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सांविधानिक विधि

भारत के संविधान का अनुच्छेद 161

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 17-Aug-2026

राम प्रताप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"यद्यपि अनुच्छेद 161 के अंतर्गत शक्ति सांविधानिक शक्ति है, जो धारा 432 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत राज्य सरकार की सांविधिक शक्ति से भिन्न है, फिर भी निर्णय मनमाना या किसी स्पष्ट त्रुटि पर आधारित नहीं हो सकता, जो दोषी द्वारा भुगती गई कारावास की अवधि जितनी महत्त्वपूर्ण हो।" 

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर, न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना शामिल थे, ने एक दोषी को समय से पहले छोड़ने से इंकार करने वाले आदेश को रद्द कर दिया, यह मानते हुए कि संविधान के अनुच्छेद 161 के अधीन राज्यपाल की शक्ति, यद्यपि संप्रभु प्रकृति की है, मनमाने ढंग से प्रयोग नहीं की जा सकती है और लागू नियमों और कसम नीति द्वारा विनियमित रहती है। 

इस मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता राम प्रताप सिंह को 2002 में फतेहपुर के अपर सेशन न्यायाधीश द्वारा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307/34 के अधीन हत्या के प्रयत्न के मामले में दोषी ठहराया गया था और उसे 2,000 रुपए के जुर्माने के साथ 7 वर्ष के कठोर कारावास की दण्ड सुनाया गया था। 
  • 2019 में उच्च न्यायालय के समक्ष उनकी अपील खारिज कर दी गई थी, और बाद में उच्चतम न्यायालय ने उनकी विशेष अनुमति याचिका को भी खारिज कर दिया था। 
  • सितंबर 2022 में, उनकी समय से पूर्व छोड़ने का प्रस्ताव जेल अधिकारियों और फतेहपुर के जिला मजिस्ट्रेट को भेजा गया था, लेकिन यह लंबित रहा। याचिकाकर्त्ता ने फरवरी 2025 में इस प्रस्ताव पर निर्णय लेने के लिये एक आवेदन दिया, जिसमें बताया गया कि वह अपने दण्ड का आधे से अधिक भाग पहले ही भोग चुका है। 
  • जेल रिपोर्ट में अभिलिखित किया गया कि उसने कुल 7 वर्ष के दण्ड में से 4 वर्ष, 6 महीने और 6 दिन बिना किसी परिहार के और 5 वर्ष और 4 महीने परिहार के साथ बिताए थे, और उसका आचरण संतोषजनक अभिलिखित किया गया था। 
  • यद्यपि, जून 2025 में, उसकी समय से पूर्व छोड़ने को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि उन्होंने बिना परिहार के केवल 2 वर्ष और 6 दिन और परिहार के साथ 2 वर्ष, 1 महीने और 27 दिन का दण्ड भोग था - ये आंकड़े जेल रिपोर्ट के विपरीत थे। 
  • याचिकाकर्त्ता ने इस आदेश को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी, जिसमें उसने तर्क दिया कि न्यायालय ने जेल रिपोर्ट की अनदेखी की, उसकी कारावास अवधि की गलत गणना की, उसके विरुद्ध कोई प्रतिकूल सामग्री का प्रकटन नहीं किया और जेल में उसके संतोषजनक आचरण पर विचार करने में विफल रही। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • कारावास की अवधि की गणना में त्रुटि के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि संयुक्त प्रांत बंदियों को परिवीक्षा पर छोड़ना नियम, 1938 के नियम 4 के उप-नियम (iii) के अधीन, लागू श्रेणी का कोई भी दोषी बिना परिहार के दण्ड का एक तिहाई हिस्सा पूरा करने के बाद समय से पहले छोड़ने के लिये पात्र हो जाता है। चूँकि याचिकाकर्त्ता ने वास्तव में 7 वर्ष के दण्ड में से 4 वर्ष, 6 महीने और 6 दिन बिना परिहार के बिताए थे, इसलिये न्यायालय ने पाया कि उसने दण्ड का आधे से अधिक भाग पूरा कर लिया है। न्यायालय ने कहा कि विवादित निष्कर्ष "स्पष्ट त्रुटि पर आधारित" था और "रिकॉर्ड पर ध्यान न देने" का संकेत देता है। न्यायालय ने कारावास की अवधि की इस गलत व्याख्या को "स्पष्ट रूप से विधिविरुद्ध" करार दिया। 
  • अनुच्छेद 161 के अधीन राज्यपाल की शक्ति की प्रकृति पर: पीठ ने माना कि राज्यपाल की समय से पूर्व छोड़ने की शक्ति, यद्यपि एक संप्रभु कार्यकारी शक्ति है, मनमाने ढंग से प्रयोग नहीं की जा सकती और यह लागू नियमों और परिहार नीति द्वारा विनियमित रहती है। इसने स्पष्ट किया कि यद्यपि यह शक्ति सांविधानिक प्रकृति की है - धारा 432 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन राज्य सरकार की सांविधिक शक्ति से भिन्न - फिर भी निर्णय मनमाना नहीं हो सकता या दोषी की कारावास अवधि जैसे महत्त्वपूर्ण तथ्य के संबंध में स्पष्ट त्रुटि पर आधारित नहीं हो सकती। 
  • अप्रकाशित अनुशंसाओं पर निर्भरता के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि अस्वीकृति आदेश समय से पूर्व छोड़ने के विरुद्ध जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक की अनुशंसाओं पर आधारित था, लेकिन न तो विवादित आदेश में और न ही राज्य के उत्तर में उन रिपोर्टों की सामग्री का प्रकटन किया गया। न्यायालय ने टिप्पणी की कि यदि ये अनुशंसाएँ "बिना कारण बताए और अधिकारियों के मात्र विवेकाधिकार से" की गई थीं, तो संबंधित अधिकारियों से नए सिरे से टिप्पणियां प्राप्त करनी होंगी। 
  • अनुतोष प्रदान करने पर: न्यायालय ने माना कि विवादित आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता है और परिणामस्वरूप, याचिका को मंजूर करते हुए 26 जून, 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें समय से पूर्व छोड़ने से इंकार किया गया था। उच्च न्यायालय के आदेश की प्राप्ति के एक महीने के भीतर नए सिरे से निर्णय लेने के लिये मामले को सरकार को वापस भेज दिया गया। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 161 क्या है? 

