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सांविधानिक विधि

िवाहित पुत्री को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकत

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 02-Jun-2026

कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 

"अपीलकर्त्ता का आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि वह विवाहित पुत्री है। ऐसा आधार सांविधानिक रूप से अमान्य है। वैवाहिक स्थिति किसी पात्र पुत्री को कल्याणकारी योजना से वंचित करने का वैध आधार नहीं हो सकती।" 

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ नेकुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामलेमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के विपरीत मतों को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया कि अनुकंपा नियुक्ति या अनुकंपा के आधार पर उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस प्रदान करने के उद्देश्य से विवाहित पुत्री को "परिवार" की परिभाषा से अपवर्जित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने बॉम्बे और कर्नाटक उच्च न्यायालयों के मतों की पुष्टि करते हुए कहा कि वैवाहिक स्थिति किसी पात्र पुत्री को कल्याणकारी लाभ से वंचित करने का वैध आधार नहीं हो सकती। 

कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता कुलसुम निशा एक विवाहित पुत्री थी जिसने अपनी माता की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस मांगा था। 
  • विवाह के बाद भी अपीलकर्ता उसी गाँव में रहती रही और उचित मूल्य की दुकान चलाने में अपनी माता की सक्रिय रूप से सहायता करती रही। 
  • वह अपने परिवार की देखरेख करने के लिये भी उत्तरदायी थीजिसमें उसकी शारीरिक रूप से अक्षम बहन भी शामिल थी। 
  • अपनी माता के निधन के बादअपीलकर्त्ता ने अपने नाम पर उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस प्राप्त करने के लिये आवेदन किया। 
  • उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा जारी 2019 के एक सरकारी आदेश के आधार पर उनका आवेदन खारिज कर दिया गयाजिसमें विवाहित पुत्रियों को "परिवार" की परिभाषा से अपवर्जित किया गया था। 
  • अपीलकर्त्ता ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सरकारी आदेश को चुनौती दी। 
  • एकल न्यायाधीश ने इस विवाद्यक पर परस्पर विरोधी पूर्व निर्णयों का उल्लेख किया: 
    • विमल श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2015)के मामले में , इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारियों के आश्रितों की भर्ती संबंधी नियम, 1974 के अधीन "परिवार" की परिभाषा से विवाहित पुत्रियों को अपवर्जित करने को असांविधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। 
    • यद्यपि, कुसुमलता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021)औरसैदा बेगम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) के मामलेमेंइलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2019 के सरकारी आदेश के अधीन विवाहित पुत्रियों को अपवर्जित रखने को बरकरार रखा। 
  • एकल न्यायाधीश ने यह भी उल्लेख किया कि बॉम्बे उच्च न्यायालय नेरंजना मुरलीधर अनेराव बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) के मामलेमें और अन्य उच्च न्यायालयों ने इस तरह के बहिष्कार को असांविधानिक माना था। 
  • न्यायिक मतों में परस्पर विरोधी विचारों को देखते हुएइस मामले को उच्चतम न्यायालय के पास भेजा गया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

वैवाहिक स्थिति बहिष्कार का आधार नहीं हो सकती: 

  • उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि केवल विवाह के आधार पर विवाहित पुत्रियों को कल्याणकारी उपायों से वंचित करना विभेदकारी और सांविधानिक रूप से अग्राह्य है। 
  • न्यायालय ने पाया कि विवाहित पुत्रों पर ऐसी कोई समान अक्षमता लागू नहीं होती है। 
  • इसलियेविवाह के बाद पुत्रियों के साथ अलग व्यवहार करना लिंग आधारित विभेद के समान है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के अधीन समता की प्रत्याभूति का उल्लंघन करता है। 

बॉम्बे और कर्नाटक उच्च न्यायालयों के विचारों की स्वीकृति: 

  • न्यायालय ने बॉम्बे उच्च न्यायालय और कर्नाटक उच्च न्यायालय के उन निर्णयों को स्पष्ट रूप से अनुमोदित कियाजिनमें यह माना गया था कि वैवाहिक स्थिति पुत्रियों को अनुकंपा लाभ से वंचित करने का वैध आधार नहीं हो सकती है। 
  • इसमें कहा गया कि इन उच्च न्यायालयों द्वारा अपनाई गई तर्क प्रक्रिया समता और गैर-भेदभाव के सांविधानिक सिद्धांतों को सही ढंग से प्रतिबिंबित करती है। 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का विपरीत मत खारिज: 

  • उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया किसैदा बेगम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) के मामलेमें दिया गया निर्णय सही विधि नहीं बताती है। 
  • न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस विपरीत मत को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि विवाहित पुत्रियों को परिवार की परिभाषा से अपवर्जित रखना सांविधानिक रूप से वैध है। 

तथ्यों से निरंतर निर्भरता और उत्तरदायी का प्रमाण मिलता है: 

  • न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्त्ता विवाह के बाद भी उसी गाँव में रहती रही 
  • वह उचित मूल्य की दुकान चलाने में अपनी माता की सक्रिय रूप से सहायता करती थी। 
  • अपनी माता की मृत्यु के बादउसने अपने परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी संभालीजिसमें उसकी दिव्यांग बहन भी शामिल थी। 
  • इन तथ्यों से यह साबित होता है कि केवल उसकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर उसके दावे को खारिज करना मनमाना और असांविधानिक था। 

अनुतोष प्रदान किया गया: 

  • उच्चतम न्यायालय ने अपीलकर्त्ता को उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस देने से इंकार करने वाले आदेशों को रद्द कर दिया। 
  • न्यायालय ने सक्षम अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर उनके पक्ष में लाइसेंस जारी करने का निदेश दिया। 

अनुकंपा नियुक्ति क्या है? 

बारे में: 

  • अनुकंपा नियुक्ति एक कल्याणकारी उपाय है जिसका उद्देश्य सेवा के दौरान मृत्यु हो जाने वाले कर्मचारी या लाइसेंस धारक के परिवार को तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करना है। 
  • यह खुली प्रतियोगिता के माध्यम से लोक नियोजन के सामान्य नियम का अपवाद है। 
  • अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार के मुखिया की मृत्यु के कारण अचानक उत्पन्न हुई वित्तीय कठिनाई को कम करना है। 

अनुकंपा नियुक्ति को नियंत्रित करने वाले सांविधानिक सिद्धांत: 

  • अनुकंपा नियुक्ति योजनाओं को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का अनुपालन करना होगा। 
  • किसी पुत्री को केवल इसलिये अपवर्जित करने वाला कोई भी वर्गीकरणक्योंकि वह विवाहित हैउचित वर्गीकरण की कसौटी पर खरा उतरना चाहिये 
  • केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर किया गया विभेदजबकि पुत्रियों के लिये ऐसा कोई प्रतिबंध मौजूद नहीं हैविभेदकारी होने के कारण रद्द किया जा सकता है। 
  • कल्याणकारी योजनाएँ उन लैंगिक रूढ़ियों को बढ़ावा नहीं दे सकतीं जो यह मानती हैं कि विवाह के बाद पुत्री अपने माता-पिता के परिवार की सदस्य नहीं रह जाती है।