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सिविल कानून
वादपत्र में संशोधन से पहले अधिकारिता संबंधी आक्षेप का निर्णय किया जाना चाहिये
12-Oct-2026
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मेसर्स आई थिंक एप्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम अनुज्ञा गुप्ता और अन्य "विषय-वस्तु क्षेत्राधिकार मामले की जड़ तक जाता है।" न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने मेसर्स आई थिंक एप्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम अनुज्ञा गुप्ता एवं अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 7 नियम 10 और 11 के अधीन विषय-वस्तु संबंधी अधिकारिता पर उठाई गई आपत्ति का निर्णय सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 17 के अधीन वादपत्र में संशोधन के आवेदन से पहले किया जाना चाहिये। न्यायालय ने वाणिज्यिक न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें प्रतिवादियों के आवेदन पर पहले निर्णय लेने का निदेश दिया गया था और याचिका खारिज कर दी।
मेसर्स आई थिंक एप्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम अनुज्ञा गुप्ता (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- वादी-याचिकाकर्त्ता ने वाराणसी वाणिज्यिक न्यायालय में व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 134 के साथ धारा 27(2) और वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 के अधीन मूल वाद संख्या 2/2025 दायर किया। इसमें निम्नलिखित मांग की गई:
- प्रतिवादियों को "सरकारी रिजल्ट" और "sarkariexam.com" व्यापार चिह्न का उपयोग करने से रोकने के लिये एक स्थायी व्यादेश।
- “sarkariresult.com” डोमेन के प्रयोग के विरुद्ध एक अनिवार्य व्यादेश।
- 23 मार्च 2026 को, प्रतिवादियों ने अधिकारिता के अभाव में वाद को वापस करने और नामंजूर करने के लिये आदेश 7 नियम 10 और 11 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन आवेदन किया।
- जब वह आवेदन लंबित था, तब वादी ने 9 अगस्त 2026 को वादपत्र में संशोधन करने के लिये एक आवेदन प्रस्तुत किया।
- 13 अगस्त 2026 के आदेश द्वारा, वाणिज्यिक न्यायालय ने निदेश दिया कि प्रतिवादियों के आवेदन पर पहले निर्णय लिया जाए।
- वादी ने संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि:
- वाणिज्यिक न्यायालय के पास अधिकारिता थी, और केवल वाद के विनिर्दिष्ट मूल्य (₹5,00,000) का प्रकटन करने वाला एक औपचारिक संशोधन ही आवश्यक था।
- जिस वादी की याचिका वापस कर दी जाती है या नामंजूर कर दी जाती है, वह सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 13 के अधीन नया वाद दायर कर सकता है, इसलिये उस स्थिति से बचने के लिये पहले संशोधन पर विचार किया जाना चाहिये।
- चार उच्च न्यायालयों ने यही दृष्टिकोण अपनाया था।
- प्रतिवादियों ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि:
- वादपत्र में वाणिज्यिक न्यायालय की अधिकारिता को आकर्षित करने के लिये आवश्यक विनिर्दिष्ट मूल्य का कहीं भी प्रकटन नहीं किया गया था।
- न्यायालय के पास धारा 20 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन क्षेत्रीय अधिकारिता का भी अभाव था, और वादपत्र में वाद-हेतुक नहीं दर्शाया गया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
वाणिज्यिक न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र पर:
- वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 की धारा 6 के अधीन, वाणिज्यिक न्यायालय केवल "विनिर्दिष्ट मूल्य" के वाणिज्यिक विवादों का विचारण कर सकता है।
- धारा 2(1)(i) को धारा 12 के साथ पढ़ने पर, विनिर्दिष्ट मूल्य ₹3 लाख से कम नहीं होना चाहिये।
- न्यायालय ने कहा कि यह स्वीकार किया गया है कि वाद दायर करते समय विनिर्दिष्ट मूल्य का प्रकटन नहीं किया गया था, और वादी ने अधिकारिता पर प्रश्न उठाए जाने के बाद ही संशोधन की मांग की।
