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आपराधिक कानून
भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के अधीन ट्रांसजेंडर महिला 'महिला' नहीं है
17-Oct-2026
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मोहम्मद साकिर उर्फ मोहम्मद साकिर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य "भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 में उल्लिखित ‘महिला’ शब्द में केवल स्त्रीलिंग मानव व्यक्ति ही सम्मिलित है।" न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने मोहम्मद साकिर उर्फ मोहम्मद साकिर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि लिंग-पुनर्निर्धारण शल्यचिकित्सा (Sex-Reassignment Surgery) कराने के पश्चात् भी कोई ट्रांसजेंडर महिला, भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 के अंतर्गत ‘महिला’ की वैधानिक परिभाषा के अंतर्गत नहीं आएगी। प्रथमदृष्टया भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के अधीन कोई अपराध गठित नहीं होने का निष्कर्ष देते हुए, न्यायालय ने उस पुरुष अभियुक्त को जमानत प्रदान की, जिस पर विवाह का मिथ्या आश्वासन देकर एक ट्रांसजेंडर महिला के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने का आरोप था।
मोहम्मद साकिर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- सूचनाकर्ता, जो एक ट्रांसजेंडर महिला है, आवेदक द्वारा उससे विवाह करने के आश्वासन पर डेढ़ वर्ष से अधिक समय से उसके साथ संबंध में थी।
- उसने आरोप लगाया कि उससे 5 लाख रुपए से अधिक लेने के बाद उसने उससे विवाह करने से इंकार कर दिया।
- प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में आगे आरोप लगाया गया है कि उसने विवाह का मिथ्या वचन करके उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित किये थे।
- आवेदक ने जमानत मांगी। उसके अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 180 और 183 के अधीन दिये गए अपने कथनों में, सूचनाकर्ता ने कहा कि जन्म के समय उसे पुरुष के रूप में पहचाना गया था और 11 अप्रैल 2023 को उसकी योनि पुनर्निर्माण सर्जरी हुई थी।
- उसने रिश्ते में आने से पहले ही आवेदक को अपनी ट्रांसजेंडर पहचान के बारे में बता दिया था।
- 19 अगस्त 2026 की एक मेडिकल पैनल रिपोर्ट में उसे महिला नहीं, अपितु जननांगों में परिवर्तन वाला और गर्भाशय रहित पुरुष पाया गया।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के अनुसार पीड़ित महिला होनी चाहिये, और धारा 2(35) भारतीय न्याय संहिता महिला को केवल एक महिला मानव के रूप में परिभाषित करती है।
- राज्य ने जमानत आवेदन का विरोध करते हुए तर्क दिया कि किसी ट्रांसजेंडर महिला को केवल इस आधार पर ‘महिला’ की परिभाषा से अपवर्जित नहीं किया जाना चाहिये कि जन्म के समय उसे पुरुष के रूप में निर्दिष्ट किया गया था और बाद में उसने शल्यचिकित्सा कराई थी।
- विधिक प्रश्न के महत्त्व को देखते हुए, न्यायालय ने अधिवक्ता मयूरी मेहरोत्रा को न्यायालय का न्यायमित्र (Amicus Curiae) नियुक्त किया। उन्होंने प्रस्तुत किया कि:
- आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के विश्वनाथन कृष्णमूर्ति बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में दिये गए निर्णय पर विश्वास करते हुए, एक ट्रांसजेंडर महिला को महिला की परिभाषा से अपवर्जित नहीं किया जा सकता है।
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 के अधीन, सर्जरी के बाद प्रमाण पत्र प्राप्त करने वाली ट्रांसजेंडर महिला को महिला की परिभाषा के अंतर्गत माना जाएगा।
- न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के प्रयोजन के लिये एक ट्रांसजेंडर महिला को 'महिला' माना जाएगा।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत 'महिला' की परिभाषा पर:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 2(35) 'महिला' को किसी भी आयु की नारी मानव के रूप में परिभाषित करती है।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 2(10) पुरुष, महिला और ट्रांसजेंडर को लिंग के रूप में मान्यता देता है और ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के अधीन "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की परिभाषा को अपनाता है।
