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पारिवारिक कानून
विवाह रजिस्ट्रीकरण और आपसी विवाह-विच्छेद
«28-Jan-2026
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एक्स बनाम वाई "विवाह का रजिस्ट्रीकरण मात्र एक सांविधिक आदेश है, और अपने आप में यह न तो वैवाहिक सौहार्द, न सहवास का आशय, और न ही वैवाहिक संबंध की व्यवहार्यता का निर्णायक कारक हो सकता है।" न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और रेनू भटनागर |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
एक्स बनाम वाई (2025) के मामले में न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और रेणु भटनागर की खंडपीठ ने यह निर्णय दिया कि दो व्यक्तियों के बीच विवाह का मात्र रजिस्ट्रीकरण वैवाहिक सामंजस्य या उनके साथ सहवास करने के आशय को निर्धारित नहीं कर सकता है, और विवाह की तारीख से एक वर्ष पूरा होने से पहले आपसी सहमती विवाह-विच्छेद की अनुमति दी।
एक्स बनाम वाई (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पत्नी ने कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की, जिसमें विवाह की तारीख से एक वर्ष की समाप्ति से पहले आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद के लिये संयुक्त याचिका प्रस्तुत करने की अनुमति मांगने वाले उसके आवेदन को नामंजूर कर दिया गया था।
- विवाह के बाद दोनों पक्षकार कभी एक दिन भी साथ नहीं रहे।
- दोनों पक्षकारों के बीच कभी भी शारीरिक संबंध स्थापित नहीं हो पाए।
- विवाह की रस्म पूरी होने के तुरंत पश्चात्, दोनों पक्षकार अपने-अपने माता-पिता के घरों में पृथक् रहने लगे।
- आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद के लिये संयुक्त याचिका विवाह के सात महीने के भीतर प्रस्तुत की गई थी।
- कुटुंब न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 14 के अधीन अनुमति देने से इंकार कर दिया।
- कुटुंब न्यायालय ने माना कि पक्षकार सांविधिक प्रतिबंध में छूट देने के लिये "असाधारण कठिनाई" का मामला स्थापित करने में असफल रहे।
- कुटुंब न्यायालय ने यह भी माना कि पक्षकारों ने विवाह को संरक्षित और सुरक्षित रखने के लिये पर्याप्त या ईमानदारीपूर्ण प्रयास नहीं किये थे।
- कुटुंब न्यायालय ने पाया कि विवाह संपन्न होने के तुरंत बाद उसका रजिस्ट्रीकरण कराना असाधारण कठिनाई के उनके दावे के विरुद्ध था और उसे कमजोर करता था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने पाया कि यह एक स्वीकृत तथ्य है कि दोनों पक्षकार कभी साथ नहीं रहे, विवाह कभी संपन्न नहीं हुआ और वे विवाह की शुरुआत से ही पृथक् रह रहे थे।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि विवाह का रजिस्ट्रीकरण मात्र एक सांविधिक आदेश है, और यह अपने आप में वैवाहिक सामंजस्य, सहवास के आशय या वैवाहिक संबंध की व्यवहार्यता का निर्णायक कारक नहीं हो सकता है।
- न्यायालय ने माना कि ये तथ्य एक विद्यमान वैवाहिक संबंध की बुनियाद पर ही प्रहार करते हैं।
- न्यायालय ने कहा कि "ऐसे विवाह को जारी रखने पर बल देना जो केवल विधि में विद्यमान है, न कि सार में, पक्षकारों को किसी भी वैवाहिक आधार से रहित संबंध को सहन करने के लिये विवश करने के समान होगा, जिससे विधि के उद्देश्य को आगे बढ़ाने के बजाय अनावश्यक कठिनाई उत्पन्न होगी।"
- न्यायालय ने माना कि यह मामला हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14 के अधीन निर्धारित अपवाद के दायरे में आता है।
- न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय के विवादित आदेश को अपास्त कर दिया।
- न्यायालय ने दंपति के आवेदन को मंजूर कर लिया और उन्हें आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद के लिये संयुक्त याचिका प्रस्तुत करने की अनुमति दे दी।
- न्यायालय ने मामले को संबंधित कुटुंब न्यायालय को वापस भेज दिया जिससे वह धारा 13-ख हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन याचिका पर विधि के अनुसार शीघ्रता से कार्यवाही कर सके।
विवाह रजिस्ट्रीकरण के संबंध में क्या उपबंध हैं?
