मान्यता देना सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने और भूमि और संसाधनों पर उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है। 
  • सरकार अनुसूचित जनजातियों के लिये विशेष रूप से शिक्षास्वास्थ्य और आर्थिक विकास की योजनाएं उपलब्ध कराती है। 

भारतीय संविधान द्वारा अनुसूचित जनजातियों के लिये कौन-कौन से बुनियादी सुरक्षा उपाय प्रदान किए गए हैं? 

सांविधानिक आधार: 

  • संविधान में "जनजाति" शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। 
  • "अनुसूचित जनजाति" शब्द कोअनुच्छेद 342(1) के माध्यम से जोड़ा गया था। 
    • यह विधेयक राष्ट्रपति को लोक अधिसूचना द्वारा अनुसूचित जनजाति घोषित की जाने वाली जनजातियों या जनजातीय समुदायों (या उनके भीतर के भागों/समूहों) को निर्दिष्ट करने का अधिकार देता है। 
  • पाँचवीं अनुसूची: अनुसूचित क्षेत्रों वाले प्रत्येक राज्य में जनजातीय सलाहकार परिषद की स्थापना का प्रावधान करती है। 

शैक्षिक एवं सांस्कृतिक सुरक्षा उपाय: 

  • अनुच्छेद 15(4): सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जनजातियाँ सहित) की उन्नति के लिये विशेष प्रावधान    
  • अनुच्छेद 29अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण (इसमें अनुसूचित जनजातियाँ शामिल हैं) 
  • अनुच्छेद 46: राज्य को विशेष ध्यान रखते हुए कमजोर वर्गोंविशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना चाहिये तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण से बचाना चाहिये 
  • अनुच्छेद 350विशिष्ट भाषालिपि या संस्कृति के संरक्षण का अधिकार 

राजनीतिक सुरक्षा उपाय 

  • अनुच्छेद 330: लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिये सीटों का आरक्षण 
  • अनुच्छेद 332: राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिये सीटों का आरक्षण 
  • अनुच्छेद 243 : पंचायतों में सीटों का आरक्षण 

प्रशासनिक सुरक्षा उपाय: 

  • अनुच्छेद 275: अनुसूचित जनजातियों के कल्याण को बढ़ावा देने और बेहतर प्रशासन प्रदान करने के लिये केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को विशेष निधि का अनुदान। 

सिविल कानून

स्थायी लोक अदालत को सेवा संबंधी मामलों पर कोई अधिकारिता नहीं है

 15-Sep-2026

राजस्थान राज्य बनाम भंवर लाल जैन 

"1987 के अधिनियम की धारा 22-सी के अधीन 'विवाद के किसी भी पक्षकारशब्दों की व्याख्या उस अधिकारिता के संदर्भ में की जानी चाहिये जिसके लिये स्थायी लोक अदालत की स्थापना की गई है।" 

न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंद 

राजस्थान उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढांड नेराजस्थान राज्य बनाम भंवर लाल जैन (2026) के मामलेमें स्थायी लोक अदालत (PLA), मेड़तानागौर द्वारा पारित एक पंचाट को अपास्त कर दियायह मानते हुए कि स्थायी लोक अदालत के पास सेवा लाभों के अनुदान से संबंधित विवाद का निर्णय करने की अधिकारिता नहीं हैक्योंकि ऐसा विवाद विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 22 (ख) के अधीन "लोक उपयोगिता सेवाओं" के अर्थ में नहीं आता है। 

राजस्थान राज्य बनाम भंवर लाल जैन (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी को 1978 में अस्थायी आधार पर सहायक के रूप में नियुक्त किया गया थाऔर 1980 में उसे अर्ध-स्थायी कर्मचारी घोषित कर दिया गया था। 
  • यद्यपिसभी सेवा लाभों के प्रयोजन के लियेउनकी सेवाओं की गणना केवल सितंबर 1981 से की गई थी। 
  • इससे व्यथित होकर प्रत्यर्थी ने स्थायी लोक अदालतमेड़तानागौर में अपनी नियुक्ति की प्रारंभिक तिथि से सेवा लाभ प्राप्त करने के लिये संपर्क किया।  
  • स्थायी लोक अदालत ने आवेदन स्वीकार कर लिया और प्रत्यर्थी के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए लोक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग विभाग को 1978 से सेवा लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया।  
  • याचिकाकर्त्ता विभाग ने राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन की वैधता को चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि चूँकि यह मुद्दा सेवा लाभों के अनुदान से संबंधित हैइसलिये इस पर स्थायी लोक अदालत द्वारा निर्णय नहीं लिया जा सकता था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं 

  • स्थायी लोक अदालत के सीमित अधिकारिता पर: 
    न्यायालय ने टिप्पणी की कि स्थायी लोक अदालत की स्थापना का उद्देश्य एक या एक से अधिक लोक उपयोगिता सेवाओं पर सीमित अधिकारिता का प्रयोग करना हैअन्यथा नहीं। 
  • धारा 22क (ख) के अधीन "सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं" के दायरे पर: 
    न्यायालय ने पाया कि लोक उपयोगिता सेवाओं की श्रेणियों को अधिनियम के अधीन विशेष रूप से सूचीबद्ध किया गया हैजिसमें केंद्र या राज्य सरकार को किसी अन्य सेवा को शामिल करने के लिये परिभाषा का विस्तार करने की शक्ति दी गई हैजो जानबूझकर सीमित अधिकारिता को इंगित करता है। 
  • धारा 22ग के अधीन "विवाद के किसी भी पक्षकार" की व्याख्या पर: 
    न्यायालय ने माना कि इस वाक्यांश को उस अधिकारिता के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिये जिसके लिये स्थायी लोक अदालत की स्थापना की गई हैऔर इसे लोक उपयोगिता सेवा विवादों से परे स्थायी लोक अदालत के अधिकार का विस्तार करने के लिये नहीं पढ़ा जा सकता है। 
  • स्थायी लोक अदालत की अधिकारिता से बाहर आने वाले सेवा लाभ विवादों पर: 
    न्यायालय ने माना कि चूँकि मामला प्रत्यर्थी को सेवा लाभ प्रदान करने से संबंधित थाइसलिये यह धारा 22 (ख) के अधीन परिभाषित "लोक उपयोगिता सेवाओं" के दायरे में नहीं आता हैऔर इसलिये स्थायी लोक अदालत ने ऐसी शक्ति का प्रयोग किया है जो उसे प्रदत्त नहीं है।  
  • उपरोक्त को ध्यान में रखते हुएन्यायालय ने स्थायी लोक अदालत द्वारा पारित पंचाट को रद्द कर दिया और प्रत्यर्थी को याचिकाकर्त्ता-विभाग के समक्ष अभ्यावेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दीजिसे मामले की सुनवाई करने और सहानुभूतिपूर्वक और शीघ्रता सेअधिमानतः दो महीने के भीतर निर्णय लेने का निदेश दिया गया। 

स्थायी लोक अदालतें क्या हैं? 

लोक अदालतों के बारे में: 

परिचय 

  • लोक अदालत शब्द का अर्थ जनता की अदालत (People’s Court) है। 
  • यह गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित है। 
  • उच्चतम न्यायालय के अनुसारयह प्राचीन भारत में प्रचलित विवाद-निपटान प्रणाली का एक पुरातन रूप है। 
  • यह वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) प्रणाली के घटकों में से एक है। 
  • यह आम जनता को अनौपचारिकसस्ता एवं त्वरित न्याय प्रदान करती है। 

प्रथम लोक अदालत 

  • पहली लोक अदालत शिविर का आयोजन 1982 में गुजरात में एक स्वैच्छिक एवं सुलहकारी संस्था के रूप में किया गया थाजिसे उस समय कोई वैधानिक आधार प्राप्त नहीं था। 

सांविधिक मान्यता 

  • इसे विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत सांविधिक दर्जा प्रदान किया गया। 
  • उक्त अधिनियम लोक अदालतों के गठन एवं कार्यप्रणाली से संबंधित प्रावधान करता है। 

संगठन 

  • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) अन्य विधिक सेवा संस्थाओं के साथ मिलकर लोक अदालतों के आयोजन एवं संचालन से संबंधित कार्य करता है। 
  • NALSA का गठन विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत किया गया थाजो 9 नवंबर 1995 को प्रभावी हुआ। 

संरचना 

  • सामान्यतः लोक अदालत में अध्यक्ष के रूप में एक न्यायिक अधिकारी तथा सदस्य के रूप में एक अधिवक्ता और एक सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं। 

अधिकारिता 

  • लोक अदालत को निम्नलिखित मामलों के संबंध में विवाद के पक्षकारों के मध्य समझौता या निपटारा निर्धारित करने तथा कराने की अधिकारिता होगी: 
  • किसी न्यायालय के समक्ष लंबित कोई वाद। 
  • ऐसा कोई विषयजो किसी न्यायालय की अधिकारिता के अंतर्गत आता होकिंतु उस न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत न किया गया हो। 
  • न्यायालय के समक्ष लंबित किसी मामले को लोक अदालत में निपटारे के लिये संदर्भित किया जा सकता हैयदि पक्षकार लोक अदालत में विवाद का निपटारा करने के लिये सहमत हों। 

कार्यवाही 

  • लोक अदालत के समक्ष की जाने वाली सभी कार्यवाहियों को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही माना जाएगा तथा प्रत्येक लोक अदालत को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के प्रयोजनार्थ सिविल न्यायालय माना जाएगा। 

पंचाट  

  • लोक अदालत द्वारा दिया गया अधिनिर्णय पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है तथा उसे सिविल न्यायालय की डिक्री का दर्जा प्राप्त होता है। यह अपील योग्य नहीं होताजिसके परिणामस्वरूप विवादों के अंतिम निपटारे में अनावश्यक विलंब नहीं होता। 

लाभ 

  • कोई न्यायालय शुल्क देय नहीं होता और यदि न्यायालय शुल्क का पहले ही भुगतान किया जा चुका हैतो लोक अदालत में विवाद का निपटारा होने पर उक्त राशि वापस कर दी जाती है। 
  • कार्यवाही में प्रक्रियात्मक लचीलापन होता है तथा विवादों का शीघ्र निपटारा किया जाता है। 

स्थायी लोक अदालतें: 

बारे में: 

विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 में 2002 में संशोधन कियागया जिससे परिवहनडाकतार आदि जैसी लोक उपयोगिता सेवाओं से संबंधित मामलों से निपटने के लिये स्थायी लोक अदालतों की स्थापना का प्रावधान किया जा सके। 

आवश्यक सुविधाएँ 

  • इन्हें विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 22-के अधीन स्थायी निकायों के रूप में स्थापित किया गया है । 
  • इसमें एकअध्यक्षहोगा जो जिला न्यायाधीश या अपर जिला न्यायाधीश हो या रह चुका हो या जिला न्यायाधीश से उच्चतर पद पर रहा होऔरदोअन्य व्यक्ति होंगेजिन्हें लोक उपयोगिता सेवाओं में पर्याप्त अनुभव हो। 
  • किसी ऐसे अपराध से संबंधित विषय के संबंध मेंजो किसी विधि के अधीन शमनीय नहीं हैउसे कोई अधिकारिता प्राप्त नहीं स्थायी लोक अदालतों की अधिकारिता ₹1 करोड़ तक है 
  • स्थायी लोक अदालत का निर्णयअंतिम औरपक्षकारों पर बाध्यकारी होगा। 
  • किसी विवाद को न्यायालय में लाने से पहलेविवाद के किसी भी पक्षकार द्वारा विवाद के निपटारे के लिये स्थायी लोक अदालत में आवेदन किया जा सकता है। स्थायी लोक अदालत में आवेदन करने के बाद, उस आवेदन के किसी भी पक्षकार को उसी विवाद में किसी अन्य न्यायालय की अधिकारिता का सहारा लेने का अधिकार नहीं होगा ।