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सांविधानिक विधि
मासिक धर्म स्वच्छता संबंधी निर्देशों को लेकर राज्यों को अवमान की चेतावनी
16-Oct-2026
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डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार और अन्य "यदि निर्णय में कही गई बातें सिर्फ कागजों पर ही रह जाएंगी, तो केंद्र शासित प्रदेश, राज्य/केंद्र शासित प्रदेश इस मौलिक अधिकार को कैसे लागू करेंगे?" न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार और अन्य (2026) के मामले की सुनवाई की। न्यायालय ने इस बात पर असंतोष व्यक्त किया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने 30 जनवरी, 2026 के उस निर्णय को लागू करने के लिये केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, जिसमें मासिक धर्म स्वच्छता को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है।
न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि अगली सुनवाई से पहले आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई तो दोषी राज्यों के मुख्य सचिवों को अवमानना नोटिस जारी किये जाएंगे।
डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला एक लोकहित याचिका से उत्पन्न हुआ है जिसमें देश भर में स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिये मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं को सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की गई है।
- 30 जनवरी, 2026 को दिये गए अपने निर्णय में, उच्चतम न्यायालय ने मासिक धर्म स्वच्छता/मासिक धर्म स्वास्थ्य को अनुच्छेद 21 के अधीन जीवन के अधिकार का एक पहलू घोषित किया।
- न्यायालय ने कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिये केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति को पूरे भारत में लागू करने का निर्देश दिया, जिसमें शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के सरकारी और निजी दोनों प्रकार के स्कूल शामिल हैं।
- अन्य उपायों के अलावा, न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का निदेश दिया:
- उपयोग योग्य जल संपर्क के साथ कार्यात्मक लिंग-विभाजित शौचालय।
- साबुन और पानी से धोने की सुविधा उपलब्ध हो।
- सैनिटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध हो।
- स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर बनाए जाएं, जिनमें अतिरिक्त अंडरवियर, यूनिफॉर्म, डिस्पोजेबल पैड और मासिक धर्म संबंधी आपात स्थितियों के लिये अन्य सामग्री उपलब्ध कराई जाए।
- न्यायालय ने 1 सितंबर, 2026 के अपने आदेश द्वारा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्णय के कार्यान्वयन में पाई गई कमियों की रिपोर्ट करने का निदेश दिया।
- इसी क्रम में न्यायालय ने निम्नलिखित कार्य किये:
- लिंग-आधारित शौचालयों, हाथ धोने की सुविधाओं, सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों और अपशिष्ट निपटान प्रणालियों से संबंधित आंकड़ों में विसंगतियों को उजागर किया गया।
- यह प्रश्न उठाया गया कि क्या केंद्र सरकार ने राज्यों द्वारा प्रस्तुत जानकारी की पर्याप्त रूप से जांच की थी।
- शौचालय के रखरखाव और सफाई कर्मचारियों में मौजूद कमियों को दूर करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
- जिला शिक्षा अधिकारियों को निदेश दिया गया कि वे विद्यालयों का अचानक निरीक्षण करने के लिये शिक्षकों की टीमें गठित करें।
- निदेश दिया गया कि अनुपालन रिपोर्टें केवल उपलब्धियों को सूचीबद्ध करने के बजाय बकाया कमियों, उनके कारणों और उन्हें दूर करने के लिये आवश्यक समय पर ध्यान केंद्रित करें।
- जैवअपघटनीय, जैव-अनुकूल और खाद बनाने योग्य सैनिटरी नैपकिन की ओर धीरे-धीरे बदलाव का आह्वान किया गया।
- बाद की सुनवाई में, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने न्यायालय को सूचित किया कि यद्यपि केंद्र शासित प्रदेश ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ इस मुद्दे को उठाया था, लेकिन उनमें से किसी ने भी अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की प्रतिक्रिया न मिलने पर:
- न्यायालय ने कहा कि वह यह समझने में असमर्थ है कि जब केंद्र सरकार आवश्यक जानकारी मांगती है तो राज्य और केंद्र शासित प्रदेश जवाब क्यों नहीं देते हैं।