आवेदन पर निर्णय लेने के आदेश पर:
- संशोधन संबंधी आवेदनों पर सामान्यतः उदारतापूर्वक विचार किया जाता है।
- यद्यपि, इस मामले में आपत्ति न्यायालय की अधिकारिता पर ही उठाई गई थी।
- जहाँ विषय-वस्तु अधिकारिता का प्रश्न उठता है, वहाँ संशोधन आवेदन पर विचार करने से पहले इसका समाधान किया जाना चाहिये।
पूर्व निर्णयों पर निर्भरता के संबंध में:
- हर्षद चिमन लाल मोदी बनाम डी.एल.एफ. यूनिवर्सल लिमिटेड के मामले पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने विषय-वस्तु संबंधी अधिकारिता को क्षेत्रीय और आर्थिक अधिकारिता से अलग किया है, और यह माना है कि अधिकारिता के बिना पारित आदेश अकृत है।
- इसमें जय प्रकाश इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम ललित भासिन के मामले का भी हवाला दिया गया, जहाँ एक समन्वय पीठ ने निर्णय दिया कि कोई न्यायालय संशोधन की अनुमति देकर स्वयं को अधिकारिता प्रदान नहीं कर सकता है।
प्रस्तावित संशोधन की प्रकृति पर:
- एक संशोधन जो उन तथ्यों को प्रदान करता है जिन पर अधिकारिता निर्भर करती है, वह केवल एक दोष का निवारण नहीं है।
- इससे विवाद का स्वरूप बदल जाता है और संशोधित वादपत्र मूल रूप से दायर किये गए वादपत्र से भिन्न हो जाता है।
अंतर्निहित अधिकारिता के अभाव पर:
- विषय-वस्तु अधिकारिता के मामले की जड़ तक जाता है।
- एक बार जब किसी न्यायालय में वाद की सुनवाई करने की अंतर्निहित अधिकारिता का अभाव हो, तो वह वादपत्र में संशोधन की अनुमति देने वाला कोई आदेश पारित नहीं कर सकता, जिससे वाद को उसकी अधिकारिता के अंतर्गत लाया जा सके।
उपर्युक्त के दृष्टिगत, न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि वाणिज्यिक न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 के नियम 10 एवं 11 के अंतर्गत प्रस्तुत आवेदन पर सर्वप्रथम निर्णय किये जाने का निदेश देकर उचित कार्य किया था तथा याचिका खारिज कर दी।
सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन वादपत्र में संशोधन, वापसी और नामंजूरी को नियंत्रित करने वाली विधि क्या है?
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में अभिवचनों में संशोधन तथा वादपत्र की वापसी अथवा अस्वीकृति के संबंध में प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
- अभिवचनों में संशोधन (आदेश VI नियम 17): न्यायालय कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम पर किसी भी पक्षकार को उसके अभिवचनों में ऐसे तरीके से तथा ऐसी शर्तों पर परिवर्तन या संशोधन करने की अनुमति दे सकता है, जो न्यायसंगत हों। विवाद के वास्तविक प्रश्नों के अवधारण के लिये आवश्यक सभी संशोधनों की अनुमति दी जाएगी। परंतुक के अधीन, विचारण प्रारंभ हो जाने के पश्चात् किसी संशोधन की अनुमति नहीं दी जाएगी, जब तक कि न्यायालय इस निष्कर्ष पर न पहुँचे कि सम्यक् तत्परता के होते हुए भी पक्षकार उक्त विषय को पहले प्रस्तुत नहीं कर सकता था।
- वादपत्र की वापसी (आदेश 7 नियम 10): वादपत्र को वाद के किसी भी प्रक्रम पर उस न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने हेतु वापस किया जाएगा, जिसमें वाद संस्थित किया जाना चाहिए था।
- वादपत्र का नामंजूर किया जाना (आदेश 7 नियम 11): वादपत्र निम्नलिखित परिस्थितियों में अस्वीकृत कर दिया जाएगा:
- जहाँ वादपत्र में वाद-हेतुक प्रकट नहीं किया गया हो।
- जहाँ दावा की गई अनुतोष का मूल्यांकन कम किया गया हो तथा वादी न्यायालय द्वारा निर्धारित समय के भीतर मूल्यांकन को ठीक करने में विफल रहता हो।
- जहाँ दावा किये गए अनुतोष का समुचित मूल्यांकन किया गया हो, किंतु वादपत्र पर अपर्याप्त स्टाम्प लगा हो तथा वादी न्यायालय द्वारा निर्धारित समय के भीतर अपेक्षित स्टाम्प-पत्र प्रस्तुत करने में विफल रहता हो।
