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सांविधानिक विधि
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) के शिक्षकों को वर्षों तक संविदा पर नियोजित रखना अनुच्छेद 23 के अधीन बलात् श्रम है
31-Oct-2026
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श्रीमती अर्चना बूध बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य "शिक्षकों को दिया जाने वाला मानदेय अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिये निर्धारित मानदेय से भी कम है।" न्यायमूर्ति पंकज भाटिया |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने श्रीमती अर्चना बूध बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों (KGBV) के शिक्षकों को वर्षों तक अल्प वेतन पर संविदा के आधार पर नियुक्त बनाए रखना तथा पदों के सृजन अथवा उनके नियमितीकरण की दिशा में कोई कदम न उठाना, संविधान के अनुच्छेद 23 के अधीन बलात् श्रम के समान है। न्यायालय ने राज्य सरकार को पदों को स्वीकृत करने, नियमित शिक्षकों के समकक्ष सेवा शर्तें निर्धारित करने तथा चार माह के भीतर नियमितीकरण संबंधी दावों पर विचार करने का निर्देश दिया।
श्रीमती अर्चना बूध बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) योजना के संबंध में:
- कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) योजना 2004 में सर्व शिक्षा अभियान के अधीन शुरू की गई थी।
- यह ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की लड़कियों को आवासीय शिक्षा प्रदान करता है।
- बाद में इसका विलय समग्र शिक्षा में कर दिया गया।
- शिक्षकों की नियुक्ति सर्वप्रथम 10 जुलाई 2009 को जारी एक विज्ञापन के माध्यम से आयोजित चयन प्रक्रिया द्वारा की गई थी। तब से, उन्हें मानदेय पर वर्ष-दर-वर्ष संविदा के आधार पर नियुक्त किया जाता रहा है।
याचिकाकर्त्ताओं के संबंध में:
- मुख्य रिट याचिका में याचिकाकर्त्ता 11 जनवरी 2010 से एक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) में काम कर रहा है, जिसकी संविदा समय-समय पर नवीनीकृत की जा रही है।
- रीता वर्मा और 376 अन्य लोगों द्वारा दायर की गई संबंधित याचिका में, 270 याचिकाकर्त्ताओं ने 10 वर्षों से अधिक समय तक सेवा की थी, और बाकी ने कम अवधि के लिये।
- अंशकालिक शिक्षकों को प्रति माह 12,790 रुपए का मानदेय मिलता है। 25% EPF कटौती के बाद, 9,592 रुपए शेष बचते हैं।
सरकारी आदेशों के अधीन नियुक्ति की शर्तें:
- शिक्षकों को 11 महीने और 29 दिनों के लिये नियुक्त किया जाता है, और अगले शैक्षणिक वर्ष से पहले एक दिन का अंतराल होता है।
- यदि सेवाएं असंतोषजनक हों या उनकी अब आवश्यकता न हो तो संविदाओं का नवीनीकरण नहीं किया जाता है।
- सेवाएं एक महीने के नोटिस पर या, अत्यंत गंभीर मामलों में, बिना नोटिस के समाप्त की जा सकती हैं।
याचिकाकर्त्ताओं के तर्क:
- अधिकांश याचिकाकर्त्ताओं ने किसी अन्य सेवा में प्रवेश करने की आयु सीमा पार कर ली है, और राज्य ने नौकरी की सुरक्षा से वंचित करके उनकी इस कमजोरी का फायदा उठाया है।
- उनके कर्त्तव्य उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (शिक्षक) सेवा नियम, 1981 के अधीन आने वाले शिक्षकों के समान हैं, जिन्हें राज्य द्वारा संचालित और सहायता प्राप्त स्कूलों में सांविधिक वेतन और संरक्षण प्राप्त होता है।
- चूँकि राज्य ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) के साथ पठित संविधान के अनुच्छेद 21-क के अधीन अपने दायित्व का निर्वहन करने के लिये इन विद्यालयों की स्थापना की है, इसलिये उसका यह दायित्व है कि वह इस कार्य में सहायता करने वाले शिक्षकों को युक्तियुक्त सेवा शर्तें प्रदान करे।
- 9 अप्रैल 2026 के एक सरकारी आदेश द्वारा, राज्य ने निम्नलिखित व्यक्तियों के मानदेय में वृद्धि की:
- प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा मित्रों और अंशकालिक प्रशिक्षकों का वेतन 10,000 रुपए से लेकर 18,000 रुपए प्रति माह तक है।
- अंशकालिक शिक्षकों को 9,000 रुपये से लेकर 17,000 रुपए प्रति माह तक का वेतन दिया जाएगा (जो साल में 11 महीनों के लिये देय होगा)।
- याचिकाकर्त्ताओं द्वारा प्रति माह 17,000 रुपए की मांग वाला अपना निवेदन भी अनिर्णित रहा।
राज्य के तर्क:
- कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) शिक्षकों के लिये कोई पद स्वीकृत नहीं किये गए थे।
- यह संविदा योजना की समाप्ति के साथ ही समाप्त हो गया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
याचिकाकर्त्ताओं के कार्य की प्रकृति के संबंध में:
- याचिकाकर्त्ताओं की नियुक्ति चयन प्रक्रिया के बाद की गई थी।
- मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अध्ययन, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 और शिक्षा मंत्रालय द्वारा समग्र शिक्षा को लागू करने के लिये तैयार किये गए ढाँच में यह मान्यता दी गई है कि राज्य द्वारा संचालित और सहायता प्राप्त स्कूलों में नियमित रूप से नियुक्त शिक्षकों की भूमिका के समान ही उनकी भी भूमिका होती है।
- ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि उनका काम किसी भी प्रकार से अलग था।
इस अभिवचन पर कि कोई पद अस्तित्व में नहीं थे और संविदा योजना के साथ ही समाप्त हो गई थी:
- न्यायालय ने इस याचिका को निम्नलिखित कारणों से खारिज कर दिया:
- यह योजना दो दशकों से अधिक समय से चल रही है।
- यह कार्य शाश्वत प्रकृति का है।
- शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 8(घ) के अधीन राज्य शिक्षण स्टाफ उपलब्ध कराने के लिये बाध्य है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की प्रयोज्यता के संबंध में:
- कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) धारा 2(ढ) के अधीन “स्कूल” की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं।
- धारा 7(1) के अधीन वित्त पोषण केंद्र और राज्यों की समवर्ती जिम्मेदारी है, लेकिन धारा 7(5) के अधीन राज्य सरकार अधिनियम को लागू करने के लिये धन उपलब्ध कराने के लिये उत्तरदायी है।
- धारा 8 के अधीन उपयुक्त सरकार को निम्नलिखित कार्य करने के लिये बाध्य किया गया है:
- शिक्षण स्टाफ उपलब्ध कराएं।
- निर्धारित मानकों के अनुरूप उच्च गुणवत्ता वाली प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित करना।
- यह सुनिश्चित करना कि कमजोर वर्गों और वंचित समूहों के बालकों के साथ विभेद न हो।
वंचित छात्रों के विरुद्ध विभेद के संबंध में:
- सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में छात्रों को अच्छी तनख्वाह पाने वाले शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता है, जबकि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) में वंचित छात्रों को असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने वाले कम वेतन पाने वाले शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता है।
- न्यायालय ने इसे कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) में पढ़ने वाले वंचित छात्रों के विरुद्ध स्पष्ट विभेद माना।
कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) शिक्षकों के कर्त्तव्यों और सुरक्षा के संबंध में:
- शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 23 से 28 के अधीन, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) शिक्षकों और अन्य राज्य-संचालित स्कूलों के शिक्षकों के समान कर्त्तव्य और दायित्व हैं।
- यद्यपि, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) शिक्षकों को धारा 24(2) के परंतुक का लाभ भी नहीं मिलता है, जिसके अधीन अनुशासनात्मक कार्रवाई से पहले सुनवाई का उचित अवसर मिलना आवश्यक है।
- शिक्षा का अधिकार नियम, 2010 के नियम 20 के अनुसार, पेशेवर और स्थायी कैडर बनाने के लिए सेवा शर्तों को अधिसूचित करना अनिवार्य है। KGBV शिक्षकों के लिये ऐसे कोई नियम नहीं बनाए गए हैं, जिनकी नियुक्ति, वेतन और सेवा शर्तें अभी भी सरकारी आदेशों द्वारा शासित हैं।
