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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

माध्यस्थम् खंड आपराधिक कार्यवाही को बाधित नहीं करता है

 19-Oct-2026

इंड्रोनील गोहो बनाम रज़ौवोनुओ थोंग और अन्य 

"संविदात्मक दायित्व का पालन करने में परवर्ती विफलता मात्र से ऐसे आशय के विद्यमान होने का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।" 

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इंद्रनील गोहो बनाम रज़ौवोनुओ थोंग एवं अन्य (2026) का मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि किसी करार में माध्यस्थम् खंड का विद्यमान होना आपराधिक कार्यवाही को वर्जित नहीं करता है, तथापि न्यायालय को सर्वप्रथम यह निर्धारित करना होगा कि क्या लगाए गए आरोप कथित अपराध के आवश्यक तत्त्वों को प्रकट करते हैं। भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 417 और 420, जो अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 318(2) और 318(4) हैं, के अधीन छल के अपराध के आवश्यक तत्त्व सिद्ध न होने के कारण, न्यायालय ने गौहाटी उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया तथा अपीलकर्त्ता के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।  

इंद्रोनील गोहो बनाम रज़ौवोनुओ थोंग और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता दार्जिलिंग ऑर्गेनिक टी एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड (कंपनी) के सीईओ थे। 
  • प्रत्यर्थी संख्या 1, CR ट्रेडर्स की मालिक, ने कंपनी के साथ एक चाय बागान के संबंध में बातचीत की। 2021 में, समझौते से पहले, उन्होंने यूको बैंक को चाय बागान और बैंक के साथ उसके बंधक के बारे में लिखा। 
  • कंपनी और CR ट्रेडर्स के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये गए। अपीलकर्त्ता ने कंपनी के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के रूप में इस पर हस्ताक्षर किये। 
  • जून 2021 में, प्रत्यर्थी संख्या 1 ने दो संव्यवहार में कंपनी के खाते में 40,00,000 रुपए अंतरित किये। 
  • बाद में कंपनी ने इस आधार पर समझौता ज्ञापन को समाप्त कर दिया कि प्रत्यर्थी संख्या 1 इसके नियमों और शर्तों का पालन करने में असफल रहा था। 
  • 2022 में, प्रत्यर्थी संख्या 1 ने एक आपराधिक परिवाद दर्ज कराया जिसमें आरोप लगाया गया कि अपीलकर्त्ता ने उसे यह कहकर पैसे देने के लिये प्रेरित किया कि चाय बागान कंपनी का है, जबकि वास्तव में यह किसी अन्य कंपनी के स्वामित्व में था और यूको बैंक से संबंधित कार्यवाही का विषय था। समन जारी किया गया। 
  • अपीलकर्त्ता ने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 482 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528) के अधीन गुवाहाटी उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि: 
    • यह विवाद पूरी तरह से संविदात्मक था; 
    • समझौता ज्ञापन पर कंपनी ने हस्ताक्षर किये थे, न कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से। 
    • पैसा कंपनी के खाते में चला गया; और 
    • कंपनी को स्वयं अभियुक्त नहीं बनाया गया था। 
  • उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 417 और 420 के अधीन प्रथम दृष्टया मामला बनता है और समझौता ज्ञापन में माध्यस्थम् खंड रद्द करने का कोई आधार नहीं है।  
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

माध्यस्थम् खंड के प्रभाव पर: 

  • उच्च न्यायालय का यह निर्णय सही था कि माध्यस्थम् खंड स्वयं में आपराधिक कार्यवाही को नहीं रोकता है।  
  • यद्यपि, यह प्रस्ताव वास्तविक प्रश्न का उत्तर नहीं देता है। न्यायालय को पहले यह निर्धारित करना होगा कि क्या आरोप कथित अपराध के आवश्यक तत्त्वों को प्रकट करते हैं। 

संविदा भंग और छल के बीच अंतर पर: 

  • समिनाथन बनाम राज्य (पुलिस उप-निरीक्षक द्वारा प्रतिनिधित्व) के मामले पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि छल के अपराध के लिये, परिवादकर्त्ता को वचन या प्रतिनिधित्व करते समय कपटपूर्ण या बेईमान आशय को प्रदर्शित करना होगा। 
  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 417 और 420 के अधीन अपराध के लिये, संव्यवहार के प्रारंभ में बेईमानी का आशय मौजूद होना चाहिये और इसने परिवादकर्त्ता को संपत्ति से अलग होने के लिये प्रेरित किया होना चाहिये। 
  • किसी संविदात्मक दायित्व को पूरा करने में बाद में हुई विफलता, स्वयं में, ऐसे आशय का अनुमान लगाने का आधार नहीं बन सकती। 