- जहाँ वादपत्र में किए गए कथनों से यह प्रतीत होता हो कि वाद किसी विधि द्वारा वर्जित है।
- जहाँ वादपत्र दो प्रतियों में प्रस्तुत न किया गया हो।
- जहाँ वादी आदेश 7 नियम 9 के उपबंधों का अनुपालन करने में विफल रहता हो।
- नामंजूर किये जाने के पश्चात् नया वादपत्र (आदेश 7 नियम 13): उल्लिखित आधारों में से किसी आधार पर वादपत्र की नामंजूरी मात्र से वादी उसी वाद-हेतुक के संबंध में नया वादपत्र प्रस्तुत करने से वर्जित नहीं होता है।
सिविल कानून
बालक के साथ असंतोषजनक भेंट अवमानना के समान नहीं है
12-Oct-2026
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X बनाम Y "बालक कोई वस्तु नहीं है जिसे प्रभावी बैठकों के लिये विवश या बाध्य किया जा सके।" न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने X बनाम Y (2026) के मामले में एक पति द्वारा दायर अवमानना याचिका का निपटारा किया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसकी पत्नी ने बच्चे के जन्मदिन पर बच्चे से मिलने के संबंध में कुटुंब न्यायालय के आदेश का पालन नहीं किया था।
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि चूँकि पत्नी ने बालक को प्रस्तुत किया था, अतः जानबूझकर अवज्ञा का कोई मामला नहीं बनता है और केवल असंतोषजनक भेंट को न्यायालय की अवमानना नहीं माना जा सकता। पति को प्रधान कुटुंब न्यायाधीश के समक्ष जाने की स्वतंत्रता प्रदान की गई।
X बनाम Y (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पति-पत्नी कुटुंब न्यायालय में वैवाहिक विवाद का सामना कर रहे थे।
- कुटुंब न्यायालय ने पति को बच्चे के जन्मदिन पर उससे मिलने की व्यवस्था दर्ज की। इसके अंतर्गत:
- पत्नी को 10 सितंबर को दोपहर में बच्चे को बच्चों के मीटिंग रूम में लाना था।
- पति को बच्चे को वहाँ से लेने जाना था।
- पति को उसी दिन शाम करीब 5 बजे बच्चे को पत्नी को लौटाना था।
- पति ने आदेश का पालन न करने का आरोप लगाते हुए उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की। उन्होंने कहा कि:
- यद्यपि पत्नी निर्देशानुसार बच्चे को लेकर आई थी, लेकिन उसने पति को बच्चे को ले जाने से रोक दिया।
- उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जन्मदिन न्यायालय परिसर के भीतर ही मनाया जाए।
- उसने कुटुंब न्यायालय के न्यायाधीश से संपर्क किया, जिन्होंने बच्चे और पत्नी को समझाने की कोशिश की, लेकिन प्रभावी अनुपालन प्राप्त नहीं किया जा सका।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
जानबूझकर अवज्ञा करने पर:
- न्यायालय ने कहा कि पति के स्वयं के कथनों से यह स्पष्ट है कि पत्नी ने आदेश के अनुसार बच्चे को पेश किया था।
- अतः परिस्थितियों से कुटुंब न्यायालय के आदेश की जानबूझकर अवज्ञा का कोई प्रमाण नहीं मिलता है जो अवमानना की कार्यवाही को उचित ठहरा सके।
बालक के साथ भेंट की प्रकृति के संबंध में:
- न्यायालय ने अवलोकन किया कि बालक कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसके साथ माता-पिता की प्रभावी भेंट सुनिश्चित करने के लिए उसे बाध्य या विवश किया जा सके।
- बालक का पालन-पोषण एवं संवर्धन किया जाना आवश्यक है तथा प्रभावी भेंट संभव हो सके, इसके लिये माता-पिता को बालक के साथ भावनात्मक संबंध विकसित करना होगा।
बैठक से असंतोष के संबंध में:
- महज इसलिये कि बैठक पति की संतुष्टि के अनुरूप नहीं थी, वह यह दावा नहीं कर सकता कि पत्नी ने अवमानना की है।
उपलब्ध उपचार के बारे में:
- पति को प्रधान कुटुंब न्यायाधीश के समक्ष अपील करने की स्वतंत्रता दी गई।
- कुटुंब न्यायालय पक्षकारों को परामर्श दे सकता है और यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसके आदेशों के अनुसार प्रभावी बैठकें हों।
न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 क्या है?