मानदेय की अपर्याप्तता के संबंध में:
- शिक्षकों को दिया जाने वाला मानदेय अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिये निर्धारित मानदेय से भी कम है है।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि इसे "मानदेय" कहना एक क्रूर मजाक है।
साधनों की शुद्धता के सिद्धांत के संबंध में:
- मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ के मामले का हवाला देते हुए, न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक प्रशंसनीय लक्ष्य असांविधानिक साधनों को उचित नहीं ठहराता है।
- वंचित विद्यार्थियों, विशेषकर बालिकाओं को शिक्षा प्रदान करना प्रशंसनीय उद्देश्य है तथा शिक्षा मंत्रालय और NCERT की रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि इस उद्देश्य की प्राप्ति में पर्याप्त सफलता मिली है।
- तथापि, इसके लिये अपनाए गए साधन न्यायोचित नहीं हैं:
- शिक्षकों को अपर्याप्त वेतन का भुगतान किया गया है ।
- उन्हें किसी भी प्रकार की सेवा-सुरक्षा से वंचित रखा गया है।
- उन्हें वर्षों तक अल्प मानदेय पर नियुक्त बनाए रखा गया है तथा उनके नियमितीकरण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है।
- शिक्षकों को 11 माह और 29 दिनों के लिए नियुक्त करना तथा एक दिन का अंतराल देकर पुनः नियुक्त करना और यह उपबंध करना कि यदि उनकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं होगी तो बिना किसी सूचना के उनके संविदा का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा, संविधान के भाग III के प्रावधानों के असंगत है तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम का उल्लंघन करता है।
अनुच्छेद 14 और 23 पर निष्कर्ष:
- याचिकाकर्त्ताओं को वर्षों तक संविदा पर बनाए रखना, बिना पद सृजित किये, उन्हें स्थायी रूप से समायोजित किये या नियमित रूप से नियुक्त शिक्षकों के समान वेतन दिये बिना, अनुच्छेद 23 द्वारा प्रतिषिद्ध बलात् श्रम का एक रूप है।
- यह संविधान के भाग 3 के अधीन याचिकाकर्त्ताओं के अनुच्छेद 14 एवं 23 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करता है तथा भाग 4 में निहित राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों के असंगत है।
जारी किये गए निर्देश:
- राज्य सरकार चार महीने के भीतर निम्नलिखित कार्य करेगी:
- शिक्षा का अधिकार अधिनियम की अनुसूची को ध्यान में रखते हुए, उत्तर प्रदेश के KGBV के लिये शिक्षकों के पदों का सृजन करेगी।
- सभी KGBV शिक्षकों, जिनमें याचिकाकर्त्ता भी सम्मिलित हैं, के लिये नियमित रूप से नियुक्त शिक्षकों के समकक्ष, इंटरमीडिएट स्तर तक सेवा की शर्तें निर्धारित करेगी।
- नवसृजित पदों के विरुद्ध नियमितीकरण संबंधी दावों पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा, संबंधित शिक्षकों की अर्हताओं एवं उनकी सेवा की अवधि को ध्यान में रखते हुए विचार किया जाएगा।
- मानदेय को समय-समय पर संशोधित करेगी, जिससे उसे अपने तथा सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों के वेतन के समकक्ष लाया जा सके।
- उपर्युक्त कदम उठाए जाने तक:
- सभी KGBV शिक्षकों, जिनमें याचिकाकर्त्ता भी सम्मिलित हैं, को निर्णय की तिथि से ₹17,000 प्रतिमाह का भुगतान किया जाएगा।
- वे शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 24(2) के अधीन अपनी सेवाओं के संरक्षण के हकदार होंगे।
- वित्तपोषण के संबंध में:
- सहमति के अनुसार व्यय में अपना हिस्सा वहन करने का उत्तरदायित्व केंद्र सरकार का है।
- राज्य सरकार यह तर्क नहीं दे सकती कि इन निर्देशों का क्रियान्वयन केंद्रीय निधि प्राप्त होने तक स्थगित रखा जाए। राज्य सरकार "भुगतान करो और वसूल करो" के सिद्धांत के आधार पर केंद्र सरकार से उसका हिस्सा वसूल कर सकती है।
- रिट याचिकाओं का निपटारा कर दिया गया।
भारतीय संविधान (COI) का अनुच्छेद 23 क्या है?
