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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

उच्चतम न्यायालय के निर्णय की आलोचना करना अपराध नहीं है

 20-Oct-2026

यासीर अराफात और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य 

"...यदि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के संबंध में कोई आवाज़ उठाई जाती है, और उसमें प्रयुक्त शब्द भी केवल ‘न्याय से वंचित किये जाने’ का है तथा न्याय की मांग हेतु आवाज़ उठाई जाती है, तो इससे भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 153क और 295क के अधीन अपराध के आवश्यक तत्त्व पूर्ण नहीं होंगे..." 

न्यायमूर्ति एच.पी. संदेश 

स्रोत: कर्नाटक उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एच.पी. संदेश की एकल-न्यायाधीश पीठ ने यासीर अराफात एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय के प्रति मात्र असंतोष व्यक्त करना, उसे “न्याय से वंचित करना” कहना तथा “न्याय के लिये आवाज़ उठाना”, भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 153क (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 196) अथवा धारा 295क  (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 299) के अधीन अपराध नहीं है।  

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 482 के अधीन अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए, न्यायालय ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) तथा उससे संबंधित समस्त आगामी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। 

यासीर अराफात और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी ? 

  • उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णय सुनाए जाने के बाद, मैंगलोर में सड़क किनारे की दीवारों पर नारे लिखे हुए पाए गए। 
  • नारों में निर्णय को "न्याय से इंकार" बताया गया और "न्याय के लिये आवाज उठाने" का आह्वान किया गया। 
  • मैंगलोर साउथ पुलिस थाने के सहायक सब-इंस्पेक्टर ने स्वतः संज्ञान लेते हुए परिवाद दर्ज कराया, जिसमें आरोप लगाया गया कि ये नारे अभियुक्तों द्वारा लिखे गए थे और इनका संबंध पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से था। 
  • देश में असामंजस्य उत्पन्न करने के आशय से किये गए इस कृत्य का आरोप लगाते हुए, पुलिस ने 2019 में 13 लोगों के विरुद्ध FIR दर्ज की थी। 
  • FIR में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153क (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 295क (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के जानबूझकर किये गए कृत्य) और 120ख (आपराधिक षड्यंत्र) के साथ-साथ कर्नाटक के लोक स्थानों पर विरूपण विधि की धारा 3 भी शामिल है। 
  • अभियुक्त ने FIR और आगे की आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिये उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। 
  • याचिकाकरताओं के तर्क: 
    • यदि परिवाद को यथावत स्वीकार भी कर लिया जाए, तो भी इसमें उल्लिखित धाराओं के अधीन कोई अपराध नहीं बनता है। 
    • अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रत्याभूत करता है, और किसी निर्णय से असहमत होना न तो राजद्रोह है और न ही धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का प्रयास है। 
    • जावेद अहमद हाजम बनाम महाराष्ट्र राज्य (2024) पर विश्वास करते हुए , वैध तरीके से असहमति का अधिकार लोकतंत्र का अभिन्न अंग है और अनुच्छेद 19(1)(क) और 21 के अधीन संरक्षित है। 
  • राज्य के तर्क: 
    • याचिकाकर्त्ताओं ने निर्णय के तुरंत बाद लोक स्थान पर नारे लगाकर प्रतिक्रिया व्यक्त की। 
    • इस कृत्य से देश में असामंजस्य पैदा होने की संभावना थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

परिवाद के विषयवस्तु के संबंध में: 

  • परिवाद में केवल इतना ही कहा गया था कि नारों में निर्णय को "न्याय से इंकार" बताया गया था और "न्याय के लिये आवाज" उठाई गई थी। 
  • यदि यही शब्द प्रयोग किये गए हैं, तो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153क और 295क के उपबंध लागू नहीं होते हैं। 

किसी निर्णय के विरुद्ध असहमति पर: 

  • यद्यपि नारों में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के प्रति असंतोष व्यक्त किया गया था, लेकिन यह केवल निर्णय के प्रति असहमति का मामला है, न कि असामंजस्य पैदा करने का। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि धारा 153क को लागू करने के लिये, राज्य के विरुद्ध कार्रवाई का तत्त्व होना आवश्यक है, जो यहाँ अनुपस्थित था। 
  • किसी निर्णय से असहमति व्यक्त करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के दायरे में आता है। 

धारा 153क के अधीन परीक्षण पर (जावेद अहमद हाजम को लागू करते हुए): 

  • इस परीक्षण का उद्देश्य यह देखना है कि उन शब्दों का सामान्यतः काफी संख्या में समझदार लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है। 
  • मात्र इस संभावना से कि कुछ व्यक्तियों में घृणा या दुर्भावना विकसित हो सकती है, धारा 153क (1) भारतीय दण्ड संहिता के खंड (क) को आकर्षित करने के लिये पर्याप्त नहीं है। 

अंतर्निहित शक्ति के प्रयोग पर: 

  • उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने कार्यवाही को रद्द करने के लिये धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन अपनी शक्ति का प्रयोग करने के लिये इसे एक उपयुक्त मामला पाया। 

निष्कर्ष: 

न्यायालय ने आपराधिक याचिका को मंजूर करते हुए याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध FIR और सभी आगे की कार्यवाही को रद्द कर दिया। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 क्या है? 

 बारे में: 

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 196 धर्म मूलवंश, जन्म-स्थान, निवास स्थान, भाषा, इत्यादि के आधारों पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन और सौहार्द बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कार्य करना से संबंधित है। 
  • यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153क के अनुरूप है। 

उपबंध: 

  • धारा 196(1)(क): जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या अन्यथा विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूहों या जातियों या समुदायों के बीच असौहार्द या शत्रुता, घृणा या वैमनस्य की भावनाएं, धर्म, मूलवंश, जन्म-स्थान, निवास स्थान, भाषा, जाति या समुदाय के आधारों पर या अन्य किसी भी आधार पर संप्रवर्तित करेगा या संप्रवर्तित करने का प्रयत्न करेगा। 
  • धारा 196(1)(ख): जो कोई ऐसा कार्य करेगा, जो विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूहों या जातियों या समुदायों के बीच सौहार्द बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है और जो लोक-प्रशान्ति में विघ्न डालता है या जिससे उसमें विघ्न पड़ना संभाव्य हो। 
  • धारा 196(1)(ग): जो कोई इस आशय से या यह जानते हुए कि किसी ऐसे समूह के विरुद्ध आपराधिक बल या हिंसा का प्रयोग किया जाएगा अथवा प्रतिभागियों को उसके प्रयोग का प्रशिक्षण दिया जाएगा, किसी अभ्यास, आंदोलन, कवायद या तत्सदृश क्रियाकलाप का आयोजन करता है या उसमें भाग लेता है।  
  • दण्ड : 3 वर्ष तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों। 
  • धारा 196(2): यदि अपराध किसी उपासना स्थल में अथवा धार्मिक उपासना या धार्मिक अनुष्ठानों में संलग्न किसी सभा में किया जाता है, तो पाँच वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 क्या है? 

 बारे में: 

  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 विमर्शित और विद्वेषपूर्ण कार्य जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से किये गए हों से संबंधित है। 
  • यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 295क के अनुरूप है। 

उपबंध: 

  • जो कोई भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विमर्शित और विद्वेषपूर्ण आशय से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान उच्चारित या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा या इलैक्ट्रॉनिक साधनों द्वारा या अन्यथा करेगा या करने का प्रयत्न करता है। 
  • दण्ड : 3 वर्ष तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों। 
  • आवश्यक शर्त: आशय जानबूझकर और विद्वेषपूर्ण होना चाहिये। अनजाने में या उपेक्षा से किये गए अपमान इसमें सम्मिलित नहीं हैं।  

सांविधानिक विधि

स्वीकृत संविदात्मक देय राशि को रोकना मनमाना है

 20-Oct-2026

मेसर्स विकास कंस्ट्रक्शंस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"स्वीकृत देय राशियों/संविदात्मक देय राशियों का अनिश्चित अवधि तक भुगतान न किया जाना भी मनमानीपूर्ण निष्क्रियता के समान है, जिसे विधि के अंतर्गत स्वीकार नहीं किया जा सकता।" 

न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने मेसर्स विकास कंस्ट्रक्शंस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि राज्य प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत संविदात्मक देय राशियों का भुगतान न किया जाना मनमाना है तथा ऐसी देय राशियों की वसूली के लिये भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन रिट याचिका प्रस्तुत की जा सकती है। न्यायालय ने नगर पंचायत को निदेश दिया कि वह स्वीकृत देय राशियों का भुगतान 6% वार्षिक की दर से साधारण ब्याज सहित करे।  

मेसर्स विकास कंस्ट्रक्शंस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता, जो एक सिविल ठेकेदार है, ने दो कार्य आदेशों के अधीन चंदौली नगर पंचायत के लिये निर्माण कार्य किया। 
  • कंपनी ने दावा किया कि आवेदन और अनुस्मारक भेजने के बावजूद 28,43,443 रुपए के बिलों का संदाय नहीं किया गया। 
  • याचिकाकर्त्ता ने बकाया राशि की वसूली के लिये अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय का रुख किया। 
  • उच्च न्यायालय ने चंदौली नगर पंचायत के कार्यकारी अधिकारी को व्यक्तिगत शपथपत्र पर यह बताने का निदेश दिया कि क्या दावा स्वीकार किया गया था। 
  • शपथपत्र में प्रत्यर्थियों का पक्ष: 
    • पहले कार्य आदेश के अधीन 7,92,580 रुपए का संदाय नहीं किया गया था, और प्रत्यर्थी इसके संदाय पर विचार करने के लिये तैयार थे। 
    • दूसरे कार्य आदेश के अधीन बकाया 6,31,890 रुपए जारी नहीं किये जा सके क्योंकि याचिकाकर्त्ता ने निर्धारित प्रारूप में बिल के बजाय अधूरा फॉर्म संख्या 26 जमा किया था, और इंजीनियरों द्वारा प्रमाणीकरण लंबित था। 
    • कार्य के पूर्ण होने पर कोई विवाद नहीं था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

धन संबंधी दावों के लिये दायर याचिका की वैधता पर: 

  • रिट न्यायालय की अधिकारिता में धन संबंधी दावों पर निर्णय लेने पर लगी रोक पूर्णतः लागू नहीं होती है। 
  • उत्कल हाइवेज इंजीनियर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर्स बनाम चीफ जनरल मैनेजर (2025) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 226 के अधीन धन दावों का निर्णय किया जा सकता है जहाँ स्वीकृत बकाया का संदाय न करना मनमाना है। 
  • उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ब्रिज एंड रूफ कंपनी (इंडिया) लिमिटेड (1996) के अधीन, गंभीर रूप से विवादित संविदात्मक दावों का निर्णय सिविल वाद में किया जाना चाहिये, लेकिन धन की कमी जैसे आधारों पर रोके गए स्वीकृत दावों को रिट अधिकारिता में लागू किया जा सकता है। 

स्वीकृत बकाया राशि पर: 

  • बकाया राशि स्पष्ट और निश्चित थी, और प्रत्यर्थी ने एक व्यक्तिगत शपथपत्र में इसे स्वीकार किया था। 
  • इस बात पर कोई विवाद नहीं था कि काम पूरा हो चुका था और प्रत्यर्थियों पर बकाया राशि का संदाय करने का दायित्व था। 
  • अनिश्चित अवधि के लिये स्वीकृत बकाया राशि को रोके रखना मनमाना है और विधि की दृष्टि से मान्य नहीं है। 
  • हस्तक्षेप करने से इंकार करने पर याचिकाकर्त्ता के वैध दावे की कीमत पर प्रत्यर्थियों को अनुचित लाभ होगा। 

दोनों राशियों पर: 

  • पहले कार्य आदेश के अधीन 7,92,580 रुपए की राशि एक स्पष्ट स्वीकृति थी और इसका संदाय करना ही था। 
  • दूसरे कार्य आदेश के अधीन 6,31,890 रुपये का संदाय याचिकाकर्त्ता द्वारा शपथपत्र में उल्लिखित औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद किया जाएगा। 

ब्याज के संबंध में: 

  • पूर्णिमा आडवाणी और अन्य बनाम गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली (2025) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने माना कि जिस व्यक्ति को वैध रूप से देय धन से वंचित किया गया है, वह ब्याज के रूप में प्रतिकर का हकदार है। 

निष्कर्ष: 

न्यायालय ने रिट याचिका मंजूर कर ली। 

याचिकाकर्त्ता को दूसरे कार्य आदेश के लिये दो सप्ताह के भीतर एक नया बिल जारी करने का निदेश दिया गया था, और प्रत्यर्थियों को देय तिथि से संदाय होने तक 6% प्रति वर्ष की साधारण ब्याज दर के साथ चार सप्ताह के भीतर स्वीकृत पूरी राशि का संदाय करने का निदेश दिया गया था। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 क्या है? 

 बारे में: 

  • अनुच्छेद 226 प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी, जिसमें सरकार भी सम्मिलित है, को निदेश, आदेश या रिट जारी करने का अधिकार देता है। 
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण की प्रकृति में रिट जारी की जा सकती हैं। 
  • उपबंध: 
  • अनुच्छेद 226(1): उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और “किसी अन्य प्रयोजन” के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, जिसके कारण उनकी रिट अधिकारिता, अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता से अधिक व्यापक है। 
  • अनुच्छेद 226(2): उच्च न्यायालय अपने प्रादेशिक अधिकारिता से बाहर स्थित किसी प्राधिकारी को भी रिट जारी कर सकता है, यदि वाद-हेतुक पूर्णतः या आंशिक रूप से उसकी प्रादेशिक अधिकारिता के अंतर्गत उत्पन्न होता है।   
  • अनुच्छेद 226(3): जहाँ दूसरे पक्षकार को सुनवाई का अवसर दिये बिना कोई अंतरिम आदेश पारित किया जाता है, वहाँ प्रभावित पक्षकार उस आदेश को अपास्त कराने के लिये आवेदन कर सकता है तथा ऐसे आवेदन का निस्तारण दो सप्ताह के भीतर किया जाना आवश्यक है। 
  • अनुच्छेद 226(4): अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय की शक्ति, अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय की शक्ति को न्यून या प्रभावित नहीं करती है।  

अधिकारिता की प्रकृति:  

  • अनुच्छेद 226 के धीन उपचार विवेकाधीन है।  
  • जहाँ समान रूप से प्रभावकारी वैकल्पिक उपचार उपलब्ध होता है, वहाँ उच्च न्यायालय सामान्यतः हस्तक्षेप करने से विरत रहता है। तथापि, यह न्यायिक आत्म-संयम का नियम है, न कि अधिकारिता पर कोई प्रतिबंध।