9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से






करेंट अफेयर्स और संग्रह

होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह

सिविल कानून

आवश्यक पक्षकार के बिना समझौता डिक्री अकृत है

 01-Oct-2026

गीता बाई एवं अन्य बनाम के. अर्जुन सिंह और अन्य

"दिवंगत श्रीमती बल्लो बाई या उनके विधिक वारिसों को पक्षकार बनाए बिना पारित समझौता डिक्री, जबकि वह वाद में एक आवश्यक पक्षकार थीं, विधि की दृष्टि में अकृत थी।"

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता

स्रोत: उच्चतम न्यायालय

चर्चा में क्यों?

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने गीता बाई एवं अन्य बनाम के. अर्जुन सिंह एवं अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि विभाजन के वाद में आवश्यक पक्षकार को पक्षकार बनाए बिना प्राप्त किया गया समझौता डिक्री अकृत है। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि छूटे हुए पक्षकार को डिक्री पारित करने वाले न्यायालय के समक्ष ऐसे डिक्री को वापस लेने की अपील करने का अधिकार है।

गीता बाई और अन्य बनाम के. अर्जुन सिंह और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?

  • संपत्ति के मालिक की निर्वसीयत मृत्यु हो गई, और वे अपने पीछे चार बच्चे छोड़ गए, जिनमें एक पुत्री, स्वर्गीय श्रीमती बल्लो बाई भी शामिल थीं।
  • अपीलकर्त्ताओं ने, मृतक पुत्री के विधिक उत्तराधिकारी होने के नाते, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अधीन अपने नाना की संपत्ति में 1/4 हिस्से का दावा किया। उन्होंने तर्क दिया कि संपत्ति उनके चार बच्चों के बीच समान रूप से विभाजित हुई थी।
  • सहदायिकी संपत्ति के बंटवारे के लिये एक वाद दायर किया गया और विचारण न्यायालय में मुकदमेबाजी के कई दौर चले।
  • तेलंगाना उच्च न्यायालय ने अंततः भाइयों/विधिक वारिसों (वादी के रूप में) और प्रतिवादियों के बीच हुए समझौते के आधार पर एक समझौता डिक्री पारित की।
  • यद्यपि, स्वर्गीय श्रीमती बल्लो बाई और उनके विधिक उत्तराधिकारी को वाद की किसी भी अवस्था में पक्षकार के रूप में शामिल नहीं किया गया था।
  • अपीलकर्त्ताओं ने समझौते डिक्री के विरुद्ध अपील याचिकाएं दायर कीं। उच्च न्यायालय ने उन्हें यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनके पास पृथक् वाद दायर करने या अनुमति लेने के बाद उच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प है।
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि वे वाद के आवश्यक पक्षकार थे और उच्च न्यायालय ने उनके अधिकारों की अनदेखी की थी।

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?

  • समझौता डिक्री का अकृत होना: न्यायालय ने माना कि मृतक की पुत्री या उसके विधिक उत्तराधिकारी को पक्षकार बनाए बिना, जबकि वह एक आवश्यक पक्षकार थी, वादी और प्रतिवादियों द्वारा प्राप्त समझौता डिक्री विधि की दृष्टि में अकृत थी।
  • अपीलकर्त्ताओं को मुकदमे से अजनबी न मानने के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि मृतक पुत्री और उसके विधिक उत्तराधिकारी को किसी भी प्रकार से वाद से अजनबी नहीं माना जा सकता। सहदायिकी संपत्ति में उनके अधिकार विभाजन की कार्यवाही के परिणाम से सीधे प्रभावित होते हैं।
  • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 23 नियम 3क की अप्रयोज्यता पर: न्यायालय ने माना कि आदेश 23 नियम 3क के अधीन लगाया गया प्रतिबंध, जो किसी समझौते डिक्री को विधिविरुद्ध बताते हुए उसे अपास्त करने के लिये नया वाद दायर करने को वर्जित करता है, विधि की अवहेलना करते हुए पारित किये गए समझौते डिक्री के विरुद्ध लागू नहीं होगा।
  • निर्णय वापस लेने के अधिकार पर: न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि कार्यवाही से अपवर्जित आवश्यक पक्षकार, अपने पीछे उसकी जानकारी के बिना पारित की गई समझौता डिक्री को चुनौती देने तथा उसे पारित करने वाले न्यायालय के समक्ष उक्त डिक्री को वापस लेने की मांग करने का हकदार था। सांविधिक वर्जिन का उपयोग उसे इस अधिकार से वंचित करने के लिये नहीं किया जा सकता था।
  • उच्च न्यायालय की त्रुटि पर: न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय द्वारा पुनः नियुक्ति आवेदनों को अस्वीकार करने और अपीलकर्त्ताओं को एक पृथक् वाद या अपील में भेजने का दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण था।
  • परिणाम: अपील मंजूर कर ली गई और मामले को उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया गया जिससे उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों के आलोक में पुनः नियुक्ति आवेदनों पर नए सिरे से विचार किया जा सके।

आवश्यक पक्षकार  क्या है?

अर्थ:

  • एक आवश्यक पक्षकार वह होता है जिसके बिना कोई भी आदेश प्रभावी ढंग से पारित नहीं किया जा सकता। वाद के उचित गठन के लिये उनकी उपस्थिति अत्यावश्यक है।
  • इसमें वे पक्षकार शामिल हैं जिनके अधिकार कार्यवाही से सीधे प्रभावित होते हैं और जिनकी उपस्थिति न्यायालय द्वारा प्रभावी निर्णय पारित करने के लिये आवश्यक है।

आवश्यक पक्षकार का निर्धारण करने के लिये दो परीक्षण:

  • संबंधित कार्यवाही में शामिल मामले के संबंध में ऐसे पक्षकार के विरुद्ध कुछ अनुतोष प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिये।
  • ऐसे पक्षकार की अनुपस्थिति में प्रभावी निर्णय पारित करना संभव नहीं होना चाहिये।
  • इन परीक्षणों की पुष्टि उच्चतम न्यायालय ने कस्तूरी बनाम अय्यमपेरुमल (2005) के मामले में की थी ।

सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत सांविधिक ढाँचा:

  • आदेश 1 नियम 9: पक्षकारों के कुसंयोजन या असंयोजन न होने मात्र से कोई वाद खारिज नहीं होगा। यद्यपि, परंतुक में स्पष्ट किया गया है कि यह नियम आवश्यक पक्षकार के कुसंयोजन न होने पर लागू नहीं होता है।
  • आदेश I नियम 10(2): न्यायालय कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में किसी भी व्यक्ति को जोड़ सकता है जिसे शामिल किया जाना चाहिये था, या जिसकी उपस्थिति वाद में शामिल सभी प्रश्नों का प्रभावी और पूर्ण रूप से निर्णय करने के लिये आवश्यक है।

आवश्यक पक्षकार बनाम उचित पक्षकार:

  • एक आवश्यक पक्षकार वह होता है जिसकी अनुपस्थिति में कोई भी प्रभावी निर्णय पारित नहीं किया जा सकता है।
  • उचित पक्षकार वह होता है जिसकी उपस्थिति अपरिहार्य नहीं होती है, लेकिन उसकी उपस्थिति से न्यायालय मामले का अधिक प्रभावी और पूर्ण ढंग से निर्णय कर पाता है।
  • इस अंतर को मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट (पी.) लिमिटेड बनाम रीजेंसी कन्वेंशन सेंटर एंड होटल्स (पी.) लिमिटेड (2010) में स्पष्ट किया गया था ।

आवश्यक पक्षकार के कुसंयोजन के परिणाम:

  • पीड़ित पक्षकार की बात सुने बिना पारित किया गया कोई भी आदेश शून्य है।
  • प्रभावित पक्षकार ऐसे आदेशों को बाध्यकारी न मानते हुए अनदेखा कर सकता है।
  • आवश्यक पक्षकार के अभाव में कार्यवाही पूरी तरह से विफल हो सकती है।

समझौता डिक्री क्या होता है?