अपीलकर्त्ता की स्थिति पर: 

  • समझौता ज्ञापन प्रत्यर्थी संख्या 1 और कंपनी के बीच था। अपीलकर्त्ता ने इस पर केवल कंपनी के CEO और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के रूप में हस्ताक्षर किये थे। 
  • 40,00,000 रुपए की राशि सीधे कंपनी के खाते में स्थानांतरित की गई थी। ऐसा कोई आरोप नहीं है कि अपीलकर्त्ता ने इसका कोई भाग अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये प्राप्त किया या उसका दुरुपयोग किया। 

कथित मिथ्या कथन के संबंध में: 

  • परिवाद में ही यह सुझाव दिया गया था कि अपीलकर्त्ता को इस बात की जानकारी थी कि चाय बागान और कारखाना कंपनी के स्वामित्व में नहीं थे, और इसे पूरे संव्यवहार के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिये। 
  • प्रत्यर्थी नंबर 1 को पता था कि चाय बागान यूको बैंक के पास बंधक रखा हुआ है। 
  • समझौते में यूको बैंक के बकाया और देनदारियों को चुकाने और अंततः चाय बागान का अधिग्रहण करने की परिकल्पना की गई थी। 
  • अभिलेख से पता चलता है कि कंपनी चाय बागान के कब्जे में थी और उसका संचालन कर रही थी, और इस संबंध में उसके पर्याप्त दावे थे। 
  • इन परिस्थितियों में, केवल यह दावा करना कि अपीलकर्त्ता को पता था कि प्रस्तुति मिथ्या है, संव्यवहार के प्रारंभ में बेईमानी के आशय को साबित नहीं करता है। 

विवाद की प्रकृति के संबंध में: 

  • समझौता ज्ञापन की समाप्ति वैध थी या नहीं, और क्या प्रत्यर्थी संख्या 1 धनवापसी या अन्य अनुतोष पाने का हकदार था, ये सिविल प्रश्न हैं। 
  • संविदात्मक संबंध बाद में टूट जाने मात्र से ऐसे मामलों को आपराधिक चरित्र नहीं दिया जा सकता। 
  • अभियोजन को जारी रखने से मुख्य रूप से संविदात्मक विवाद को आपराधिक मामले का रूप मिल जाएगा और यह विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। 

निष्कर्ष: 

  • न्यायालय ने अपील मंजूर कर ली और आपराधिक याचिका संख्या 32/2022 में उच्च न्यायालय के दिनांक 13.05.2025 के आदेश को अपास्त कर दिया। 
  • प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट, दीमापुर, नागालैंड के समक्ष लंबित C.R. केस संख्या 17/2022 और उससे उत्पन्न सभी कार्यवाही को अपीलकर्त्ता के संबंध में रद्द कर दिया गया।  
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रत्यर्थी संख्या 1 अपने सिविल या संविदात्मक दावों के लिये विधि में उपलब्ध किसी भी उपचार का सहारा लेने के लिये स्वतंत्र है। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 क्या है? 

 बारे में: 

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 318 छल के अपराध को परिभाषित करती है और उसे दण्डित करती है। 
  • यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 415, 417, 418 और 420 को एक ही उपबंध में समेकित करता है। 

उपबंध: 

