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आपराधिक कानून
न्यायालय वयस्कों के व्यक्तिगत विकल्पों पर नैतिक निर्णय नहीं दे सकते हैं
«03-Nov-2026
|
संतोष कुमार एन.पी. बनाम राज्य- थाने का भारसाधक अधिकारी “इस न्यायालय को स्वतंत्र विकल्प के विविध प्रयोगों पर नैतिक निर्णय देने का दायित्व नहीं सौंपा गया है।” न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने संतोष कुमार एन.पी. बनाम राज्य-थाने का भारसाधक अधिकारी (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अपीलें स्वीकार कर लीं, विचारण न्यायालय तथा केरल उच्च न्यायालय के आदेशों को अपास्त कर दिया तथा अपीलार्थी को विवाह के मिथ्या वचन पर बलात्संग, छल एवं द्विविवाह के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
संतोष कुमार एन.पी. बनाम राज्य- थाने का भारसाधक अधिकारी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- परिवादकर्त्ता का अपीलार्थी के साथ संबंध था और बाद में दोनों ने विवाह कर लिया।
- उसने आरोप लगाया कि विवाह से पूर्व अपीलार्थी ने अपने पूर्ववर्ती विवाह को छिपाया था और स्वयं को अविवाहित बताया था।
- उसके परिवाद के आधार पर अपीलार्थी के विरुद्ध निम्नलिखित अपराधों के लिये आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ की गई:
- भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 376(2)(ढ) के अधीन विवाह के मिथ्या वचन पर बलात्संग,
- छल, और
- द्विविवाह
- अभिलेख पर उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट हुआ कि:
- परिवादकर्त्ता को छह माह के भीतर ही पता चल गया था कि अपीलार्थी पहले से विवाहित है और उसके बच्चे भी हैं, और
- इसके बावजूद वह सात वर्षों तक उसके साथ रहती रही।
- विचारण न्यायालय और केरल उच्च न्यायालय ने अपीलार्थी को दोषमुक्त नहीं किया।
- तत्पश्चात् अपीलार्थी ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की।
उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न:
- जब कोई महिला किसी पुरुष के पहले से विवाहित होने की जानकारी होने के पश्चात् भी उसके साथ संबंध जारी रखती है, तो क्या उसकी सहमति को दूषित माना जा सकता है, जिससे संबंध समाप्त होने के बाद उस पुरुष के विरुद्ध बलात्संग, छल और द्विविवाह के अपराधों के लिये अभियोजन चलाया जा सके?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
स्वतंत्र विकल्प और नैतिक निर्णय के संबंध में:
- न्यायालय ने कहा कि उसे वयस्क व्यक्तियों द्वारा अपने स्वतंत्र विकल्प, स्वायत्तता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का प्रयोग करने के तरीकों पर नैतिक निर्णय देने की भूमिका नहीं सौंपी गई है।
- वयस्क व्यक्ति ऐसे विकल्प चुन सकते हैं जो विवेकपूर्ण अथवा अविवेकपूर्ण, सतर्कतापूर्ण अथवा जोखिमपूर्ण हों। ऐसे विकल्पों के परिणाम पीड़ादायक या अवांछित हो सकते हैं।
- केवल इस आधार पर ऐसे विकल्प आपराधिक अपराधों में परिवर्तित नहीं हो जाते, जिनके लिये राज्य द्वारा कार्रवाई किया जाना आवश्यक हो।
- आपराधिक विधि का उपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध लेने, बदला चुकाने अथवा किसी व्यक्ति को किसी विशेष तरीके से कार्य करने के लिये बाध्य करने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।
परिवादकर्त्ता के आचरण के संबंध में:
- परिवादकर्त्ता को छह माह के भीतर ही यह ज्ञात हो गया था कि अपीलार्थी विवाहित है और उसके बच्चे भी हैं, तथापि वह सात वर्षों तक उसके साथ रहती रही।
- इस आचरण से उसका यह दावा कमजोर हुआ कि वह स्वयं को अपीलार्थी की विधिपूर्वक विवाहित पत्नी मानती थी।
- अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से यह प्रदर्शित नहीं हुआ कि वह लगातार यह विश्वास करती रही कि वह अपीलार्थी की विधिक रूप से विवाहित पत्नी है अथवा कथित अपराधों के आवश्यक अवयव साबित होते हैं।
