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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सांविधानिक विधि

मातृत्व एवं स्तनपान का अधिकार अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है

 27-Oct-2026

सुमन मीना बनाम राजस्थान राज्य और अन्य 

“मातृत्व सभी सभ्यताओं की जननी है...” 

न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंद 

स्रोत: राजस्थान उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंद ने सुमन मीना बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने एक महिला शिक्षिका के स्थानांतरण पर रोक लगा दी, जिसका स्थानांतरण उसके प्रसव के दो माह पश्चात् किया गया था। न्यायालय ने राज्य को उसके मामले पर सहानुभूतिपूर्वक पुनर्विचार करने का निर्देश दिया तथा सरकार से शिशुओं की माताओं के स्थानांतरण के संबंध में नीति निर्मित करने का आग्रह किया।  

सुमन मीना बनाम राजस्थान राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता गंगापुर, सवाई माधोपुर में वरिष्ठ शिक्षक के पद पर तैनात थी। 
  • बच्चे को जन्म देने के महज दो महीने बाद ही उनका तबादला करौली के मसालपुर में कर दिया गया। 
  • उसने तबादले के विरुद्ध अपील दायर की, जिसमें कहा गया कि इतनी दूर की पोस्टिंग से उसके शिशु की देखरेख करना मुश्किल हो जाएगा। 
  • अपील खारिज कर दी गई। 
  • इससे व्यथित होकर उसने राजस्थान उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

अनुच्छेद 21 के संबंध में: 

  • मातृत्व का अधिकार, स्तनपान का अधिकार और शिशु का स्तनपान और पोषण प्राप्त करने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग हैं। 
  • दो महीने के बच्चे को उसकी माता से जबरन अलग करना और उसे दूर स्थानांतरित करना, दोनों को इस अधिकार से वंचित कर देगा। 
  • इससे शिशु को अपूरणीय मनोवैज्ञानिक आघात, असुरक्षा, कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी खतरे होंगे जिनकी भरपाई नहीं की जा सकती। 

बालक के सर्वोत्तम हित में: 

  • जहाँ एक शिशु शामिल होता है, वहाँ विधिक ध्यान प्रशासनिक दक्षता से हटकर बालक के सर्वोत्तम हितों पर केंद्रित हो जाता है, जो सर्वोपरि विचारणीय बन जाते हैं। 
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और UNICEF द्वारा सर्वत्र मान्यता प्राप्त है कि स्तनपान के पहले छह महीने बच्चे के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण अवधि होती है। 
  • बाल देखरेख, मातृ देखरख और शिशु कल्याण सामाजिक न्याय का अभिन्न अंग हैं। 

राज्य के दृष्टिकोण के संबंध में: 

  • जहाँ तक ​​संभव हो, एक वर्ष से कम आयु के बच्चे वाली महिला कर्मचारी को परेशान नहीं किया जाना चाहिये, और उसके मामले पर यांत्रिक रूप से विचार करने के बजाय सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाना चाहिये। 
  • एक आदर्श नियोक्ता के रूप में, राज्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह माता और बच्चे के बीच के बंधन की रक्षा करे और यांत्रिक तबादलों के माध्यम से इसे न तोड़े। 
  • स्तनपान कराने वाली माताओं के लिये अधिक मानवीय, दयालु और संवेदनशील दृष्टिकोण की आवश्यकता है। 

स्थानांतरण की वैधता के संबंध में: 

  • स्थानांतरण आदेश राज्य की स्वयं की स्थानांतरण नीति, मानवता के सिद्धांतों और अनुच्छेद 21 के विपरीत था। 
  • यह इसके मूल सिद्धांतों के भी विरुद्ध था: 
    • मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 , जैसा कि 2017 में संशोधित किया गया था; 
    • बाल देखरेख अवकाश के मानदंड; और 
    • संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय। 

नीति की आवश्यकता पर: 

  • न्यायालय ने इस बात पर ध्यान दिया कि हाल ही में प्रसव कर चुकी या शिशुओं की देखरख कर रही महिला कर्मचारियों के तबादलों से संबंधित कोई नीति विद्यमान नहीं है। 
  • इसने सरकार से माता और शिशु दोनों को होने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिये एक उपयुक्त हस्तांतरण नीति बनाने का आग्रह किया। 

निदेश: 

  • राज्य को निदेश दिया गया कि वह अवयस्क के हित में याचिकाकर्त्ता के मामले पर सहानुभूतिपूर्वक और मानवीय दृष्टिकोण से पुनर्विचार करे। 
  • पुनर्विचार होने तक स्थानांतरण आदेश पर रोक लगा दी गई है। 
  • रजिस्ट्री को आदेश की एक प्रति विधि एवं न्याय मंत्रालय को भेजने का निदेश दिया गया था । 

मातृत्व संरक्षण के लिय सांविधानिक और विधिक ढाँचा क्या है? 