- इसमें कहा गया कि केंद्र शासित प्रदेशों, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अनुच्छेद 21 के अधीन मौलिक अधिकार के रूप में मासिक धर्म स्वच्छता को घोषित करने वाले निर्णय के महत्त्व का एहसास हो गया होगा।
निर्णय के केवल कागज़ों तक सीमित रह जाने के जोखिम के संबंध में:
- न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि निर्देशों को लागू नहीं किया गया तो निर्णय केवल कागजों पर ही रह जाएगा, और प्रश्न उठाया कि अधिकारी तब उस मौलिक अधिकार को कैसे प्रभावी बनाएंगे जिसे उन्होंने मान्यता दी है।
निर्णय के विषय पर:
- न्यायालय ने दोहराया कि जनवरी का निर्णय विशेष रूप से देश के दूरदराज के भागों में रहने वाली युवा लड़कियों की उस समस्या का समाधान करने के लिये था, जो मासिक धर्म संबंधी कठिनाइयों के कारण शिक्षा छोड़ देती हैं।
निर्देश जारी किये गए:
- केंद्र शासित प्रदेश को निदेश दिया गया कि वह प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के साथ इस मुद्दे को गंभीरता से उठाए और निर्णय को लागू करने के लिये उठाए गए उपायों के बारे में लिखित जानकारी प्राप्त करे।
- संघ को निदेश दिया गया था कि वह निर्णय का फिर से अध्ययन करे और इसके कार्यान्वयन के हर पहलू पर जानकारी प्राप्त करे, विशेष रूप से 1 सितंबर के आदेश के पैराग्राफ 11 और 13 से 23 पर ध्यान दे।
- संघ को प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश से उचित प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिये एक प्रश्नावली तैयार करने के लिये कहा गया था।
अवमान की चेतावनी:
- न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को "एक अंतिम अवसर" प्रदान किया ।
- इसमें चेतावनी दी गई है कि यदि अगली तारीख को केंद्र सरकार यह रिपोर्ट करती है कि किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने जवाब नहीं दिया है, तो न्यायालय संबंधित राज्य के मुख्य सचिव को अवमानना का नोटिस जारी करने की कार्यवाही करेगा।
निष्कर्ष:
- इस मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर, 2026 को दोपहर 2:30 बजे होगी ।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 क्या है?
बारे में:
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण को प्रत्याभूत करता है।
- इसमें यह उपबंधित किया गया है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं।
- यह सभी व्यक्तियों, नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों के लिये उपलब्ध है।
विस्तृत निर्वचन:
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के बाद से, उच्चतम न्यायालय ने यह माना है कि किसी व्यक्ति को जीवन या स्वतंत्रता से वंचित करने की प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष और उचित होनी चाहिये।
- जीवन के अधिकार का निर्वचन मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकार के रूप में किया गया है, न कि केवल पशुवत अस्तित्व के रूप में (फ्रांसिस कोराली मुलिन बनाम प्रशासक, दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश (1981))।
- न्यायिक निर्वचन के माध्यम से, अनुच्छेद 21 में स्वास्थ्य का अधिकार, निजता का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, आश्रय का अधिकार और शिक्षा का अधिकार आदि सम्मिलित किया गया है।
- डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार (2026) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने मासिक धर्म स्वच्छता/मासिक धर्म स्वास्थ्य को अनुच्छेद 21 के एक पहलू के रूप में जोड़ा।
संबंधित सांविधानिक उपबंध:
- अनुच्छेद 15(3): राज्य को महिलाओं और बालकों के लिये विशेष उपबंध करने में सक्षम बनाता है।
- अनुच्छेद 21क: 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बालकों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है।
- अनुच्छेद 39(ङ) और (च): राज्य को यह सुनिश्चित करने का निदेश देता है कि नागरिकों के स्वास्थ्य का दुरुपयोग न हो और बालकों को स्वस्थ तरीके से और स्वतंत्रता और गरिमा की स्थितियों में विकसित होने के अवसर दिये जाएं।
- अनुच्छेद 47: राज्य पर पोषण स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाने तथा लोक स्वास्थ्य में सुधार करने का कर्त्तव्य निर्धारित करता है।
उच्चतम न्यायालय के पास अवमानना के लिये दण्डित करने की क्या शक्तियां हैं?