  • धारा 318(1) — परिभाषा (धारा 415 आईपीसी): जो कोई किसी व्यक्ति से प्रवंचना कर उस व्यक्ति को, जिसे इस प्रकार प्रवंचित किया गया है, कपटपूर्वक या बेईमानी से उत्प्रेरित करता है कि वह कोई संपत्ति किसी व्यक्ति को परिदत्त कर दे, या यह सम्मति दे दे कि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति को रख रखे या जानबूझकर उस व्यक्ति को, जिसे इस प्रकार प्रवंचित किया गया है, उत्प्रेरित करता है कि वह ऐसा कोई कार्य करे, या करने का लोप करे, जिसे वह यदि उसे प्रत्येक प्रकार प्रवंचित न किया गया होता तो, न करता, या करने का लोप न करता, और जिस कार्य या लोप से उस व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, ख्याति संबंधी या साम्पत्तिक नुकसान या अपहानि कारित होती है, या कारित होनी संभाव्य है, वह छल करता है, यह कहा जाता है। 
  • धारा 318(2) — छल के लिये दण्ड (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 417): किसी भी प्रकार का कारावास जो तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या जुर्माना, या दोनों। 
  • धारा 318(3) — किसी व्यक्ति को सदोष हानि पहुँचाने के ज्ञान के साथ छल करना, जिसके हित की रक्षा करना अपराधी का दायित्व है (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 418): कारावास जो पाँच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या जुर्माना, या दोनों। 
  • धारा 318(4) — छल और बेईमानी से संपत्ति सौंपने के लिये प्रेरित करना (भारतीय दण्ड संहिता की धारा 420): कारावास जो सात वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माना। 

छल के आवश्यक तत्त्व: 

  • किसी व्यक्ति को मिथ्या या भ्रामक कथन द्वारा या तथ्यों को बेईमानी से छिपाकर प्रवंचित करना। 
  • किसी व्यक्ति को कपटपूर्ण या बेईमानी से प्रेरित करके संपत्ति सौंपना, या कोई कार्य करना या लोप करना। 
  • इस प्रकार की बेईमानी या कपटपूर्ण आशय कथन करते समय, अर्थात संव्यवहार के प्रारंभ में विद्यमान होना चाहिये। 
  • छल किए गए व्यक्ति को क्षति या हानि होना अथवा ऐसी क्षति या हानि होने की संभावना होना (संपत्ति के परिदान से संबंधित न होने वाले धारा 318(1) के मामलों में)। 

संविदा का भंग बनाम छल: 

  • संविदा का हर भंग छल नहीं होता। केवल वचन निभाने में विफलता, बिना किसी बेईमानी के आशय के, केवल सिविल दायित्व को जन्म देती है। 
  • न्यायालयों ने बार-बार इस बात की चेतावनी दी है कि सिविल विवादों को आपराधिक रंग देकर दूसरे पक्ष पर समझौता करने के लिये दबाव न डाला जाए, और ऐसे अभियोगों को प्रक्रिया का दुरुपयोग माना है। 

कंपनी अधिकारियों की देयता: 

  • भारतीय दण्ड संहिता और भारतीय न्याय संहिता में ऐसा कोई सामान्य उपबंध नहीं है जो किसी कंपनी द्वारा किये गए अपराधों के लिये निदेशकों या अधिकारियों पर परोक्ष दायित्व डालता हो।  
  • किसी अधिकारी पर अभियोजन तभी चलाया जा सकता है जब उसकी सक्रिय भूमिका और आपराधिक आशय के विशिष्ट आरोप हों, या जहाँ कोई विधि स्पष्ट रूप से परोक्ष दायित्व का प्रावधान करता हो, जैसा कि सुनील भारती मित्तल बनाम सीबीआई (2015) में कहा गया है।      
  • केवल कंपनी के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के रूप में किसी समझौते पर हस्ताक्षर करने से ही अधिकारी छल के लिये व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं हो जाता है। 

कार्यवाही रद्द करने की शक्ति (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528): 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 (जो दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अनुरूप है) उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति को सुरक्षित रखती है, जिसके अधीन वह संहिता के अधीन किसी भी आदेश को प्रभावी करने, किसी भी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने या अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिये आवश्यक आदेश दे सकता है। 
  • हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992) के बाद, कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है जहाँ आरोप, भले ही उन्हें सतही तौर पर मान लिया जाए, प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं बनाते हैं, या जहाँ कार्यवाही स्पष्ट रूप से दुर्भावना से प्रेरित है या किसी गुप्त उद्देश्य से शुरू की गई है। 

सांविधानिक विधि

मिथ्या निर्वाचन शपथपत्रों के संबंध में मतदाता निजी परिवाद दायर कर सकते हैं

 19-Oct-2026

राजकुमार मड़की बनाम डॉ. शैलेन्द्र बेलडेल 

"विधियों का निर्वचन करना मुख्य रूप से न्यायालयों का कार्य है।" 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने राजकुमार मड़की बनाम डॉ. शैलेन्द्र बेलडाले (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RP Act) की धारा 125क के अधीन अपराध के संबंध में निजी परिवाद पोषणीय है तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 195(1) के अधीन प्रतिबंध, जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 215 है, उस पर लागू नहीं होता। तथापि, मामले के तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने परिवाद को पुनर्जीवित करने से इंकार कर दिया तथा अन्य आधारों पर कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा पारित निरस्तीकरण आदेश को बरकरार रखा। 