सहमति से स्थापित संबंधों और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376(2)(ढ) के संबंध में:
- न्यायालय ने पाया कि पक्षकारों के बीच संबंध तथा उनके मध्य हुए यौन कृत्य सहमति से किये गए थे। अपीलार्थी ने केवल उस संबंध से अलग होने का निर्णय लिया था।
- इससे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376(2)(ढ) के अधीन बलात्संग का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
- किसी संबंध के कटु एवं अप्रिय हो जाने से, पूर्व में सहमति से किये गए यौन कृत्य को पूर्वव्यापी प्रभाव से बलात्संग में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।
असफल संबंधों को अपराध बनाने के संबंध में:
- न्यायालय ने सहमति से स्थापित, किंतु विफल हो चुके संबंधों को आपराधिक मामलों में परिवर्तित करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की।
- न्यायालय ने उल्लेख किया कि न्यायालयों द्वारा इस प्रवृत्ति की निंदा किये जाने के बावजूद यह जारी है तथा ऐसे मामलों में समझौते के अंतर्गत प्रायः पुरुष अभियुक्तों द्वारा बड़ी धनराशि का भुगतान किया जाता है।
वास्तविक मामलों और दूषित सहमति के संबंध में:
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों से बलात्संग और लैंगिक हमले के वास्तविक आरोपों की गंभीरता कम नहीं होती। बलात्संग का अपराध आज भी व्यापक रूप से अप्रतिवेदित है और वास्तविक मामलों में दृढ़तापूर्वक अभियोजन चलाया जाना आवश्यक है।
- न्यायालय ने स्वीकार किया कि भारत में, जहाँ विवाह को अत्यधिक सामाजिक महत्त्व प्राप्त है, कोई महिला इस विश्वास के आधार पर शारीरिक अंतरंगता के लिये सहमति दे सकती है कि संबंध का परिणाम विधिपूर्वक विवाह होगा अथवा संबंध विधिपूर्वक विवाह पर आधारित है। ऐसी स्थिति में उसकी सहमति इस विश्वास की सत्यता पर निर्भर करती है।
- यदि किसी महिला को वास्तव में इस तथ्य से पूर्णतः अनभिज्ञ रखा गया हो कि उसका साथी पहले से विवाहित है, तो उसकी सहमति दूषित हो सकती है। अन्यथा, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 तथा धाराओं 493, 494 और 495 के अधीन प्रदान की गई सुरक्षा उन महिलाओं के लिये निरर्थक हो जाएगी, जिनके साथ वास्तव में अन्याय हुआ है।
- तथापि, इस सिद्धांत का अनुप्रयोग प्रत्येक मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिये, न कि केवल आरोपों अथवा नैतिक धारणाओं के आधार पर।
निर्णय:
- अपील स्वीकार कर ली गईं।
- विचारण न्यायालय और केरल उच्च न्यायालय के आदेश अपास्त कर दिये गए।
- अपीलार्थी को उसके विरुद्ध आरोपित सभी अपराधों से दोषमुक्त कर दिया गया।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64 क्या है?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 64 बलात्संग के लिये दण्ड का उपबंध करती है।
- धारा 64(1): जो कोई बलात्कार करता है, उसे कम-से-कम दस वर्ष के कठोर कारावास से, जिसकी अवधि आजीवन कारावास तक हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा तथा वह जुर्माने के लिये भी दायी होगा।
- धारा 64 (2): इस उपधारा में बलात्संग के गंभीरतर स्वरूपों का उल्लेख किया गया है, जिनके लिये कम-से-कम दस वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड निर्धारित है, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है (अर्थात् व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल तक), साथ ही जुर्माना का भी दायी होगा।
- धारा 64(2)(ड): इस खंड के अंतर्गत एक ही महिला के साथ बार-बार बलात्संग करने वाले व्यक्ति को दण्डित करने का उपबंध है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- सहमति मुख्य तत्त्व है: भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 में बलात्संग को परिभाषित किया गया है। किसी महिला की स्वतंत्र एवं स्वैच्छिक सहमति से किये गए लैंगिक कृत्य बलात्संग की श्रेणी में नहीं आते।