सांविधानिक आधार:
- अनुच्छेद 129: उच्चतम न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है और उसे ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त हैं, जिनमें स्वयं की अवमानना के लिये दण्ड देने की शक्ति भी शामिल है।
- अनुच्छेद 142(2): संसद द्वारा बनाई गई विधि के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय को स्वयं की अवमानना का अन्वेषण करने और दण्डित करने की शक्ति है।
न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971:
- धारा 2(ख) – सिविल अवमान: न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट या अन्य आदेशिका की जानबूझकर अवज्ञा करना, अथवा न्यायालय से किये गए किसी वचनबंध को जानबूझकर भंग करना, अभिप्रेत है।
- धारा 2(ग) – आपराधिक अवमान: किसी भी ऐसे कार्य का प्रकाशन या करना जो न्यायालय के अधिकार को कलंकित करता हो या कम करता हो, न्यायिक कार्यवाही में पूर्वाग्रह उत्पन्न करता हो या हस्तक्षेप करता हो, या न्याय प्रशासन में बाधा डालता हो।
- धारा 12 – दण्ड: छह माह तक के साधारण कारावास से, या ₹2,000 तक के जुर्माने से, या दोनों से दंडित किया जा सकता है। न्यायालय की संतुष्टि के अनुरूप क्षमायाचना किए जाने पर अभियुक्त को उन्मोचित किया जा सकता है अथवा दंड का परिहार किया जा सकता है।
पारिवारिक कानून
पुनर्विवाह स्थायी निर्वाह-व्यय प्राप्त करने में स्वतः बाधा नहीं है
16-Oct-2026
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बी. बनाम श्रीमती ए. "भरण-पोषण का उद्देश्य उचित परिस्थितियों में पति या पत्नी को वित्तीय सहायता और उचित जीविका प्रदान करना है; यह कोई पुरस्कार, इनाम या निरंतर अधिकार नहीं है..." न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण |
स्रोत: कर्नाटक उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण की खंडपीठ ने बी. बनाम श्रीमती ए. (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि तलाकशुदा पत्नी का पुनर्विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 25 के अधीन स्थायी निर्वाह-व्यय की राशि निर्धारित करने में एक महत्त्वपूर्ण कारक है, यद्यपि यह उसके हक से स्वतः वंचित करने वाला कारक नहीं है। न्यायालय ने पति की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए स्थायी निर्वाह-व्यय 25 लाख रुपए से घटाकर 10 लाख रुपए कर दिया।
बी. बनाम श्रीमती ए. (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- दोनों पक्षकारों का विवाह 2021 में हुआ था।
- पत्नी ने आरोप लगाया कि विवाह के तीन महीने बाद से ही पति ने उसे मानसिक और शारीरिक क्रूरता, लैंगिक दुर्व्यवहार, मनमानी पाबंदियों और मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित करने का शिकार बनाया और उसे 2022 में वैवाहिक घर से निकाल दिया गया।
- पति ने आरोपों से इंकार करते हुए दावा किया कि उसने पत्नी की सभी आवश्यकताओं को पूरा किया, उसे महंगे उपहार दिये और सुलह के कई प्रयास किये। उसने आरोप लगाया कि पत्नी पुणे में पृथक् आवास पर अड़ी हुई थी और अपनी मर्जी से वापस आने से इंकार कर रही थी।
- मैसूरु कुटुंब न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(iक) और 13(2)(ii) के अधीन विवाह भंग कर दिया और पत्नी को स्थायी निर्वाह-व्यय के रूप में 25 लाख रुपए प्रदान किये।
- कुटुंब न्यायालय ने कहा कि पति का वार्षिक वेतन 25 लाख रुपए था, जबकि पत्नी का वार्षिक वेतन 7 लाख रुपए था।
- पति ने केवल स्थायी निर्वाह-व्यय की राशि को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में अपील की, न कि विवाह विच्छेद को।
- उन्होंने तर्क दिया कि कुटुंब न्यायालय ने उनके आश्रित माता-पिता के प्रति उनके वित्तीय दायित्वों पर विचार नहीं किया था।
