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करेंट अफेयर्स और संग्रह
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सांविधानिक विधि
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार कब्रिस्तान हेतु किसी विशिष्ट भूखंड के अधिकार को प्रदान नहीं करता है
14-Oct-2026
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क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य "...उस अधिकार का दावा उस तरीके से नहीं किया जा सकता है जिससे याचिकाकर्त्ता या ईसाई समुदाय के सदस्यों को स्थानीय निकाय में निहित किसी विशेष भूखंड के आरक्षण का अधिकार प्राप्त हो, जिसका उद्देश्य ईसाई कब्रिस्तान बनाना हो।" न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धार्मिक स्वतंत्रता, भले ही इसमें अंतिम संस्कार करने का अधिकार शामिल हो, का प्रयोग कब्रिस्तान के लिये स्थानीय निकाय की भूमि के एक विशिष्ट भूखंड पर दावा करने के लिये नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने गाजियाबाद में बंजर भूमि को ईसाई कब्रिस्तान में परिवर्तित करने के सोसाइटी के अनुरोध को अस्वीकार किये जाने को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया।
क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता, जो कि सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 के अधीन रजिस्ट्रीकृत एक संस्था है, ने अपने अध्यक्ष विनय कुमार पॉल के माध्यम से उच्च न्यायालय का रुख किया। इसका एक उद्देश्य ईसाइयों के अंतिम संस्कार में सहायता करना है।
- यह विवाद गाजियाबाद जिले के मोदी नगर तहसील के जलालाबाद परगना के विसोखर गाँव में स्थित 0.3420 हेक्टेयर भूमि से संबंधित है, जो राजस्व अभिलेखों में बंजर भूमि (उसर) के रूप में दर्ज है।
संस्था ने यह प्रस्तुत किया कि:
- बेगमबाद बुदाना में मौजूदा ईसाई कब्रिस्तान में जगह कम पड़ने के कारण इलाके के ईसाई निवासियों को अंतिम संस्कार करने में गंभीर कठिनाई का सामना करना पड़ा।
- मोदी नगर नगर पालिका परिषद के बोर्ड ने 22 जनवरी 2018 को संकल्प संख्या 11 पारित किया था, जिसमें ईसाई कब्रिस्तान के लिये भूमि के आवंटन का प्रस्ताव था।
- यह प्रस्ताव जिला अधिकारियों को भेजा गया था, लेकिन उस भूमि को कभी भी उस उद्देश्य के लिये परिवर्तित या आरक्षित नहीं किया गया था।
- इसने कई अभ्यावेदन दिये, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अधीन जानकारी प्राप्त की और इससे पहले उच्च न्यायालय में एक लोकहित याचिका दायर कर जमीन को कब्रिस्तान के रूप में प्रयोग करने की अनुमति मांगी थी।
- लोकहित याचिका में उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, अपर जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन), गाजियाबाद ने जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 77(2) के अधीन अनुरोध को अस्वीकार कर दिया।
- संस्था ने इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि उपयुक्त भूमि का आवंटन न होना उसके सदस्यों के धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है, जिसमें अंतिम संस्कार करना भी शामिल है।
जिला अधिकारियों ने बताया कि:
- उस भूमि को बंजर घोषित किया गया था, वह खाली पड़ी थी, और परंपरागत रूप से किसी भी समुदाय द्वारा कब्रिस्तान के रूप में इसका उपयोग नहीं किया गया था।
- उप-विभागीय मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट में अन्य स्थानीय निवासियों और समुदायों के आवेदनों का उल्लेख किया गया है, जिनमें आशंका व्यक्त की गई है कि ईसाई समुदाय को भूमि का आवंटन भविष्य में सांप्रदायिक मतभेदों को जन्म दे सकता है।
- पास में ही एक ईसाई कब्रिस्तान मौजूद था और उसका उपयोग किया जा रहा था।
- इसलिये, उस समय ईसाई कब्रिस्तान के लिये भूमि आवंटित करने का कोई औचित्य नहीं था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
भूमि को सार्वजनिक उपयोगिता भूमि में परिवर्तित करने पर:
- उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के अधीन, ग्राम सभा या स्थानीय निकाय को सौंपी गई भूमि को सार्वजनिक उपयोगिता भूमि में परिवर्तित किया जा सकता है।
- यद्यपि, इस प्रकार का रूपांतरण मूल रूप से एक कार्यकारी निर्णय होता है, जो विभिन्न कारकों और आकस्मिकताओं पर विचार करने के बाद लिया जाता है।
क्या कोई न्यायनिर्णेय अधिकार मौजूद है:
- किसी भी व्यक्ति को किसी ग्राम सभा या स्थानीय निकाय के स्वामित्व वाली किसी विशेष गैर-सार्वजनिक उपयोगिता वाली भूमि को कब्रिस्तान के लिये सार्वजनिक उपयोगिता वाली भूमि में परिवर्तित करने का न्यायनिर्णेय अधिकार नहीं है।
- जहाँ वास्तव में जगह की कमी हो, वहाँ स्थिति अलग होगी; ऐसे अनुरोध पर अधिकारियों द्वारा विचार किया जा सकता है, जिसमें क्षेत्र के सभी निवासियों के व्यापक और विविध लोकहित को ध्यान में रखा जाएगा।
धर्म की स्वतंत्रता और अंतिम संस्कार के संबंध में:
- अपने धर्म के सिद्धांतों के अनुसार अंतिम संस्कार करने का अधिकार धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का भाग हो सकता है।
- लेकिन इस अधिकार का प्रयोग इस प्रकार नहीं किया जा सकता है जिससे याचिकाकर्त्ता या ईसाई समुदाय को कब्रिस्तान के लिये स्थानीय निकाय की भूमि के एक विशेष भूखंड के आरक्षण पर बल देने का अधिकार मिले।
निष्कर्ष:
- उस विशेष भूखंड के लिये अनुरोध को अस्वीकार करने वाले आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई न्यायसंगत आधार न पाते हुए, न्यायालय ने रिट याचिका खारिज कर दी।
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार क्या है?
अर्थ और प्रकृति:
- भारत एक पंथनिरपेक्ष राज्य है; इसका कोई आधिकारिक धर्म नहीं है और यह सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करता है।
- संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 25 से 28 तक व्यक्तियों और धार्मिक समूहों को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं।
- यह स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है और यह लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और भाग 3 के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
सांविधानिक उपबंध:
- अनुच्छेद 25 – अंत-करण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता:
- सभी व्यक्तियों को अंत-करण की स्वतंत्रता और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता का समान अधिकार है।
- यह लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन है।
- राज्य धार्मिक प्रथाओं से संबंधित आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य पंथनिरपेक्ष गतिविधियों को विनियमित कर सकता है, और सामाजिक कल्याण और सुधार के लिये उपबंध कर सकता है।
- अनुच्छेद 26 – धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता: प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को निम्नलिखित अधिकार हैं:
- धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिये संस्थानों की स्थापना और उनका पोषण करना।
- धर्म विषयक कार्यों में का प्रबंध करना।
- जंगम और स्थावर संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व को अर्जित करना।
- ऐसी संपत्ति का प्रबंधन विधि के अनुसार करना।
- अनुच्छेद 27: किसी भी व्यक्ति को किसी विशिष्ट धर्म के प्रचार या पोषण के लिये करों का संदाय करने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता है।
- अनुच्छेद 28: राज्य निधि से पूर्णतः संचालित शिक्षण संस्थानों में कोई धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं की जाएगी।
धर्म और संपत्ति की स्वतंत्रता:
- अनुच्छेद 26 किसी संप्रदाय के संपत्ति रखने और प्राप्त करने के अधिकार को मान्यता देता है, लेकिन ऐसी संपत्ति "विधि के अनुसार" प्राप्त और प्रशासित की जानी चाहिये।
- जैसा कि वर्तमान मामले में दोहराया गया है, इससे राज्य या स्थानीय निकाय से सार्वजनिक भूमि के किसी विशेष टुकड़े को धार्मिक प्रयोग के लिये आवंटित करने की मांग करने का अधिकार उत्पन्न नहीं होता है।
अंतिम संस्कार का अधिकार और मृतकों की गरिमा:
- परमानंद कटारा बनाम भारत संघ (1995) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 21 के अधीन गरिमा और निष्पक्ष व्यवहार का अधिकार न केवल जीवित व्यक्ति तक अपितु मृत्यु के बाद उसके शरीर तक भी विस्तारित होता है।
- आश्रय अधिकार अभियान बनाम भारत संघ (2002) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि एक बेघर मृतक व्यक्ति अपने धार्मिक विश्वास के अनुसार सम्मानजनक दफन या दाह संस्कार का हकदार है।
उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक उपयोगिता वाली भूमि पर विधिक स्थिति क्या है?