अनुच्छेद 23 – मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध:
प्रावधान का पाठ:
- अनुच्छेद 23(1): मानव का दुर्व्यापार, बेगार तथा इसी प्रकार के अन्य बलात् श्रम के स्वरूप प्रतिषिद्ध हैं। इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन विधि के अनुसार दण्डनीय अपराध होगा।
- अनुच्छेद 23(2): राज्य लोक प्रयोजनों के लिये अनिवार्य सेवा अधिरोपित कर सकता है। ऐसी सेवा अधिरोपित करते समय राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग अथवा इनमें से किसी एक के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।
प्रमुख विशेषताएँ:
- यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को उपलब्ध है।
- यह व्यक्तियों को राज्य के साथ-साथ निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी संरक्षण प्रदान करता है।
- यह राज्य पर मानव दुर्व्यापार तथा बलात् श्रम के अन्य स्वरूपों जैसी शोषणकारी प्रथाओं के उन्मूलन का सकारात्मक दायित्व अधिरोपित करता है।
स्पष्ट रूप से प्रतिषिद्ध प्रथाएँ:
- मानव का दुर्व्यापार
- बेगार — किसी व्यक्ति को बिना पारिश्रमिक का भुगतान किए कार्य करने के लिए विवश करना
- बलात् श्रम के अन्य समान स्वरूप
अपवाद – लोक प्रयोजनों के लिये अनिवार्य सेवा:
- राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य सेवा की मांग कर सकता है, जैसे कि सैन्य सेवा या सामाजिक सेवा।
- यह शक्ति केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर विभेद किए जाने के प्रतिषेध के अधीन है।
न्यायिक निर्णय:
- पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ (1982):
- उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 23 का विस्तार व्यापक एवं असीमित है।
- "बल" के अंतर्गत केवल शारीरिक अथवा विधिक बल ही नहीं, अपितु ऐसी आर्थिक परिस्थितियाँ भी सम्मिलित हैं, जो किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध न्यूनतम मजदूरी से कम पर कार्य करने के लिये विवश करती हैं।
- न्यायालय ने सरकार को अनुच्छेद 23 के अधीन प्रदत्त मूल अधिकार का उल्लंघन करने वाले निजी व्यक्तियों को दण्डित करने के लिये आवश्यक कदम उठाने का निदेश दिया।
सिविल कानून
यदि कोई पक्षकार प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ हो तो वह सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील करने की अनुमति मांग सकता है
31-Oct-2026
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गिरीशभाई नटवरलाल पटेल बनाम गौतम पंजाबभाई पालखीवाला (मृत) विधि प्रतिनधि और अन्य द्वारा "वाद का पक्षकार न होना, अपील करने का अप्रतिबंधित अधिकार प्रदान नहीं करता है।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने गिरीशभाई नटवरलाल पटेल बनाम गौतम पंजाबभाई पालखीवाला (मृत) विधिक प्रतिनधि और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने गुजरात उच्च न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसमें गैर-पक्षकारों को सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील करने की अनुमति दी गई थी। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि यदि समझौता डिक्री किसी अजनबी के अधिकारों या हितों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है, तो उसे अपील करने से नहीं रोका जा सकता।
गिरीशभाई नटवरलाल पटेल बनाम गौतम पंजाबभाई पालखीवाला (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद गुजरात में एक भूखंड से संबंधित था।
- एक सहकारी आवास समिति ने विक्रय करार के आधार पर मूल स्वामी के विधिक वारिसों के विरुद्ध विनिर्दिष्ट पालन के लिये वाद दायर किया।
- यह वाद सोसाइटी के पक्ष में एक समझौते के डिक्री के साथ समाप्त हुआ।
- 2020 में, डिक्री को लागू किया गया और एक कोर्ट कमिश्नर के माध्यम से अपीलकर्त्ता पटेल के पक्ष में एक विक्रय विलेख निष्पादित किया गया, जिसमें सोसाइटी एक पुष्टिकरण पक्षकार के रूप में शामिल हुई।
