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आपराधिक कानून

निजी घर के अंदर कथित जातिवादी दुर्व्यवहार के लिये अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अधीन कोई अपराध नहीं है

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 12-May-2026

"भले ही वह एक निजी स्थान होऐसी स्थिति में जनता की नज़र को वहाँ होने वाली घटनाओं या क्रियाकलापों को देखने के लिये वहाँ तक ​​पहुँच होनी चाहियेइससे ही वह स्थान 'लोक दृष्टि के अंतर्गतआएगा।" 

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय की एक खंडपीठजिसमें न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया शामिल थेनेगुंजन उर्फ गिरिजा कुमारी और अन्य बनाम राज्य (एन.सी.टी. दिल्ली) और अन्य (2026) के मामलेमें एक अपील को स्वीकार करते हुए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के अधीन उन अपीलकर्त्ताओं के विरुद्ध कार्यवाही को रद्द कर दियाजिन पर एक निजी आवासीय घर के अंदर परिवादकर्त्ता के विरुद्ध जाति-आधारित गालियाँ देने का आरोप था। 

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि चूँकि प्रथम सूचना रिपोर्ट में यह प्रकटन नहीं किया गया था कि कथित घटना "सार्वजनिक दृश्य के भीतर एक स्थान पर" हुई थी - जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) के अधीन अपराधों का एक आवश्यक तत्त्व है  इसलिये अपीलकर्त्ताओं के विरुद्ध कार्यवाही अस्थिर थी। 

गुंजन उर्फ ​​गिरिजा कुमारी और अन्य बनाम राज्य (एनसीटी ऑफ दिल्लीऔर अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अभियुक्तों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई हैजिसमें अभिकथित किया गया है कि उन्होंने परिवादकर्त्ता के घर का ताला तोड़ने का प्रयास किया और उनके तथा उनकी पत्नी के विरुद्ध जाति आधारित अपशब्दों का प्रयोग कियाजिनमें चूड़ाचमारहरिजन और गंदा नाला जैसे अपशब्द शामिल हैं। परिवादकर्त्ता और दो अभियुक्त अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सगे भाई थेजबकि अभियुक्तों की पत्नियां गैर-अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय से थीं। 
  • विचारण न्यायालय ने अभियुक्तों में से एक के विरुद्ध अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) के अधीन आरोप विरचित कियेसाथ ही सभी अभियुक्तों के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के साथ धारा 34 के अधीन आरोप विरचित किये।         
  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने आरोप विरचित करने के आदेश में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। 
  • उच्चतम न्यायालय के समक्षअपीलकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में ही इस आवश्यक तत्त्व का प्रकटन करने में विफल रहा कि कथित घटना "सार्वजनिक दृश्य के भीतर" घटित हुई थीजैसा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अधीन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • सार्वजनिक दृश्य की अनिवार्य शर्त पर:न्यायालय ने माना कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(द) और 3(1)(ध) के अधीन अपराध गठित करने के लियेजाति आधारित अपशब्दों का प्रयोग "सार्वजनिक दृश्य के अंतर्गत आने वाले स्थान" पर होना चाहिये। यहाँ तक ​​कि एक निजी स्थान भी इस श्रेणी में  सकता हैलेकिन केवल तभी जब जनता को वहाँ हो रहे क्रियाकलाप को देखने की पहुँच हो। एक आवासीय मकानअपनी प्रकृति के कारणइस शर्त को पूरा नहीं करता है। 
  • वर्तमान मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट पर:न्यायमूर्ति अंजारिया द्वारा लिखित निर्णय में प्रथम सूचना रिपोर्ट की गहन परीक्षा की गई और पाया गया कि कथित घटना परिवादकर्त्ता के आवासीय परिसर के अंदर घटी थी - एक ऐसा स्थान जो न तो सार्वजनिक दृष्टि से खुला था और न ही जनता के लिये सुलभ था। न्यायालय ने माना कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में अपराध की आवश्यक शर्त स्पष्ट रूप से अनुपस्थित थी। 
  • आरोपों को रद्द करने पर:चूँकि प्रथम सूचना रिपोर्ट में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अधीन किसी भी अपराध के होने का प्रकटीकरण नहीं हुआ थाइसलिये न्यायालय ने अपील मंजूर कर ली और कार्यवाही को रद्द कर दियायह मानते हुए कि ऐसी परिस्थितियों में अभियोजन जारी रखना अस्थिर होगा। 

अनुसूचित जनजाति/अनुसूचित जाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 क्या है? 