राजकुमार मड़की बनाम डॉ. शैलेंद्र बेलडाले (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी डॉ. शैलेंद्र बेलडाले 2023 में बीदर निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानसभा के लिये निर्वाचित हुए थे। 
  • अपीलकर्त्ता राजकुमार मड़की ने आरोप लगाया कि प्रत्यर्थी ने अपने नामांकन पत्रों के साथ दायर शपथपत्रों में अपने आवासीय पते के बारे में मिथ्या घोषणा की थी। 
  • अपीलकर्त्ता ने धारा 200 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन बेंगलुरु के अपर मुख्य महानगरीय मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद दायर कराया, जिसमें लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125क के अधीन अपराध का आरोप लगाया गया था। 
  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने परिवाद को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1) के अधीन निर्बंधन लागू होते हैं और ऐसे परिवाद केवल भारत निर्वाचन आयोग या संबंधित लोक सेवक ही दर्ज कर सकता है, कोई निजी व्यक्ति नहीं। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

क्या दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1) धारा 125क लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम पर लागू होती है:  

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1) में लोक सेवक द्वारा परिवाद की आवश्यकता वाले अपराधों में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125क को शामिल नहीं किया गया है। 
  • धारा 125क को 2002 में जोड़ा गया था, जबकि धारा 195 दण्ड प्रक्रिया संहिता में बाद में, 2006 में संशोधन किया गया था। चूँकि विधायिका ने उस समय धारा 195 में धारा 125क को नहीं जोड़ा था, इसलिये इस लोप को जानबूझकर किया गया लोप माना जाना चाहिये। 
  • यदि विधायिका का यह आशय होता कि मिथ्या शपथपत्र के अपराध का संज्ञान केवल लोक सेवक के परिवाद पर ही लिया जा सकता है, तो वह धारा 195 दण्ड प्रक्रिया संहिता में संशोधन करके ऐसा कह सकती थी। 

किसी भी सांविधिक वर्जन के अभाव में: 

  • कोई भी अधिनियम यह उपबंधित नहीं करता है कि धारा 125क के अधीन किसी अपराध का परिवाद केवल लोक सेवक द्वारा ही दर्ज किया जा सकता है। 
  • धारा 125क का प्रारंभ एक गैर-बाधाकारी खंड से होता है, जिसके परिणामस्वरूप तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, उसमें विहित दण्ड लागू होता है। 

प्रत्यर्थी के तर्कों पर: 

  • प्रत्यर्थी ने तर्क दिया कि निजी परिवादों की अनुमति देने से निर्वाचित उम्मीदवारों के विरुद्ध तुच्छ आपराधिक कार्यवाही को बढ़ावा मिलेगा। 
  • प्रत्यर्थी ने जून 2020 के निर्वाचन आयोग के एक प्रेस नोट पर भी विश्वास किया, जिसमें कहा गया था कि आयोग शपथपत्रों में गंभीर लोपों को दर्शाने वाले परिवादों पर विचार करेगा तथा प्रत्येक मामले के तथ्यों के अनुसार उन्हें अन्वेषण अभिकरणों को संदर्भित करेगा। 
  • न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि विधियों का निर्वचन मुख्यतः न्यायालयों का कार्य है; अतः विधिक उपबंधों की व्याख्या के संबंध में निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देश एवं प्रेस नोट न्यायालयों पर बाध्यकारी नहीं हैं। 

तुच्छ परिवादों के विरुद्ध सुरक्षा उपायों पर:  

  • प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर, मजिस्ट्रेटों को तुच्छ परिवादों अथवा निर्वाचित को मात्र प्रताड़ित करने के उद्देश्य से संस्थित कार्यवाहियों से समुचित रूप से निपटने की शक्ति प्राप्त है। 

मामले के तथ्यों के आधार पर: 

