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सांविधानिक विधि

आघात चिकित्सा (ट्रॉमा केयर) का अधिकार, जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है

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 30-May-2026

सेवलाइफ फाउंडेशन बनाम भारत संघ 

"चिकित्सीय हस्तक्षेप अथवा त्वरित आपातकालीन उपचार के अभाव में व्यतीत होने वाला प्रत्येक मिनट जीवित रहने की संभावना को उल्लेखनीय रूप से कम कर देता है। शीघ्रतावस्तुतःऔषधि के समान जीवनरक्षक सिद्ध होती है।" 

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर 

स्रोत: उच्चतमन्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ नेसेवलाइफ फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2026) के मामलेमें सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भारत के ट्रॉमा केयर और आपातकालीन प्रतिक्रिया ढाँचे को मजबूत करने के लिये व्यापक अंतरिम निदेश जारी कियेजिसमें कहा गया कि सड़क दुर्घटनाओं के बाद समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन प्रदत्त जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है। ये निदेश 26 मई, 2026 को एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान पारित किये गएजिसमें ट्रॉमा केयर को सांविधानिक अधिकार के रूप में मान्यता देने और देश भर में एक समान आपातकालीन चिकित्सा प्रतिक्रिया प्रणाली लागू करने की मांग की गई थी। 

सेवलाइफ फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह याचिका एक सामाजिक प्रभाव संगठन और उसके संस्थापक द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर की गई थी। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने कई निदेशों की मांग कीजिनमें सभी आपातकालीन हेल्पलाइन नंबरों को सार्वभौमिक आपातकालीन नंबर 112 में एकीकृत करनागुड समैरिटन' (नेक मददगार) सुरक्षा उपायों को लागू करनाएम्बुलेंस सेवाओं का मानकीकरण करनाट्रॉमा रजिस्ट्री बनाना और सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिये कैशलेस उपचार योजनाओं को चालू करना शामिल है। 
  • न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार पहले ही पी.एम. राहत कैशलेस उपचार योजनागुड समैरिटन रूल्सनेशनल एम्बुलेंस कोड और ERSS-112 फ्रेमवर्क सहित कई योजनाएँ और नीतियाँ लागू कर चुकी है। 
  • यद्यपिराज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इसका कार्यान्वयन "कम और खंडित" पाया गया। 
  • न्यायालय ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमानी द्वारा प्रस्तुत सुझावों को स्वीकार कर लिया और व्यापक अंतरिम निदेश जारी करने की कार्यवाही शुरू की। 
  • इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और अधिवक्ता मालविका कपिला ने भी सहायता की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

अनुच्छेद 21 के भाग के रूप में ट्रॉमा केयर: 

  • न्यायालय ने माना कि सड़क दुर्घटनाओं के बाद समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है। 
  • इसमें इस बात पर बल दिया गया कि "चिकित्सा हस्तक्षेप या आपातकालीन देखरेख के बिना बिताया गया हर मिनट जीवित रहने की संभावना को काफी कम कर देता है," और "तेजी से इलाज करनासचमुचदवा की तरह है।" 
  • एक समान और सुदृढ़ ट्रॉमा केयर प्रणालीनिरंतर जन जागरूकता के साथ मिलकरसड़क दुर्घटनाओं और अन्य दर्दनाक घटनाओं के कारण होने वाली रोकी जा सकने वाली मृत्यु को काफी हद तक कम कर सकती है। 

आपातकालीन हेल्पलाइनों का एकीकरण: 

  • न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निदेश दिया कि वे आपातकालीन और एम्बुलेंस हेल्पलाइन नंबर जैसे 100, 101, 102, 108, 1033 और 1091 को तीन महीने के भीतर एकीकृत हेल्पलाइन नंबर 112 में शामिल करें। 
  • राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एकीकृत आपातकालीन नंबर का प्रचार करने के लिये जनसंचार अभियान चलाने का भी निदेश दिया गया था। 

सद्भावी सहायक (Good Samaritan) द्वारा प्रदान की जाने वाली सुरक्षाएँ:  

  • न्यायालय ने पाया कि पुलिस या विधिक कार्यवाही के भय से राहगीर अक्सर दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने में हिचकिचाते हैं। 
  • इसमें कहा गया है कि मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 134क के अधीन गुड समैरिटन सुरक्षा को मजबूत करने के लिये व्यवस्थित हस्तक्षेप और जन जागरूकता आवश्यक हैं। 
  • राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर भौतिक और डिजिटल स्तर पर सद्भावनापूर्ण शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करने का निदेश दिया गया थाजिसमें जिला और राज्य स्तर पर नामित नोडल अधिकारी होंगे। 

एम्बुलेंस मानक और प्रतिक्रिया प्रणाली: 

  • न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को AIS-125 एम्बुलेंस मानकों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने का निदेश दिया। 
  • GPS ट्रैकिंग और एम्बुलेंस का 112 आपातकालीन प्रणाली के साथ वास्तविक समय में एकीकरण अनिवार्य कर दिया गया। 
  • एम्बुलेंस की प्रतिक्रिया समयदेखरेख की गुणवत्ता और उपकरण मानकों के आवधिक ऑडिट के भी निदेश दिये गए। 

मानकीकृत ट्रॉमा प्रोटोकॉल और राष्ट्रीय ट्रॉमा रजिस्ट्री: 

  • केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर ट्रॉमा के मामलों के लिये एक मानकीकृत चिकित्सा बचाव प्रोटोकॉल जारी करने का निदेश दिया गया थाजिसके बाद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसे लागू करने का आदेश दिया गया था। 
  • केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को आठ सप्ताह के भीतर राष्ट्रीय ट्रॉमा रजिस्ट्री के लिये दिशानिर्देश जारी करने का निदेश दिया गया था। 
  • इसके बाद सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सार्वजनिक और निजी चिकित्सा सुविधाओं दोनों को कवर करने वाले राज्य स्तरीय ट्रॉमा रजिस्ट्री स्थापित करने की आवश्यकता थी। 

पी.एम. राहत कैशलेस उपचार योजना: 

  • राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निदेश दिया गया था कि वे सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिये पी.एम. राहत कैशलेस उपचार योजना को तीन महीने के भीतर पूरी तरह से लागू करें। 
  • न्यायालय ने चेतावनी दी कि यदि इसे लागू नहीं किया गया तो यह मोटर यान अधिनियम का उल्लंघन होगा। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 क्या है? 

बारे में: 

  • अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता की सुरक्षासे संबंधित है । इसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार हे वंचित नहीं किया जाएगा, अन्यथा नहीं 
    • जीवन का अधिकारकेवल पशुवत अस्तित्व या जीवित रहने तक ही सीमित नहीं हैअपितु इसमेंमानवीय गरिमा के साथ जीनेका अधिकारऔर जीवन के वे सभी पहलू शामिल हैं जो मनुष्य के जीवन को सार्थकपूर्ण और जीने लायक बनाते हैं। 
  • अनुच्छेद 21 दो अधिकारों की सुरक्षा करता है: 
    • प्राण का अधिकार 
    • दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार 
  • इस अनुच्छेद को जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करने वाले प्रक्रियात्मक मैग्ना कार्टा के रूप में वर्णित किया गया है। 
  • यह मौलिक अधिकारप्रत्येक व्यक्तिचाहेवह नागरिक हो या विदेशीको समान रूप से प्राप्त है। 
  • भारत के उच्चतम न्यायालय ने इस अधिकार को मौलिक अधिकारों का हृदयबताया है । 
  • यह अधिकारकेवल राज्य के विरुद्ध ही प्रदान किया गया है। 

अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अधिकार: 

  • अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आने वाले अधिकारनिम्नलिखितहैं: 
    • निजता का अधिकार 
    • विदेश जाने का अधिकार 
    • आश्रय का अधिकार 
    • एकांत कारावास (Solitary Confinement) के विरुद्ध अधिकार 
    • सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण का अधिकार 
    • हथकड़ी लगाए जाने के विरुद्ध अधिकार 
    • अभिरक्षात्मक मृत्यु (Custodial Death) के विरुद्ध अधिकार 
    • दण्डादेश के विलंबित निष्पादन के विरुद्ध अधिकार 
    • सार्वजनिक फाँसी के विरुद्ध अधिकार 
    • सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का अधिकार 
    • प्रदूषण-मुक्त जल एवं वायु का अधिकार 
    • प्रत्येक बालक के सर्वांगीण विकास का अधिकार 
    • स्वास्थ्य एवं चिकित्सीय सहायता का अधिकार 
    • शिक्षा का अधिकार 
    • विचाराधीन बंदियों (Under-trials) के संरक्षण का अधिकार। 

विधिक मामले: 

  • फ्रांसिस कोराली मुलिन बनाम प्रशासक (1981) के मामलेमेंन्यायमूर्ति पी. भगवती ने कहा था किभारत के संविधान का अनुच्छेद 21 एक लोकतांत्रिक समाज में सर्वोच्च महत्त्व के सांविधानिक मूल्य को समाहित करता है। 
  • खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1963) के मामलेमेंउच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि जीवन शब्द सेकेवल पशुवत अस्तित्व का ही अर्थ नहीं है।इसके हनन पर रोकउन सभी अंगों और इंद्रियों पर लागू होती है जिनके द्वारा जीवन का आनंद लिया जाता है।यह प्रावधान शरीर को विकृत करनेजैसे कि कवचधारी पैर काटनाआँख निकालना या शरीर के किसी अन्य अंग को नष्ट करना जिसके माध्यम से आत्मा बाह्य जगत से संपर्क स्थापित करती हैपर भी समान रूप से प्रतिबंध लगाता है।