- अपील लंबित रहने के दौरान, पत्नी के अधिवक्ता ने विवाह प्रमाण पत्र के साथ एक ज्ञापन दाखिल किया जिसमें कहा गया कि उसने 21 अप्रैल, 2024 को पुनर्विवाह कर लिया था ।
- इसके बाद पति ने तर्क दिया कि पत्नी का पुनर्विवाह निर्वाह-व्यय की राशि निर्धारित करने में एक प्रासंगिक कारक था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
निर्वाह-व्यय में परिवर्तन करने की शक्ति के संबंध में:
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 न्यायालय को परिस्थितियों में परिवर्तन होने पर स्थायी निर्वाह-व्यय के आदेश को बदलने, संशोधित करने या रद्द करने में सक्षम बनाती है।
- धारा 25(3) में विशेष रूप से ऐसे परिवर्तन की परिकल्पना की गई है जहाँ जिस पक्षकार के पक्ष में आदेश दिया गया था उसने पुनर्विवाह कर लिया है।
स्थायी निर्वाह-व्यय के अवधारण के संबंध में:
- स्थायी निर्वाह-व्यय अवधारित करने का कोई निश्चित फार्मूला नहीं है।
- न्यायालय को दोनों पक्षकारों की आय और संपत्ति, उनके संबंधित साधन, स्थिति, कमाई की क्षमता, भविष्य की संभावनाएं, उचित आवश्यकताएं और मामले की अन्य परिस्थितियों पर विचार करना चाहिये।
- इन परिस्थितियों पर प्रभाव डालने वाली बाद की घटनाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिये।
- कुटुंब न्यायालय ने पति की आय और वित्तीय क्षमता, पत्नी की अपेक्षाकृत कम आय और विवाह विच्छेद के बाद उसे जिन परिस्थितियों में रहना होगा, उन सभी बातों पर विचार किया था।
पुनर्विवाह के प्रभाव पर:
- पत्नी के पुनर्विवाह ने उन परिस्थितियों को काफी हद तक बदल दिया जो कुटुंब न्यायालय द्वारा विवादित निर्णय सुनाए जाने के समय उसकी भविष्य की वित्तीय आवश्यकताओं के आकलन के लिये सुसंगत थीं।
- एक बार जब तलाकशुदा पत्नी स्वेच्छा से पुनर्विवाह कर लेती है, तो भरण-पोषण जारी रखने का आधार काफी हद तक बदल सकता है, विशेषत: जहाँ नया विवाह साथ, समर्थन और वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है।
- तलाकशुदा पति या पत्नी निर्वाह-व्यय को एक सुनिश्चित मौद्रिक लाभ के रूप में नहीं मान सकते जो वैवाहिक और वित्तीय परिस्थितियों में बाद में होने वाले परिवर्तनों के होते हुए भी बना रहता है।
- आर्थिक कठिनाई को कम करने के उद्देश्य से दिया गया वैवाहिक उपाय केवल इसलिये अप्रत्याशित लाभ में परिवर्तित नहीं हो सकता क्योंकि प्राप्तकर्ता ने पुनर्विवाह कर लिया है।
पुनर्विवाह स्वतः ही बाधा नहीं है:
- शरथ कैरियप्पा के.एस. बनाम श्रीमती शारिन एन.एस. (2024) पर विश्वास करते हुए, जहाँ एक खंडपीठ ने अपील के लंबित रहने के दौरान पत्नी के पुनर्विवाह के बाद स्थायी निर्वाह-व्यय कम कर दिया था, न्यायालय ने माना कि पुनर्विवाह अपने आप में स्थायी निर्वाह-व्यय के हकदार होने की परिस्थितियों को समाप्त नहीं करता है।
- यद्यपि, पुनर्विवाह परिस्थितियों में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है जिसे देय राशि का अवधारण करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिये।
पति द्वारा बताए गए अन्य आधारों पर:
- न्यायालय ने पत्नी द्वारा आय का प्रकटन न करने और आश्रित माता-पिता के प्रति पति के वित्तीय दायित्वों के संबंध में पति के दावों को खारिज कर दिया, क्योंकि इन दावों के समर्थन में संपत्ति और देनदारियों का कोई शपथपत्र दाखिल नहीं किया गया था।
निष्कर्ष:
- न्यायालय ने स्थायी निर्वाह-व्यय की राशि 25 लाख रुपए से घटाकर 10 लाख रुपए कर दी।
- अपील को आंशिक रूप से मंजूर कर लिया गया और कुटुंब न्यायालय के निर्णय को उस हद तक संशोधित कर दिया गया।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 क्या है?