हिंदू विधि:
- हिंदू विधि की धारा 8(1) राज्य सरकारों को विवाह रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजन से नियम बनाने में सक्षम बनाती है
- धारा 8(2) में उल्लेख है कि उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार, यदि वह आवश्यक या उचित समझे, तो पूरे राज्य या विशिष्ट क्षेत्रों में उपधारा (1) में उल्लिखित विवरण प्रस्तुत करना अनिवार्य कर सकती है, चाहे सार्वभौमिक रूप से हो या विशिष्ट मामलों के लिये।
- ऐसे मामलों में जहाँ इस प्रकार के निदेश जारी किये जाते हैं, इस संबंध में स्थापित किसी भी नियम का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति पर पच्चीस रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
मुस्लिम विधि:
- मुसलमानों में विवाह का रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य है, क्योंकि मुस्लिम विवाह को एक सिविल संविदा माना जाता है।
- इस अधिनियम के लागू होने के पश्चात् मुसलमानों के बीच हुए प्रत्येक विवाह को निकाह समारोह के समापन के तीस दिनों के भीतर, जैसा कि आगे उपबंध किया गया है, रजिस्ट्रीकृत कराया जाएगा।
- निकाहनामा मुस्लिम विवाहों में एक प्रकार का विधिक दस्तावेज़ है जिसमें विवाह की आवश्यक शर्तें/विवरण सम्मिलित होते हैं।
क्रिश्चियन (ईसाई) विधि:
- धारा 27-37 भारतीय क्रिश्चियन विवाह अधिनियम, 1872 के भाग 4 का निर्माण करती हैं, जो विशेष रूप से भारतीय क्रिश्चियनों के बीच इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठित विवाहों के रजिस्ट्रीकरण की प्रक्रिया को संबोधित करती हैं।
- विवाहों को विहित नियमों का पालन करना चाहिये, और सामान्यत: इनका संचालन चर्च ऑफ इंग्लैंड से संबद्ध पादरियों द्वारा किया जाता है।
विवाह का रजिस्ट्रीकरण न कराने के क्या परिणाम होते हैं?
- भारत में विवाह का रजिस्ट्रीकरण न कराने के परिणाम परिस्थिति और विधिक आवश्यकताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। यहाँ कुछ सामान्य परिणाम दिये गए हैं:
- विधिक मान्यता : अधिकतर मामलों में विवाह की वैधता के लिये रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य नहीं है, परंतु यह विवाह संपन्न होने का पुख्ता सबूत होता है। रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाण पत्र के बिना, विवाह के अस्तित्व को साबित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, विशेषकर विधिक कार्यवाही में।
- अधिकार एवं लाभ : सरकार द्वारा प्रदत्त विभिन्न अधिकारों एवं लाभों, जैसे कि उत्तराधिकार अधिकार, पति-पत्नी से संबंधित लाभ और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ उठाने के लिये प्राय रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाण पत्र आवश्यक होता है। रजिस्ट्रीकरण न कराने पर इन लाभों से वंचित होना पड़ सकता है।
- विधिक कार्यवाही : वैवाहिक स्थिति, संपत्ति के अधिकार या विवाह-विच्छेद से संबंधित विवादों के मामले में, रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाण पत्र विवाह के स्पष्ट दस्तावेजीकरण प्रदान करके विधिक कार्यवाही को सरल बना सकता है। रजिस्ट्रीकरण न होने से ऐसे मामले जटिल हो सकते हैं और विधिक प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है।
- वीज़ा और आव्रजन : कुछ मामलों में, वीज़ा आवेदन और आव्रजन उद्देश्यों के लिये रजिस्ट्रीकृत विवाह प्रमाण पत्र की आवश्यकता हो सकती है, विशेष रूप से उन पति-पत्नी के लिये जो दूसरे देश में अपने पति/पत्नी के साथ रहने का आशय रखते हैं। रजिस्ट्रीकरण न होने से ऐसी प्रक्रियाओं में बाधा आ सकती है।
विवाह रजिस्ट्रीकरण के लिये महत्त्वपूर्ण मामले कौन से हैं?
- सीमा बनाम अश्वनी कुमार (2007) :
- इस मामले में, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन, विवाहों का रजिस्ट्रीकरण पक्षकारों के विवेक पर छोड़ दिया गया है; वे या तो उप-पंजीयक के समक्ष विवाह संपन्न करा सकते हैं या पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार विवाह संस्कार संपन्न करने के बाद इसे रजिस्ट्रीकृत करा सकते हैं।
- अब्दुल कादिर बनाम सलीमा और अन्य (1886):
- न्यायमूर्ति महमूद ने मुस्लिम विवाह की प्रकृति को एक संस्कार के बजाय विशुद्ध रूप से एक सिविल संविदा के रूप में देखा।