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सिविल कानून
अतिरिक्त लिखित कथन से पूर्व के अभिवचनों को वापस नहीं लिया जा सकता
« »01-Jun-2026
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मोंदिरा घोष बनाम चैताली घोष "प्रतिवादी ने कब्जे के संबंध में अपनी स्थिति और दावे को पूरी तरह से परिवर्तित करना चाहा। पहले उसने कहा था कि वह विवादित परिसर की वास्तविक सह-भागीदार है, लेकिन अतिरिक्त लिखित कथन के माध्यम से उसने पूरी तरह से पलटवार करते हुए दावा किया कि वह वादी की किराएदार है।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मोंडीरा घोष बनाम चैताली घोष (2026) के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें सिविल कार्यवाही के उन्नत प्रक्रम में प्रतिवादी को अतिरिक्त लिखित कथन दाखिल करने की अनुमति दी गई थी। न्यायालय ने माना कि कोई भी पक्षकार आदेश 8 नियम 9 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन अतिरिक्त लिखित कथन का उपयोग मूल प्रतिरक्षा के पूर्णतः विपरीत मामला पेश करने के लिये नहीं कर सकता है, और विचारण की शुरुआत के बाद किया गया ऐसा प्रयास, आदेश 6 नियम 17 सिविल प्रक्रिया संहिता के परंतुक के अधीन निषेध को दरकिनार करने के उद्देश्य से प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है।
मोंदिरा घोष बनाम चैताली घोष (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- मोंडीरा घोष ने एक सिविल वाद दायर कर यह घोषणा करने की मांग की कि चैताली घोष विवादित संपत्ति पर अवैध रूप से कब्जा कर रही हैं और उन्हें बेदखल किया जाए।
- दिसंबर 2022 में दायर अपने मूल लिखित कथन में, प्रतिवादी ने दावा किया कि वह विवादित संपत्ति की एक वास्तविक सह-हिस्सेदार है और उसने वादी के विधिविरुद्ध कब्जे के दावे को खारिज कर दिया।
- मामले से संबंधित विवाद्यक मई 2023 में तैयार किये गए थे, जिसके बाद वादी के साक्षी से विस्तृत रूप से प्रतिपरीक्षा की गई।
- विचारण के प्रारंभ होने के बाद, प्रतिवादी ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 8 नियम 9 के अधीन एक आवेदन दायर कर प्रतिदावे के साथ एक अतिरिक्त लिखित कथन दाखिल करने की अनुमति मांगी।
- प्रस्तावित अतिरिक्त लिखित कथन के माध्यम से, प्रतिवादी ने अपनी स्थिति को पूरी तरह से बदलने और यह दावा करने की कोशिश की कि वह वादी के अधीन एक किराएदार थी - एक ऐसा रुख जो सह-हिस्सेदार होने के उसके मूल प्रतिरक्षा के साथ पूरी तरह से असंगत है।
- विचारण न्यायालय ने आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि प्रतिवादी अपने पूर्व के कथनं से पीछे नहीं हट सकती और उसकी जगह असंगत मामला नहीं रख सकती, इसके लिये उसने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 7 का हवाला दिया, जो संशोधन के अलावा पूर्व के कथनों के साथ असंगत आरोप लगाने पर रोक लगाता है।
- कलकत्ता उच्च न्यायालय ने प्रतिवादी की चुनौती को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए, 15,000 रुपए के खर्च के भुगतान पर अतिरिक्त लिखित कथन दाखिल करने की अनुमति दी, जबकि प्रतिदावे पर विचार करने से इंकार कर दिया।
- इससे व्यथित होकर वादी मोंदिरा घोष ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
अतिरिक्त लिखित कथन विरोधाभासी मामला पेश नहीं कर सकता:
- न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने अतिरिक्त लिखित कथन की अनुमति देकर त्रुटी की, क्योंकि प्रतिवादी अपनी स्थिति को एक वास्तविक सह-हिस्सेदार से बदलकर वादी की किराएदार बनकर पूरी तरह से पलटवार करने की कोशिश कर रही थी।