- तथ्य संबंधी भ्रांति: भारतीय न्याय संहिता की धारा 28 के अधीन, यदि सहमति तथ्य संबंधी भ्रांति के अधीन दी गई हो और अभियुक्त यह जानता हो अथवा उसके पास यह विश्वास करने का कारण हो कि सहमति ऐसी भ्रांति के कारण दी गई थी, तो ऐसी सहमति विधिमान्य नहीं होती।
- छलपूर्ण साधनों द्वारा नया अपराध: भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 ऐसे प्रवंचनापूर्ण साधनों द्वारा अथवा विवाह करने के ऐसे वचन के आधार पर, जिसे पूरा करने का कोई आशय न हो, प्राप्त किये गए मैथुन को पृथक् रूप से दण्डित करती है, जहाँ ऐसा कृत्य बलात्संग की श्रेणी में नहीं आता। इसके लिये जुर्माने के साथ दस वर्ष तक के कारावास का दण्ड दिया जा सकता है। “प्रवंचनापूर्ण साधनों” में अपनी पहचान छिपाकर विवाह करना भी सम्मिलित है।
- वचन का भंग सदैव बलात्संग नहीं होता: सहमति से स्थापित कोई संबंध बाद में समाप्त हो जाने मात्र से, पूर्व में सहमति से किये गए लैंगिक कृत्य बलात्संग में परिवर्तित नहीं हो जाते।
भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 376:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 64, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अनुरूप है।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 (2) (ड) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 (2) (ढ) के अनुरूप है, जिसमें एक ही महिला के साथ बार-बार बलात्संग किये जाने से संबंधित उपबंध था।
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 28, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 90 के अनुरूप है।
- वर्तमान मामले में, उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376(2)(ढ) लागू की और अभिनिर्धारित किया कि इस धारा के आवश्यक अवयव साबित नहीं हुए, क्योंकि पक्षकारों के बीच संबंध सहमति से स्थापित था।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराएँ 81 और 82 क्या हैं?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता की धाराएँ 81 और 82 विवाह से संबंधित अपराधों के अध्याय में सम्मिलित हैं।
- धारा 81: यह धारा ऐसे पुरुष को दण्डित करती है, जो किसी महिला को, जो विधिपूर्वक उससे विवाहित न हो, प्रवंचना से यह विश्वास कारित करेगा कि वह विधिपूर्वक उससे विवाहित है और इस विश्वास में उस महिला का अपने साथ सहवास या मैथुन कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भि दायी होगा।
- धारा 82 (1): यह धारा ऐसे व्यक्ति को दण्डित करती है, जो अपने पति या पत्नी के जीवित रहते हुए ऐसी परिस्थितियों में पुनः विवाह करता है, जिनमें पूर्ववर्ती पति या पत्नी के जीवित होने के कारण ऐसा विवाह शून्य होता है। इसके लिये जुर्माने के साथ सात वर्ष तक के कारावास का दण्ड दिया जा सकता है।
- धारा 82(2): यह उपधारा उसी अपराध को अधिक कठोरता से दण्डित करती है, जहाँ व्यक्ति अपने आगामी विवाह के समय उस व्यक्ति से अपने पूर्ववर्ती विवाह की बात छिपाता है, जिससे वह विवाह कर रहा है। इसके लिये जुर्माने के साथ दस वर्ष तक के कारावास का दण्ड दिया जा सकता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- धारा 81 का मूल तत्त्व प्रवंचना है: इस अपराध के लिये यह आवश्यक है कि महिला को वास्तव में इस विश्वास में छलपूर्वक रखा गया हो कि उसका विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ है।
- द्विविवाह के अपवाद: धारा 82 निम्नलिखित परिस्थितियों में लागू नहीं होती:
- सक्षम न्यायालय द्वारा पूर्ववर्ती विवाह को शून्य घोषित कर दिया गया हो, या
- पूर्ववर्ती पति या पत्नी लगातार सात वर्षों से अनुपस्थित हो और उसके जीवित होने के संबंध में कोई जानकारी प्राप्त न हुई हो, बशर्ते कि इस तथ्य का प्रकटीकरण उस व्यक्ति के समक्ष कर दिया गया हो जिससे विवाह किया जा रहा है।
- तथ्य छिपाने से अपराध की गंभीरता बढ़ती है: नए पति/पत्नी से पूर्ववर्ती विवाह को छिपाने पर धारा 82(2) के अधीन अधिक कठोर दण्ड का उपबंध लागू होता है।