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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

अनुच्छेद 311 के अधीन प्रतिबंध समान पदक्रम वाले प्राधिकारी द्वारा पद से हटाए जाने पर लागू नहीं होता

 25-Sep-2026

भारत संघ और अन्य बनाम रामधनी प्रसाद 

"अनुच्छेद 311(1) में निहित सांविधानिक निषेध केवल वहीं लागू होता है जहाँ बर्खास्तगी या निष्कासन का आदेश उस प्राधिकरण के अधीनस्थ/अधिकारी द्वारा पारित किया जाता है जिसके द्वारा कर्मचारी को नियुक्त किया गया था।" 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने भारत संघ और अन्य बनाम रामधनी प्रसाद (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन केवल तभी होता है जब किसी सिविल सेवक को उसके नियुक्तिकर्ता से अधीनस्थ अधिकारी द्वारा बर्खास्त या हटाया जाता है। जहाँ हटाने वाला अधिकारी नियुक्तिकर्ता के समान पद का हो और नियमों के अनुसार दण्ड अधरोपित के लिये सक्षम हो, वहाँ सांविधानिक प्रतिबंध लागू नहीं होता।  

भारत संघ और अन्य बनाम रामधनी प्रसाद (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी को मई 1979 में गोरखपुर स्थित रेलवे सुरक्षा विशेष बल (RPSF) के कमांडेंट से एक आमंत्रण पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें उन्हें रक्षक पद के लिये प्रारंभिक प्रशिक्षण हेतु उपस्थित होने का निदेश दिया गया था। पत्र में उनकी नियुक्ति को स्पष्ट रूप से प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने पर सशर्त बताया गया था।   
  • प्रशिक्षण के बाद, सहायक कमांडेंट ने दिसंबर 1979 में एक बटालियन आदेश जारी कर उन्हें और अन्य रंगरूटों को रक्षक नियुक्त किया और उन्हें उनकी बटालियनों में तैनात कर दिया। फरवरी 1980 में जारी एक बाद के बटालियन आदेश ने इस नियुक्ति की पुष्टि की।     
  • इसके बाद प्रत्यर्थी ने स्वीकृत अवकाश से 72 दिन अधिक समय तक सेवा में रहने का उल्लंघन किया। उन पर रेलवे सुरक्षा बल नियम, 1959 के नियम 44 के अधीन आरोप पत्र दायर किया गया और एकपक्षीय विभागीय जांच के बाद, सहायक अधिकारी ने उन्हें मार्च 1983 में सेवा से बर्खास्त कर दिया। उनकी विभागीय अपील 1984 में खारिज कर दी गई। 
  • इसके बाद उन्होंने एक सिविल वाद दायर किया, जिसमें दावा किया गया कि उन्हें कमांडेंट/मुख्य सुरक्षा अधिकारी द्वारा 1979 के कॉल लेटर के माध्यम से नियुक्त किया गया था, और अधीनस्थ अधिकारी एडजुटेंट द्वारा उनकी बर्खास्तगी अनुच्छेद 311(1) का उल्लंघन थी। 
  • विचारण न्यायालय ने वाद खारिज कर दिया। प्रथम अपील न्यायालय ने इस निर्णय को पलट दिया और निष्कासन को असांविधानिक करार दिया, और इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2023 में द्वितीय अपील में उस दृष्टिकोण की पुष्टि की। 
  • भारत सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

वास्तविक नियुक्ति आदेश की पहचान करने पर: 