लागू विधि के संबंध में:
- चूँकि कथित घटना 30 मार्च 2026 के संशोधन से पहले हुई थी, इसलिये 2019 अधिनियम की असंशोधित धारा 2(ट) लागू होगी।
- इस परिभाषा में ट्रांस पुरुष और ट्रांस महिलाएं शामिल हैं, चाहे उन्होंने लिंग परिवर्तन सर्जरी या हार्मोन थेरेपी करवाई हो या नहीं।
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की अलग पहचान पर:
- 2019 के अधिनियम के अधीन एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की एक अलग पहचान होती है।
- जन्म के समय पुरुष के रूप में पहचाना गया व्यक्ति जो लिंग-परिवर्तन सर्जरी के बाद महिला बन जाता है, या जन्म के समय महिला के रूप में पहचाना गया व्यक्ति जो ऐसी सर्जरी के बाद पुरुष बन जाता है, वह एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति ही रहता है, न कि पुरुष या महिला मानव।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 में 'महिला' शब्द का अर्थ केवल एक महिला नारी से है।
- इसलिये, लिंग परिवर्तन सर्जरी के बाद भी, एक ट्रांसजेंडर महिला धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के अधीन 'महिला' की परिभाषा के दायरे में नहीं आती है।
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को उपलब्ध सुरक्षा के संबंध में:
- न्यायालय ने 2019 अधिनियम की धारा 18(घ) का उल्लेख किया, जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति को नुकसान या क्षति कारित करने वाले कृत्यों से संबंधित है, जिसमें शारीरिक और लैंगिक शोषण शामिल है।
विधायी आशय पर:
- गृह मामलों पर संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट संख्या 246 में एक उपयुक्त संशोधन के माध्यम से ट्रांसजेंडर महिलाओं को भारतीय न्याय संहिता के बलात्संग संबंधी प्रावधानों के दायरे में लाने की सिफारिश की गई थी।
- संसद ने इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया और 'महिला' की परिभाषा अपरिवर्तित रही।
निर्णय के दायरे के संबंध में:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणी धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के अधीन 'महिला' की व्याख्या तक ही सीमित है, न कि किसी अन्य अपराध के लिये।
निष्कर्ष:
- न्यायालय ने माना कि प्रथम दृष्टया धारा 69 भारतीय न्याय संहिता के अधीन कोई अपराध नहीं बनता है और आवेदक को शर्तों के अधीन जमानत दे दी।
- न्यायालय ने एमिकस क्यूरी की सहायता की सराहना की और उच्च न्यायालय विधिक सहायता सेवा समिति को उन्हें शुल्क के रूप में ₹10,000 का संदाय करने का निदेश दिया।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 क्या है?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 69 प्रवंचनापूर्ण साधनों, आदि का प्रयोग करके मैथुन से संबंधित है।
- यह एक नवीन उपबंध है, जिसका भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में कोई प्रत्यक्ष समतुल्य उपबंध नहीं था। भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत, ऐसे मामलों का सामान्यतः धारा 375 को धारा 90 (तथ्य की भ्रांति के अधीन दी गई सहमति) के साथ पढ़ते हुए निपटारा किया जाता था।
उपबंध:
- जो कोई प्रवंचनापूर्ण साधनों द्वारा या किसी महिला को विवाह करने का वचन देकर, उसे पूरा करने के किसी आशय के बिना, उसके साथ मैथुन करता है, ऐसा मैथुन बलात्संग के अपराध की कोटि में नहीं आता है, तो वह दोनों में से किसी भांति के ऐसी अवधि के कारावास से दण्डनीय होगा, जो दस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने के लिये भी दायी होगा।
- स्पष्टीकरण: "प्रवंचनापूर्ण साधनों" में, नियोजन या प्रोन्नति, या पहचान छिपाकर विवाह करने के लिये, उत्प्रेरण या उनका मिथ्या वचन, सम्मिलित है।
आवश्यक सामग्रियां:
- पीड़ित को धारा 2(35) भारतीय न्याय संहिता के अधीन परिभाषित 'महिला' होना चाहिये।
- मैथुन प्रवंचनापूर्ण साधनों या विवाह का वचन करके प्राप्त किया जाना चाहिये, जबकि उस वचन को पूरा करने का कोई आशय न हो।
- यह कृत्य बलात्संग का अपराध नहीं होना चाहिये।
संबंधित उपबंध
भारतीय न्याय संहिता की धारा 2(35)– महिला:
- "महिला" से तात्पर्य किसी भी आयु की स्त्री से है।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 2(10)– लिंग:
- सर्वनाम “वह” तथा उसके व्युत्पन्न रूपों का प्रयोग किसी भी व्यक्ति के लिए किया जाता है, चाहे वह पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर हो।
- “ट्रांसजेंडर” का वही अर्थ है जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 2(ट) के अंतर्गत दिया गया है।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 (संशोधित नहीं) की धारा 2(ट) – ट्रांसजेंडर व्यक्ति:
- एक ऐसा व्यक्ति जिसका लिंग जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाता।
- इसमें ट्रांस पुरुष और ट्रांस महिलाएं (चाहे उन्होंने लिंग परिवर्तन सर्जरी, हार्मोन थेरेपी, लेजर थेरेपी या कोई अन्य थेरेपी करवाई हो या नहीं), इंटरसेक्स भिन्नता वाले व्यक्ति, जेंडरक्वीर व्यक्ति और किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति सम्मिलित हैं।
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 18(घ):
- यह विधि किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के जीवन, सुरक्षा, स्वास्थ्य या कल्याण (मानसिक या शारीरिक) को नुकसान पहुँचाने, क्षति कारित करने या खतरे में डालने को दण्डित करती है, जिसमें शारीरिक, लैंगिक, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार सम्मिलित है।
- दण्ड: कम-से-कम छह माह का कारावास, जिसे दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, तथा जुर्माना।
सांविधानिक विधि
इंटरनेट तक पहुँच और उसका उपयोग करने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है
17-Oct-2026
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जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस और अन्य बनाम एस. हरीश और अन्य “हमारे बालकों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। हमारे बालकों को दोनों का अधिकार है।” न्यायमूर्ति जे.बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस और अन्य बनाम एस. हरीश और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि इंटरनेट तक पहुँच और उसका उपयोग करने का अधिकार भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और बालक, चाहे उनकी आयु कुछ भी हो, इस अधिकार का आनंद लेते हैं। न्यायालय ने ये टिप्पणियां सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य ऑनलाइन सेवाओं से बाल लैंगिक शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) का पता लगाने और उसे हटाने के तंत्र को मजबूत करने के निदेश जारी करते हुए कीं।
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस और अन्य बनाम एस. हरीश और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला आपराधिक अपील संख्या 2161-2162 वर्ष 2024 में दायर विविध आवेदन संख्या 2553-2554 वर्ष 2026 के माध्यम से सामने आया।
- जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस बनाम एस. हरीश के मामले में 2024 की आपराधिक अपीलों में बाल लैंगिक शोषण सामग्री से संबंधित अपराधों पर विचार किया गया, जहाँ उच्चतम न्यायालय ने "बाल लैंगिक शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री" (CSEAM) शब्द के उपयोग की सिफारिश की थी।
- वर्तमान कार्यवाही में, न्यायालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन सेवाओं पर "बाल लैंगिक शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री" (CSEAM) का पता लगाने और उसे हटाने के लिये निर्देशों पर विचार किया।