- यह मूल लिखित कथन से तथ्यों के अनजाने में छूट जाने का मामला नहीं था; अपितु, यह पहले के रुख को वापस लेने और उसके स्थान पर पूरी तरह से विरोधाभासी अभिवचन पेश करने का जानबूझकर किया गया प्रयास था।
- ऐसा करना सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 7 के आदेश के विपरीत है, जो किसी पक्षकार को औपचारिक संशोधन की मांग किये बिना अपने पहले के कथनों के साथ असंगत तथ्यों को प्रस्तुत करने से रोकता है।
प्रक्रिया का दुरुपयोग — आदेश 6 नियम 17 का उल्लंघन:
- न्यायालय ने पाया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 8 नियम 9 के अधीन आवेदन केवल सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 17 के परंतुक में निहित प्रतिबंध को दूर करने के लिये दायर किया गया था, जो विचारण के प्रारंभ के बाद अभिवचनों में संशोधन को प्रतिबंधित करता है।
- इस तरह का आवेदन दाखिल करना - विशेष रूप से तब जब प्रतिवादी उचित समय पर अपने लिखित कथन में संशोधन की मांग करने में विफल रही थी - प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग माना गया।
- इस प्रकार की प्रक्रिया की अनुमति देने से विचारण के पश्चात् संशोधन पर लगे प्रतिबंध अर्थहीन हो जाएंगे।
विचारण न्यायालय के आदेश की बहाली:
- उच्चतम न्यायालय ने वादी की अपील को मंजूर करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय के 3 सितंबर, 2025 के आदेश को अपास्त कर दिया और प्रतिवादी के आवेदन को खारिज करने वाले विचारण न्यायालय के आदेश को बहाल कर दिया।
लिखित कथन क्या होता है?
बारे में:
- लिखित कथन प्रतिवादी द्वारा वादी के वादपत्र का उत्तर होता है। इससे संबंधित सभी प्रावधान सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 8 के अंतर्गत आते हैं।
मुख्य नियम एक दृष्टि में
- नियम 1 — समय सीमा:
- समन की तामील होने के 30 दिनों के भीतर इसे दाखिल करना होगा ।
- न्यायालय सुनवाई को 90 दिनों तक बढ़ा सकता है (कारणों को अभिलिखित करते हुए)।
- वाणिज्यिक वाद: 120 दिनों तक का अतिरिक्त विस्तार; जिसके बाद वाद दायर करने का अधिकार समाप्त हो जाता है ।
- नियम 2 — नए तथ्य: प्रतिरक्षा के सभी आधार (कपट, परिसीमा, अवैधता, आदि) स्पष्ट रूप से बताए जाने चाहिये; अन्यथा उन्हें बाद में नहीं उठाया जा सकता।
- नियम 3 — विशिष्ट खंडन: सामान्य खंडन अपर्याप्त है; प्रत्येक आरोप से विशिष्ट रूप से निपटना होगा।
- नियम 4 — टालमटोल वाला इंकार नहीं: इंकार आरोप के सार पर आधारित होना चाहिये, न कि केवल आरोप के सटीक रूप पर।
- नियम 6 — मुजरा : प्रतिवादी वादी के दावे के विरुद्ध एक निर्धारित राशि के मुजरा का दावा कर सकता है, लेकिन केवल प्रथम सुनवाई में, जब तक कि बाद में इसकी अनुमति न दी जाए।
- नियम 6ख — प्रतिदावा: लिखित कथन में इसे प्रतिदावे के रूप में स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिये।
- नियम 10 - दाखिल करने में विफलता: न्यायालय चूक करने वाले पक्षकार के विरुद्ध निर्णय सुना सकता है या कोई उपयुक्त आदेश पारित कर सकता है।
विधिक मामले
- कैलाश बनाम नानखु (2005): नियम 1, आदेश 8 का परंतुक निर्देशात्मक है , अनिवार्य नहीं।
- सलेम एडवोकेट बार एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2005): नियम 10 के तहत समय का विस्तार सामान्य रूप से नहीं दिया जा सकता; केवल असाधारण रूप से कठिन मामलों में ही दिया जा सकता है।