  • न्यायालय ने नियुक्ति पत्र और बटालियन आदेश के बीच के अंतर को निर्णायक माना। न्यायालय ने कहा कि नियुक्ति पत्र में "यह स्पष्ट रूप से घोषित नहीं किया गया था कि प्रत्यर्थी को नियमित रक्षक के रूप में नियुक्त किया गया है" और इसके बजाय प्रस्तावित नियुक्ति को प्रशिक्षण पूरा करने पर सशर्त बनाया गया था।  
  • इसके विपरीत, बटालियन आदेश में विशेष रूप से यह दर्ज किया गया था कि प्रशिक्षण पूरा करने पर रंगरूटों को रक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। 
  • न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि बटालियन आदेश मात्र एक तैनाती आदेश था। न्यायालय ने कहा कि "एक आदेश नियुक्ति आदेश और तैनाती आदेश दोनों के रूप में वैध रूप से कार्य कर सकता है।" 
  • निष्कर्ष यह निकला कि प्रत्यर्थी को नियमित रक्षक के रूप में सहायक कमांडेंट द्वारा नियुक्त किया गया था, न कि कमांडेंट/मुख्य सुरक्षा अधिकारी द्वारा। 

नियुक्ति और बर्खास्तगी की सांविधिक योजना पर: 

  • रेलवे सुरक्षा बल अधिनियम, 1957 की धारा 6 और 9 के साथ-साथ रेलवे सुरक्षा बल नियम, 1959 के नियम 20 और 43 और अनुसूची 1 और 2 की जांच करने के बाद, न्यायालय ने माना कि मुख्य सुरक्षा अधिकारी को नियुक्तियों पर समग्र नियंत्रण प्राप्त है। 
  • यद्यपि, धारा 6 का परंतुक स्पष्ट रूप से अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को नियुक्ति शक्तियां प्रयोग करने की अनुमति देता है। नियमों में सहायक सुरक्षा अधिकारी को रक्षकों और वरिष्ठ रक्षकों की नियुक्ति और बर्खास्तगी दोनों का अधिकार भी स्पष्ट रूप से दिया गया है। 

भारत संघ बनाम चंद्र पाल पांडे मामले पर निर्भरता: 

  • न्यायालय ने इस निर्णय पर विश्वास किया, जिसमें यह माना गया कि धारा 6 में "shall rest" वाक्यांश केवल समग्र नियंत्रण को दर्शाता है। यह नियुक्ति की शक्ति को विशेष रूप से मुख्य सुरक्षा अधिकारी में निहित नहीं करता है। 

कृष्णा कुमार बनाम डिविजनल असिस्टेंट इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के मामले पर निर्भरता: 

  • इस सिद्धांत को लागू करते हुए कि नियुक्ति शक्ति का प्रत्यायोजन करने से प्रत्यायोजित व्यक्ति के पदानुक्रमिक पद में परिवर्तन नहीं होता है, न्यायालय ने माना कि सहायक कमांडेंट, जिसने प्रत्यर्थी को नियुक्त किया था, पद में एडजुटेंट के अधीन नहीं था। 
  • अनुसूची II के अधीन एडजुटेंट को निष्कासन की दण्ड देने का भी अधिकार था। अतः अनुच्छेद 311(1) का आवश्यक तत्त्व अनुपस्थित था, और सांविधानिक प्रतिबंध कभी लागू नहीं हुआ। 

प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आधार पर: 

  • न्यायालय ने इस दावे को खारिज कर दिया कि एकपक्षीय जांच त्रुटिपूर्ण थी। प्रत्यर्थी ने आरोप पत्र स्वीकार कर लिया था, उसका जवाब दे दिया था और उसे जांच की तारीख की सूचना भी दे दी गई थी, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुआ। निष्कासन आदेश पारित होने से पहले कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया था। 
  • न्यायालय ने कहा कि "विभागीय जांच को केवल इस आधार पर दूषित नहीं माना जा सकता कि यह एकपक्षीय रूप से आगे बढ़ी।" 

निष्कर्ष: 

  • न्यायालय ने माना कि प्रथम अपील न्यायालय और उच्च न्यायालय ने 1979 के आमंत्रण पत्र को नियुक्ति आदेश मानकर गलती की थी। न्यायालय ने दोनों निर्णयों को अपास्त कर दिया, वाद को खारिज करने वाले विचारण न्यायालय के निर्णय को बहाल किया और प्रत्यर्थी को सेवा से हटाने के आदेश को बरकरार रखा। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 311 क्या है? 

