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पारिवारिक कानून

अनुसूचित जनजाति के सदस्य स्वेच्छया से हिंदू विवाह अधिनियम का पालन कर सकते हैं

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 07-Mar-2026

"जब किसी अधिसूचित अनुसूचित जनजाति का कोई सदस्य स्वेच्छया से अधिनियम के अंतर्गत न्यायालय की अधिकारिता में इस आधार पर स्वयं को प्रस्तुत करता है कि वह हिंदू हैहिंदू धर्म अपना चुका है और हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करता हैतो ऐसे सदस्य को आरंभिक रूप से ही इस प्रावधान का सहारा लेने से रोका या प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा 

स्रोत: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ नेश्रीमती गुड़िया नागेश और अन्य बनाम नील (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि अनुसूचित जनजाति (ST) का कोई सदस्य जो स्वेच्छया से हिंदू रीति-रिवाजोंअनुष्ठानों और परंपराओं को अपनाता है और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) द्वारा शासित होने का विकल्प चुनता हैउसेकेवल इसलिये इसके संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) अनुसूचित जनजाति समुदायों पर इसके सामान्य अनुप्रयोग को अपवर्जित करती है। 

श्रीमती गुड़िया नागेश और अन्य बनाम नील (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता एक विवाहित दंपत्ति थे जिन्होंने 2009 में हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसारजिसमें सप्तपदी का अनुष्ठान भी सम्मिलित थाअपना विवाह संपन्न किया था। 
  • पत्नी अनुसूचित जाति (SC) श्रेणी से थीजबकि पति अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय से था। 
  • अनुसूचित जनजाति (ST) होते हुए भीपति नेस्वेच्छया से हिंदू विवाह अनुष्ठानों का पालन करना चुना। 
  • यह दंपत्ति अप्रैल 2014 से पृथक् रहने लगे और उन्होंने बस्तर स्थित कुटुंब न्यायालय के समक्ष हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-ख के अधीन पारस्परिक  सम्मति से विवाह-विच्छेद की अर्जी दी। 
  • कुटुंब न्यायालय ने आवेदन को खारिज कर दियायह मानते हुए कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसारअधिनियम अनुसूचित जनजाति समुदाय के सदस्यों पर लागू नहीं होता है।  
  • खारिजी से व्यथित दोनों पक्षकारों ने कुटुंब न्यायालय अधिनियम की धारा 19(1) के अधीन उच्च न्यायालय में अपील दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने मुख्य प्रश्न को इस प्रकार परिभाषित किया कि क्या कुटुंब न्यायालय यह मानने में उचित था कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-ख अधिनियम की धारा 2(2) के अधीन पति की अनुसूचित जनजाति स्थिति के कारण पक्षकारों पर लागू नहीं होगी।  
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) - जो यह उपबंधित करती है कि अधिनियम में कुछ भी अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होगा जब तक कि केंद्र सरकार अधिसूचना द्वारा अन्यथा निदेश न दे -संरक्षण का उपाय हैन कि अपवर्जन का उपाय। 
  • लबीश्वर मांझी बनाम प्राण मांझी और अन्य (2000) के मामलेमें उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने इस सुस्थापित सिद्धांत की पुष्टि की कि अनुसूचित जनजाति के सदस्य जो मूलतः हिंदू बन चुके हैं और हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैंउन्हें प्रथागत न्यायालयों में नहीं भेजा जा सकताविशेष रूप से तब जब वे स्वयं हिंदू रीति-रिवाजोंप्रथाओं और परंपराओं का पालन करने की बात स्वीकार करते हैं। 
  • इसके अतिरिक्तआंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय केचित्तपुली बनाम संघ सरकार (2020)के निर्णय और दिल्ली उच्च न्यायालय केसतप्रकाश मीना बनाम अलका मीना (2021) के निर्णय का हवाला देते हुए, न्यायालय ने माना कि जो पक्षकार स्वेच्छया से सप्तपदी करते हैं और हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करते हैंउन्हें हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे से अपवर्जित नहीं किया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने यह माना कि जहाँ कोई अनुसूचित जनजाति का सदस्य स्वेच्छया से हिंदू धर्म में परिवर्तित होने और हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करने के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की अधिकारिता को स्वीकार करता हैतो ऐसे सदस्य को अधिनियम के अधीन कार्यवाही पर आक्षेप करने का अधिकार होगा - लेकिन उन्हेंप्रारंभिक चरण में ही इसका सहारा लेने से रोका नहीं जा सकता। 
  • तदनुसारअपील मंजूर कर ली गई और मामले को कुटुंब न्यायालय को वापस भेज दिया गया जिससे वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-ख के अधीन पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद के आवेदन पर उसके गुण-दोष के आधार पर निर्णय ले सके। 

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा क्या है? 

धारा 2 — हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का अनुप्रयोग: 

धारा 2(1) — अधिनियम किन पर लागू होता है: 

यह अधिनियम व्यक्तियों की तीन व्यापक श्रेणियों पर लागू होता है: 

  • किसी भी रूप या विकास में धर्म से हिंदूजिसमें विशेष रूप से वीरशैवलिंगायत और ब्रह्समाजप्रार्थना समाज या आर्य समाज के अनुयायी सम्मिलित हैं। 
  • धर्म से बौद्धजैन और सिक्ख हो 
  • संबंधित क्षेत्रों में निवास करने वाला कोई भी अन्य व्यक्ति जो मुस्लिमईसाईपारसी या यहूदी नहीं है - जब तक कि यह साबित न हो जाए कि अधिनियम पारित होने से पूर्व भी ऐसा व्यक्ति हिंदू विधि या रीति-रिवाज द्वारा शासित नहीं होता। 

स्पष्टीकरण — हिंदूबौद्धजैन या सिख धर्म की मान्यता किसे प्राप्त है: 

  • कोई भी अपत्य, धर्मज या अधर्मज जिसके माता-पिता दोनों इनमें से किसी भी धर्म को मानते हों। 
  • कोई भी अपत्य, धर्मज या अधर्मज जिसके माता-पिता में से कोई एक इन धर्मों में से किसी एक का अनुयायी होबशर्ते कि बच्चे का पालन-पोषण उस माता-पिता के समुदाय या परिवार के सदस्य के रूप में किया जाए। 
  • कोई भी व्यक्ति जो हिंदूबौद्धजैन या सिख धर्म में परिवर्तित होता है या पुनः परिवर्तित होता है। 

धारा 2(2) — अनुसूचित जनजातियों के लिये अपवाद: 

  • धारा 2(1) के अधीन व्यापक प्रयोज्यता के होते हुए भीअधिनियम संविधान के अनुच्छेद 366(25) के अधीन परिभाषित किसी भी अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर स्वतः लागू नहीं होता है। 
  • यह अपवाद तब तक लागू रहेगा जब तक कि केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में कोई विशिष्ट अधिसूचना जारी करके इसके विपरीत निदेश न दे दे। 

अनुच्छेद 366(25) — "अनुसूचित जनजातियों" की परिभाषा 

  • "अनुसूचित जनजातियाँ" से तात्पर्य ऐसी जनजातियोंजनजातीय समुदायों या उनके भीतर के उन भागों/समूहों से है जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 342 के अधीन अनुसूचित जनजातियाँ माना जाता है। 
  • यह परिभाषा अपने आप में पूर्ण नहीं है - इसका क्रियात्मक अर्थ पूरी तरह से अनुच्छेद 342 के संदर्भ से प्राप्त होता है। 

अनुच्छेद 342 — अनुसूचित जनजातियाँ 

खण्ड (1) — राष्ट्रपति की निर्दिष्ट करने की शक्ति: 

  • भारत के राष्ट्रपति को लोक अधिसूचना द्वारा यह निर्दिष्ट करने का अधिकार है कि किसी विशेष राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में किन जनजातियों या जनजातीय समुदायों (या उनके भागों/समूहों) को अनुसूचित जनजाति माना जाएगा। 
  • यदि अधिसूचना किसी राज्य से संबंधित हैतो राष्ट्रपति को अधिसूचना जारी करने से पूर्व उस राज्य के राज्यपाल से परामर्श करना होगा। 
  • केंद्र शासित प्रदेश के मामले में इस प्रकार के परामर्श की आवश्यकता नहीं है। 

खण्ड (2) — संसद की संशोधन करने की शक्ति: 

  • संसद विधि द्वारा किसी जनजाति या जनजातीय समुदाय (या उसके भाग/समूह) को खण्ड (1) के अंतर्गत राष्ट्रपति की अधिसूचना में निर्दिष्ट सूची में सम्मिलित या अपवर्जित कर सकती है। 
  • महत्त्वपूर्ण बात यह है कि केवल संसद ही ऐसी अधिसूचना में परिवर्तन कर सकती है - राष्ट्रपति एक बार जारी होने के बाद अधिसूचना में कोई परिवर्तन या संशोधन नहीं कर सकता हैं। 
  • इससे यह सुनिश्चित होता है कि अनुसूचित जनजातियों की सूची में किये गए परिवर्तन विधायी जांच और जवाबदेही के अधीन होंजिससे मनमानी कार्यकारी संशोधन को रोका जा सके।