अर्थ:

  • समझौता डिक्री वह डिक्री होती है जो किसी वाद के पक्षकारों के बीच हुए वैध करार या सुलह के आधार पर न्यायालय द्वारा पारित की जाती है। यह विवाद को पूर्ण या आंशिक रूप से सुलझाती है।
  • यह मूलतः पक्षकारों के बीच एक संविदा है जिस पर न्यायालय की मुद्रा लगी होती है।

सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत सांविधिक ढाँचा :

  • आदेश 23 नियम 3: जहाँ न्यायालय संतुष्ट है कि किसी वाद का निपटारा पूर्णतः या आंशिकतः वैध करार या लिखित रूप में तथा पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित समझौते द्वारा किया गया है, तो वह समझौते को दर्ज करेगा तथा तदनुसार डिक्री पारित करेगा।
  • आदेश 23 नियम 3क: किसी डिक्री को इस आधार पर अपास्त करने के लिये कोई वाद नहीं चलेगा कि जिस समझौते पर वह आधारित है वह वैध नहीं था।
  • धारा 96(3): पक्षकारों की सहमति से न्यायालय द्वारा पारित डिक्री के विरुद्ध कोई अपील नहीं होती।
  • आदेश 43 नियम 1क (2): समझौता दर्ज करने के बाद पारित डिक्री के विरुद्ध अपील में, एक पक्षकार यह तर्क दे सकता है कि समझौता दर्ज किया जाना चाहिये था या नहीं।

समझौता डिक्री के विरुद्ध उपचार:

  • समझौते की वैधता पर विवाद करने वाले पक्षकार को सामान्यतः उसी न्यायालय में जाना चाहिये जिसने समझौता अभिलिखित किया था। पुष्पा देवी भगत बनाम राजिंदर सिंह (2006) के मामले में जैसा कहा गया है, पृथक् वाद दायर करना उचित नहीं है।
  • समझौता अभिलिखित करने वाले न्यायालय को डिक्री पारित करने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि करार वैध है, जैसा कि बनवारी लाल बनाम चंदो देवी (1993) में बल दिया गया है ।
  • जैसा कि इस मामले में स्पष्ट किया गया है, एक आवश्यक पक्षकार जिसे कभी पक्षकार नहीं बनाया गया, वह विवाद से अपरिचित नहीं है। ऐसा पक्षकार उस न्यायालय के समक्ष समझौता डिक्री को वापस लेने की मांग कर सकता है जिसने इसे पारित किया था, क्योंकि डिक्री अकृत है और आदेश 23 नियम 3क के अधीन वर्जन इसे संरक्षण नहीं देता है।

सिविल कानून

व्हाट्सएप पर आपत्तिजनक तस्वीरें प्रसारित करना 'सार्वजनिक दृष्टिगोचरता' के अंतर्गत आता है

 01-Oct-2026

निखिल मधुकर थेपले बनाम महाराष्ट्र राज्य

"...पीड़ित के मोबाइल से व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया पर उसके आपत्तिजनक वीडियो/तस्वीरों का प्रसार, जो सार्वजनिक दृष्टिगोचरता (Public View) के अंतर्गत आता है।"

न्यायमूर्ति यांशिवराज खोबरागड़े

स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय (नागपुर पीठ)

चर्चा में क्यों?

न्यायमूर्ति यंशिवराज खोबरागड़े की अध्यक्षता वाली एकल न्यायाधीश पीठ ने निखिल मधुकर थेपले बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले में अभिनिर्धारित किया कि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति के आपत्तिजनक वीडियो या फोटो को व्हाट्सएप पर प्रसारित करना 'सार्वजनिक दृष्टिगोचरता' के अंतर्गत आने वाला कृत्य है और इस पर अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 लागू हो सकता है। न्यायालय ने अभियुक्त की अग्रिम जमानत की अपील खारिज कर दी।

निखिल मधुकर थेपले बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?

  • पीड़िता अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय से थी। अभियुक्त ने कथित तौर पर उससे लैंगिक संबंध बनाने की मांग की थी।
  • जब उसने उसके साथ लैंगिक संबंध बनाने से इंकार कर दिया, तो अभियुक्त ने कथित तौर पर उसके नग्न वीडियो और तस्वीरें बनाईं। फिर उसने उन्हें एक अलग नंबर से व्हाट्सएप पर उसके पति, भाभी और अन्य रिश्तेदारों को भेज दिया।
  • 5 नवंबर 2025 को निम्नलिखित प्रावधानों के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई:
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 77 (दृश्यरतिकता) और 78 (पीछा करना),
    • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 ङ (निजता का उल्लंघन) और 67 (इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री प्रकाशित करना) और
    • अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(द) (सार्वजनिक दृष्टिगोचरता में साशय अपमान) और 3(1)(ब )(ii) (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति महिला के प्रति लैंगिक शब्द, कृत्य या हावभाव)।
  • विशेष न्यायालय ने अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिकाएं दो बार खारिज कर दीं। इसके बाद उसने आपराधिक अपील के माध्यम से बॉम्बे उच्च न्यायालय का रुख किया।
  • मार्च 2026 में, उसी न्यायाधीश ने अभियुक्त को अंतरिम अनुतोष प्रदान की थी, और उस समय यह टिप्पणी की थी कि FIR में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होते हैं।   
  • अभियुक्त ने तर्क दिया कि व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक वीडियो रिकॉर्ड करना या प्रसारित करना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अंतर्गत नहीं आएगा, क्योंकि ऐसा प्रसार 'सार्वजनिक दृष्टिगोचरता' में नहीं होता है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?

  • व्हाट्सएप के माध्यम से सामग्री प्रसारित करना सार्वजनिक दृष्टिगोचरता में होना: न्यायालय ने माना कि आरोपी के मोबाइल से व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया पर पीड़िता के आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें प्रसारित करना सार्वजनिक दृष्टिगोचरता में किया गया कृत्य है।   
  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अधीन प्रथम दृष्टया तत्व: रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री के आधार पर, न्यायालय ने पाया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(ब) (ii) और 3(2)(फ क) के अधीन अपराधों के आवश्यक तत्त्व प्रथम दृष्टया सिद्ध हुए थे।
  • पूर्व अंतरिम दृष्टिकोण से विचलन पर: न्यायालय ने स्वीकार किया कि उसने पहले इस आधार पर अंतरिम अनुतोष दिया था कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम लागू नहीं होता है। यद्यपि, अभिलेख पर मौजूद सामग्री की परीक्षा करने के बाद, न्यायालय ने अभियुक्त के विरुद्ध मजबूत मामला पाया और अपना मत बदल दिया।
  • अभियुक्त के आचरण के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि अपराध दर्ज होने के बाद से अभियुक्त फरार है। न्यायालय ने माना कि इन परिस्थितियों में वह अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है।
  • परिणाम: अपील खारिज कर दी गई और अग्रिम जमानत नामंजूर कर दी गई।

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 क्या है?

पृष्ठभूमि एवं उद्देश्य:

  • यह अधिनियम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के विरुद्ध अत्याचारों को रोकने के लिये अधिनियमित किया गया था। इसमें ऐसे अपराधों के विचारण और पीड़ितों के पुनर्वास एवं अनुतोष के लिये विशेष न्यायालयों का प्रावधान है।
  • यह अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन), अनुच्छेद 15 (विभेद का निषेध) और अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) के अधीन सांविधानिक गारंटियों को प्रभावी बनाता है ।

इस मामले से संबंधित सुसंगत उपबंध:

  • धारा 3(1)(द): ऐसे व्यक्ति को दण्डित करता है जो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है और जो जानबूझकर सार्वजनिक रूप से किसी भी स्थान पर अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्य का अपमान करता है या उसे डराता है, जिसका उद्देश्य उसे अपमानित करना है।
  • धारा 3(1)(ब) ऐसे व्यक्ति को दण्डित करती है जो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है और जो:
    • (i) अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की किसी महिला को उसकी सहमति के बिना जानबूझकर स्पर्श करना, जहाँ यह कृत्य लैंगिक प्रकृति का हो, या
    • (ii) अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की किसी महिला के प्रति लैंगिक प्रकृति के शब्दों, कृत्यों या इशारों का प्रयोग करना, यह जानते हुए कि वह ऐसी समुदाय से संबंधित है।
  • धारा 3(2)(फ क): अधिनियम की अनुसूची में निर्दिष्ट किसी अपराध को किसी व्यक्ति या संपत्ति के विरुद्ध करने वाले व्यक्ति को, यह जानते हुए कि ऐसा व्यक्ति अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का सदस्य है, उस अपराध के लिये विहित दण्ड के साथ जुर्माना भी लगाया जाएगा।

अग्रिम जमानत पर वर्जन:

  • धारा 18: अधिनियम के अधीन किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति पर अग्रिम जमानत का उपबंध लागू नहीं होता है। यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के अनुरूप है, जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 482 है ।
  • धारा 18क: 2018 के संशोधन द्वारा जोड़ी गई यह धारा प्रावधान करती है कि FIR दर्ज करने से पहले किसी प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है और गिरफ्तारी के लिये किसी पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है। यह किसी भी न्यायालय के निर्णय या आदेश होते हुए भी अग्रिम जमानत पर रोक को भी दोहराती है।
  • पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (2020) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने धारा 18क को बरकरार रखा। इसने स्पष्ट किया कि जहाँ परिवाद अधिनियम के अधीन प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है, वहाँ भी न्यायालय अग्रिम जमानत दे सकते हैं।

जमानत आदेशों के विरुद्ध अपील:

  • धारा 14क: विशेष न्यायालय के किसी भी निर्णय, दंडादेश या आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, जिसमें जमानत देने या अस्वीकार करने का आदेश भी शामिल है।

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अंतर्गत 'सार्वजनिक दृष्टिगोचरता' की अवधारणा क्या है?

अर्थ:

  • 'सार्वजनिक दृष्टिगोचरता' का अर्थ है कि घटना सार्वजनिक उपस्थिति में घटित होनी चाहिये, या सार्वजनिक सदस्यों द्वारा देखी या सुनी जा सकने योग्य होनी चाहिये। यह ‘सार्वजनिक स्थान' की तुलना में अधिक व्यापक है।

न्यायिक निर्वचन :

  • स्वर्ण सिंह बनाम राज्य (2008) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने 'सार्वजनिक स्थान' और 'सार्वजनिक दृष्टिगोचरता के अंतर्गत आने वाले स्थान' के बीच अंतर स्पष्ट किया। न्यायालय ने माना कि यदि जनता के सदस्य उपस्थित हों और किसी गतिविधि को देख या सुन सकें, तो निजी स्थान भी सार्वजनिक दृष्टिगोचरता के अंतर्गत आ सकता है।
  • हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि किसी इमारत की चारदीवारी के भीतर, जहाँ कोई आम जनता मौजूद नहीं है, अपमान सार्वजनिक दृष्टिगोचरता में नहीं आता है। न्यायालय ने यह भी माना कि अपमान पीड़ित की जाति के कारण होना चाहिये।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अनुप्रयोग:

  • वर्तमान निर्णय 'सार्वजनिक दृष्टिगोचरता' को डिजिटल क्षेत्र तक विस्तारित करता है। व्हाट्सएप पर आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करने से वह दूसरों के लिये सुलभ हो जाती है, और इसलिये यह कृत्य सार्वजनिक दृष्टिगोचरता के अंतर्गत आता है।
  • यद्यपि, सोशल मीडिया को लेकर न्यायालयों के अलग-अलग मत हैं। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में निर्णय दिया कि केवल संपर्कों के साथ साझा किया गया व्हाट्सएप स्टेटस भारतीय दण्ड संहिता की धारा 505(2) के अधीन शत्रुता को बढ़ावा देने के अपराध के लिये प्रकाशन नहीं माना जा सकता। इसलिये, ऑनलाइन सामग्री सार्वजनिक दृष्टिगोचरता में आती है या नहीं, यह तथ्यों और संबंधित विशिष्ट अपराध पर निर्भर करता है।