बारे में: 

  • भारत के संविधान, 1950 का अनुच्छेद 311 संघ या राज्य के अधीन नागरिक पदों पर कार्यरत व्यक्तियों की बर्खास्तगी, निष्कासन या पद में कमी से संबंधित है। 
  • यह संविधान के भाग 14 (संघ और राज्यों के अधीन सेवाएं) के अंतर्गत आता है। 
  • यह सिविल सेवकों को मनमानी बर्खास्तगी, पद से हटाने या पदोन्नति में कमी के विरुद्ध सांविधानिक सुरक्षा प्रदान करता है, और अनुच्छेद 310 के अधीन प्रसादपर्यंत के सिद्धांत' पर एक सीमा के रूप में कार्य करता है। 

उपबंध: 

अनुच्छेद 311 में कहा गया है: 

खंड (1): 

  • "किसी व्यक्ति को जो संघ की सिविल सेवा का या अखिल भारतीय सेवा का या राज्य की सिविल सेवा का सदस्य है अथवा संघ या राज्य के अधीन कोई सिविल पद धारण करता है, उसकी नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी के अधीनस्थ किसी प्राधिकारी द्वारा पदच्युत नहीं किया जाएँगा या पद से नहीं हटाया जाएगा।" 

खंड (2): 

  • "यथापूर्वोक्त किसी व्यक्ति को, ऐसी जांच के पश्चात् ही, जिसमें उसे अपने विरुद्ध आरोपों की सूचना दे दी गई है गई है और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया है, पदच्युत किया जाएगा या पद से हटाया जाएगा या पंक्ति में अवनत किया जाएगा, अन्यथा नहीं।" 
  • परंतु जहाँ ऐसी जांच के पश्चात् उस पर ऐसी कोई शास्ति अधिरोपित करने की प्रस्थापना है वहाँ ऐसी शास्ति ऐसी जांच के दौरान दिये गए साक्ष्य के आधार पर अधिरोपित की जा सकेगी और ऐसे व्यक्ति को प्रस्थापित शास्ति के विषय में अभ्यावेदन करने का अवसर देना आवश्यक नहीं होगा। 

परंतु यह और कि यह खंड वहाँ लागू नहीं होगा—  

(क) जहाँ किसी व्यक्ति को ऐसे आचरण के आधार पर पदच्युत किया जाता है या पद से हटाया जाता है या पंक्ति में अवनत किया जाता है जिसके लिये आपराधिक आरोप पर उसे सिद्धदोष ठहराया गया है; या 

(ख) जहाँ किसी व्यक्ति को पदच्युत करने या पद से हटाने या पंक्ति में अवनत करने के लिये सशक्त प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि किसी कारण से, जो उस प्राधिकारी द्वारा लेखबद्ध किया जाएगा, यह युक्तियुक्त रूप से साध्य नहीं है कि ऐसी जांच की जाए; या 

(ग) जहाँ, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल का यह समाधान हो जाता है कि राज्य की सुरक्षा के हित में यह समीचीन नहीं है कि ऐसी जांच की जाए।" 

खंड (3): 

  • "यदि, यथापूर्वोक्त किसी व्यक्ति के संबंध में यह प्रश्न उठता है कि खंड (2) में निर्दिष्ट जांच करना युक्तियुक्त रूप से साध्य है या नहीं तो उस व्यक्ति को पदच्युत करने या पद से हटानें या पैंक्ति में अवनत करने के लिये सशक्त प्राधिकारी का उस पैर विनिश्चय अंतिम होगा।" 

अनुच्छेद 311 के अंतर्गत आने वाले व्यक्ति: 

यह संरक्षण निम्नलिखित पर लागू होता है: 

  • संघ की सिविल सेवा के सदस्य; 
  • अखिल भारतीय सेवा के सदस्य; 
  • किसी राज्य की सिविल सेवा के सदस्य; और 
  • संघ या राज्य के अधीन सिविल पद धारण करने वाले व्यक्ति। 

अनुच्छेद 311 के अंतर्गत सुरक्षा उपाय: 