सांविधानिक उपबंध: 

  • अनुच्छेद 15(3): राज्य को महिलाओं और बालकों के लिये विशेष उपबंध करने की अनुमति प्रदान करता है। 
  • अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण करता है, जिसकी न्यायालयों ने ऐसी व्याख्या की है कि इसमें गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार तथा प्रजनन संबंधी स्वायत्तता का अधिकार भी सम्मिलित है।  
  • अनुच्छेद 39(च): राज्य को यह सुनिश्चित करने का निदेश देता है कि बालकों को स्वस्थ ढंग से तथा स्वतंत्रता और गरिमा की परिस्थितियों में विकास करने के अवसर प्राप्त हों।  
  • अनुच्छेद 42: राज्य को कार्य की न्यायसंगत एवं मानवीय दशाओं तथा प्रसूति सहायता (Maternity Relief) के लिये उपबंध करने का निदेश देता है। 

मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (जैसा कि 2017 में संशोधित किया गया): 

  • मातृत्व अवकाश: दो से कम जीवित संतानों वाली महिलाओं के लिये 26 सप्ताह तक का सवेतन अवकाश तथा दो या दो से अधिक संतानों वाली महिलाओं के लिये 12 सप्ताह का सवेतन अवकाश। 
  • दत्तक ग्रहण करने वाली और प्रसव कराने वाली माताएँ: तीन माह से कम आयु के बालक को दत्तक ग्रहण करने वाली महिला अथवा कमीशनिंग माता को 12 सप्ताह का मातृत्व लाभ।  
  • घर से काम करना: जहाँ कार्य की प्रकृति इसकी अनुमति देती हो, वहाँ मातृत्व अवकाश के पश्चात् पारस्परिक रूप से सहमत शर्तों पर घर से कार्य करने की अनुमति दी जा सकती है।  
  • क्रेच सुविधा: 50 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों के लिये शिशुगृह की सुविधा उपलब्ध कराना अनिवार्य है। माता को प्रतिदिन चार बार शिशुगृह जाने की अनुमति होती है। 
  • स्तनपान संबंधी विराम: बालक की आयु 15 माह होने तक प्रतिदिन दो स्तनपान विराम प्रदान किए जाते हैं। 

बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय, 1989:  

  • भारत ने वर्ष 1992 में इस अभिसमय का अनुसमर्थन किया। 
  • अनुच्छेद 3: बालकों से संबंधित सभी कार्यवाहियों में बालक के सर्वोत्तम हित को प्राथमिक विचार के रूप में लिया जाना चाहिये। 
  • अनुच्छेद 24: बालक के स्वास्थ्य के उच्चतम प्राप्य मानक के अधिकार को मान्यता प्रदान करता है। इसमें स्तनपान के लाभों के संबंध में जानकारी तक पहुँच का अधिकार भी सम्मिलित है।  

स्थानांतरण संबंधी मामलों में न्यायिक पुनर्विलोकन का दायरा क्या है? 

सामान्य सिद्धांत: 

  • स्थानांतरण सेवा का एक सामान्य अंग है तथा किसी कर्मचारी को किसी विशिष्ट स्थान पर बने रहने का निहित अधिकार प्राप्त नहीं होता है। 
  • न्यायालय सामान्यतः स्थानांतरण आदेशों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं, क्योंकि ऐसे आदेश प्रशासनिक विवेकाधिकार के क्षेत्राधिकार में आते हैं।  

हस्तक्षेप के आधार:  

  • स्थानांतरण दुर्भावनापूर्ण हो अथवा बाह्य एवं अप्रासंगिक कारणों से किया गया हो। 
  • स्थानांतरण किसी सांविधिक उपबंध अथवा लागू स्थानांतरण नीति का उल्लंघन करता हो। 
  • स्थानांतरण ऐसे प्राधिकारी द्वारा किया गया हो, जिसे ऐसा करने की सक्षम अधिकारिता प्राप्त न हो। 
  • स्थानांतरण मनमाना हो अथवा अनुच्छेद 21 जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो।  

पारिवारिक कानून

कुटुंब न्यायालय साक्ष्य के मूलभूत नियमों और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से आबद्ध हैं

 27-Oct-2026

P बनाम P  

“...साक्ष्य साबित करने के मूलभूत नियमों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को पूर्णतः नष्ट करने के बजाय....” 