- इस संदर्भ में, न्यायालय ने इस बात की परीक्षा की कि क्या बालकों को उनकी अपनी सुरक्षा के लिये इंटरनेट और सोशल मीडिया से पूरी तरह से दूर रखा जाना चाहिये।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
इंटरनेट तक पहुँच और उसके उपयोग के अधिकार पर:
- संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन इंटरनेट तक पहुँच और उपयोग का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
- बालकों को, उनकी आयु चाहे जो भी हो, समान अधिकार प्राप्त हैं। उनसे इस अधिकार को पूरी तरह छीन लेना उतना ही बेतुका होगा जितना यह कहना कि एक निश्चित आयु से कम आयु के बालकों में रक्षा करने योग्य कोई विवेक या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं होती।
- बालकों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बालकों को दोनों का अधिकार है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक भाग के रूप में इंटरनेट पर:
- अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में जानने और सूचना और विचारों को प्राप्त करने और प्रदान करने का अधिकार शामिल है।
- इंटरनेट विचारों, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सूचनाओं का एक बाज़ार है। इसका महत्त्व केवल इसमें मौजूद सूचनाओं में ही नहीं, अपितु वयस्कों और बालकों दोनों को समान रूप से मिलने वाली पहुँच में भी निहित है।
- कई बालकों के लिये, विशेषत: दूरदराज के इलाकों में, इंटरनेट प्राय सीखने और जानकारी का एकमात्र स्रोत होता है।
- विशेष आवश्यकताओं वाले बालकों के लिये, यह प्राय एकमात्र ऐसी जगह होती है जहाँ उन्हें अपने जैसे अन्य लोगों के साथ मेलजोल मिलता है।
पूर्व निर्णयों के आधार पर:
- अनुराधा भासिन बनाम भारत संघ (2020) के मामले में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि इंटरनेट के माध्यम से वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा व्यापार या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) एवं 19(1)(छ) के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है। तथापि, न्यायालय ने इस प्रश्न पर कोई मत व्यक्त नहीं किया कि क्या स्वयं इंटरनेट तक पहुँचने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।
- प्रज्ञा प्रसून और अन्य बनाम भारत संघ (2025) के मामले में, न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अधीन डिजिटल पहुँच के अधिकार को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी।
- इन पूर्व निर्णयों के आधार पर, न्यायालय ने इंटरनेट के उपयोग के अधिकार को एक मौलिक अधिकार घोषित किया जिसे बच्चों से छीना नहीं जा सकता।
बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर व्यापक प्रतिबंधों के संबंध में:
- वर्तमान स्वरूप में इंटरनेट बच्चों के लिए पूर्णतः सुरक्षित नहीं है।
- तथापि, मध्यस्थों द्वारा हानिकारक सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने में विफल रहने के कारण बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना, समस्या के लिये पीड़ित को ही उत्तरदायी ठहराने के समान होगा।
- विधि द्वारा इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाने मात्र से बच्चे इसका उपयोग करना बंद नहीं कर देते। वे अनियंत्रित और संभावित रूप से अधिक असुरक्षित प्लेटफार्मों की ओर रुख कर सकते हैं।
- प्रतिबंधों के कारण, ऑनलाइन माध्यम से बहकावे या धमकी का सामना कर रहे बच्चे, डांट-फटकार के भय से, माता-पिता, संरक्षकों या विश्वसनीय वयस्कों को ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट करने में हिचकिचा सकते हैं।
- व्यापक प्रतिबंध "असंतुलन के नासाबित अप्रमाणित उपाय" हैं, और अभी तक किसी भी क्षेत्र ने यह नहीं दिखाया है कि इनसे बच्चे अधिक सुरक्षित हैं।
- आयु-आधारित प्रतिबंधों के लिये प्रत्येक उपयोगकर्ता की आयु की पहचान और सत्यापन की आवश्यकता होगी, जिसमें संवेदनशील डेटा का निरंतर संग्रह और निगरानी शामिल होगी, जिससे दुरुपयोग और निगरानी का अत्यधिक जोखिम उत्पन्न होता है।
बालकों के लिये आनुपातिक सुरक्षा उपायों पर:
- व्यापक प्रतिबंधों को अस्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि आयु-आधारित सुरक्षा उपाय नहीं होने चाहिये।
- बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके लिये उपलब्ध सामग्री को विनियमित करने के लिये कुछ सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं।
- यह प्रणाली बच्चों के सोशल मीडिया तक पहुँच पर माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी पर अधिक बाल दे सकती है, साथ ही उनके खातों के लिये एक समर्पित "चाइल्ड मोड" भी प्रदान कर सकती है।
- ऐसे सुरक्षा उपायों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:
- बच्चों के खातों को डिफ़ॉल्ट रूप से निजी बनाना।
- अज्ञात वयस्कों से संपर्क और संदेशों को प्रतिबंधित करना।
- बच्चों के लिये सुलभ विज्ञापनों और सामग्री को नियंत्रित करना।
- इन उपायों को किशोरों से पहले की आयु के बालकों के लिये लागू किया जा सकता है, जिसमें माता-पिता की सहमति को सत्यापित करने के लिये उचित और समानुपातिक साधन उपलब्ध कराए जाएंगे। इसकी प्रक्रिया केंद्र सरकार पर छोड़ दी गई है।
- केंद्र सरकार को बालकों की उन विशिष्ट श्रेणियों की सामग्री या सेवाओं तक पहुँच को प्रतिबंधित करने से नहीं रोका गया है जो उनके लिये स्वाभाविक रूप से हानिकारक हैं, जैसे कि वयस्क सामग्री वाली वेबसाइटें।
निष्कर्ष:
- न्यायालय ने बच्चों सहित प्रत्येक व्यक्ति के इंटरनेट तक पहुँचने एवं उसका उपयोग करने के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया।
- न्यायालय ने बाल लैंगिक शोषण एवं दुर्व्यवहार संबंधी सामग्री (CSEAM) का पता लगाने तथा उसे हटाने के लिये निर्देशों की एक श्रृंखला भी जारी की। इनमें एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस का निर्माण सम्मिलित है, जिससे सोशल मीडिया मंचों पर ऐसी सामग्री की पहचान एवं उसे हटाना संभव हो सके।
संविधान के अधीन इंटरनेट तक पहुँच का अधिकार क्या है?
बारे में:
- इंटरनेट तक पहुँचने और उसका उपयोग करने का अधिकार अब भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 21 के साथ अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन प्राप्त एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है।
- इसका स्पष्ट रूप से संविधान में उल्लेख नहीं है, लेकिन न्यायिक निर्वचन के माध्यम से इसे मौजूदा मौलिक अधिकारों में सम्मिलित कर लिया गया है।
अनुच्छेद 19(1)(क) – वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता:
- सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है।
- इसमें जानने का अधिकार, और सूचना एवं विचारों को प्राप्त करने और साझा करने का अधिकार सम्मिलित है।
- इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिए इस स्वतंत्रता का प्रयोग किया जाता है।
अनुच्छेद 19(2) – युक्तियुक्त निर्बंधन:
- भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हित में, या न्यायालय का अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में, राज्य अनुच्छेद 19(1)(क) के अधीन स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है।
- इस प्रकार के किसी भी निर्बंधन को आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिये।
अनुच्छेद 21 – प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण:
- किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
- उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के व्यापक निर्वचन करते हुए इसमें निजता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार और अब डिजिटल पहुँच का अधिकार तथा इंटरनेट का उपयोग करने का अधिकार जैसे अधिकारों को शामिल किया है।
अनुच्छेद 19(1)(छ) – व्यापार और व्यवसाय की स्वतंत्रता:
- यह किसी भी वृत्ति का अभ्यास करने अथवा कोई भी उपजीविका, व्यापार या व्यवसाय करने के अधिकार की प्रत्याभूति देता है।
- अनुराधा भासिन के मामले में, न्यायालय ने निर्णय दिया कि इंटरनेट के माध्यम से प्रयोग की जाने वाली यह स्वतंत्रता सांविधानिक रूप से संरक्षित है।