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आपराधिक कानून

गंभीर चोट मात्र हत्या के प्रयत्न के दोषसिद्धि हेतु पर्याप्त नहीं है

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 26-May-2026

रोशन लाल बनाम हरियाणा राज्य और अन्य 

"चोट की गंभीरता अपने आप में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 के अधीन अपराध का निर्णायक कारक नहीं हो सकतीजब तक कि अभियोजन पक्ष प्रावधान के अधीन परिकल्पित आवश्यक आपराधिक मनःस्थिति को साबित करने में सक्षम न हो।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह शामिल थेनेरोशन लाल बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2026) के मामलेमें अपीलकर्त्ता कोभारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 307 (भारतीय न्याय संहिता की धारा 109) (हत्या करने का प्रयत्न) के अधीन दोषी ठहराए जाने को अपास्त कर दियाजबकि उसे आरोप से दोषमुक्त कर दिया। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि हत्या करने के प्रयत्न के लिये दोषसिद्धि को केवल पीड़ित को हुई चोट की गंभीरता के आधार पर बरकरार नहीं रखा जा सकता हैजब तक कि अभियोजन पक्ष आवश्यक आपराधिक मनःस्थिति (mens rea) - अर्थात्मृत्यु का कारण बनने का आशय या ज्ञान - को अपराध के एक स्वतंत्र तत्त्व के रूप में स्पष्ट रूप से स्थापित न कर दे। 

रोशन लाल बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • घायल व्यक्ति (PW3 अमर सिंह) ने अपीलकर्त्ता और एक पर-पक्षकार (जीप के चालक) के बीच झगड़े को रोकने के लिये हस्तक्षेप किया थाजिसके दौरान वह घायल हो गया था। 
  • विचारण न्यायालय ने अपीलकर्त्ता को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 के अधीन हत्या करने के प्रयत्न का दोषी ठहरायामुख्य रूप से इस तथ्य पर विश्वास करते हुए कि चोटें जानलेवा मानी गई थीं। 
  • पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के तर्क को बरकरार रखते हुए दोषसिद्धि को बरकरार रखा। 
  • अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष दोषसिद्धि को चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि अभियोजन पक्ष द्वारा मृत्यु का कारण बनने के आशय के आवश्यक तत्त्व को स्थापित नहीं किया गया था। 
  • न्यायालय के समक्ष मुख्य विवाद्यक यह था कि क्या भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 के अधीन दोषसिद्धि को केवल चोट की गंभीरता के आधार परआपराधिक आशय के सबूत के अभाव मेंबरकरार रखा जा सकता है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 के आवश्यक तत्त्व:न्यायालय ने माना कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 के अधीन हत्या करने के प्रयत्न का अपराध गठित करने के लिये दो आवश्यक तत्त्वों का स्वतंत्र रूप से सिद्ध होना आवश्यक है: (i) हत्या करने का आशय या ज्ञानऔर (ii) हत्या करने का वास्तविक प्रयास। अभियोजन पक्ष द्वारा दोनों तत्वों को सिद्ध किया जाना चाहिएएक का प्रमाण दूसरे का विकल्प नहीं है। 
  • आपराधिक मनःस्थिति (mens rea) का कृत्य से स्वतंत्र होना:न्यायालय ने माना कि हत्या करने का आशय वास्तविक प्रयत्न से पहले विद्यमान होता है और इसे कृत्य या दोषी कृत्य (actus reus) से स्वतंत्र रूप से साबित किया जाना चाहिये। एक बार आवश्यक आशय साबित हो जाने परप्रयत्न का अंतिम परिणाम अप्रासंगिक हो जाता है - जब तक कि प्रयास का परिणाम मृत्यु न होऐसी स्थिति में अपराध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 300 के अंतर्गत आता है। आशय के सबूत के अभाव मेंभारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 के अधीन दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता। 
  • चोट की गंभीरता निर्णायक कारक नहीं:न्यायालय ने माना कि केवल चोट की गंभीरता ही भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 के अधीन दायित्त्व तय करने के लिये पर्याप्त नहीं है। केवल इसलिये हत्या करने का आशय नहीं माना जा सकता क्योंकि अंततः चोटों को जानलेवा माना गया। अभियोजन पक्ष को स्वतंत्र रूप से पूर्व नियोजित उद्देश्यपूर्वचिंताघातक आयुधों से बार-बार जानबूझकर किये गए प्रहारया जानबूझकर मृत्यु का कारण बनने के दृढ़ प्रयास को दर्शाने वाले आचरण को साबित करना होगा। 
  • घटना की परिस्थितियों पर:न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्त्ता और घायल व्यक्ति के बीच कोई पुरानी दुश्मनी नहीं थी। अभियोजन पक्ष हत्या के पूर्व नियोजित आशयतैयारी या मिलीभगत से किये गए कृत्य का संकेत देने वाला कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा। यह घटना अचानक घटी जब घायल व्यक्ति ने किसी पर-पक्षकार के झगड़े में हस्तक्षेप कियाऔर हमला किसी पूर्व नियोजित आशय के बजायउस क्षणिक आवेश में की गई एक सहज प्रतिक्रिया प्रतीत होती है। 
  • निचले न्यायालयों द्वारा अनुचित निर्भरता:न्यायालय ने पाया कि विचारण न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों ने जानलेवा चोट पर अनुचित रूप से विश्वास किया थाजबकि अपीलकर्त्ता की ओर से हत्या करने के लिये आवश्यक आशय या ज्ञान के अभाव को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया था। तदनुसारदोषसिद्धि को अपास्त कर दिया गया और अपीलकर्त्ता को दोषमुक्त कर दिया गया। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 109 क्या है? 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 109— हत्या करने का प्रयत्न  