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के बारे में: 

  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 संसद द्वारा पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के सदस्यों के विरुद्ध विभेद को रोकना और उनके विरुद्ध अत्याचारों को रोकना है।  
  • यह अधिनियम भारत की संसद में 11 सितंबर 1989 को पारित हुआ और 30 जनवरी 1990 को अधिसूचित किया गया। 
  • यह अधिनियम इस दुखद वास्तविकता की भी स्वीकृति है कि कई उपाय होते हुए हुए भीअनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लोग उच्च जातियों के हाथों विभिन्न अत्याचारों के शिकार होते रहते हैं। 
  • यह अधिनियम भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 15, 17 और 21 में उल्लिखित स्पष्ट सांविधानिक सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया हैजिसका दोहरा उद्देश्य इन कमजोर समुदायों के सदस्यों की रक्षा करना और साथ ही जाति-आधारित अत्याचारों के पीड़ितों को राहत और पुनर्वास प्रदान करना है। 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (संशोधन) अधिनियम, 2015: 

  • इस अधिनियम को वर्ष 2015 में निम्नलिखित प्रावधानों के साथ और अधिक कठोर बनाने के उद्देश्य से संशोधित किया गया था: 
  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध अपराधों के रूप में अत्याचार के अधिक मामलों को मान्यता दी गई। 
  • इसमें धारा में कई नए अपराध जोड़े गए और पूरी धारा को पुनः क्रमांकित किया गया क्योंकि मान्यता प्राप्त अपराध लगभग दोगुना हो गया था। 
  • इस अधिनियम ने अध्याय 4क की धारा 15 (पीड़ितों और साक्षियों के अधिकार) को जोड़ा और अधिकारियों द्वारा कर्त्तव्य की उपेक्षा और जवाबदेही तंत्र को अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित किया। 
  • इसमें अनन्य विशेष न्यायालयों और विशेष लोक अभियोजकों की स्थापना का प्रावधान किया गया था। 
  • सभी स्तरों पर लोक सेवकों के संदर्भ मेंइस अधिनियम ने जानबूझकर की गई उपेक्षा शब्द को परिभाषित किया है। 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (संशोधन) अधिनियम, 2018: 

  • पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (2020)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने अत्याचार निवारण अधिनियम में संसद द्वारा 2018 में किये गए संशोधन की सांविधानिक वैधता को बरकरार रखा। इस संशोधन अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं: 
  • इसने मूल अधिनियम में धारा 18क को जोड़ा। 
  • इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध विशिष्ट अपराधों को अत्याचार के रूप में परिभाषित किया गया है और इन कृत्यों का निपटने के लिये रणनीतियों का वर्णन किया गया है तथा दण्ड निर्धारित किया गया हैं। 
  • इसमें यह परिभाषित किया गया है कि किन कृत्यों को “अत्याचार” माना जाता है और अधिनियम में सूचीबद्ध सभी अपराध संज्ञेय हैं। पुलिस बिना वारण्ट के अपराधी को गिरफ्तार कर सकती है और न्यायालय से कोई आदेश लिये बिना मामले का अन्वेषण शुरू कर सकती है। 
  • इस अधिनियम में सभी राज्यों से प्रत्येक जिले में विद्यमान सेशन न्यायालय को एक विशेष न्यायालय में परिवर्तित करने का आह्वान किया गया है जिससे उसके अंतर्गत रजिस्ट्रीकृत मामलों का विचारण किया जा सके और विशेष न्यायालयों में मामलों की सुनवाई के लिये लोक अभियोजकों/विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। 
  • इसमें राज्यों को जातिगत हिंसा के उच्च स्तर वाले क्षेत्रों को "अत्याचार-प्रवण" घोषित करने और विधि एवं व्यवस्था की निगरानी और रखरखाव के लिये योग्य अधिकारियों को नियुक्त करने के प्रावधान किये गए हैं। 
  • इसमें गैर-अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लोक सेवकों द्वारा जानबूझकर कर्त्तव्यों की उपेक्षा करने पर दण्ड का प्रावधान है। 
  • इसका कार्यान्वयन राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों द्वारा किया जाता हैजिन्हें उचित केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है। 

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(): 

  • इस अधिनियम की धारा अत्याचारों से संबंधित अपराधों के लिये दण्ड का उपबंध करती है। 
  • धारा 3(1)(द) में कहा गया है कि जो कोई भीअनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य न होते हुएसार्वजनिक रूप से किसी भी स्थान पर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य का अपमान करता है या उसे अपमानित करने के आशय से भयभीत हैउसे कम से कम छह महीने की कारावास का दण्ड दिया जाएगालेकिन इसे पाँच वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। 

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(1)(): 

  • इस उपबंध के अधीनयदि कोई व्यक्ति जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैसार्वजनिक स्थान पर किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को जातिगत नाम से गाली देता हैतो यह एक अपराध है।