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पारिवारिक कानून

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15

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 24-Apr-2026

संतसरन गुरसरन आडवाणी बनाम नीना एच. भल्ला और अन्य 

"धारा 15(1) की सांविधानिकता का मुद्दा इस न्यायालय की एक खंडपीठ द्वारा तय किया जाना है और तब तक धारा 15(1) को असांविधानिक नहीं माना जा सकता है।" 

न्यायमूर्ति फ़िरदोष पी. पूनीवाला 

स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति फ़िरदोष पी. पूनीवाला ने संतसरन गुरसरन आडवाणी बनाम नीना एच. भल्ला और अन्य (2026)के मामले मेंनिर्णय दिया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(1) को असांविधानिक घोषित नहीं किया गया है और यह निर्वसीयत मरने वाली हिंदू महिला की संपत्ति के उत्तराधिकार को नियंत्रित करती रहेगी।  

  • न्यायालय ने मृतक के भाई द्वारा दायर अंतरिम आवेदन को नामंजूर कर दियायह मानते हुए कि पति के वारिस - विशेष रूप से पति की बहन - उत्तराधिकार के सांविधिक क्रम के अधीन मृतक के भाई पर वरीयता रखते हैंजिससे वह संपदा में किसी भी अंश से वंचित हो जाता है। 

संतसरन गुरसरन आडवाणी बनाम नीना एच. भल्ला और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • मृतकएक हिंदू महिलाका निधन 31 मई 2025 को हुआउन्होंने 10 अप्रैल 2023 की एक वसीयत छोड़ीजिसमें प्रतिवादी नंबर को वसीयत की निष्पादक नियुक्त किया गया था और उनके पक्ष में विभिन्न वसीयतें की गई थीं। 
  • मृतक के भाईजो वादी थेने वाद दायर कर दावा किया कि वह मृतक के इकलौते जीवित रिश्तेदार हैं और उन्होंने मृतक की संपदा का प्रबंधन करने और प्रतिवादियों को उनकी संपत्ति से निपटने से रोकने की मांग की। 
  • वादी ने वसीयत और प्रतिवादी नंबर के पक्ष में निष्पादित दान विलेख की वैधता को भी चुनौती दी। 
  • प्रतिवादी ने तर्क दिया कि यदि वसीयत और दान विलेख को अपास्त भी कर दिया जाएतो भी वादी को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के अधीन कोई अधिकार प्राप्त नहीं होगाक्योंकि मृतक के पति की बहनपति की उत्तराधिकारी होने के नातेवादी पर वरीयता प्राप्त करेगी। 
  • प्रतिवादी नंबर को वसीयत का प्रोबेट पहले ही प्रदान कर दिया गया थाऔर वादी ने प्रोबेट कार्यवाही में कोई आपत्ति दर्ज नहीं की थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 और 16 के अधीन उत्तराधिकार की सांविधिक योजना: 

  • न्यायालय ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 और 16 के अधीन उत्तराधिकार के क्रम की परीक्षा की और यह माना कि पहले की प्रविष्टि में आने वाले उत्तराधिकारी बाद की प्रविष्टियों में आने वालों को अपवर्जित कर देते हैं। 
  • मृतक के पति की बहनप्रविष्टि (ख) के अधीन उत्तराधिकारी होने के नातेवादी को अपवर्जित कर देती हैजो प्रविष्टि (घ) के अंतर्गत आता हैजिससे वह निर्वसीयत की स्थिति में संपत्ति में किसी भी अंश से वंचित हो जाता है। 

धारा 15(1) असांविधानिक नहीं है: 

  • न्यायालय ने ममता दिनेश वकील बनाम बंसी एस. वधवा [(2012) एससीसी ऑनलाइन बॉम्बे 1685] में वादी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि धारा 15(1) को असंवैधानिक घोषित किया गया था। 
  • यह देखा गया कि यद्यपि एक एकल न्यायाधीश ने ऐसा विचार व्यक्त किया थाफिर भी मामले को एक खंडपीठ के पास भेज दिया गया था और असांविधानिकता की कोई अंतिम घोषणा नहीं की गई थी। 
  • उच्चतम न्यायालय के बाद के निर्णय धारा 15(1) को लागू करते रहेंगेऔर इसलिये यह उपबंध तब तक वैध और प्रभावी रहेगा जब तक कि कोई खंडपीठ या उच्चतम न्यायालय अन्यथा निर्णय न दे। 

विधि आयोग की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं: 

  • न्यायालय ने माना कि विधि आयोग की धारा 15(1) में संशोधन का सुझाव देने वाली सिफारिशों को विधायिका द्वारा लागू नहीं किया गया है और इसलिये प्रावधान की प्रयोज्यता को प्रभावित नहीं कर सकता है। 

अंतरिम अनुतोष को अस्वीकार करना उचित था: 

  • मृतक की संपत्ति में प्रथम दृष्टया हित साबित करने का भार वादी पर था जिससे अंतरिम अनुतोष प्राप्त किया जा सके। 
  • वादी सांविधिक योजना के अधीन इस प्रकार के किसी भी हित को प्रदर्शित करने में विफल रहा। 
  • चूँकि वसीयत की प्रोबेट पहले ही प्रदान की जा चुकी थीइसलिये मृतक की मृत्यु की तारीख से संपत्ति प्रतिवादी नंबर में निहित हो गई। 
  • तदनुसारअंतरिम आवेदन खारिज कर दिया गया। 

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15 क्या है? 

धारा 15 — हिंदू नारी की दशा में उत्तराधिकार के साधारण नियम: 

उपधारा (1):निर्वसीयत मरने वाली हिन्दू नारी की सम्पत्ति धारा 16 में दिए गए नियमों के अनुसार निम्नलिखित को न्यागत होगी: 

  • सर्वप्रथम — प्रथमतःपुत्रों और पुत्रियों (जिसके अंतर्गत किसी पूर्वमृत पुत्र या पुत्री के अपत्य भी हैं) और पति को 
  • द्वितीयतः — पति के वारिसों को 
  • तृतीयतः — माता और पिता को  
  • चतुर्थतः — पिता के वारिसों को 
  • अंततः — माता के वारिसों को। 

उपधारा (2):उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी: 

  • पिता या माता से विरासत में मिली संपत्ति — मृतक के पुत्र या पुत्री के (जिसके अंतर्गत किसी पूर्वमृत पुत्र या पुत्री के अपत्य भी आते हैं) अभाव में उपधारा (1) में निर्दिष्ट अन्य वारिसों को उसमें विनिर्दिष्ट क्रम से न्यागत न होकर पिता के वारिसों को न्यागत होगी 
  • पति या श्वसुर से विरासत में मिली संपत्ति — मृतक के किसी पुत्र या पुत्री के (जिसके अंतर्गत किसी पूर्वमृत पुत्र या पुत्री या अपत्य भी आते हैं) अभाव में उपधारा (1) में निर्दिष्ट अन्य वारिसों को उसमें विनिर्दिष्ट क्रम से न्यागत न होकर पति के वारिसों को न्यागत होगी।