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आपराधिक कानून

केंद्रीय अधिनियम के अंतर्गत दण्डादेश प्रभावी रहने की अवधि में ही दण्ड-परिहार हेतु केंद्र सरकार की सहमति आवश्यक है

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 05-Jun-2026

नांजिल मुगिलन बनाम राज्य 

"उपरोक्त दिये गए पैराग्राफ में संदर्भित और धारा 435 का निर्वचन करने वाले निर्णयों की श्रृंखलाजिसका अर्थ यह है कि केंद्र की सहमति केवल तभी आवश्यक है जब केंद्रीय अधिनियम के अधीन अपराध के लिये दण्ड की अवधि अभी भी लागू होराज्य द्वारा स्वीकार कर ली गई है।"        

न्यायमूर्ति अनीता सुमंत और सुंदर मोहन 

स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनीता सुमंथ और सुंदर मोहन की पीठ ने नंजिल मुगिलन बनाम राज्य (2026)के मामले मेंयह निर्णय दिया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 435 के अधीन केंद्र सरकार की सहमति केवल तभी दण्ड परिहार के लिये आवश्यक है जब केंद्रीय अधिनियम के अधीन अपराध का दण्ड अभी भी जारी हो। एक बार दोषी द्वारा ऐसा दण्ड पूरा कर लेने के बादधारा 435 के अधीन रोक लागू नहीं रहती हैऔर राज्य सरकार स्वयं दण्ड परिहार के लिये याचिका पर विचार करने के लिये स्वतंत्र है। न्यायालय ने आगे निदेश दिया कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा शुरू किये गए ई-जेल शीघ्र रिहाई प्रक्रिया मॉड्यूल को तमिलनाडु के पुझल केंद्रीय कारागार में एक पायलट परियोजना के रूप में लागू किया जाए।  

नांजिल मुगिलन बनाम राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता के पिता चेन्नई केंद्रीय कारागार में बंद थे और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 148 (एक वर्ष का कठोर कारावास), 341 (एक महीने का साधारण कारावास) और 302 (आजीवन कारावासपाँच मामलों में) के अधीन अपराधों के लिये 20 अक्टूबर, 2004 को दोषी ठहराए जाने के बाद आजीवन कारावास का दण्ड भोग रहे थेसाथ ही विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 (एक वर्ष का कठोर कारावास) के अधीन भी दोषी ठहराए गए थे। 
  • उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में दायर की गई दोनों अपीलें खारिज कर दी गईं। 
  • वर्तमान याचिका दायर किये जाने तकदोषी को 21 वर्षों से अधिक समय से कारावास में रखा जा चुका था और कहा जाता है कि उसमें काफी सुधार हुआ था। 
  • याचिकाकर्त्ता ने अपने पिता की समय से पहले रिहाई की मांग करते हुए अधिकारियों के समक्ष एक अभ्यावेदन दायर कियाजिसे फरवरी, 2018 के सरकारी आदेश (G.O.(Ms).No.64) का हवाला देते हुए खारिज कर दिया गयाजिसमें धारा 435 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आने वाले मामलों पर विचार करने पर रोक लगा दी गई थी। 
  • चूँकि दोषसिद्धि में विस्फोटक पदार्थ अधिनियम - एक केंद्रीय अधिनियम - के अधीन एक अपराध शामिल थाइसलिये राज्य ने इस आधार पर माफी देने से इंकार कर दिया कि धारा 435 के अधीन केंद्र सरकार की सहमति आवश्यक थी। 
  • याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि उसके पिता केंद्रीय अधिनियम के अधीन दण्ड पूरी तरह से भोग चुके हैं और इसलिये धारा 435 के अधीन रोक अब लागू नहीं होती है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 435 के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 435 राज्य सरकार को किसी भी अपराध के संबंध में दण्ड परिहार करने या कम करने से पहले केंद्र सरकार से परामर्श करने के लिये बाध्य करती हैलेकिन यह परामर्श केवल उसी अपराध के लिये लागू होता है जिस पर यह प्रावधान लागू होता है। केंद्र सरकार की सहमति की आवश्यकता सभी दण्ड परिहार की प्रक्रियाओं पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं हैयह केवल उस अवधि तक सीमित है जिसके दौरान केंद्रीय अधिनियम के अधीन दण्ड अभी भी प्रभावी है। 
  • केंद्रीय अधिनियम के अधीन दण्ड पूरा होने के बाद इसकी प्रयोज्यता पर:न्यायालय ने माना कि केंद्रीय अधिनियम के अधीन अपराध के लिये दिया गया दण्ड पूरा हो जाने के बाददण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 435 के अधीन केंद्र सरकार की सहमति लेने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। इसके बाद राज्य सरकार बिना किसी परामर्श के दण्ड परिहार की याचिका पर विचार करने के लिये सक्षम है। 
  • 2018 के सरकारी आदेश पर:न्यायालय ने माना कि सरकारी आदेश संख्या 64 में उल्लिखित धारा 435 की शर्त को उसी अर्थ में समझा जाना चाहिये जिस अर्थ में स्वयं धारा 435 को समझा गया है — अर्थात्यह केवल केंद्रीय अधिनियम के अधीन दण्ड के अस्तित्व के दौरान ही लागू होगा। इसके विपरीत कोई भी व्याख्या सांविधिक प्रावधान के स्पष्ट आशय और इस विषय पर राज्य के अपने बाद के सरकारी आदेशों के विपरीत होगी। 
  • राज्य की नीतिगत दलील खारिज होने पर:न्यायालय ने राज्य के इस तर्क को खारिज कर दिया कि उसने नीति के तौर पर धारा 435 दण्ड प्रक्रिया के अंतर्गत आने वाले सभी मामलों को परिहार आदेशों के लाभ से बाहर रखने का निर्णय लिया था। केंद्रीय अधिनियम के अधीन दण्ड पूरा हो चूका हो या नहींइस तरह का व्यापक बहिष्कारइस मामले पर उच्चतम न्यायालय के निर्णयों द्वारा निर्धारित विधिक स्थिति के विपरीत माना गया। 
  • जारी निर्देशों पर:न्यायालय ने सक्षम अधिकारियों को याचिकाकर्त्ता के पिता की समय से पहले छोड़ने के मामले पर पुनर्विचार करने और चार सप्ताह के भीतर उचित आदेश पारित करने का निदेश दिया। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 477 क्या है? 