अधीनस्थ प्राधिकारी द्वारा निष्कासन से सुरक्षा (खंड 1): 

  • किसी सरकारी कर्मचारी को उसके नियुक्तिकर्ता से अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा बर्खास्त या पद से हटाया नहीं जा सकता। 
  • यह सुरक्षा उपाय केवल बर्खास्तगी और पद से हटाने पर लागू होता है। यह पद में कमी पर लागू नहीं होता। 

जांच का अधिकार (धारा 2): 

  • किसी भी सरकारी कर्मचारी को बिना जांच के बर्खास्त, पद से हटाया या पदावनत नहीं किया जा सकता। 
  • उस जांच में, उसे अपने विरुद्ध लगे आरोपों की जानकारी दी जानी चाहिये और उन आरोपों पर अपनी बात रखने का उचित अवसर दिया जाना चाहिये। 

दंड के संबंध में पृथक सुनवाई नहीं (खंड 2 का प्रथम परंतुक): 

  • जांच पूरी हो जाने के बाद, जांच के दौरान प्रस्तुत किये गए साक्ष्य के आधार पर दंड अधिरोपित किया जा सकता है। 
  • कर्मचारी को प्रस्तावित दंड के संबंध में अभ्यावेदन करने का कोई अतिरिक्त अवसर दिया जाना आवश्यक नहीं है। 

जांच की आवश्यकता के अपवाद (धारा 2 का दूसरा परंतुक): 

खंड (2) के अंतर्गत जांच निम्नलिखित तीन स्थितियों में आवश्यक नहीं है: 

  • आपराधिक आरोप में दोषसिद्धि: जहाँ दंड उस आचरण के आधार पर अधिरोपित किया जाता है, जिसके कारण संबंधित व्यक्ति को किसी आपराधिक आरोप में दोषसिद्ध किया गया है। 
  • जांच कराना युक्तियुक्त रूप से साध्य न होना: जहाँ अनुशासनिक प्राधिकारी इस बात से संतुष्ट है कि जांच कराना युक्तियुक्त रूप से साध्य नहीं है तथा इसके कारणों को लिखित रूप में अभिलिखित करता है। 
  • राज्य की सुरक्षा: जहाँ राष्ट्रपति या राज्यपाल इस बात से संतुष्ट हैं कि जांच कराना राज्य की सुरक्षा के हित में समीचीन नहीं है। 

निर्णय की अंतिमता (खंड 3): 

  • जहाँ यह प्रश्न उठता है कि जांच कराना युक्तियुक्त रूप से साध्य है अथवा नहीं, वहाँ उस प्राधिकारी का निर्णय अंतिम होगा, जिसे संबंधित व्यक्ति को पदच्युत, सेवा से हटाने या पदावनत करने की शक्ति प्राप्त है। 

आपराधिक कानून

अभिरक्षा संबंधी विवादों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण के दुरुपयोग के विरुद्ध संरक्षणात्मक उपाय

 25-Sep-2026

आर' बनाम 'ई' और अन्य 

"लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन मामला दर्ज होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिये कि आरोप सत्य है।" 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन 

उच्चतम न्यायालय  

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 'आर' बनाम 'ई' और अन्य (2026) के मामले में वैवाहिक और बाल अभिरक्षा विवादों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के दुरुपयोग को रोकने के लिये सुरक्षा उपाय निर्धारित किये। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच में आरोपों को अविश्वसनीय पाए जाने के बाद न्यायालय ने अवयस्क लड़की के साथ उसके पिता द्वारा लैंगिक हमले के आरोप वाली FIR को भी रद्द कर दिया। 