- नौ व्यक्तियों (प्रत्यर्थी संख्या 1-9) ने, भूमि के मूल क्रेता से संबद्ध हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के माध्यम से अधिकार का दावा करते हुए, गुजरात उच्च न्यायालय का रुख किया। उन्होंने निम्नलिखित अभिकथन किये:
- सहमति डिक्री तथा उसके पश्चात् की गई कार्यवाहियाँ कपट एवं मिलीभगत का परिणाम थीं।
- मूल विक्रेता के विधिक उत्तराधिकारियों के पास संपत्ति का अंतरण करने हेतु कोई विद्यमान स्वत्व (Subsisting Title) शेष नहीं था।
- इस कार्यवाही से उनके अधिकारों को नुकसान पहुँचा था।
- उन्होंने सूचना का अधिकार (RTI) प्रक्रिया के अधीन प्राप्त दस्तावेजों पर विश्वास किया, जिनसे कथित तौर पर अपीलकर्त्ता का सोसाइटी के साथ घनिष्ठ संबंध प्रदर्शित होता है, जिसमें 2002-2003 में इसके अध्यक्ष के रूप में उनका पद भी सम्मिलित है।
उच्च न्यायालय के समक्ष कार्यवाही:
- उच्च न्यायालय ने एकपक्षीय अंतरिम व्यादेश जारी करते हुए अपीलकर्त्ता को विवादित संपत्ति में प्रवेश करने, उसका विक्रय करने, अंतरण करने, बंधक रखने, पट्टे पर देने अथवा उसमें किसी तृतीय पक्ष के अधिकार सृजित करने से प्रतिबंधित कर दिया।
- तत्पश्चात् उच्च न्यायालय ने:
- व्यादेश को जारी रखा।
- लगभग 11 वर्षों के विलंब को माफ कर दिया।
- प्रत्यर्थी संख्या 1–9 को सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील करने की अनुमति प्रदान की।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
धारा 96(3) और आदेश 23 के अधीन वर्जन के विस्तार के संबंध में:
- सहमति डिक्री से उत्पन्न विबंध (Estoppel) केवल डिक्री के पक्षकारों के मध्य प्रभावी होता है, न कि ऐसे बाहरी व्यक्ति के विरुद्ध, जो कभी भी उस डिक्री का पक्षकार नहीं था।
- ऐसा व्यक्ति, जो न तो मूल कार्यवाही का पक्षकार था और न ही समझौते का, केवल इस आधार पर डिक्री के प्रति सहमत माना जा सकता कि अन्य व्यक्तियों ने अपनी सहमति प्रदान की थी।
- ऐसे व्यक्ति को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96(3) के साथ आदेश 23 नियम 3 और 3क के साथ पढ़ने पर, ऐसे व्यक्ति के अपील करने पर कोई वर्जन लागू नहीं होता, क्योंकि ये उपबंध केवल समझौते के पक्षकारों तक सीमित हैं।
गैर-पक्षकार के अपील करने के अधिकार की सीमाओं के संबंध में:
- वाद का पक्षकार न होना, अपील करने का अप्रतिबंधित अधिकार प्रदान नहीं करता है।
- गैर-पक्षकार को:
- प्रथमदृष्टया यह दर्शाना होगा कि आक्षेपित डिक्री उसके अधिकारों अथवा हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
- गैर-पक्षकारों द्वारा अपील किये जाने को नियंत्रित करने वाले स्थापित सिद्धांतों के अधीन अपीलीय न्यायालय से अपील करने की अनुमति प्राप्त करनी होगी।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 के अधीन अपील करने के लिए कौन सक्षम है:
न्यायालय ने संक्षेप में स्पष्ट किया कि धारा 96 के अधीन निम्नलिखित व्यक्ति अपील प्रस्तुत कर सकते हैं:
- वाद का कोई भी ऐसा पक्षकार, जिस पर डिक्री का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो अथवा यदि ऐसा पक्षकार मृत हो, तो उसका विधिक प्रतिनिधि।
- ऐसे पक्षकार के हित का कोई भी अंतरिती, जो उस हित की सीमा तक डिक्री से आबद्ध हो।
- किसी गैर-पक्षकार को केवल अपीलीय न्यायालय की अनुमति से ही अनुमति दी जा सकती है। अनुमति तब दी जानी चाहिये जब व्यक्ति:
- निर्णय से व्यथित हो अथवा जिस पर निर्णय का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो।
- सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 के स्पष्टीकरण 6 के अधीन इसे पूर्व-न्याय के रूप में माना जाएगा और यह इससे बाध्य होगा।
- आदेश से आबद्ध हो अथवा उससे व्यथित हो।
