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पारिवारिक कानून
कार्यस्थल पर पति द्वारा पत्नी की छवि को कलंकित करना मानसिक क्रूरता के समान है
«09-Jan-2026
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डॉ. सोमा मंडल देबनाथ बनाम श्री तन्मय देबनाथ "पति/पत्नी द्वारा किया गया सार्वजनिक अपमान, चरित्र हनन और पेशेवर कलंक किसी व्यक्ति की गरिमा और मानसिक शांति पर गहरा प्रहार करता है और इसे तुच्छ वैवाहिक कलह के रूप में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।" न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य और सुप्रतिम भट्टाचार्य |
स्रोत: कलकत्ता उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
डॉ. सोमा मंडल देबनाथ बनाम श्री तन्मय देबनाथ (2025) के मामले में न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य और सुप्रतिम भट्टाचार्य की खंडपीठ ने निर्णय दिया कि एक पति द्वारा अपनी पत्नी को उसके कार्यस्थल पर कलंकित करना, उसके शील-चरित्र पर प्रश्न उठाना और सहकर्मियों के सामने उसका अपमान करना मानसिक क्रूरता के समान है, जिसके अधीन विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन विवाह विच्छेद उचित है।
डॉ. सोमा मंडल देबनाथ बनाम श्री तन्मय देबनाथ (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह अपील एक महिला डॉक्टर द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उसने कुटुंब न्यायालय के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसमें विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन उसकी विवाह-विच्छेद की याचिका खारिज कर दी गई थी।
- कुर्सेओंग के एक अस्पताल में कार्यरत चिकित्सा पेशेवर पत्नी ने अपने पति द्वारा व्यवस्थित उत्पीड़न और अपमान का आरोप लगाया है।
- पति बार-बार उसके कार्यस्थल पर जाता था और उसके सहकर्मियों के सामने उसे गाली देता था।
- पति ने उसके पेशेवर कार्यस्थल पर उसकी शील और चरित्र के बारे में अफवाहें फैलाईं।
- पति ने उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी।
- पत्नी ने विशेष रूप से यह दलील दी थी कि कार्यस्थल पर सार्वजनिक रूप से अपमानित किये जाने के इन कृत्यों के कारण उसे गंभीर मानसिक पीड़ा हुई।
- पत्नी ने अपने आरोपों को साबित करने के लिये वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अपने सहयोगियों से पूछताछ करने के लिये कुटुंब न्यायालय से अनुमति मांगी।
- कुटुंब न्यायालय ने बुनियादी ढाँचे की कमी का हवाला देते हुए एक पंक्ति के आदेश में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से साक्ष्य प्रस्तुत करने के उनके अनुरोध को खारिज कर दिया।
- विचारण न्यायाधीश ने पत्नी के कथन पर इस आधार पर विश्वास नहीं किया कि वह अपने आरोपों के समर्थन में कोई सहायक साक्षी प्रस्तुत नहीं कर सकी।
- कुटुंब न्यायालय ने पत्नी की विवाह-विच्छेद की याचिका को यह पाते हुए खारिज कर दिया कि वह क्रूरता को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर पाई थी।
- पति के लिखित कथन में गंभीर आरोपों के संबंध में मात्र निराधार, अस्पष्ट एवं टालमटोलपूर्ण इंकार किया गया था तथा किसी प्रकार का सार्थक स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया गया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- पीठ ने टिप्पणी की कि " जब स्वयं विद्वान विचारण न्यायाधीश ने अधोसंरचना के अभाव जैसे तुच्छ आधार पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया, तब उसी आधार पर अपीलकर्त्ता-पत्नी के विरुद्ध साक्ष्य न प्रस्तुत करने का प्रतिकूल अनुमान नहीं लगाया जा सकता था।"
- न्यायालय ने यह माना कि इस प्रकार का दृष्टिकोण पत्नी के प्रति गंभीर पूर्वाग्रह उत्पन्न करता है तथा उसे क्रूरता साबित करने के लिये निष्पक्ष अवसर से वंचित करने के समान है।
- न्यायालय ने गैर-प्रतिवाद (Non-Traverse) के सिद्धांत को लागू करते हुए पाया कि पति के लिखित कथन में सार्थक स्पष्टीकरण के बिना केवल टालमटोल वाले इंकार शामिल थे।
- पीठ ने टिप्पणी की, "इस प्रकार, विशिष्ट और स्पष्ट आरोपों का खंडन... अधिक से अधिक टालमटोल ही है। अतः, गैर-प्रतिवाद के सिद्धांत के अनुसार आरोप किसी भी स्थिति में स्थापित हो जाते हैं।"
- न्यायालय ने इस तथ्य पर बल दिया कि पति द्वारा पत्नी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना, उसके चरित्र पर आक्षेप लगाना तथा पेशेवर मान-प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना व्यक्ति की गरिमा एवं मानसिक शांति के मूल में प्रहार करता है और इसे साधारण वैवाहिक मतभेद कहकर उपेक्षित नहीं किया जा सकता।
- पीठ ने कहा कि "पत्नी द्वारा लगाए गए यह आरोप कि पति ने निरंतर उसके कार्यस्थल पर उसकी छवि को कलंकित करने का प्रयास किया, मानसिक क्रूरता के सर्वाधिक गंभीर स्वरूप को दर्शाते हैं।"
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि पेशेवर परिवेश में जीवनसाथी को अपमानित करने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव कहीं अधिक गहरा होता है, यह देखते हुए कि पेशेवर गरिमा किसी व्यक्ति की पहचान का एक अभिन्न अंग है।
- समस्त साक्ष्यों परीक्षा करने के बाद, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी ने क्रूरता और परित्याग दोनों को सफलतापूर्वक साबित कर दिया है।
- न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया और पत्नी को विवाह-विच्छेद की डिग्री प्रदान की।
- न्यायालय ने अवयस्क पुत्र के संबंध में पति को मुलाक़ात का अधिकार भी प्रदान किया और बच्चे के कल्याण की रक्षा के लिये एक विस्तृत समय-सारिणी भी निर्धारित की।
क्रूरता क्या है?