'आर' बनाम 'ई' और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • जिन पक्षकारों को 'आर' (पिता) और 'ई' (माता) के रूप में संदर्भित किया गया है, उनका विवाह 2011 में हुआ था। उनकी पुत्री 'एम' का जन्म 2015 में हुआ था। 
  • शादी टूटने के बाद, माता 2018 में बच्चे के साथ वैवाहिक घर छोड़कर चली गई। इसके कारण लंबे समय तक विधिक कार्यवाही चली, जिसमें अभिभावकत्व याचिका, माता के विरुद्ध FIR, तलाक की कार्यवाही और अभिरक्षा का विवाद शामिल है। 
  • मार्च 2022 में, कुटुंब न्यायालय ने माता को बच्चे की अभिरक्षा पिता को सौंपने का निदेश दिया। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने जनवरी 2023 में माता के लिये मुलाक़ात के अधिकारों के अधीन इस निदेश को बरकरार रखा, और उच्चतम न्यायालय ने मार्च 2023 में माता की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी। जून 2023 में बच्चे की अभिरक्षा पिता को सौंप दी गई। 
  • बाद में पिता ने मुलाक़ात के अधिकारों (visitation rights) में संशोधन करने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। 
  • इसी बीच, माता ने पिता के विरुद्ध FIR दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि उसने दो मौकों पर बच्ची के साथ लैंगिक हमला किया और बच्ची द्वारा इसका प्रकटन करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी। 
  • FIR में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10, किशोर न्याय (देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 75 और भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 323, 504 और 506 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115(2), 352 और 351) का आह्वान किया गया है। 
  • अप्रैल 2026 में, उच्चतम न्यायालय ने अन्वेषण CBI को सौंप दी, जिसे उप महानिरीक्षक से कम रैंक के अधिकारी की अध्यक्षता वाली एक समिति और एक महिला मनोवैज्ञानिक द्वारा संचालित किया जाना था। न्यायालय ने निदेश दिया कि अन्वेषण के दौरान किसी भी पक्षकार के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए। 
  • CBI समिति में दो पुलिस अधीक्षक और NIMHANS के दो विशेषज्ञ शामिल थे, जिनमें से एक बाल और किशोर मनोचिकित्सा में और दूसरा नैदानिक ​​मनोविज्ञान में था। 
  • समिति ने बच्चे के कक्षा शिक्षक, ट्यूशन शिक्षक, स्कूल काउंसलर, घरेलू नौकरानी और पड़ोसियों सहित साक्षियों से पूछताछ की और पिता के घर से CCTV फुटेज का विश्लेषण किया। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि आरोप सिद्ध नहीं हुए और मामला अभियोजन के योग्य नहीं है। 
  • मनोचिकित्सीय मूल्यांकन में आरोपों के अनुरूप चिंता या आघात के कोई लक्षण नहीं पाए गए। इसमें यह भी पाया गया कि माता-पिता के बीच लंबे समय से चल रहे झगड़े, चल रहे वाद में, आरोपों पर बार-बार चर्चा और पारिवारिक कहानियों के संपर्क में आने से बालक के कथन पर प्रभाव पड़ सकता है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

वैवाहिक विवादों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के बढ़ते दुरुपयोग पर: 

  • गेड्डम झांसी बनाम तेलंगाना राज्य, अचिन गुप्ता बनाम हरियाणा राज्य , ईश्वर चंद शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और सुहारा बनाम मुहम्मद जलील मामले में केरल उच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए, न्यायालय ने पति-पत्नी द्वारा अभिरक्षा विवादों में लाभ प्राप्त करने या बेहतर समझौते हासिल करने के लिये मिथ्या लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण परिवाद दर्ज करने की चिंताजनक प्रवृत्ति पर ध्यान दिया। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 22 की अपर्याप्तता पर: 

  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि यद्यपि धारा 22 मिथ्या परिवादों को दण्डित करती है, "धारा 22 लागू होने तक मिथ्या आरोप के शिकार पक्ष को काफी नुकसान हो चुका होगा।" इस प्रकार का नुकसान लंबे कारावास या लंबित अभिरक्षा या संरक्षकता कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव के रूप में हो सकता है। 
  • इसमें कहा गया है कि "विधि के दायरे में रहते हुए, अभियुक्त को इस प्रकार की हानि से बचाने के लिये कुछ सावधानियां बरतनी चाहिये।" 

