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आपराधिक कानून
विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम के अधीन कुर्की की पुष्टि करने वाले आदेश पर राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम के अधीन अपील की जा सकती है
18-Sep-2026
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अकील अहमद बनाम राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (मुख्य अन्वेषण अधिकारी के माध्यम से) "विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम की धारा 25(6) के अधीन न्यायालय द्वारा पारित आदेश अंतिम है और प्रकृति में 'अंतरिम' नहीं है।" न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुडेजा |
दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा की खंडपीठ ने अकील अहमद बनाम राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण मुख्य अन्वेषण अधिकारी के माध्यम से (2026) के मामले में यह माना कि विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 (UAPA) की धारा 25(6) के अधीन पारित आदेश, जिसमें "आतंकवाद की आय" के रूप में संपत्ति की जब्ती या कुर्की की पुष्टि की गई है, अंतिम प्रकृति का है और इसे राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम, 2008 (NIA Act) की धारा 21 के अधीन उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
अकील अहमद बनाम राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- केंद्रीय गृह मंत्रालय के नामित प्राधिकारी ने विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम की धारा 25(3) के अधीन पुणे में स्थित एक संपत्ति की चौथी और पाँचवीं मंजिल की कुर्की की पुष्टि करते हुए एक आदेश पारित किया था।
- अपीलकर्त्ता अकील अहमद ने इस आदेश को विशेष न्यायाधीश के समक्ष चुनौती दी, जिन्होंने उनकी अपील खारिज कर दी और कुर्की को बरकरार रखा।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक और अपील दायर की।
- राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण ने अपील की स्वीकार्यता पर प्रारंभिक आपत्ति उठाते हुए तर्क दिया कि विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम का अध्याय 5 आतंकवाद से प्राप्त आय की जब्ती, कुर्की और ज़ब्ती को नियंत्रित करने वाली एक संपूर्ण संहिता है।
- राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण ने तर्क दिया कि विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम की धारा 25(6) पहले से ही नामित प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध विशेष न्यायालय में अपील का प्रावधान करती है, जबकि धारा 28 अलग से धारा 26 के अधीन अंतिम ज़ब्ती आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील का प्रावधान करती है, और राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम की धारा 21 के अधीन आगे अपील की अनुमति देने से उसी कुर्की आदेश के विरुद्ध एक अनुचित द्वितीय अपील उत्पन्न होगी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम की धारा 25(6) के अधीन आदेश की प्रकृति पर: न्यायालय ने माना कि विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम की धारा 25(6) के अधीन पारित आदेश, आतंकवाद की आय के रूप में संपत्ति की जब्ती या कुर्की की पुष्टि करता है, अंतिम है और अंतरिम प्रकृति का नहीं है, भले ही अंततः इसके परिणामस्वरूप धारा 26 के अधीन संपत्ति की जब्ती हो सकती है।
- राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम की धारा 21 के अधीन सांविधिक अपील के अधिकार पर: न्यायालय ने माना कि राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम की धारा 21 किसी विशेष न्यायालय के किसी भी निर्णय, दंडादेश या आदेश के विरुद्ध असीमित सांविधिक अपील का अधिकार प्रदान करती है, एकमात्र अपवाद यह है कि आदेश अंतरिम नहीं होना चाहिये। चूँकि कुर्की आदेश अंतिम था, इसलिये यह अपील के इस अधिकार के दायरे में पूरी तरह आता है।
- कुर्की और ज़ब्ती के अलग-अलग चरण होने के संबंध में: न्यायालय ने माना कि संपत्ति की साधारण कुर्की से विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम की धारा 26 के अधीन स्वतः ही उसकी ज़ब्ती नहीं हो जाती। ज़ब्ती का आदेश पारित करने से पहले धारा 27 के अधीन एक अलग कारण बताओ नोटिस, प्रतिनिधित्व और सुनवाई का अवसर, आवश्यक है।
- दो अपीलों के अलग-अलग चरणों से संबंधित होने पर: न्यायालय ने माना कि कुर्की आदेश के विरुद्ध अपील और बाद के ज़ब्ती आदेश के विरुद्ध अपील कार्यवाही के अलग-अलग चरणों से संबंधित हैं, जिनमें से प्रत्येक अपने-अपने चरण में अंतिम है, और इसलिये ये एक ही आदेश के विरुद्ध क्रमिक अपील नहीं मानी जाती हैं।
- राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण की आपत्ति खारिज होने पर: न्यायालय ने आगे कहा कि यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं है कि उच्च न्यायालय, कुर्की के विरुद्ध बाद की अपील की सुनवाई करते समय, कुर्की के विरुद्ध अपील में पारित अपने पूर्व आदेश का संज्ञान नहीं लेगा। इसी आधार पर न्यायालय ने राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण की प्रारंभिक आपत्ति को खारिज कर दिया और अपील को पोषणीय माना।
राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम, 2008 की धारा 21 क्या है?
पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य:
- राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम की धारा 21 अधिनियम के अंतर्गत गठित विशेष न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के विरुद्ध अपील करने का तंत्र प्रदान करती है। यह सुनिश्चित करती है कि विशेष न्यायालय के निर्णयों से पीड़ित पक्षकारों को उच्च न्यायालय के समक्ष सांविधिक उपचार उपलब्ध हो, साथ ही विचारण की कार्यवाही के दौरान पारित विशुद्ध रूप से प्रक्रियात्मक या अंतरिम आदेशों की अंतिम वैधता को भी बरकरार रखा जाए।
मुख्य उपबंध:
- अपील का अधिकार (उपधारा 1): विशेष न्यायालय के किसी भी निर्णय, दंडादेश या आदेश, जो अंतरिम आदेश न हो, के विरुद्ध तथ्यों और विधि दोनों के आधार पर उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।
- परिसीमा (उपधारा 2): ऐसी प्रत्येक अपील निर्णय, दंडादेश या आदेश की तिथि से तीस दिनों के भीतर दायर की जानी चाहिये, तथापि उच्च न्यायालय इस अवधि के बाद भी अपील पर विचार कर सकता है यदि विलंब के लिये पर्याप्त कारण बताया जाए।
- पीठ की संरचना (उपधारा 3): प्रत्येक अपील की सुनवाई उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा की जानी आवश्यक है।
- शीघ्र निपटान के लिये प्रयास (उपधारा 4): उच्च न्यायालय को अपील को स्वीकार किये जाने की तिथि से तीन महीने की अवधि के भीतर निपटाने का प्रयास करना आवश्यक है।
- विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम की धारा 26 के साथ दायरा: जबकि धारा 21 अंतरिम आदेशों को अपील से बाहर रखती है, एक आदेश जो अंततः किसी अधिकार या दायित्व का निर्धारण करता है - जैसे कि विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम की धारा 25(6) के अधीन आतंकवाद की आय की कुर्की की पुष्टि - इस अपवाद से बाहर आता है और अपील योग्य बना रहता है, भले ही उसी कार्यवाही में बाद में एक और, अलग चरण (धारा 26 के अधीन ज़ब्ती) हो।
सांविधानिक विधि
समान वेतन सिद्धांत को यंत्रवत रूप से लागू नहीं किया जा सकता
18-Sep-2026
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जी.पी. संगीता और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य "समान काम के लिये समान वेतन के सिद्धांत का यांत्रिक अनुप्रयोग से बचना चाहिये।" न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू |
उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने जी.पी. संगीता और अन्य बनाम केरल राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह अभिनिर्धारित किया कि समान काम के लिये समान वेतन के सिद्धांत को केवल कर्त्तव्यों की कार्यात्मक समता के आधार पर यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता है, और प्रत्यक्ष रूप से भर्ती और पदोन्नत उच्च माध्यमिक विद्यालय शिक्षकों, जूनियर (HSST, Jr) के बीच उनके अनुभव में अंतर के आधार पर वेतन अंतर को बरकरार रखा।
जी.पी. संगीता बनाम केरल राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता केरल के सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में 1998 के सरकारी आदेश के अधीन सीधी भर्ती के माध्यम से नियुक्त HSST, जूनियर शिक्षक थे।
- उन्होंने स्थानांतरण या पदोन्नति के माध्यम से नियुक्त किये गए HSST, जूनियर शिक्षकों के साथ समानता का दावा किया और बाद वाली श्रेणी को दिये जाने वाले समान पूर्णकालिक वेतनमान की मांग की, इस आधार पर कि दोनों समूह एक ही कैडर के भीतर समान कर्त्तव्यों का पालन करते हैं।
- केरल उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णयों पर विश्वास करते हुए यह माना कि अपीलकर्त्ताओं के साथ गंभीर विभेद हुआ था और वे समानता के हकदार थे।
- अपील पर, खंडपीठ ने इस निर्णय को पलट दिया और कहा कि पदोन्नत शिक्षकों को सीधे भर्ती किये गए नए शिक्षकों के समान नहीं माना जा सकता, क्योंकि पदोन्नत लोगों के लिये पूरा वेतनमान केवल पदोन्नति से पहले उनके द्वारा प्राप्त स्थिति की रक्षा के लिये था।
- इससे व्यथित होकर, सीधे भर्ती किये गए शिक्षकों ने उच्चतम न्यायालय में अपील की, यह तर्क देते हुए कि एकल न्यायाधीश द्वारा लागू किये गए पूर्व निर्णय पिछली शताब्दी के थे और तब से समान वेतन सिद्धांत के प्रति न्यायिक दृष्टिकोण में काफी परिवर्तन आया है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- समान वेतन सिद्धांत के विकास पर: न्यायालय ने इस सिद्धांत के विकास क्रम का विश्लेषण करते हुए कहा कि पिछली शताब्दी में, रणधीर सिंह बनाम भारत संघ मामले से शुरू होकर, समान कार्य के लिये समान वेतन को अनुच्छेद 14 और 39(घ) के अंतर्गत एक व्यापक शोषण-विरोधी सिद्धांत के रूप में माना जाता था, जहाँ पदनाम की समानता ही समानता का दावा करने के लिये पर्याप्त थी। न्यायालय ने पाया कि तब से इस स्थिति में परिवर्तन आया है: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम एम.आर. गणेश बाबू से लेकर बिहार राज्य बनाम बिहार माध्यमिक शिक्षक संघर्ष समिति तक , यह सिद्धांत सेवा नियमों पर आधारित एक कठोर परीक्षण के रूप में विकसित हुआ है।
- समान वेतन का दावा करने के लिये आवश्यक कारक: न्यायालय ने माना कि केवल एक समान कार्य प्रदर्शित करने से समान वेतन का दावा नहीं किया जा सकता; दावेदार को भर्ती के स्रोत, शैक्षणिक योग्यता और अनुभव, सांविधानिक प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्ति के तरीके और उत्तरदायित्व और जवाबदेही की प्रकृति में पूर्ण समानता स्थापित करनी होगी। न्यायालय ने कहा कि केवल कार्य की कार्यात्मक समानता अब पर्याप्त नहीं है।
- कार्य में गुणात्मक अंतरों पर (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम श्री गणेश बाबू मामले पर आधारित): न्यायालय ने माना कि समान वेतन का निर्धारण केवल किये गए कार्य की मात्रा के आधार पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि विश्वसनीयता और उत्तरदायित्व में गुणात्मक अंतर हो सकते हैं। वेतनमान निर्धारित करते समय प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किया गया सद्भावपूर्ण, उचित और तर्कसंगत निर्णय विभेद नहीं कहलाता।
- शैक्षिक योग्यता को विभेद के वैध आधार के रूप में मानने पर (पश्चिम बंगाल सरकार बनाम तरुण कुमार रॉय मामले पर आधारित): न्यायालय ने माना कि कार्य की प्रकृति समान होने मात्र से यह सिद्धांत स्वतः लागू नहीं हो जाता, चाहे शैक्षिक योग्यता या भर्ती का स्रोत कुछ भी हो। उच्चतर शैक्षिक योग्यता धारकों को एक अलग वर्ग के रूप में माना जा सकता है, और समान कार्य करने वाले लेकिन भिन्न योग्यता रखने वाले कर्मचारियों के साथ अलग व्यवहार किया जा सकता है।
- यांत्रिक अनुप्रयोग न होने के सिद्धांत पर (हरियाणा राज्य बनाम चरणजीत सिंह और संबंधित पूर्व निर्णयों पर आधारित): न्यायालय ने माना कि समान वेतन समान मूल्य के समान कार्य के लिये होना चाहिये, और समान कार्य करने वाले व्यक्तियों के कार्य की गुणवत्ता भिन्न हो सकती है। जहाँ चयन समिति द्वारा वरिष्ठता का उचित ध्यान रखते हुए योग्यता के आधार पर व्यक्तियों का चयन किया जाता है, वहाँ उन्हें दिये गए उच्च वेतनमान को चुनौती नहीं दी जा सकती, और भिन्न शैक्षणिक योग्यताओं के आधार पर किया गया वर्गीकरण वेतनमानों में अंतर को उचित ठहराता है।
- बिहार राज्य बनाम बिहार माध्यमिक शिक्षक संघर्ष समिति मामले में विधिक स्थिति का सारांश इस प्रकार है : न्यायालय ने माना कि इस सिद्धांत का यांत्रिक अनुप्रयोग नहीं किया जाना चाहिये, तथापि इसका यह अर्थ नहीं है कि इसे कभी लागू नहीं किया जा सकता। इसे लागू करने के लिये अनेक कारकों पर विचार करना आवश्यक है; केवल तभी जब इन सभी कारकों में पूर्ण समानता हो, रिट न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है और समान मूल्य के समान कार्य के लिये समान वेतन का प्रावधान कर सकता है।
- अनुभव को एक विभेदकारी कारक के रूप में मान्य मानना: इस दृष्टिकोण को लागू करते हुए, न्यायालय ने माना कि स्थानांतरित/पदोन्नत HSST, जूनियर शिक्षकों और सीधे भर्ती किये गए HSST, जूनियर शिक्षकों के बीच अनुभव में अंतर एक वैध और बोधगम्य अंतर है, जिसका उद्देश्य प्राप्त करने की मांग से संबंध है, और यह पूर्व को उच्च वेतन देने को उचित ठहराता है।
- पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनिर्बन घोष मामले पर अपीलकर्त्ताओं के विश्वास के संबंध में : अपीलकर्त्ताओं ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के अनिर्बन घोष मामले में दिये गए निर्णय का हवाला देते हुए बिहार माध्यमिक शिक्षक संघर्ष समिति से इसे अलग करने का प्रयास किया और बताया कि इसके विरुद्ध दायर की गई एक SLP खारिज कर दी गई थी। न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि बिहार माध्यमिक शिक्षक संघर्ष समिति मामले में विचार किये गए उच्चतम न्यायालय के बाध्यकारी पूर्व निर्णयों को अनिर्बन घोष मामले में खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया था , जिससे यह निर्णय उस हद तक त्रुटिपूर्ण हो जाता है, और केवल SLP की बर्खास्तगी से अलग दृष्टिकोण का औचित्य सिद्ध नहीं होता है।
समान कार्य के लिये समान वेतन का सिद्धांत क्या है?
अर्थ:
- "समान काम के लिये समान वेतन" के सिद्धांत का अर्थ है कि समान प्रकृति और मूल्य का काम समान परिस्थितियों में करने वाले व्यक्तियों को मनमाने या बाहरी कारकों के आधार पर विभेद के बिना समान दर पर भुगतान किया जाना चाहिये।
सांविधानिक आधार:
- यह सिद्धांत एक स्वतंत्र मौलिक अधिकार नहीं है, अपितु संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) को अनुच्छेद 39(घ) के साथ पढ़ने से प्राप्त होता है, जो राज्य नीति का एक निदेशक तत्त्व है जो राज्य को पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिये समान काम के लिये समान वेतन सुनिश्चित करने का निदेश देता है।
- अनुच्छेद 14 पर आधारित होने के कारण, यह मनमानी वर्गीकरण के विरुद्ध गारंटी के एक पहलू के रूप में कार्य करता है - समान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिये, और असमान लोगों के साथ समान व्यवहार नहीं किया जा सकता है।
उत्पत्ति और प्रारंभिक दृष्टिकोण:
- इस सिद्धांत को पहली बार न्यायिक रूप से रणधीर सिंह बनाम भारत संघ (1982) में लागू करने योग्य माना गया, जहाँ उच्चतम न्यायालय ने माना कि समान काम के लिये समान वेतन, तथापि एक निदेशक तत्त्व है, अनुच्छेद 14 को अनुच्छेद 39 (घ) के साथ पढ़कर लागू किया जा सकता है।
- अपने प्रारंभिक चरण में, न्यायालयों ने इस सिद्धांत को शोषण-विरोधी सिद्धांत के रूप में व्यापक रूप से लागू किया - पदनामों की मात्र समानता (शिक्षक, क्लर्क, ड्राइवर, आदि) को अक्सर वेतन समानता का दावा करने के लिये पर्याप्त माना जाता था।
बाद में, अधिक कठोर दृष्टिकोण:
- स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम एम.आर. गणेश बाबू के मामले से शुरू होकर बिहार राज्य बनाम बिहार माध्यमिक शिक्षक संघर्ष समिति के मामले में समाप्त होने तक , न्यायालयों ने एक कठोर, तथ्य-आधारित परीक्षण की ओर रुख किया।
- इस दृष्टिकोण के अधीन, दावेदार को निम्नलिखित में पूर्ण समानता दिखानी होगी: (i) भर्ती का स्रोत और तरीका, (ii) शैक्षिक योग्यताएं, (iii) अनुभव, और (iv) कर्त्तव्यों, उत्तरदायित्व और जवाबदेही की प्रकृति।
- केवल कार्य की कार्यात्मक या पदनाम संबंधी समानता अब पर्याप्त नहीं है; विश्वसनीयता, उत्तरदायित्व और कार्य की मात्रा में गुणात्मक अंतर भी अलग-अलग वेतन को उचित ठहरा सकते हैं।
वर्तमान स्थिति:
- इस सिद्धांत का कोई यांत्रिक या स्वचालित अनुप्रयोग नहीं है। इसे केवल इसलिये लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि कर्मचारियों के दो समूहों का पदनाम समान है या वे सतही तौर पर समान कार्य करते हैं।
- अनुतोष केवल तभी दिया जा सकता है जब दावेदार और तुलना किये जाने वाले व्यक्ति के बीच सभी सुसंगत कारकों में पूर्ण समानता हो; अनुभव, नियुक्ति का तरीका या शैक्षणिक योग्यता जैसे वैध और बोधगम्य अंतर, जिनका वर्गीकरण के उद्देश्य से तर्कसंगत संबंध हो, समानता के दावे को खारिज कर देंगे।