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आपराधिक कानून

ब्रेकअप के परिणामस्वरूप आत्महत्या होना सदैव दुष्प्रेरण नहीं है

 08-Oct-2026

चित्तिबारिका चंद्र शेखर और अन्य। बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य 

"लोग परिस्थितियों पर अलग-अलग प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं और यदि ब्रेकअप का नतीजा आत्महत्या होता है, तो इसे सदैव आत्महत्या का दुष्प्रेरण नहीं कहा जा सकता।" 

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने चित्तिबारिका चंद्र शेखर एवं अन्य बनाम तेलंगाना राज्य एवं अन्य (2026) मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि विवाह करने से इंकार करना, अपने आप में, भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 306 (भारतीय न्याय संहत की धारा 108) के अधीन आत्महत्या का दुष्प्रेरण (Abetment of Suicide) नहीं माना जाएगा, भले ही बाद में महिला द्वारा आत्महत्या कर ली जाए। न्यायालय ने सभी छह अभियुक्तों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया।। 

चित्तिबारिका चंद्र शेखर बनाम तेलंगाना राज्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • मृतक महिला का पहले अभियुक्त के साथ आपसी सहमति से संबंध था। 
  • वे दोनों लगभग तीन महीने से उसके घर में साथ रह रहे थे, और उसके परिवार ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया था। 
  • मृतक की बहन द्वारा दिये गए कथन के आधार पर प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी। 
  • अभियोजन पक्ष के अनुसार: 
    • बाद में पहले अभियुक्त ने मृतक से विवाह करने से इंकार कर दिया, जिसके बाद उसने आत्महत्या कर ली। 
    • दूसरे अभियुक्त ने उसे उससे विवाह न करने के लिये प्रभावित किया था। 
  • पहले अभियुक्त के अलावा, पाँच अन्य लोगों को भी अभियुक्त बनाया गया था: 
    • उसके माता - पिता। 
    • उसकी बहन। 
    • एक मित्र। 
    • उनकी बहन का होने वाला दूल्हा। 
  • यह मामला तेलंगाना उच्च न्यायालय के समक्ष दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका से उत्पन्न अपील के माध्यम से उच्चतम न्यायालय तक पहुँचा। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

क्या आत्महत्या में परिणत होने वाला ब्रेकअप आत्महत्या का दुष्प्रेरण है? 

  • न्यायालय ने पाया कि लोग परिस्थितियों पर अलग-अलग प्रकार से प्रतिक्रिया करते हैं। 
  • जिस ब्रेकअप का अंत आत्महत्या में होता है, उसे स्वतः ही आत्महत्या के लिये दुष्प्रेरण के रूप में नहीं माना जा सकता।  

आशय या ज्ञान की आवश्यकता पर: 

  • विवाह से इंकार करना तभी दुष्प्रेरण का मामला बन सकता है जब इसके साथ महिला को आत्महत्या के लिये विवश करने का आशय हो, या यह जानकारी हो कि परिणामस्वरूप वह अपनी जान ले लेगी। 
  • न्यायालय ने माना कि इस मामले में विवाह से इंकार करने का उद्देश्य महिला को आत्महत्या के लिये मजबूर करना नहीं था। 
  • और न ही अभियुक्त को इस बात की जानकारी होने का आरोप लगाया जा सकता है कि इंकार करने पर वह आत्महत्या कर लेगी।     

उकसावे के अभाव में: 

  • न्यायालय को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि किसी भी अभियुक्त ने मृतक को आत्महत्या करने के लिये उकसाया था। 
  • यदि मुखबिर के कथन पर पूरी तरह से विश्वास भी कर लिया जाए, तो भी यह अधिक से अधिक विवाह से इंकार को ही दर्शाता है जिसके बाद महिला ने आत्महत्या कर ली। 
  • इसका उद्देश्य न तो दुष्प्रेरण था और न ही इसे दुष्प्रेरण कहा जा सकता है।  

अभियोजन पक्ष के संबंध में: 

  • चूँकि दुष्प्रेरण के आवश्यक तत्त्व विद्यमान नहीं थे, इसलिये अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोपों के आधार पर अभियोजन को कायम नहीं रखा जा सकता था। 

निष्कर्ष 

  • विधिक स्थिति: बिना उकसावे के और बिना किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिये प्रेरित करने के आशय या जानकारी के विवाह से इंकार करना, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के अधीन आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अपराध नहीं है। 
  • परिणाम: अपील मंजूर कर ली गई और सभी छह अभियुक्तों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई। 

आत्महत्या का दुष्प्रेरण क्या होता है? 

  • भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 107 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 45 आत्महत्या के दुष्प्रेरण को परिभाषित करती हैं। धारा 306 (भारतीय न्याय संहिता की धारा 108) के साथ पढ़ने पर, आत्महत्या के दुष्प्रेरण हेतु अभियुक्त द्वारा जानबूझकर किया गया ऐसा कृत्य आवश्यक है जिसके कारण आत्महत्या हुई हो। 
  • दुष्प्रेरण को स्थापित करने वाले तीन आवश्यक घटक हैं:  
    • किसी व्यक्ति को प्रत्यक्ष रूप से उस कृत्य को करने के लिये उकसाना। 
    • इस कृत्य को अंजाम देने में सहायता के लिये दूसरों के साथ मिलकर षड्यंत्र रचना। 
    • किसी कार्य या अवैध लोप के माध्यम से जानबूझकर सहायता करना। 
  • अभियोजन पक्ष को यह साबित करने का भार वहन करना होगा कि अभियुक्त ने मृतक को आत्महत्या करने के लिये प्रत्यक्ष रूप से उकसाया या भौतिक रूप से सहायता की। 
  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 (धारा 108 भारतीय न्याय संहिता) के अधीन विधिक परिणामों में 10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना शामिल है। 
  • NCRB के सांख्यिकीय साक्ष्य से पता चलता है कि 2022 में दुष्प्रेरण के मामलों में दोषसिद्धि दर उल्लेखनीय रूप से कम अर्थात 17.5% थी।  
  • सबूत पेश करने का भार यह साबित करना है कि अभियुक्त के कार्यों और पीड़ित के निर्णय के बीच स्पष्ट कारण-कार्य संबंध है। 
  • कार्यस्थल से संबंधित मामलों में, न्यायालय संबंधों की व्यावसायिक प्रकृति के कारण उच्च साक्ष्य मानक अनिवार्य करता हैं। 
  • आत्महत्या के दुष्प्रेरण के विशिष्ट आशय के बिना मात्र उत्पीड़न या व्यावसायिक दबाव को आत्महत्या हेतु दुष्प्रेरण नहीं माना जाता है। 
  • न्यायालयों को परिस्थितिजन्य संबंधों के बजाय "प्रत्यक्ष और चिंताजनक प्रोत्साहन" के ठोस साक्ष्य की आवश्यकता होती है।  
  • विधि सामान्य दुर्व्यवहार और किसी को आत्महत्या के लिये उकसाने के आशय से की गई विशिष्ट कार्रवाइयों के बीच अंतर करता है। 
  • अन्वेषण में घटनाओं की एक स्पष्ट श्रृंखला स्थापित होनी चाहिये जो आत्महत्या में अभियुक्त की प्रत्यक्ष भूमिका को दर्शाती हो। 

सांविधानिक विधि

निर्वाचन याचिका याचिकाकर्त्ता द्वारा स्वयं प्रस्तुत की जानी चाहिये

 08-Oct-2026

वी. पोन. पनीरसेल्वम बनाम एस. रेगूपथी और अन्य 

"धारा 81 के अधीन प्रस्तुति की आवश्यकता को महज एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता के रूप में नहीं देखा जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने वी. पोन. पनीरसेल्वम बनाम एस. रेगुपथी एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। इसमें कहा गया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RP Act) के अधीन निर्वाचन याचिका स्वयं निर्वाचन याचिकाकर्त्ता द्वारा प्रस्तुत की जानी चाहिये। केवल अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत याचिका धारा 81 की शर्तों को पूरा नहीं करती और धारा 86 के अधीन खारिज कर दी जानी चाहिये। न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा निर्वाचन याचिका खारिज करने के निर्णय को बरकरार रखा। 

वी. पोन. पनीरसेल्वम बनाम एस. रेगूपथी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता वी. पोन. पनीरसेल्वम ने 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में थिरुमयम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था।     
  • DMK के उम्मीदवार एस. रेगूपथी इस निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित हुए। 
  • याचिकाकर्त्ता ने मद्रास उच्च न्यायालय में चुनाव को चुनौती देते हुए एक निर्वाचन याचिका दायर की। उन्होंने अन्य बातों के अलावा निम्नलिखित आरोप लगाए: 
    • अनुचित प्रभाव का भ्रष्ट आचरण।  
    • सांविधिक प्रपत्र 26 के शपथपत्र में चयनित उम्मीदवार के पति/पत्नी की संपत्ति और आय को छुपाना और गलत तरीके से घोषित करना। 
  • मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्वाचन याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने पाया कि याचिका याचिकाकर्त्ता के अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत की गई थी, न कि स्वयं याचिकाकर्त्ता द्वारा। 
  • याचिकाकर्त्ता ने विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में बर्खास्तगी को चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

निर्वाचन याचिका की प्रकृति पर: 

  • वी. श्रीरामा रेड्डी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर (2009) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि निर्वाचन याचिका एक गंभीर कार्यवाही है जो चुनावी प्रक्रिया को दूषित कर सकती है।  
  • अत: निर्वाचन संबंधी विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का कठोरता से पालन किया जाना चाहिये। 
  • यह अनिवार्यता कि याचिका याचिकाकर्त्ता द्वारा ही प्रस्तुत की जाए, उच्च न्यायालय को प्रस्तुति के चरण में ही प्रारंभिक सत्यापन करने की अनुमति देती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि कार्यवाही निरर्थक या अनावश्यक न हो। 

