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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सिविल कानून

सहकारी समिति का सदस्य सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत समिति के अभिलेखों को प्राप्त करने का हकदार है

 28-Oct-2026

मुप्पथडम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य

"...सोसायटी के किसी सदस्य को ऐसी जानकारी से वंचित नहीं किया जा सकता..."

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन

स्रोत: उच्चतम न्यायालय

चर्चा में क्यों?

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी.पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मुप्पथडम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने सहकारी बैंक की अपील खारिज कर दी तथा सूचना का अधिकार अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रार के माध्यम से बैंक के अभिलेख प्राप्त करने के सदस्य के अधिकार को बरकरार रखा। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जब किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रार को उक्त अभिलेखों तक पहुँच प्राप्त करने की शक्ति है, तब ऐसी सूचना को व्यक्तिगत सूचना मानकर उपलब्ध कराने से इंकार नहीं किया जा सकता।

मुप्पथडम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक बनाम राज्य मुख्य सूचना आयुक्त (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?

  • अपीलकर्त्ता सहकारी बैंक के सदस्य प्रत्यर्थी ने सहकारी समितियों के संयुक्त रजिस्ट्रार (जनरल) से सूचना के अधिकार अधिनियम के अधीन दो दस्तावेज मांगे :
  • बैंक द्वारा की गई संविदा का विवरण; और
  • बैंक की साधारण सभा (General Body Meeting) की कार्यवाही के कार्यवृत्त।
  • उनकी याचिका को प्रारंभ में अस्वीकार कर दिया गया था।
  • कार्यवाही के दूसरे दौर में, राज्य सूचना आयुक्त और केरल उच्च न्यायालय ने अभिलेखों तक उनकी पहुँच के अधिकार को बरकरार रखा।

बैंक के तर्क:

  • सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत बैंक कोई "लोक प्राधिकरण" नहीं था।
  • केरल सहकारी समिति अधिनियम, 1969 की धारा 65 के अधीन रजिस्ट्रार केवल जांच प्रारंभ करने का निर्णय लेने के बाद ही अपने अभिलेखों तक पहुँच सकता है।
  • सूचना सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(घ) और 8(1)(झ) के अधीन वाणिज्यिक विश्वास और व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित छूट प्राप्त थी।
  • उच्च न्यायालय के निर्णय से व्यथित होकर बैंक ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?

सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 2(च) के संबंध में:

  • धारा 2(च) में किसी निजी निकाय से संबंधित ऐसी जानकारी शामिल है जिसे कोई लोक प्राधिकरण किसी अन्य प्रचलित विधि के अधीन प्राप्त कर सकता है।
  • रजिस्ट्रार के लिये दस्तावेजों तक पहुँच प्राप्त करने से पहले उन दस्तावेजों का पहले से मौजूद होना या जांच प्रारंभ करने का निर्णय लेना आवश्यक नहीं है।
  • एक बार रजिस्ट्रार को सहकारी बैंक द्वारा रखे गए दस्तावेजों तक पहुँचने की शक्ति मिल जाने पर, बैंक धारा 2(च) के अनुसार अपने सदस्य को जानकारी प्रदान करने के लिये बाध्य है।

रजिस्ट्रार की शक्तियों के संबंध में:

  • केरल सहकारी समिति अधिनियम की धारा 66 रजिस्ट्रार या उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति को पर्यवेक्षण और निरीक्षण शक्तियां प्रदान करती है।
  • इस प्रकार की निगरानी रजिस्ट्रार द्वारा जितनी बार आवश्यक समझी जाए उतनी बार की जा सकती है और इसमें सोसायटी की पुस्तकों का निरीक्षण शामिल है।

वाणिज्यिक विश्वास के लिये छूट के संबंध में (धारा 8(1)(घ)):

  • इन दस्तावेजों में कोई व्यापारिक रहस्य, बौद्धिक संपदा या वाणिज्यिक विश्वास शामिल नहीं थी जो प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को प्रभावित करती हो।
  • बोली प्रक्रिया पहले ही समाप्त हो चुकी थी और एक श्रम संविदा समिति ने संविदा प्राप्त कर ली थी, जिसकी शर्तों से कोई भी सदस्य चिंतित होगा।