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006:
- किसी ग्राम सभा या स्थानीय निकाय के पास निहित भूमि को व्यापक समुदाय के लाभ के लिये रखा जाता है।
- संहिता की धारा 77 उन जमीनों से संबंधित है जिनमें भूमिधारी अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं, जिसमें सार्वजनिक उपयोग की भूमि जैसे कि दफन और श्मशान भूमि, चारागाह और तालाब शामिल हैं।
- वर्तमान अनुरोध को संहिता की धारा 77(2) के अधीन अस्वीकार कर दिया गया।
निर्णय का स्वरूप:
- किसी विशेष भूखंड को कब्रिस्तान में परिवर्तित किया जाना चाहिये या नहीं, यह एक नीतिगत और कार्यकारी मामला है, जो भूमि की उपलब्धता, मौजूदा सुविधाओं और क्षेत्र में रहने वाले सभी समुदायों के हितों जैसे कारकों पर निर्भर करता है।
- न्यायालय, अनुच्छेद 226 के अधीन रिट अधिकारिता का प्रयोग करते हुए, सामान्यतः अधिकारियों को किसी विशिष्ट भूखंड को आवंटित करने का निदेश नहीं देते हैं, क्योंकि इस संबंध में कोई लागू करने योग्य विधिक अधिकार मौजूद नहीं है।
सिविल कानून
वाद-हेतुक के अभाव में किसी पक्षकार को वाद में बने रहने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता
14-Oct-2026
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मोहम्मद सुल्तान भट बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य "...निजी प्रत्यर्थियों को ऐसे वाद में पक्षकार बनने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता है, जिसमें न तो वादी को उनके विरुद्ध कोई वाद-हेतुक प्राप्त हुआ है और न ही उनके विरुद्ध कोई अनुतोष मांगा गया है।" न्यायमूर्ति एम.ए. चौधरी |
स्रोत: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.ए. चौधरी ने मोहम्मद सुल्तान भट बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10(2) के अधीन भूमि विवाद के वाद से तीन निजी व्यक्तियों को हटाने के विचारण न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि राजस्व अधिकारियों के साथ विवाद का निपटारा उनकी अनुपस्थिति में भी प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन दायर याचिका को खारिज कर दिया।
मोहम्मद सुल्तान भट बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
याचिकाकर्त्ता मोहम्मद सुल्तान भट ने श्रीनगर के तैलबल जिले के डेंजरपोरा स्थित भूमि के संबंध में घोषणा और स्थायी व्यादेश हेतु एक वाद दायर किया, जिसमें राजस्व अधिकारियों के साथ-साथ निजी व्यक्तियों को भी प्रतिवादी बनाया गया।
विवाद निम्नलिखित प्रकार से उत्पन्न हुआ:
- 1967 में दर्ज एक उत्तराधिकार परिवर्तन के अनुसार, याचिकाकर्त्ता के पिता की संपत्ति उसे और उसके भाई को अंतरित कर दी गई थी, जिसमें उनकी दो बहनों को शामिल नहीं किया गया था।
- बहनों में से एक ने वित्तीय आयुक्त के समक्ष इस परिवर्तन को चुनौती दी, जिन्होंने 2017 में इसे अपास्त कर दिया और मुस्लिम वैयक्तिक विधि के अनुसार नए सिरे से परिवर्तन की कार्यवाही शुरू करने का निदेश दिया।
याचिकाकर्त्ता ने यह प्रस्तुत किया कि:
- बाद में उनकी बहनों के साथ एक समझौता हुआ, जिसके अधीन एक बहन को उसका अंश नकद में मिला और दूसरी को जमीन दी गई।
- समझौते और सिविल कार्यवाही के लंबित होते हुए भी, राजस्व अधिकारियों ने निजी प्रत्यर्थियों के अनुरोध पर संपत्ति से संबंधित कार्यवाही जारी रखी।
निचली अदालत के समक्ष कार्यवाही:
- निजी प्रत्यर्थियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने की मांग की, यह तर्क देते हुए कि कोई वाद-हेतुक प्रकट नहीं किया गया था और उनके विरुद्ध कोई अनुतोष नहीं मांगा गया था।
- विचारण न्यायालय (तीसरे सिविल अधीनस्थ न्यायाधीश (वन मजिस्ट्रेट), श्रीनगर) ने वादपत्र को नामंजूर करने से इंकार कर दिया।
- यद्यपि, बाद में इसने आदेश I नियम 10(2) सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन उनके नाम हटा दिये, यह मानते हुए कि उन्हें अनुचित तरीके से शामिल किया गया था।
- याचिकाकर्त्ता ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10(2) के दायरे पर:
- यह उपबंध न्यायालय को अनुचित रूप से शामिल किये गए पक्षकार को हटाने या ऐसे व्यक्ति को जोड़ने का अधिकार देता है जिसकी उपस्थिति वाद में शामिल प्रश्नों के प्रभावी और पूर्ण निर्णय के लिये आवश्यक है।
- न्यायालय ने निम्नलिखित के बीच अंतर किया:
- आवश्यक पक्षकार – वह पक्षकार जिसके बिना कोई प्रभावी आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
- उचित पक्षकार – वह व्यक्ति जिसकी उपस्थिति पूर्ण और अंतिम निर्णय लेने में सक्षम बनाती है, भले ही उसके विरुद्ध कोई विशिष्ट अनुतोष का दावा न किया गया हो।
- किसी व्यक्ति को पक्षकार के रूप में शामिल करने का एकमात्र कारण यह है कि वह परिणाम से आबद्ध हो, और उसके बिना संबंधित प्रश्न का प्रभावी और पूर्ण रूप से समाधान नहीं किया जा सकता है।
अभिवचनों के आधार पर:
- निजी प्रत्यर्थियों के विरुद्ध न तो कोई वाद-हेतुक बताया गया था और न ही कोई विनिर्दिष्ट अनुतोष की मांग की गई थी।
- वादपत्र के अनुसार ही, तहसीलदार और नायब तहसीलदार संभागीय आयुक्त के निर्देशों के अनुसार कार्य कर रहे थे, और याचिकाकर्त्ता मूल रूप से राजस्व अधिकारियों की कार्रवाई को चुनौती दे रहा था।
निजी प्रत्यर्थियों की उपस्थिति के संबंध में:
- राजस्व अधिकारियों के समक्ष कार्यवाही को निजी प्रत्यर्थियों के बिना भी प्रभावी ढंग से निपटाया जा सकता है।
- उनकी उपस्थिति आवश्यक नहीं थी, और उन्हें ऐसे वाद में बने रहने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता था जहाँ कोई वाद-हेतुक उत्पन्न नहीं हुआ था और उनके विरुद्ध कोई अनुतोष नहीं मांगा गया था।
अनुच्छेद 227 के अधीन हस्तक्षेप पर:
- विचारण न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10(2) के अधीन अपनी शक्ति का सही ढंग से प्रयोग किया था।
- याचिकाकर्त्ता आदेश में किसी भी प्रकार की विकृति या अवैधता को प्रदर्शित करने में असफल रहा, जिसके लिये उच्च न्यायालय के पर्यवेक्षी अधिकारिता के अधीन हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।
निष्कर्ष:
- न्यायालय ने याचिका और उससे संबंधित आवेदन को खारिज कर दिया, विचारण न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और सभी लागू अंतरिम निर्देशों को रद्द कर दिया।
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 1 नियम 10 क्या है?
अर्थ और प्रकृति:
- सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 1 वादों के पक्षकारों से संबंधित है, अर्थात्, किन लोगों को वादी और प्रतिवादी के रूप में शामिल किया जा सकता है।
- नियम 10 न्यायालय को कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में पक्षकारों को प्रतिस्थापित करने, जोड़ने या हटाने के द्वारा पक्षकारों से संबंधित दोषों को दूर करने का अधिकार देता है।
- इसका उद्देश्य वादों की बहुलता से बचना और यह सुनिश्चित करना है कि विवाद के सभी प्रश्नों का अंतिम निर्णय एक ही कार्यवाही में हो जाए।
सांविधिक शर्तें:
- नियम 10(1) – गलत वादी के नाम से वाद: जहाँ सद्भावनापूर्ण गलती से किसी गलत व्यक्ति के नाम पर वादी के रूप में वाद दायर किया गया हो, तो न्यायालय उचित वादी को प्रतिस्थापित या जोड़ सकता है।
- नियम 10(2) – न्यायालय पक्षकारों को हटा या जोड़ सकता है: न्यायालय किसी भी प्रक्रम पर, आवेदन सहित या उसके बिना, और ऐसी शर्तों पर जो उचित प्रतीत हों, आदेश दे सकता है:
- किसी भी पक्षकार का नाम, जिसे अनुचित रूप से शामिल किया गया हो, हटा दिया जाएगा; और
- उन सभी व्यक्तियों का नाम जोड़ा जाएगा जिन्हें शामिल किया जाना चाहिये था, या जिनकी उपस्थिति प्रभावी और पूर्ण न्यायनिर्णय के लिये आवश्यक है।
- नियम 10(3): किसी भी व्यक्ति को उसकी सहमति के बिना वादी के रूप में, या किसी अक्षम वादी के वादमित्र के रूप में नहीं जोड़ा जाएगा।
- नियम 10(4): जहाँ कोई प्रतिवादी जोड़ा जाता है, वहाँ वादपत्र में आवश्यकतानुसार संशोधन किया जाएगा और समन तथा वादपत्र की संशोधित प्रतियाँ नए प्रतिवादी को भेजी जाएँगी।
- नियम 10(5): किसी नए जोड़े गए प्रतिवादी के विरुद्ध कार्यवाही समन की तामील पर ही प्रारंभ मानी जाएगी, जो परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 21 के अधीन है।
संबंधित उपबंध:
- आदेश 1 नियम 9: पक्षकारों के कुसंयोजन या असंयोजन के कारण कोई भी वाद खारिज नहीं किया जाएगा, सिवाय आवश्यक पक्षकार के कुसंयोजन होने के।
- आदेश 1 नियम 13: असंयोजन या कुसंयोजन के संबंध में आपत्तियां यथाशीघ्र उठाई जानी चाहिये, अन्यथा उन्हें क्षमा किया हुआ माना जाएगा।
- आदेश 7 नियम 11: वादपत्र को नामंजूर करने का उपबंध करता है, जिसमें वह स्थिति भी शामिल है जब उसमें वाद-हेतुक प्रकट नहीं होता है। नामंजूरी पूरे वादपत्र के विरुद्ध कार्य करती है, यही कारण है कि विचारण न्यायालय ने यहाँ आदेश I नियम 10(2) का प्रयोग केवल अनुचित रूप से शामिल किये गए प्रतिवादियों को हटाने के लिये किया।
- आवश्यक पक्षकार बनाम उचित पक्षकार:
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आधार |
आवश्यक पक्षकार |
उचित पक्षकार |
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अर्थ |
ऐसा पक्षकार जिसके बिना कोई प्रभावी डिक्री पारित नहीं की जा सकती। |
ऐसा पक्षकार जिसकी उपस्थिति से वाद का पूर्ण एवं अंतिम न्यायनिर्णयन करने में सहायता मिलती है। |
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अनुतोष |
जिसके विरुद्ध कोई अनुतोष चाहा गया हो। |
जिसके विरुद्ध कोई अनुतोष चाहा जाना आवश्यक नहीं है। |
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अनुपस्थिति का प्रभाव |
वाद खारिज किए जाने योग्य हो सकता है। |
वाद विफल नहीं होता। |
अनुच्छेद 227 के अंतर्गत पर्यवेक्षी अधिकारिता क्या है?
अर्थ और प्रकृति:
- अनुच्छेद 227 प्रत्येक उच्च न्यायालय को उसके क्षेत्रीय अधिकारिता के अंतर्गत आने वाले सभी न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण की शक्ति प्रदान करता है।
- इसका उद्देश्य अधीनस्थ न्यायालयों को उनकी अधिकार सीमा के भीतर रखना है, और यह अपील या पुनरीक्षण संबंधी अधिकारिता नहीं है।
विस्तार:
- उच्च न्यायालय केवल तभी हस्तक्षेप करता है जब अधीनस्थ न्यायालय ने अधिकारिता से बाहर जाकर कार्य किया हो, अपनी अधिकारिता का उल्लंघन किया हो, या कोई स्पष्ट त्रुटि की हो जिसके परिणामस्वरूप गंभीर अन्याय हुआ हो।
- तथ्यों या विधि की मात्र त्रुटियां, या एक भिन्न संभावित दृष्टिकोण, हस्तक्षेप को उचित नहीं ठहराते।