बारे में:
- न्यायालय की अवमानना ऐसा आचरण है, जो विधि के न्यायालय तथा उसके न्यायाधीशों के आदेशों की अवज्ञा करता है अथवा उनके प्रति अनादर प्रदर्शित करता है और न्यायालय के प्राधिकार, गरिमा तथा न्याय-प्रशासन को क्षति पहुँचाता है।
- इसमें न्यायालय के विधिसम्मत आदेश की अवज्ञा करना, कदाचार के माध्यम से न्यायिक कार्यवाहियों में व्यवधान उत्पन्न करना, न्यायाधीश के प्रति अनादर प्रदर्शित करना तथा ऐसी सामग्री प्रकाशित करना सम्मिलित है, जिससे निष्पक्ष विचारण के प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने की संभावना हो।
- न्यायालय की अवमानना से संबंधित विधि को परिभाषित एवं विनियमित करने के उद्देश्य से न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 अधिनियमित किया गया था।
- चूँकि न्यायालय की अवमानना के लिये दण्डित किये जाने से वैयक्तिक स्वतंत्रता तथा वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार प्रभावित होते हैं, इसलिये इस विधि की प्रायः अस्पष्ट एवं अनिश्चित होने के आधार पर आलोचना की जाती रही है।
सांविधिक उपबंध:
- अनुच्छेद 129: उच्चतम न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है और उसे स्वयं की अवमानना के लिये दण्ड देने का अधिकार है। अभिलेख न्यायालय वह होता है जिसके कार्य और कार्यवाही अभिलेखित और साक्ष्य के रूप में संरक्षित होते हैं जिन पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। इसी प्रकार, अनुच्छेद 215 प्रत्येक उच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय बनाता है और उसे स्वयं की अवमानना के लिये दण्ड देने का अधिकार है।
- अनुच्छेद 142(2): उच्चतम न्यायालय को किसी भी व्यक्ति की उपस्थिति सुनिश्चित करने, दस्तावेज़ प्रस्तुत करने और अपने विरुद्ध किसी भी अवमानना का अन्वेषण या दण्ड देने का अधिकार है। इस शक्ति का प्रयोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अनुरूप ही किया जाना चाहिये।
अवमानना के प्रकार (धारा 2(क)):
- सिविल अवमानना (धारा 2(ख)): न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, निदेश, रिट या अन्य प्रक्रिया की जानबूझकर अवज्ञा करना, या न्यायालय को दिये गए वचन का जानबूझकर भंग करना।
- आपराधिक अवमानना (धारा 2(ग)): किसी भी विषय का प्रकाशन, चाहे शब्दों (बोले गए या लिखित), संकेतों, दृश्य प्रस्तुतियों या किसी अन्य माध्यम से, या कोई ऐसा कार्य करना जो:
- किसी न्यायालय के अधिकार को कलंकित करता है या कलंकित करने की प्रवृत्ति रखता है, या उसे कम करता है या कम करने की प्रवृत्ति रखता है; या
- किसी न्यायिक कार्यवाही के उचित संचालन में पूर्वाग्रह उत्पन्न करता है, हस्तक्षेप करता है या हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति रखता है; या
- किसी भी अन्य तरीके से न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करता है या हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति रखता है, या उसमें बाधा डालता है या बाधा डालने की प्रवृत्ति रखता है।
अवमानना के मूल तत्त्व:
- न्यायालय का वैध आदेश होना चाहिये और प्रत्यर्थी को इसकी जानकारी होनी चाहिये।
- सिविल अवमानना के मामले में, न्यायालय के निर्णय, डिक्री या आदेश की अवज्ञा जानबूझकर की जानी चाहिये।
- आपराधिक अवमानना में, धारा 2(ग) के अंतर्गत आने वाले शब्दों, संकेतों या दृश्य प्रस्तुतियों द्वारा प्रकाशन या कार्य होना चाहिये।
- अवमानना करने वाले व्यक्ति का कृत्य जानबूझकर और न्यायालय के आदेश की अवहेलना में किया गया होना चाहिये।
दण्ड (धारा 12):
- न्यायालय की अवमानना के लिये छह महीने तक का साधारण कारावास, या 2,000 रुपए तक का जुर्माना, या दोनों या दोनों हो सकते है।
- यदि अभियुक्त न्यायालय की संतुष्टि के अनुरूप क्षमायाचना करता है, तो उसे उन्मोचित किया जा सकता है अथवा दंड का परिहार किया जा सकता है।
- यदि क्षमायाचना सद्भावपूर्वक की गई है, तो उसे केवल इस आधार पर अस्वीकार नहीं किया जाएगा कि वह सशर्त या परिसीमित है।
जब अवमानना दंडनीय नहीं है (धारा 13):
- धारा 13 को न्यायालय अवमान (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था।
- धारा 13(क): कोई भी न्यायालय अवमानना के लिये तब तक दण्ड अधिरोपित नहीं करेगा, जब तक वह इस बात से संतुष्ट न हो जाए कि अवमानना न्याय-प्रशासन की समुचित प्रक्रिया में सारभूत रूप से हस्तक्षेप करती है अथवा ऐसा हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति रखती है।
- धारा 13(ख): न्यायालय सत्य को एक वैध प्रतिरक्षा के रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति दे सकता है, यदि वह इस बात से संतुष्ट हो कि ऐसा करना लोकहित में है तथा उक्त प्रतिरक्षा का आश्रय लेने का अनुरोध सद्भावपूर्वक किया गया है।