संतुलन स्थापित करने पर: 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी सावधानी अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत नहीं होनी चाहिये या ऐसे अपराधों के प्रति गंभीरता को कम नहीं करनी चाहिये। न्यायालय ने इस प्रक्रिया को अधिनियम की कठोरता को बनाए रखने और अभियुक्त को अपूरणीय क्षति से बचाने के बीच संतुलन के रूप में वर्णित किया। 

सुरक्षा उपायों को लागू करने की सीमा शर्तों पर: 

ये सुरक्षा उपाय तभी लागू होते हैं जब निम्नलिखित दोनों शर्तें पूरी होती हैं:  

  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अपराध कथित तौर पर बच्चे के साथ एक ही छत के नीचे रहने वाले माता-पिता या परिवार के सदस्य द्वारा किया गया है; और 
  • बच्चे के माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद मौजूद है, जो संभवतः तनावपूर्ण संबंधों का संकेत देता है। 

परिवाद प्राप्त करने वाले पुलिस अधिकारी का यह कर्त्तव्य है कि वह सत्यापित करे कि क्या वास्तव में ऐसा कोई वैवाहिक विवाद विद्यमान है। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण मामलों में गिरफ्तारी पर: 

  • जहाँ निर्धारित शर्तें पूरी होती हैं, वहाँ अन्वेषण अधिकारियों को जल्दबाजी में कार्रवाई नहीं करनी चाहिये या FIR दर्ज होने के तुरंत बाद अभियुक्त को गिरफ्तार नहीं करना चाहिये। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35 का हवाला देते हुए, न्यायालय ने कहा कि गिरफ्तारी की शक्ति एक सांविधिक विवेकाधिकार है और FIR दर्ज करने का स्वतःस्फूर्त परिणाम नहीं है। 
  • गिरफ्तारी की शक्ति का अस्तित्व और उस शक्ति के प्रयोग का औचित्य अलग-अलग बातें हैं, और गिरफ्तारी केवल इसलिये नहीं की जा सकती क्योंकि यह विधिक रूप से अनुमेय है। 

अन्वेषण में विशेषज्ञों की भागीदारी के संबंध में: 

अन्वेषण अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस यूनिट (SJPU) को गिरफ्तारी के उद्देश्य से यह तय करने से पहले कि क्या अभियुक्त ने अपराध किया है, बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा या नैदानिक ​​मनोविज्ञान के विशेषज्ञ की नियुक्ति अनिवार्य है। केवल असाधारण मामलों में ही लिखित रूप में कारण अभिलिखित करके इस आवश्यकता से छूट दी जा सकती है। 

न्यायालय ने विशेषज्ञ रिपोर्ट पर दो सीमाएँ लगाईं:  

  • अन्वेषण अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस यूनिट विशेषज्ञ के निष्कर्षों से बाध्य नहीं है, क्योंकि रिपोर्ट केवल विवेकाधिकार के प्रयोग में सहायता करती है; और 
  • यह रिपोर्ट आरोप पत्र या समापन रिपोर्ट दाखिल करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती। 

विशेष न्यायालय के समक्ष निजी परिवादों पर: 

  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 33 के अधीन सीधे विशेष न्यायालय के समक्ष दायर किये गये परिवादों के लिये भी वही प्रारंभिक शर्तें लागू होती हैं। 
  • विशेष न्यायालय को संज्ञान लेने और समन जारी करने का निर्णय लेने से पहले बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा या नैदानिक ​​मनोविज्ञान के विशेषज्ञ को शामिल करना होगा, सिवाय उन असाधारण मामलों के जिनमें कारण लिखित रूप में अभिलिखित किये गए हों। 

अभिरक्षा की कार्यवाही में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण प्रथम सूचना रिपोर्ट के प्रभाव पर: 

  • न्यायालय ने कहा कि "लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन मामला दर्ज होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आरोप सत्य है।" अभिरक्षा या अभिभावकत्व से संबंधित मामलों से निपटने वाले न्यायालयों को आरोपों की निराधारता के संबंध में स्वतंत्र रूप से प्रथम दृष्ट्या निर्णय लेना होगा। 