न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने P बनाम P (2026) मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने उस कुटुंब न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें अवयस्क पुत्र की अभिरक्षा उसकी माता को देने से इनकार किया गया था। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जब पिता प्रतिपरीक्षा हेतु कभी उपस्थित ही नहीं हुआ, तब कुटुंब न्यायालय केवल उसके शपथपत्र के आधार पर अभिरक्षा का निर्णय नहीं कर सकता था। तदनुसार, न्यायालय ने अवयस्क पुत्र की अभिरक्षा माता को प्रदान कर दी। 

P बनाम P (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • दोनों पक्षकारों ने 19 फरवरी 2007 को वाराणसी में विवाह किया और उनके दो पुत्र 2011 और 2013 में पैदा हुए। 
  • 3 अप्रैल 2016 को पति अपनी पत्नी को वाराणसी स्थित उसके मायके में छोड़कर अपने बड़े पुत्र को अपने साथ ले गया।     
  • पति की तलाक की याचिका 15 दिसंबर 2022 को खारिज कर दी गई और पत्नी की दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की याचिका उसी दिन स्वीकार कर ली गई। यद्यपि, उसने न तो उसे वापस अपनाया और न ही निर्णय का पालन किया। 
  • यह तर्क दिया गया कि जब दोनों पक्षकारों के बीच वैवाहिक संबंध कायम था, तब उसने किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया था। 

कुटुंब न्यायालय के समक्ष कार्यवाही: 

  • 2017 में, पत्नी ने बड़े पुत्र की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिये आज़मगढ़ स्थित कुटुंब न्यायालय में संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 25 के अधीन कार्यवाही दायर की। 
  • कुटुंब न्यायालय ने 23 जुलाई 2024 को उसकी अर्जी खारिज कर दी और उसे केवल मिलने का अधिकार प्रदान किया। 

उच्च न्यायालय के समक्ष कार्यवाही: 

  • पत्नी ने कुटुंब न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 19 के अधीन अपील दायर की , जिसमें कहा गया कि उसे अपने पुत्र से एक बार भी मिलने की अनुमति नहीं दी गई थी। 
  • पति अपील में पेश नहीं हुआ, मध्यस्थता केंद्र से दूर रहा और दिसंबर 2024 में बिना कोई नया पता बताए अपना नोएडा वाला पता छोड़कर चला गया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

कुटुंब न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के संबंध में: 

  • धारा 14 केवल कुछ परिस्थितियों में ही साक्ष्य अधिनियम के अधीन प्रासंगिकता और ग्राह्यता के कठोर नियमों को कम करती है। 
  • यह किसी भी विधिक प्रणाली में निहित साक्ष्य के मूलभूत नियमों और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों को समाप्त नहीं करता है। 
  • कुटुंब न्यायालयों को इन सिद्धांतों का पालन करना चाहिये, भले ही वे साक्ष्य अधिनियम से बाध्य न हों। 

पिता के शपथपत्र पर विश्वास करते हुए: 

  • पिता ने कभी भी प्रतिपरीक्षा के लिये स्वयं को पेश नहीं किया, और उसके अपने व्यतिक्रम के कारण विचारण के दौरान उसके साक्ष्य को बंद कर दिया गया। 
  • प्रतिपरीक्षा से इंकार करना नैसर्गिक न्याय का उल्लंघन था।  
  • बिना प्रतिपरीक्षा किए शपथपत्र को सत्य मान लेना त्रुटिपूर्ण था और स्पष्ट रूप से विधिविरुद्ध था । 
  • शपथपत्र के अलावा, ऐसा कुछ भी अभिलेख पर नहीं रखा गया जिससे यह पता चले कि बालक के कल्याण का ध्यान रखा जा रहा था, और न ही पिता की आय या बच्चे की स्कूली शिक्षा के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध थी। 

माता का बालक से संपर्क न होने के संबंध में: 

  • कुटुंब न्यायालय द्वारा माता की स्वीकृति पर विश्वास करना कि वह साढ़े तीन साल से अपने पुत्र से नहीं मिली थी, अनुचित था । 
  • उसे उससे मिलने से रोका गया था और वह अपनी मर्जी से दूर नहीं रही थी। 
  • विवादित निर्णय के तुरंत बाद पिता का गायब हो जाना, उसके मिलने के अधिकारों को खत्म करने के आशय से किया गया था। 

अभिभावक की वित्तीय क्षमता पर: 

  • बालक की अभिरक्षा देने से मुख्य रूप से इसलिये इंकार कर दिया गया था क्योंकि माता की कोई आमदनी नहीं थी और वह अपने सेवानिवृत्त पिता पर निर्भर थी। 
  • आर्थिक क्षमता ही एकमात्र मापदंड नहीं हो सकती। गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल के मामले में, पिता को बालक की शिक्षा का खर्च वहन करने का निदेश दिया गया था। 
  • मौसमी मोइत्रा गांगुली बनाम जयंत गांगुली के मामले में, बेहतर वित्तीय संसाधन या माता-पिता का प्यार प्रासंगिक तो माना गया, लेकिन निर्णायक नहीं। 