बारे में: 

  • अनुच्छेद 161 राज्य के राज्यपाल को राज्य विधियों के अधीन दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को अनुतोष प्रदान करने का अधिकार देता है। 
  • अनुतोष के प्रकार: क्षमादान, प्रविलंबन, विराम, दंड-परिहार (Remission), दंडादेश का निलंबन तथा दंडादेश का लघुकरण। 
  • यह शक्ति राज्य मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर प्रयोग की जाती है, न कि व्यक्तिगत/स्वतंत्र शक्ति के रूप में। 
  • इसे राज्यपाल के न्यायिक कार्यों के भाग के रूप में, कार्यकारी, विधायी और वित्तीय भूमिकाओं के साथ-साथ माना जाता है। 
  • इसका उद्देश्य उचित मामलों में न्याय, निष्पक्षता और दया सुनिश्चित करना है; यह कठोर दण्ड और करुणा के बीच संतुलन बनाए रखता है। 

अनुतोष के प्रकार: 

  • क्षमादान – अपराध को पूरी तरह से क्षमा कर देता है; दोषसिद्धि, दण्ड और अयोग्यता को समाप्त कर देता है; यह केवल राज्य-विधि के अधीन आने वाले अपराधों तक सीमित है; इसमें मृत्युदण्ड और कोर्ट-मार्शल के मामले शामिल नहीं हैं। 
  • प्रविलंबन– मानवीय आधारों पर (जैसे, गर्भावस्था, बीमारी, वृद्धावस्था) कम सजा दी जाती है; इसमें अपराधबोध पर प्रश्न नहीं उठाया जाता। 
  • विराम– अपील/दया याचिका की अनुमति देने के लिये दण्ड (विशेषकर मृत्युदण्ड) के निष्पादन को अस्थायी रूप से स्थगित करना। 
  • परिहार– दण्ड की प्रकृति में परिवर्तन किये बिना उसकी अवधि को कम करना। 
  • दंडादेश का लघुकरण– कठोर दण्ड के स्थान पर कम दण्ड देना (जैसे, मृत्युदण्ड के स्थान पर आजीवन कारावास)। 

राज्यपाल (अनुच्छेद 161) बनाम राष्ट्रपति (अनुच्छेद 72): 

  • राष्ट्रपति की शक्तियां व्यापक हैं - इनमें संघ विधि के अधीन आने वाले अपराध, कोर्ट मार्शल के मामले और मृत्युदण्ड की पूर्ण क्षमा शामिल है। 
  • राज्यपाल की शक्तियां सीमित हैं - ये केवल राज्य-विधि के अधीन आने वाले अपराधों तक ही सीमित हैं, इसमें कोर्ट-मार्शल के मामले शामिल नहीं हैं, और यह मृत्युदण्ड को पूरी तरह से क्षमा नहीं कर सकता (केवल निलंबित/परिहार/लघुकरण कर सकता है)। 
  • राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है; राज्यपाल राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है।