बारे में: 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 435 के स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 477 लागू की गई है। यह उन मामलों में दण्ड परिहार करने या कम करने की राज्य सरकार की शक्ति के प्रयोग को नियंत्रित करती है जहाँ केंद्र सरकार के हित शामिल होते हैंऔर इस प्रकार के प्रयोग को केंद्र सरकार की पूर्व सहमति पर निर्भर बनाती है। 

मुख्य उपबंध: 

  • उपधारा (1) — अनिवार्य सहमति:राज्य सरकार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 473 और 474 के अधीन निलंबनपरिहार या लघुकरण करने की अपनी शक्तियों का प्रयोग केंद्रीय सरकार की सहमति प्राप्त किये बिना नहीं कर सकतीजहाँ अपराध: 
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अतिरिक्त किसी अन्य केंद्रीय अधिनियम के अधीन अन्वेषण करने के लिये अधिकृत किसी अभिकरण द्वारा जांच की गई होया 
    • केंद्र सरकार की किसी भी संपत्ति का दुरुपयोगविनाश या क्षति पहुँचानाया 
    • यह अपराध केंद्र सरकार के किसी कर्मचारी द्वारा आधिकारिक कर्त्तव्य के निर्वहन के दौरान या निर्वहन के आशय से किया गया था। 
  • उपधारा (2) - संघ से संबंधित मामलों में समवर्ती दण्डादेश:जहाँ किसी दोषी को समवर्ती रूप से चलने वाले कारावास का पृथक् दण्डादेश दिया गया होंऔर कुछ अपराध संघ की कार्यकारी शक्ति के अंतर्गत आने वाले मामलों से संबंधित होंतो राज्य सरकार द्वारा निलंबनपरिहार या दण्डादेश का लघुकरण का कोई भी आदेश तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक कि उन संघ से संबंधित अपराधों के संबंध में केंद्र सरकार द्वारा भी ऐसा ही आदेश जारी न किया गया हो। 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 435 से तुलना: 

  • धारा 477 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता अपने उद्देश्य और संचालन में धारा 435 दण्ड प्रक्रिया संहिता के समान है - दोनों उपबंध निर्दिष्ट श्रेणियों के मामलों में केंद्र सरकार की सहमति पर राज्य की छूट शक्तियों को निर्भर करते हैं। 
  • मसौदा तैयार करने में मुख्य अंतर यह है कि धारा 477 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में धारा 435 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन प्रयुक्त "परामर्श"शब्द के स्थान पर "सहमतिशब्द का प्रयोग किया गया है जो केवल राय मांगने के बजाय सहमति की अधिक मजबूत आवश्यकता को दर्शाता है। 
  • धारा 477 की उपधारा (2) स्पष्ट रूप से केंद्रीय और राज्य दोनों विषय-वस्तुओं की बात करने वाले समवर्ती दण्डादेश के परिदृश्य को संबोधित करती है - एक ऐसी स्थिति जो पुराने दण्ड प्रक्रिया संहिता व्यवस्था के अधीन न्यायिक निर्वचन के माध्यम से काफी हद तक विकसित हुई थी।