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 81(1) की आवश्यकताओं पर: 

  • न्यायालय ने कहा कि धारा 81(1) में पाँच विशिष्ट आवश्यकताएँ शामिल हैं: 
    • याचिकाकर्त्ता उम्मीदवार या मतदाता होना चाहिये। 
    • याचिका याचिकाकर्त्ता द्वारा ही प्रस्तुत की जानी चाहिये। 
    • यह संविधि में निर्दिष्ट आधारों पर आधारित होना चाहिये। 
    • इसे उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिये। 
    • इसे निर्धारित 45 दिनों की अवधि के भीतर दाखिल करना होगा। 
  • ये आवश्यकताएँ महज प्रक्रियात्मक नहीं हैं। 

धारा 86(1) के अधीन अनुपालन न करने के परिणाम पर: 

  • धारा 86(1) के अधीन यह अनिवार्य है कि उच्च न्यायालय उस निर्वाचन याचिका को खारिज कर देगा जो धारा 81 का अनुपालन नहीं करती है। 
  • अत: प्रस्तुति संबंधी आवश्यकता का अनुपालन निर्वाचन याचिका की वैधता से सीधा रूप से जुड़ा हुआ है। 
  • प्रस्तुति में किसी भी प्रकार की खामी का निवारण नहीं किया जा सकता। 

धारा 81 के विधायी इतिहास पर: 

  • मूल धारा 81(2) में स्पष्ट रूप से यह उपबंध था कि निर्वाचन याचिका याचिकाकर्त्ता द्वारा या उसके द्वारा लिखित रूप से अधिकृत व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की जा सकती है। इसमें पंजीकृत डाक के माध्यम से प्रस्तुति की भी अनुमति थी। 
  • लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1966 द्वारा इस उपबंध को हटा दिया गया था। 
  • वर्तमान उपबंध के अनुसार, किसी अधिकृत व्यक्ति के माध्यम से या पंजीकृत डाक द्वारा प्रस्तुति को मान्यता नहीं दी जाती है। 

शेओ सदन सिंह बनाम मोहन लाल गौतम (1969) में अंतर बताने पर: 

  • शेओ सदन सिंह के मामले में, एक अधिवक्ता के क्लर्क द्वारा की गई प्रस्तुति को पर्याप्त अनुपालन माना गया, क्योंकि प्रस्तुति के समय याचिकाकर्त्ता स्वयं क्लर्क के साथ उपस्थित था। 
  • वर्तमान मामले में, याचिकाकर्त्ता ने यह दावा नहीं किया कि याचिका प्रस्तुत करते समय वह अपने अधिवक्ता के साथ उपस्थित था। 
  • इसलिये उस निर्णय से याचिकाकर्त्ता को कोई सहायता नहीं मिली। 

निष्कर्ष 

  • विधिक स्थिति: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अधीन निर्वाचन याचिका स्वयं याचिकाकर्त्ता द्वारा प्रस्तुत की जानी चाहिये। केवल अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत करने से धारा 81 की शर्त पूरी नहीं होती और यह दोष दूर नहीं किया जा सकता। 
  • परिणाम: धारा 81 के अधीन अनिवार्य आवश्यकता पूरी नहीं हुई, इसलिये उच्चतम न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। 

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 81 क्या है? 

  • धारा 81 निर्वाचन याचिकाओं की प्रस्तुति से संबंधित है। 
  • धारा 81(1) के अधीन, किसी भी चुनाव पर प्रश्न उठाने वाली निर्वाचन याचिका ऐसे निर्वाचन में किसी भी उम्मीदवार या किसी भी मतदाता द्वारा उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है।  
  • यह अधिनियम की धारा 100(1) और धारा 101 में निर्दिष्ट एक या अधिक आधारों पर आधारित होना चाहिये। 
  • इसे निर्वाचित उम्मीदवार के निर्वाचन की तारीख से 45 दिनों के भीतर प्रस्तुत किया जाना चाहिये। यदि दो या अधिक निर्वाचित उम्मीदवार अलग-अलग तारीखों पर चुने जाते हैं, तो यह अवधि उन तारीखों में से बाद वाली तारीख से गिनी जाएगी। 
  • प्रत्येक निर्वाचन याचिका के साथ उतनी ही प्रतियां संलग्न होनी चाहिये जितने प्रत्यर्थियों का उल्लेख याचिका में किया गया है।   

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 86 क्या है?  

  • धारा 86 निर्वाचन याचिकाओं के विचारण से संबंधित है।  
  • धारा 86(1) के अधीन, उच्च न्यायालय निर्वाचन याचिका को खारिज कर देगा जो अधिनियम की धारा 81, धारा 82 या धारा 117 के प्रावधानों का अनुपालन नहीं करती है। 
  • धारा 86(1) के अधीन बर्खास्तगी का आदेश अधिनियम की धारा 98(क) के अधीनक दिया गया आदेश माना जाएगा।