  • आवासीय पते के संबंध में लगाए गए आरोप का अभिलेख पर उपलब्ध दस्तावेजों द्वारा प्रथमदृष्टया खंडन किया जा चुका था। 
  • दोषसिद्धि की संभावना अत्यंत क्षीण प्रतीत हो रही थी तथा कार्यवाही जारी रखने से केवल न्यायिक समय व्यय होता। 

निष्कर्ष: 

  • न्यायालय ने उच्च न्यायालय के विधिक तर्क को अस्वीकार कर दिया, किंतु आपराधिक कार्यवाही को पुनर्जीवित नहीं किया। न्यायालय ने अन्य आधारों पर परिवाद के निरस्तीकरण को बरकरार रखा। अपील का निस्तारण कर दिया गया तथा पक्षकारों को अपने-अपने वाद-व्यय वहन करने का निदेश दिया गया। 

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125क क्या है? 

 बारे में: 

  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125क निर्वाचन नामांकन संबंधी दस्तावेजों में मिथ्या शपथपत्र प्रस्तुत करने या जानकारी छिपाने के लिये दण्ड का उपबंध करतीहै। 
  • इसे 2002 में उच्चतम न्यायालय के निर्वाचकों के उम्मीदवारों के पूर्ववृत्त जानने के अधिकार पर दिये गए निर्णयों (भारत संघ बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, 2002 और पी.यू.सी.एल. बनाम भारत संघ, 2003) के बाद शामिल किया गया था। 

उपबंध:  

  • वह उम्मीदवार जो किसी निर्वाचन में निर्वाचित होने के आशय से: 
    • धारा 33क(1) के अधीन आवश्यक जानकारी प्रदान करने में असफल रहता है; या 
    • वह ऐसी मिथ्या जानकारी देता है जिसे वह जानता है या जिसके बारे में उसे मिथ्या होने का विश्वास करने का कारण है; या 
    • किसी भी जानकारी को छुपाता है, 

धारा 33(1) के अधीन अपने नामांकन पत्र में या धारा 33क (2) के अधीन अपने शपथपत्र में ऐसा करने पर अपराध करता है। 

  • दण्ड: छह महीने तक का कारावास, जुर्माना, या दोनों। 
  •   यह उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी लागू होता है।  

संबंधित उपबंध (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33क — सूचना का अधिकार): 

  • किसी उम्मीदवार को यह प्रकट करना होगा कि क्या वह ऐसे लंबित मामले में किसी अपराध का अभियुक्त है, जो दो वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दण्डनीय है तथा जिसमें आरोप विरचित किये जा चुके हैं। 
  • उसे यह भी प्रकट करना होगा कि क्या उसे किसी अपराध के लिये (धारा 8(1), (2) या (3) के अधीन आने वाले अपराधों से भिन्न) दोषसिद्ध ठहराया गया है तथा एक वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दण्डित किया गया  है। 
  • यह जानकारी धारा 33क (2) के अधीन शपथपत्र के साथ प्रस्तुत की जाती है, जिसे रिटर्निंग ऑफिसर सार्वजनिक जानकारी के लिये प्रदर्शित करता है। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 क्या है? 

 बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 लोक सेवकों के विधिपूर्ण प्राधिकार की अवमानना से संबंधित अपराधों, लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों तथा साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत या दिये गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के अभियोजन से संबंधित है। 
  • यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के अनुरूप है। 

उपबंध: 

  • धारा 215(1)(क): भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 206 से 223 के अधीन अपराधों (जो भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 172 से 188 के अनुरूप हैं), अथवा ऐसे अपराधों के दुष्प्रेरण, प्रयत्न या आपराधिक षड्यंत्र का कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा, सिवाय संबंधित लोक सेवक या उस लोक सेवक, जिसके प्रशासनिक अधीन वह लोक सेवक है (अथवा किसी अन्य प्राधिकृत लोक सेवक) की लिखित परिवाद पर। 
  • धारा 215(1)(ख): लोक न्याय के विरुद्ध कतिपय अपराधों तथा न्यायालय की कार्यवाही में या उससे संबंधित रूप से कारित, साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत या दिये गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों का संज्ञान केवल उस न्यायालय की लिखित परिवाद पर लिया जा सकता है, जिसमें ऐसा अपराध कारित किया गया हो, अथवा ऐसे न्यायालय की लिखित परिवाद पर लिया जा सकता है जिसके अधीन वह अधीनस्थ है।