सुरक्षा उपायों की प्रयोज्यता पर: 

  • ये सुरक्षा उपाय निर्णय की तारीख को लंबित FIR-आधारित अन्वेषण और धारा 33 के अधीन उन निजी परिवादोंयेपर लागू होते हैं जिनमें अभी तक समन जारी नहीं किए गए हैं। 

निदेश जारी किये गए: 

न्यायालय ने निम्नलिखित निदेश दिये: 

  • जिला बाल संरक्षण यूनिटों को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण नियम, 2020 के नियम 5 के अधीन अपने विशेषज्ञ रजिस्टरों को अद्यतन करना होगा जिससे उनमें बाल और किशोर मनोचिकित्सा या नैदानिक ​​मनोविज्ञान के विशेषज्ञों को शामिल किया जा सके। 
  • ऐसे मामलों में रिमांड और जमानत से संबंधित मामलों को निपटाने वाले न्यायालयों को यह परीक्षा करनी चाहिये  कि क्या अन्वेषण अधिकारी ने सुरक्षा उपायों का पालन किया है। 
  • निर्णय की एक प्रति सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को वितरण और अनुपालन के लिये भेजी जाए। 

मामले के तथ्यों पर: 

  • CBI की जांच के निष्कर्षों को स्वीकार करते हुए, न्यायालय ने पिता के विरुद्ध दर्ज FIR को रद्द कर दिया और कहा कि कार्यवाही जारी रखना प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा। न्यायालय ने कहा कि CBI द्वारा मामले को सुनवाई योग्य न पाए जाने के कारण, बालक की अभिरक्षा के लिये माता के दावे का मूल आधार ही धराशायी हो गया है। 
  • रोजी जैकब बनाम जैकब ए. चक्रमक्कल (1973) मामले में बालक के कल्याण के सिद्धांत को लागू करते हुए, न्यायालय ने निर्णय दिया कि विधिक अभिरक्षा और संरक्षकता पिता के पास होनी चाहिये। 
  • चूँकि मार्च 2023 से बच्चे की शारीरिक अभिरक्षा माता के पास ही थी, इसलिये  न्यायालय ने बालक को पिता के साथ पुनः मिलाने के लिये मामले को कुटुंब न्यायालय को वापस भेज दिया। इस प्रक्रिया का मार्गदर्शन विशेषज्ञों की एक समिति करेगी, जिसमें जांच में शामिल CBI के दो अधिकारी और NIMHANS के दो डॉक्टर शामिल होंगे। यह समिति अंतरिम अभिरक्षा व्यवस्था पर भी निर्णय लेगी। 
  • न्यायालय ने पिता द्वारा माता के विरुद्ध दर्ज कराई गई FIR को भी रद्द कर दिया और दोनों पक्षकारों तथा बालक को 28 सितंबर 2026 को कुटुंब न्यायालय में उपस्थित होने का निदेश दिया। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 क्या है? 

क्र. सं. 

पहलू 

जानकारी 

1. 

शीर्षक 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 

2.  

अधिनियम संख्या 

अधिनियम संख्या 32, 2012 

3. 

अधिनियमन की तारीख 

19 जून, 2012  

4.  

प्रवर्तन की तारीख 

14 नवंबर, 2012 

5. 

स्थानीय विस्तार 

संपूर्ण भारत पर लागू 

6.

उद्देश्य 

लैंगिक हमला, लैंगिक उत्पीड़न और अश्लील साहित्य के अपराधों से बालकों का संरक्षण करने और ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना तथा उनसे संबंधित या आनुषंगिक विषयों के लिये उपबंध करने के लिये अधिनियम करना। 

7. 

संरचना 

कुल धाराएँ: 46  
कुल अध्याय: 9 

8. 

महत्त्वपूर्ण संशोधन 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2019 

अधिनियमन की तारीख: 5 अगस्त, 2019  
प्रवर्तन की तारीख: 16 अगस्त, 2019