पिता के द्वितीय विवाह और आचरण के संबंध में: 

  • द्वितीय विवाह स्वयं में अयोग्यता का कारण नहीं है, लेकिन यह एक महत्त्वपूर्ण कारक है, जैसा कि अथर हुसैन बनाम सैयद सिराज अहमद के मामले में कहा गया है । 
  • पिता ने न्यायिक आदेशों की अवहेलना की और विधिक प्रक्रिया से बचने की कोशिश की। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि बालक अपनी माता, छोटे भाई और नाना-नानी के साथ बड़ा होगा, शायद भौतिक सुख-सुविधाओं में कमी के साथ, लेकिन बेहतर नैतिक मूल्यों के साथ। 

निदेश: 

  • अपील मंजूर कर ली गई और कुटुंब न्यायालय का 23 जुलाई 2024 का आदेश अपास्त कर दिया गया। 
  • पिता को एक महीने के भीतर अवयस्क की अभिरक्षा माता को सौंपने का निदेश दिया गया था । 
  • पिता को वाराणसी स्थित जिला विधि सेवा प्राधिकरण में प्रत्येक शनिवार को दोपहर 3:00 बजे से शाम 5:00 बजे के बीच बच्चे से मिलने की अनुमति दी गई थी। 

कुटुंब न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 14 क्या है? 

बारे में: 

  • धारा 14 में कुटुंब न्यायालयों पर भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023) के लागू होने से संबंधित उपबंध हैं। 
  • कुटुंब न्यायालय किसी विवाद से प्रभावी ढंग से निपटने में सहायक किसी भी रिपोर्ट, कथन, दस्तावेज, सूचना या मामले को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है, चाहे वह साक्ष्य अधिनियम के अधीन सुसंगत या ग्राह्य हो या न हो। 

उद्देश्य: 

  • कुटुंब न्यायालयों को वैवाहिक और पारिवारिक विवादों के लिये उपयुक्त लचीला, कम तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने की अनुमति देना। 
  • यह ग्राह्यता के नियमों में ढील देता है लेकिन सबूत या निष्पक्ष सुनवाई की आवश्यकता को समाप्त नहीं करता है। 

संबंधित उपबंध: 

  • धारा 9: कुटुंब न्यायालय का समझौता कराने का कर्त्तव्य। 
  • धारा 10: प्रक्रिया सामान्यतः सिविल प्रक्रिया संहिता का अनुसरण करती है, लेकिन कुटुंब न्यायालय सत्य तक पहुँचने के लिये अपनी स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित कर सकता है। 
  • धारा 19: कुटुंब न्यायालय के किसी निर्णय या आदेश के विरुद्ध अपील तथ्यों और विधि दोनों के आधार पर 30 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में की जा सकती है। 

संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 के अंतर्गत बाल अभिरक्षा संबंधी विधि क्या है? 

मुख्य उपबंध: 

  • धारा 17: किसी संरक्षक की नियुक्ति या घोषणा करते समय न्यायालय को अवयस्क के कल्याण को ध्यान में रखते हुए, अवयस्क की आयु, लिंग और धर्म, प्रस्तावित संरक्षक का चरित्र और क्षमता, और यदि अवयस्क बुद्धिमानी से अपनी पसंद बताने में सक्षम है तो उसकी स्वयं की पसंद जैसे कारकों पर विचार करना चाहिये।  
  • धारा 25: यदि कोई आश्रित संरक्षक की अभिरक्षा से चला जाता है या उसे हटा दिया जाता है, तो न्यायालय आश्रित की वापसी का आदेश दे सकता है यदि न्यायालय की राय है कि यह आश्रित के कल्याण के लिये होगा।  

न्यायालयों द्वारा विकसित सिद्धांत: 

  • बालक का कल्याण सभी अभिरक्षा संबंधी मामलों में सर्वोपरि विचारणीय विषय है । 
  • संरक्षक की वित्तीय क्षमता सुसंगत है, लेकिन निर्णायक नहीं है। 
  • माता-पिता का आचरण, जिसमें न्यायालय के आदेशों का पालन करना भी शामिल है, एक सुसंगत कारक है।  
  • माता-पिता का द्वितीय विवाह स्वयं में अयोग्यता का कारण नहीं है, लेकिन बालक के कल्याण का आकलन करते समय इस पर विचार किया जा सकता है। 
  • अभिरक्षा से वंचित अभिभावक के मुलाकात संबंधी अधिकारों का सामान्यतः संरक्षण किया जाना चाहिये, जिससे बालक का माता-पिता दोनों के साथ संबंध बना रहे।