बारे में:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 स्थायी निर्वाह-व्यय और भरण-पोषण से संबंधित है ।
- यह लिंग-तटस्थ है और इसके अधीन पति या पत्नी में से कोई भी स्थायी निर्वाह-व्यय का दावा कर सकता है।
उपबंध:
- धारा 25(1): हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने वाला कोई न्यायालय यथास्थिति पत्नी या पति द्वारा इस प्रयोजन के लिये अपने से आवेदन किये जाने पर आज्ञप्ति देने के समय या तत्पश्चात किसी समय प्रत्युत्तरदाता या प्रत्युत्तरदात्री को आदिष्ट कर सके कि आवेदक या आवेदिका के अपने भरण-पोषण और पालन के लिये ऐसे आवेदक या आवेदिका के जीवन काल से अधिक न होने वाली अवधि के लिये ऐसी पूर्ण राशि या ऐसी मासिक कालावधीय राशि देता या देती रहे जैसी कि प्रत्युत्तरदाता या प्रत्युत्तरदात्री को अपनी आय और अन्य संपत्ति को, यदि कोई हो, आवेदक या आवेदिका की आय या संपत्ति को और पक्षकारों के आचरण और मामले की अन्य परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय को न्याय्य लगे और यदि आवश्यक हो तो ऐसी देनगी प्रत्युत्तरदाता या प्रत्युत्तरदात्री की स्थावर संपत्ति पर प्रभार द्वारा प्रतिभूत की जाएगी।
- धारा 25(2): यदि न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उपधारा (1) के अधीन अपने द्वारा दिये गये आदेश के पश्चात् किसी समय पक्षकारों में से किसी की परिस्थितियों में तब्दीली हो गई हो तो वह ऐसे किसी आदेश को ऐसी रीति में जैसी कि न्यायालय न्याय्य समझे किसी पक्षकार की प्रेरणा पर परिवर्तित, रूपभेदित या विखण्डित कर सकेगा।
- धारा 25(3): यदि न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उस पक्षकार ने जिसके पक्ष में कि इस धारा के अधीन आदेश दिया जा चुका है, पुनः विवाह कर लिया है यदि ऐसा पक्षकार पत्नी है। तो वह सती नहीं रही है, यदि ऐसा पक्षकार पति है तो उसने किसी स्त्री से विवाह के बाद लैंगिक सम्भोग किया है तो वह दूसरे पक्षकार की प्रेरणा पर ऐसे किसी आदेश को ऐसी रीति में जो न्यायालय न्यायसंगत समझे, परिवर्तित, उपांतरित या विखंडित कर सकेगा।
निर्वाह-व्यय अवधारित करने वाले कारक:
- राजनेश बनाम नेहा (2020) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने भरण-पोषण पर दिशानिर्देश निर्धारित करते हुए कहा कि सुसंगत कारकों में पक्षकारों की स्थिति, दावेदार की उचित आवश्यकताएं, दावेदार की स्वतंत्र आय और संपत्ति, वैवाहिक घर में जीवन स्तर और संदाय करने वाले पति या पत्नी की वित्तीय क्षमता और देनदारियां शामिल हैं।
- उच्चतम न्यायालय ने भरण-पोषण संबंधी कार्यवाही में दोनों पक्षकारों द्वारा परिसंपत्तियों एवं दायित्वों के प्रकटन का शपथपत्र दाखिल करना भी अनिवार्य कर दिया है, यही कारण है कि वर्तमान मामले में पति के निराधार दावों को स्वीकार नहीं किया जा सका।