व्यक्तिगत जानकारी के संबंध में (धारा 8(1)(ञ)):

  • सोसाइटी के एक सदस्य द्वारा मांगी गई संविदा संबंधी जानकारी और साधारण सभा की बैठक का कार्यवृत्त, व्यक्तिगत जानकारी के रूप में नहीं माना जा सकता है।
  • लोक गतिविधि या हित से किसी भी प्रकार का संबंध न होना, अनुरोध को अस्वीकार करने का पर्याप्त आधार नहीं था, बशर्ते कि दस्तावेज अन्यथा सुलभ हों।
  • किसी सदस्य को इस आधार पर ऐसी जानकारी देने से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह समाज से संबंधित निजी जानकारी है या इसमें लोक गतिविधि या हित शामिल नहीं है।

असंबंधित पर-पक्षकारों के अनुरोध पर:

  • यदि ऐसा ही अनुरोध समाज से असंबंधित व्यक्ति द्वारा किया जाता तो स्थिति भिन्न होती।
  • व्यक्तिगत जानकारी की अवधारणा केवल प्राकृतिक व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं है और निजी संस्थाओं तक भी फैली हुई है, जिनके मामलों में प्रत्येक नागरिक तब तक कोई हित का दावा नहीं कर सकता जब तक कि लोक गतिविधि से कोई संबंध न हो।

निदेश:

  • अपील खारिज कर दी गई और उच्च न्यायालय की खंडपीठ का निर्णय बरकरार रखा गया।
  • रजिस्ट्रार को निदेश दिया गया कि वह दोनों दस्तावेजों को तुरंत, और किसी भी स्थिति में दो सप्ताह के भीतर मंगवाए और उन्हें सदस्य को उपलब्ध कराए।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के सुसंगत उपबंध क्या हैं?

धारा 2(च) – सूचना:

  • ससे अभिप्राय किसी भी रूप में विद्यमान किसी सामग्री से है, जिसमें अभिलेख, दस्तावेज़, ज्ञापन, ई-मेल, मत, सलाह, प्रेस विज्ञप्तियाँ, परिपत्र, आदेश, लॉगबुक, संविदाएँ, रिपोर्टें, कागज़ात, नमूने, मॉडल तथा इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध आँकड़े सम्मिलित हैं।
  • इसमें किसी निजी निकाय से संबंधित ऐसी सूचना भी सम्मिलित है, जिस तक तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी लोक प्राधिकरण की पहुँच हो सकती है।

धारा 2(ज) – लोक प्राधिकारी:

  • इसमें ऐसा कोई प्राधिकरण, निकाय या स्वशासी संस्था सम्मिलित है, जिसकी स्थापना या गठन निम्नलिखित के द्वारा या अधीन किया गया हो:
    • संविधान द्वारा या उसके अधीन;
    • संसद या किसी राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित किसी विधि के द्वारा; या
    • समुचित सरकार द्वारा जारी अधिसूचना या आदेश के द्वारा।
  • इसमें सरकार के स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित निकाय तथा सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से वित्तपोषित गैर-सरकारी संगठन भी सम्मिलित हैं।

धारा 8(1)(घ) – वाणिज्यिक विश्वास:

  • यह ऐसी सूचना को प्रकटीकरण से छूट प्रदान करती है, जिसमें वाणिज्यिक विश्वास, व्यापार रहस्य या बौद्धिक संपदा सम्मिलित हैं तथा जिसके प्रकटीकरण से किसी तृतीय पक्ष की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को क्षति पहुँच सकती है; तथापि, यदि व्यापक लोकहित सूचना के प्रकटीकरण को न्यायोचित ठहराता है, तो यह छूट लागू नहीं होगी।

धारा 8(1)(ञ) – व्यक्तिगत सूचना:

  • यह ऐसी व्यक्तिगत सूचना को प्रकटीकरण से छूट प्रदान करती है, जिसका प्रकटीकरण किसी लोक क्रियाकलाप या लोकहित से संबंधित न हो अथवा जिससे व्यक्ति की निजता का अनावश्यक अतिक्रमण होता हो; तथापि, यदि व्यापक लोकहित प्रकटीकरण को न्यायोचित ठहराता है, तो यह छूट लागू नहीं होगी।

थलप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम केरल राज्य (2013) के मामले में क्या अभिनिर्धारित किया गया?

  • राज्य सहकारी विधियों के अधीन पंजीकृत सहकारी समितियाँ, केवल इस आधार पर कि वे रजिस्ट्रार के पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण के अधीन हैं, धारा 2(ज) के अंतर्गत लोक प्राधिकरण नहीं हैं।
  • कोई समिति तभी लोक प्राधिकरण होगी, जब वह सरकार के स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से वित्तपोषित हो।
  • तथापि, ऐसी समितियों से संबंधित सूचना धारा 2(च) के अधीन रजिस्ट्रार के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है, वहाँ तक जहाँ तक संबंधित सहकारी विधि के अधीन रजिस्ट्रार को विधिपूर्वक उस सूचना तक पहुँच प्राप्त करने का अधिकार है; यह धारा 8 के अधीन उपलब्ध छूटों के अधीन होगा।

सिविल कानून

न्यायालय न्यायहित में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के अधीन साक्ष्य को पुनः खोल सकते हैं

 28-Oct-2026

मंगत राम बनाम शानो देवी

"...न्याय के हित में ऐसा करना सुसंगत और आवश्यक है।"

न्यायमूर्ति संजय धर

स्रोत: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय

चर्चा में क्यों?

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय धर ने मंगत राम बनाम शानो देवी (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया, जिसके द्वारा साक्ष्य बंद किये जाने के पश्चात् पत्नी को साक्षियों को पुनः बुलाने तथा अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई थी। न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 18 नियम 17 तथा धारा 151 के पृथक-पृथक क्षेत्राधिकार एवं प्रयोज्यता को स्पष्ट किया।

मंगत राम बनाम शानो देवी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?

  • याचिकाकर्त्ता (पति) ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के अधीन अभित्यजन, धारा 9 के अधीन पत्नी के विरुद्ध पारित दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के आदेश का अनुपालन न करने और क्रूरता के आधार पर विवाह-विच्छेद की मांग करते हुए एक याचिका दायर की।
  • प्रत्यर्थी (पत्नी) ने याचिका का विरोध किया, और विचारण न्यायालय ने क्रूरता, अभित्यजन और दिये जाने वाल अनुतोष के संबंध में विवाद्यक विरचित किये।
  • दोनों पक्षकारों ने साक्ष्य प्रस्तुत किये, जिनमें स्वयं की और प्रत्येक पक्ष के तीन साक्षियों की परीक्षा शामिल थी।

साक्ष्य को पुनः खोलने के लिये आवेदन:

  • साक्ष्य बंद होने और मामले को अंतिम बहस के लिय सूचीबद्ध किये जाने के बाद, पत्नी ने आदेश 18 नियम 17 के अधीन धारा 151 सिविल प्रक्रिया संहिता के साथ एक आवेदन दायर किया।
  • उसने पति और उसके साक्षियों को आगे की प्रतिपरीक्षा के लिये पुन: बुलाने और दो नए साक्षियों की परीक्षा करने की मांग की।
  • उसने बताया कि उसे हाल ही में पता चला है कि पति ने अपने विवाह के दौरान ही दूसरी महिला से विवाह कर लिया था और उससे तीन बच्चे भी हैं।
  • उसे इस बात का पता तब चला जब वह पति के कथित दामाद से मिली, जिसकी शादी पति की दूसरी शादी से हुई कथित बेटी से हुई थी।

कुटुंब न्यायालय का आदेश:

  • जम्मू स्थित कुटुंब न्यायालय के अपर प्रधान न्यायाधीश ने आवेदन स्वीकार कर लिया।
  • इससे पति और उसके दो साक्षियों को पुन: बुलाने और दो नए साक्षियों से परीक्षा करने की अनुमति मिली।
  • इसके अलावा, इसने पति पर 10,000 रुपए का जुर्माना भी अधिरोपित किया गया।

उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती:

  • पति ने यह तर्क दिया कि:
    • साक्ष्यों को पुन:जांचने की कोई आवश्यकता नहीं थी;
    • यह तय किये बिना कि क्या उसने वास्तव में द्वितीय विवाह किया था, उस पर जुर्माना अधिरोपित नहीं किया जा सकता था; और
    • यह आदेश अवैध था और बिना सोचे-समझे पारित किया गया था।

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 18 नियम 17 के दायरे के संबंध में:

  • यह नियम न्यायालय को पहले से जांचे जा चुके किसी भी साक्षी को पुन: बुलाने और उससे ऐसे प्रश्न पूछने का अधिकार देता है जो वह उचित समझे।
  • इसका मुख्य उद्देश्य न्यायालय को पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के बारे में अपने स्वयं के संदेहों को स्पष्ट करने में सक्षम बनाना है।       
  • इसका उपयोग पक्षकारों को मुख्य परीक्षा या प्रतिपरीक्षा के लिये साक्षियों को पुन: बुलाने की अनुमति देने या ऐसी अतिरिक्त सामग्री लाने के लिये नहीं किया जा सकता है जिसे पहले प्रस्तुत नहीं किया जा सका था।    
  • वादीराज नागप्पा वर्नेकर बनाम शरदचंद्र प्रभाकर गोगेट (2009) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि इस शक्ति का प्रयोग संयम से किया जाना चाहिये और केवल किसी पक्षकार को उसके साक्ष्य में कमियों या लोप को भरने में सहायता करने के लिये नहीं किया जाना चाहिये।
  • के. के. वेलुसामी बनाम एन. पलानीसामी (2011) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि शक्ति का प्रयोग स्वतः संज्ञान से या आवेदन पर किया जा सकता है, लेकिन यह विवेकाधीन है और इसका उद्देश्य केवल स्पष्टीकरण देना है।

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के संबंध में:

  • धारा 151 न्याय के उद्देश्यों के लिये या प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये आवश्यक आदेश देने की न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति को संरक्षित करती है ।
  • जैसा कि के. के. वेलुसामी मामले में कहा गया है, जहाँ संहिता में स्पष्टीकरण के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिये साक्ष्य को पुन: खोलने या साक्षियों को पुन: बुलाने का कोई उपबंध नहीं है, वहाँ उचित मामलों में धारा 151 लागू की जा सकती है।
  • अतः न्यायालय किसी पक्षकार को साक्ष्य प्रस्तुत करने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्राप्त अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दे सकता है, यदि यह न्याय के हित में आवश्यक हो।

तथ्यों पर लागू होना:

  • पति ने तर्क दिया कि पत्नी को द्वितीय विवाह के बारे में पहले से ही पता था, क्योंकि उसने रणबीर दण्ड संहिता की धारा 494 के अधीन परिवाद दायर कराया गया था, जिसे 2014 में खारिज कर दिया गया था।
  • न्यायालय ने कहा कि पूर्ववर्ती परिवाद एक अलग महिला से संबंधित था और वह आरोप साबित नहीं हुआ था, जबकि वर्तमान आरोप एक अलग व्यक्ति से संबंधित है।
  • पत्नी ने आधार कार्ड, वैवाहिक याचिका और विवाह करार सहित कई दस्तावेज पेश किये थे, जिनसे प्रथम दृष्टया यह साबित होता है कि पति कथित पुत्री का पिता है।
  • यह साक्ष्य पति के आचरण से संबंधित था और न्याय के हित में सुसंगत और आवश्यक था।
  • यदि द्वितीय विवाह साबित हो जाता है, तो इससे इस बात पर असर पड़ेगा कि क्या पत्नी का पति के साथ न रहना उचित था, और यह क्रूरता के आरोप के विरुद्ध प्रतिरक्षा का आधार बन सकता है।

पति को पुन: बुलाने के संबंध में:

  • चूँकि महत्त्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत किये जा रहे थे, इसलिये आदेश 18 नियम 17 के अधीन उत्पन्न संदेहों को स्पष्ट करने के लिये पति को पुन: बुलाना आवश्यक था।

पति के अन्य साक्षियों को पुन: बुलाने के संबंध में:

  • पति के दो साक्षियों को पुन: बुलाना अनावश्यक था, क्योंकि वे पहले ही प्रतिपरीक्षा में कह चुके थे कि उन्हें किसी द्वितीय विवाह के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

लागत अधिरोपित करने के संबंध में:

  • क्योंकि द्वितीय विवाह अभी तक साबित नहीं हुआ था, इसलिये जुर्माना अधिरोपित नहीं किया जा सका।
  • इस प्रकार के निष्कर्ष के बिना, यह नहीं कहा जा सकता कि पति ने तथ्य को छिपाया था।

निदेश:

  • याचिका को आंशिक रूप से मंजूर कर लिया गया।
  • कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया गया जिसमें 10,000 रुपए का जुर्माना अधिरोपित करने और पति के दो साक्षियों को पुन: पेश करने का निदेश दिया गया था।
  • आदेश को इस हद तक बरकरार रखा गया कि पति को पुन: बुलाया गया और पत्नी को दो नए साक्षियों से परीक्षा करने की अनुमति दी गई।
  • विचारण न्यायालय को उच्च न्यायालय की टिप्पणियों के अनुसार कार्यवाही करने का निदेश दिया गया था।

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 18 नियम 17 क्या है?

 बारे में:

  • आदेश 18 वाद की सुनवाई तथा साक्षियों की परीक्षा से संबंधित है ।
  • नियम 17 के अधीन, न्यायालय वाद के किसी भी प्रक्रम पर ऐसे किसी साक्षी को, जिसकी परीक्षा की जा चुकी है, पुनः बुला सकता है तथा उससे ऐसे प्रश्न पूछ सकता है, जिन्हें वह साक्ष्य विधि के अधीन उचित समझे।

प्रमुख सिद्धांत:

  • इस शक्ति का उद्देश्य न्यायालय को साक्ष्यों के बारे में संदेह दूर करने में सक्षम बनाना है।
  • न्यायालय इस शक्ति का प्रयोग स्वप्रेरणा से अथवा किसी पक्षकार द्वारा प्रस्तुत आवेदन पर कर सकता है।
  • यह एक विवेकाधीन शक्ति है, जिसका प्रयोग संयमपूर्वक तथा विरल परिस्थितियों में किया जाना चाहिये।
  • इस शक्ति का प्रयोग किसी पक्षकार के साक्ष्य में विद्यमान कमियों अथवा चूकों को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता।

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 क्या है?

बारे में:

  • धारा 151 यह उपबंधित करती है कि संहिता की कोई भी बात न्यायालय की उन अंतर्निहित शक्तियों को सीमित या प्रभावित नहीं करेगी, जिनका प्रयोग न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति करने अथवा न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये आवश्यक आदेश पारित करने हेतु किया जा सकता है।

इसके प्रयोग को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत (के.के. वेलुसामी बनाम एन. पलानीसामी, 2011):

  • यह कोई ऐसी मूलभूत उपबंधात्मक धारा नहीं है, जो अधिकारिता का सृजन करती हो अथवा उसे प्रदान करती हो।
  • इसका प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है, जब संहिता किसी प्रक्रियात्मक पहलू के संबंध में उपबंध नहीं करती हो।
  • न्यायालय इसका प्रयोग ऐसा कार्य करने के लिये नहीं कर सकता, जो विधि द्वारा निषिद्ध हो।
  • इस शक्ति का प्रयोग सावधानी एवं समुचित विचार-विमर्श के साथ तथा केवल वहीं किया जाना चाहिये, जहाँ इसकी पूर्णतः आवश्यकता हो।
  • आवेदक की सद्भावना के संबंध में कोई संदेह नहीं होना चाहिये।
  • इस शक्ति का प्रयोग न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति करने तथा न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये किया जाना चाहिये।