आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से










होम / करेंट अफेयर्स

आपराधिक कानून

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 का दायरा और आत्म अभिशंसन के विरुद्ध संरक्षण

    «    »
 30-Jan-2026

सीबीआई बनाम आई.एम. कुद्दुसी 

"दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 विद्यमान दस्तावेज़ों या वस्तुओं के रूप में वास्तविक साक्ष्य प्राप्त करने का एक तंत्र हैयह किसी अभियुक्त को नवीन अभिलेख सृजित करने अथवा अपने व्यक्तिगत ज्ञान से सूचना प्रदान करने के लिए बाध्य करने का साधन नहीं है।” 

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा 

स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने सीबीआई बनाम आई.एम. कुद्दुसी (2025) के मामले में बलात् आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध अभियुक्त व्यक्तियों के संरक्षण को बरकरार रखते हुए निर्णय दिया कि धारा 91 दण्ड प्रक्रिया संहिता का प्रयोग किसी अभियुक्त से ऐसी जानकारी निकालने के लिये नहीं किया जा सकता है जिसके लिये उन्हें व्यक्तिगत जानकारी देनी पड़े। 

सीबीआई बनाम आई.एम. कुद्दुसी (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • सीबीआई ने प्रत्यर्थी (छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश)न्यायमूर्ति श्री नारायण शुक्ला (इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश)मेसर्स प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट और अन्य के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संख्या आर.सी. 217/2019/ए/0009 दिनांक दिसंबर, 2019 को दर्ज की। 
  • अभियुक्तों पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120-ख के अधीन भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7, 8, 12 और 13(2) के साथ धारा 13(1)(घ) के अधीन आरोप लगाए गए थे 
  • आरोपों में प्रसाद एजुकेशनल ट्रस्ट के लिये अनुकूल आदेश प्राप्त करने की आपराधिक षड्यंत्र शामिल था जिसके कॉलेज को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया थाऔर इसमें कथित तौर पर अवैध रिश्वतखोरी शामिल थी। 
  • 11 फरवरी, 2020 को सीबीआई ने धारा 91 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन प्रतिवादी को नोटिस जारी कर निम्नलिखित जानकारी मांगी: (i) 2017 के दौरान उपयोग किये गए मोबाइल नंबरों का विवरण, (ii) मई-अक्टूबर 2017 के लिये विवरण सहित सभी बैंक खातों का विवरणऔर (iii) मई-अक्टूबर 2017 के दौरान नियोजित ड्राइवरों/नौकरों का विवरण। 
  • प्रत्यर्थी ने सीबीआई मामलों के लिये विशेष न्यायाधीश के समक्ष विविध आवेदन संख्या 1/2020 के माध्यम से नोटिस को चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि यह संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन करता है। 
  • अप्रैल, 2021 को विशेष न्यायाधीश ने प्रत्यर्थी के आवेदन को मंजूर कर लिया और स्टेट ऑफ गुजरात बनाम श्यामलाल मोहनलाल चोक्सी (1965) पर भरोसा करते हुए धारा 91 के नोटिस को अपास्त कर दिया। 
  • सीबीआई ने विशेष न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देते हुए धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन वर्तमान याचिका दायर कर विशेष न्यायाधीश के आदेश को चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि मांगी गई सूचना आत्म-अभिशंसन नहीं है तथा अन्वेषण के लिये आवश्यक है।                  