बारे में:
- भारत में विभिन्न वैवाहिक विधियों के अधीन क्रूरता को विवाह-विच्छेद के आधार के रूप में मान्यता दी गई है, जिनमें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 सम्मिलित हैं।
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 या अन्य वैवाहिक विधानों में 'क्रूरता' शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है।
- सामान्यतः, क्रूरता से आशय ऐसे किसी भी आचरण से है जो पति/पत्नी को शारीरिक अथवा मानसिक क्षति पहुँचाए, चाहे वह जानबूझकर किया गया हो या अनजाने में।
- न्यायिक निर्वचन के माध्यम से क्रूरता की अवधारणा विकसित हुई है और इसमें अंतर्गत अब दुर्व्यवहार, अपमान, तिरस्कार तथा मानवीय गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले कृत्य भी सम्मिलित किये गए हैं।
क्रूरता पर न्यायिक पूर्व निर्णय:
शोभा रानी बनाम मधुकर रेड्डी (1988):
- उच्चतम न्यायालय यह प्रतिपादित किया कि “क्रूरता” की कोई निश्चित अथवा स्थिर परिभाषा नहीं हो सकती।
- न्यायालय ने यह भी माना कि क्रूरता का निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिये।
मायादेवी बनाम जगदीश प्रसाद (2007):
- उच्चतम न्यायालय ने यह घोषित किया कि पति या पत्नी, दोनों में से किसी के साथ की गई मानसिक क्रूरता, केवल महिलाओं तक सीमित न होकर पुरुषों के संदर्भ में भी, क्रूरता के आधार पर विवाह-विच्छेद का वैध आधार हो सकता है।
- इस निर्णय में क्रूरता संबंधी प्रावधानों के लिंग-तटस्थ अनुप्रयोग को मान्यता दी गई।
क्रूरता के प्रकार:
उच्चतम न्यायालय द्वारा कई निर्णयों में निर्धारित विधि के अनुसार, क्रूरता दो प्रकार की होती है:
- शारीरिक क्रूरता: पति या पत्नी को शारीरिक पीड़ा पहुँचाने वाला हिंसक आचरण।
- मानसिक क्रूरता: जब पति या पत्नी को किसी भी प्रकार के मानसिक तनाव से ग्रस्त किया जाता है या उन्हें निरंतर मानसिक पीड़ा सहनी पड़ती है। इसका तात्पर्य ऐसे आचरण से है जो इस हद तक मानसिक पीड़ा, कष्ट या क्षति पहुँचाता है कि दोनों पक्षकारों के लिये एक साथ रहना असंभव हो जाता है।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन विवाह-विच्छेद के आधार के रूप में क्रूरता:
- हिंदू विवाह अधिनियम में 1976 में हुए संशोधन से पहले, क्रूरता हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन विवाह-विच्छेद का दावा करने का आधार नहीं थी।
- यह अधिनियम की धारा 10 के अधीन न्यायिक पृथक्करण का दावा करने का केवल एक आधार था।
- 1976 के संशोधन द्वारा, क्रूरता को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)( i-क) के अधीन विवाह-विच्छेद का आधार बनाया गया था।
- इस उपबंध के अधीन, यदि पति या पत्नी को दूसरे द्वारा क्रूरता का शिकार बनाया जाता है, तो दोनों में से कोई भी विवाह-विच्छेद की मांग कर सकता है।
विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन विवाह-विच्छेद के आधार के रूप में क्रूरता:
- विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अधीन, धारा 27(1)(घ) के अधीन क्रूरता को विवाह-विच्छेद के आधार के रूप में मान्यता दी गई है।
- विधि मानसिक क्रूरता को पूरी तरह से परिभाषित नहीं करती है, जिससे न्यायालयों को प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर इसका निर्धारण करने की अनुमति मिलती है।
- मानसिक क्रूरता इस प्रकार की होनी चाहिये कि पीड़ित पक्षकार के लिये दूसरे पति/पत्नी के साथ रहना असंभव हो जाए।