- सामान्य नियम के रूप में, ऐसे व्यक्ति को अपील की अनुमति देने से इंकार नहीं किया जाएगा, जिसे मूल कार्यवाही में पक्षकार बनाया जा सकता था।
- किसी व्यक्ति पर डिक्री का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है या नहीं, यह तथ्य का प्रश्न है, जिसका निर्धारण प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा।
सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील की अनुमति प्रदान करने की कसौटी के संबंध में:
- सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील करने की अनुमति हेतु प्रस्तुत आवेदन की जांच उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर की जानी चाहिये, जो न्यायनिर्णयन के पश्चात् पारित सामान्य डिक्री को चुनौती देने वाले गैर-पक्षकार पर लागू होते हैं।
- निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या आवेदक ने ऐसा विधिक रूप से मान्य हित दर्शाया है, जिस पर आक्षेपित डिक्री का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- यह तथ्य कि डिक्री सहमति डिक्री है, न तो इस आवश्यकता को समाप्त करता है और न ही अपने आप में अपील की अनुमति प्रदान किये जाने पर कोई रोक लगाता है।
मामले के तथ्यों के संबंध में:
- केवल इस सीमित प्रयोजन के लिये कि क्या वे अपील की अनुमति माँगने के अधिकारी हैं, अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से यह परिलक्षित हुआ कि प्रत्यर्थी संख्या 1–9 ने ऐसे विधिक रूप से मान्य हित का दावा किया था, जिस पर सहमति डिक्री का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता था।
- मूल वाद अथवा समझौते का पक्षकार न होना, अपने आप में उन्हें अपील की अनुमति माँगने के अधिकार से वंचित नहीं करता, विशेषकर तब, जब डिक्री कथित रूप से उनके स्वतंत्र अधिकारों को प्रभावित करती हो।
- अतः उच्च न्यायालय द्वारा अपील करने की अनुमति प्रदान करना न्यायोचित था।
स्पष्टीकरण:
- यह निष्कर्ष केवल डिक्री को चुनौती देने के लिये प्रत्यर्थियों की विधिक स्थिति तथा अपीलीय न्यायिक परीक्षण की आवश्यकता तक सीमित था।
- यह निष्कर्ष न तो भूमि पर उनके दावे के गुण-दोषों के संबंध में कोई राय थी और न ही कपट एवं मिलीभगत के आरोपों की सत्यता के संबंध में। इन प्रश्नों का निर्णय विधि के अनुसार किया जाना आवश्यक है।
निर्णय:
- उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा गया और अपील खारिज कर दी गई।
सहमति डिक्री क्या है?
- सहमति डिक्री (या समझौता डिक्री) न्यायालय द्वारा पक्षों के बीच वैध समझौते या सुलह के आधार पर पारित की गई डिक्री है, न कि मामले की खूबियों पर निर्णय लेने के बाद।
- यह मूलतः पक्षों के बीच न्यायालय की मुहर लगा हुआ एक अनुबंध है। यह पक्षों को बाध्य करता है और उनके बीच एक निषेधात्मक नियम के रूप में कार्य करता है।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 क्या है?
धारा 96 – मूल डिक्री से अपील:
- धारा 96(1): जब तक कि इस संहिता अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा स्पष्ट रूप से अन्यथा उपबंधित न किया गया हो, मूल अधिकारिता का प्रयोग करने वाले न्यायालय द्वारा पारित प्रत्येक डिक्री के विरुद्ध अपील की जा सकेगी। ऐसी अपील उस न्यायालय में प्रस्तुत की जाएगी, जिसे उक्त न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करने का प्राधिकार प्राप्त है।
- धारा 96(2s): एकपक्षीय पारित मूल डिक्री के विरुद्ध भी अपील की जा सकती है।
- धारा 96(3): पक्षकारों की सहमति से न्यायालय द्वारा पारित डिक्री के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी।
- धारा 96(4): ऐसे वाद में पारित डिक्री के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी, जिसकी सुनवाई लघुवाद न्यायालय द्वारा की जा सकती है, जहाँ मूल वाद की विषय-वस्तु की रकम अथवा मूल्य दस हजार रुपये से अधिक न हो। इसका एकमात्र अपवाद विधि के किसी प्रश्न पर अपील है।