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने अनुच्छेद 20(3) के अधीन सांविधानिक संरक्षण की परीक्षा कीजिसमें एम.पी. शर्मा बनाम सतीश चंद्र (1954) का हवाला दिया गयाजिसमें यह माना गया कि "साक्षी होना" में मौखिक और दस्तावेज़ी साक्ष्य दोनों सम्मिलित हैं और यह न्यायालय परिसाक्ष्य से परे है। 
  • न्यायालय ने बॉम्बे राज्य बनाम काठी कालू ओघड़ (1961) के मामले के आधार पर परिसाक्ष्य साक्ष्य (व्यक्तिगत ज्ञान प्रदान करना) और भौतिक साक्ष्य (उंगलियों के निशाननमूना लेखन) के बीच अंतर किया। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 किसी विशिष्टमूर्त दस्तावेज़ या वस्तु के अस्तित्व को पूर्वकल्पित करती है जो पहले से ही कब्जे में होन कि नए अभिलेख के निर्माण को। 
  • न्यायालय ने पाया कि सीबीआई के नोटिस मेंपहले से विद्यमान दस्तावेज़ों को पेश करने की मांग नहीं की गई थीअपितु अभियुक्तों से अपने मस्तिष्क और स्मृति का प्रयोग करके एक नया अभिलेख बनाने के लिये जानकारी प्रदान करने की मांग की गई थी। 
  • न्यायालय ने कहा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता में विभिन्न तंत्र दिये गए हैं: धारा 91 वास्तविक साक्ष्य (विद्यमान दस्तावेज़/वस्तुएँ) प्राप्त करने के लिये और धारा 161 पूछताछ के माध्यम से मौखिक साक्ष्य प्राप्त करने के लिये 
  • न्यायालय ने माना कि विवरणों की मांग को दस्तावेज़ की मांग के रूप में मानना ​​धारा 91 को उसकी अनुमेय सीमाओं से परे ले जाएगा। 
  • न्यायालय ने पुष्टि की कि जबकि काठी कालू ओघड़ ने अनुच्छेद 20(3) की व्यापक रूपरेखा निर्धारित कीश्यामलाल चोक्सी ने धारा 91 दण्ड प्रक्रिया संहिता का विशेष रूप से निर्वचन किया और निष्कर्ष निकाला कि विधायिका का आशय अभियुक्त व्यक्तियों को इसके दायरे में सम्मिलित करने का नहीं था। 
  • न्यायालय ने कहा कि श्यामलाल चोक्सी (1964) का निर्णय काठी कालू ओघड़ (1961) के बाद किया गया थाऔर संविधान पीठ पूर्व के सिद्धांतों से अवगत थीलेकिन धारा 91 के संबंध में एक विशिष्ट सांविधिक अपवाद बनाया। 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि अभियुक्त को मोबाइल नंबरबैंक खाते और कर्मचारियों की पहचान करने और उनकी सूची बनाने के लिये मजबूर करने में मस्तिष्क लगानास्मृति का प्रयोग करना और व्यक्तिगत ज्ञान के आधार पर जानकारी संकलित करना सम्मिलित होगाजो परिसाक्ष्य के लिये दबाव डालने के समान है। 
  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि धारा 91 काप्रयोग अभियुक्त कोअपने विरुद्ध मामला बनाने में सहायता करने के लिये विवश करने के शॉर्टकट के रूप में नहीं किया जा सकता हैजबकि अभिकरण स्वतंत्र स्रोतों से साक्ष्य एकत्र कर सकती है। 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 क्या है? 

परिचय: 

  • यह धारादस्तावेज़ या अन्य चीजों को प्रस्तुत करने के लिये समन जारी करनेसे संबंधित हैजबकि यही उपबंध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 94 के अंतर्गत आता है ।इसमें कहा गया है कि 

(1) जब कभी कोई न्यायालय या पुलिस थाने का कोई भारसाधक अधिकारी यह समझता है कि किसी ऐसे अन्वेषणजांचविचारणया अन्य कार्यवाही के प्रयोजनों के लियेजो इस संहिता के अधीन ऐसे न्यायालय या अधिकारी के द्वारा या समक्ष हो रही हैंकिमी दस्तावेज़ या अन्य चीज का पेश किया जाना आवश्यक या वांछनीय है तो जिम व्यक्ति के कब्जे या शक्ति में ऐसी दस्तावेज़ या चीज के होने का विश्वास है उसके नाम ऐमा न्यायालय एक समन या ऐसा अधिकारी एक लिखित आदेश उससे यह अपेक्षा करते हुए जारी कर सकता है कि उस समन या आदेश में उल्लिखित समय और स्थान पर उसे पेश करे अथवा हाजिर हो और उसे पेश करे।  

(2) यदि कोई व्यक्तिजिससे इस धारा के अधीन दस्तावेज़ या अन्य चीज पेश करने की ही अपेक्षा की गई है उसे पेश करने के लिये स्वयं हाजिर होने के बजाय उस दस्तावेज़ या चीजें को पेश करवा दे तो यह समझा जाएगा कि उसने उस अपेक्षा का अनुपालन कर दिया है।  
(3) इस धारा की कोई बात— 
(क) भारतीय साध्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और 124 या बैंककार वही साक्ष्य अधिनियम, 1891 (1891 का 13) पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगीअथवा 
(ख) डाक या तारे प्राधिकारी की अभिरक्षा में किमी पत्रपोस्टकार्डतार या अन्य दस्तावेज़ या किसी पार्सल या चीज को लागू होने वाली नहीं समझी जाएगी।  

निर्णय विधि: 

  • नित्या धर्मानंद बनाम गोपाल शीलुम रेड्डी (2018)के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की कि अभियुक्त आरोप तय करने के प्रक्रम में धारा 91 दण्ड प्रक्रिया संहिता का आह्वान नहीं कर सकता है और न ही उसे ऐसा करने का अधिकार होगा।