मूल परिभाषा: 

  • जो कोई भी इस आशय या ज्ञान के साथ कोई कार्य करता है कि यदि उस कृत्य के कारण मृत्यु हो जाती हैतो वह हत्या का दोषी होगा।    
  • दो आवश्यक तत्त्व: (i) मृत्यु का कारण बनने का आशय/ज्ञानऔर (ii) हत्या करने की दिशा में एक स्पष्ट कृत्य। 

दण्ड: 

  • मूल अपराध: 10 वर्ष तक का कारावास + जुर्माना। 
  • यदि चोट पहुँचाई जाती है: आजीवन कारावासया 10 वर्ष तक का कारावास + जुर्माना। 
  • यदि अपराधी पहले से ही आजीवन कारावास का दण्ड काट रहा है और चोट पहुँचाता है: तो मृत्युदण्डया आजीवन कारावास (अर्थात् शेष प्राकृत जीवनकाल के लिये)। 

दृष्टांत: 

  • ‘A’, ‘Z’ को जान से मारने के आशय से उस पर गोली चलाता है – ‘Z’ के बच जाने पर भी ‘A’ इस धारा के अधीन उत्तरदायी होगा। 
  • किसी बच्चे को रेगिस्तान में इस आशय से छोड़ देना कि उसकी मृत्यु हो जाए - यह अपराध मृत्यु के बिना भी पूरा हो जाता है। 
  • ‘A’, ‘Z’ को मारने के आशय से बंदूक खरीदता है और उसमें गोलियां भरता है - अभी तक कोई अपराध नहींअपराध तभी होता है जब ‘A’ गोली चलाता है। 
  • ‘A’ अपने पास रखे भोजन में जहर मिला देता है - अभी तक कोई अपराध नहींअपराध तब होता है जब भोजन ‘Z’ की मेज पर रखा जाता है।  

प्रमुख विधिक सिद्धांत: 

  • महज तैयारी करना पर्याप्त नहीं है—तैयारी से परे एक स्पष्ट कार्रवाई आवश्यक है। 
  • केवल चोट की गंभीरता से अपराध साबित नहीं होताआपराधिक मनःस्थिति (mens rea) को स्वतंत्र रूप से साबित किया जाना चाहिये 

प्रक्रियात्मक वर्गीकरण: 

  • संज्ञेय 
  • अजमानतीय 
  • सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय