होम / एडिटोरियल
अंतर्राष्ट्रीय नियम
भारत-कनाडा रणनीतिक पुनर्व्यवस्था
«10-Mar-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
मार्च 2026 में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत की आधिकारिक यात्रा को दोनों सरकारों द्वारा एक रणनीतिक परिवर्तन के रूप में वर्णित किया गया था। यह 2023-24 के राजनयिक तनावों से उबरने का एक सुनियोजित प्रयास था, जिसके कारण राजनयिकों को निष्कासित किया गया था और द्विपक्षीय संबंध बुरी तरह प्रभावित हुए थे। इस यात्रा के परिणामस्वरूप व्यापार, नागरिक परमाणु ऊर्जा, महत्त्वपूर्ण खनिज, रक्षा और नवाचार सहित कई क्षेत्रों में व्यापक समझौते हुए। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण 2.6 अरब डॉलर का यूरेनियम आपूर्ति समझौता था, जिसका भारत की दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।
इस यात्रा के प्रमुख परिणाम क्या हैं?
- दोनों देशों ने एक व्यापक आर्थिक भागीदारी करार (CEPA) पर बातचीत फिर से प्रारंभ करने के लिये संदर्भ की शर्तों पर हस्ताक्षर किये, जिसका महत्वाकांक्षी लक्ष्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करके 50 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाना है।
- परमाणु ऊर्जा विभाग ने कनाडा की कैमेको (विश्व के सबसे बड़े यूरेनियम उत्पादकों में से एक) के साथ 2027 से 2035 के बीच यूरेनियम अयस्क सांद्रण की आपूर्ति के लिये एक दीर्घकालिक वाणिज्यिक संविदा पर हस्ताक्षर किये। G7 क्रिटिकल मिनरल्स एक्शन प्लान के अनुरूप सुरक्षित महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने के लिये एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किये गए।
- कनाडा ने घोषणा की कि वह औपचारिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन और वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन दोनों में शामिल होगा।
- सुरक्षा के मोर्चे पर, दोनों देशों ने पहली बार भारत-कनाडा रक्षा वार्ता की घोषणा की। एक भारत-कनाडा संसदीय मैत्री समूह की स्थापना की गई और भारत ने हिंद महासागर रिम एसोसिएशन में संवाद भागीदार के रूप में सम्मिलित होने के कनाडा के प्रस्ताव का औपचारिक रूप से समर्थन किया।
- अन्य परिणामों में भारत-कनाडा CEO फोरम का पुनर्गठन, ऑस्ट्रेलिया-कनाडा-भारत प्रौद्योगिकी और नवाचार (ACITI) त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन, AICTE-मिटैक्स समझौते के माध्यम से भारतीय छात्रों के लिये 300 पूर्णतः वित्त पोषित अनुसंधान इंटर्नशिप और NIFTEM-K में एक संयुक्त पल्स प्रोटीन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस शामिल हैं।
यूरेनियम समझौता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- भारत में वर्तमान में लगभग 9 गीगावाट की संयुक्त क्षमता वाले 24 परमाणु रिएक्टर संचालित हैं, जो राष्ट्रीय बिजली मांग का लगभग 3% पूरा करते हैं।
- सरकार का लक्ष्य 2047 तक इसे बढ़ाकर 100 गीगावाट करना है - जो कि दस गुना से अधिक की वृद्धि है - जिससे यूरेनियम की एक स्थिर, दीर्घकालिक आपूर्ति आवश्यक हो जाती है।
- कैमेको के साथ हुए समझौते से आठ वर्षों में लगभग 10,000 टन की आपूर्ति सुनिश्चित होती है, जो इस विस्तार को सीधे तौर पर समर्थन प्रदान करती है।
- आयात की आवश्यकता गुणवत्ता में भारी अंतर से उत्पन्न होती है। भारतीय यूरेनियम अयस्क में यूरेनियम की सांद्रता केवल 0.02-0.45% है, जबकि वैश्विक औसत 1-2% और कनाडाई अयस्क में 15% तक है।
- इससे घरेलू स्तर पर यूरेनियम निकालना काफी महंगा हो जाता है। भारत वर्तमान में अपनी नागरिक यूरेनियम आवश्यकताओं का 70% से अधिक आयात करता है, और नए रिएक्टरों के चालू होने से वार्षिक मांग वर्तमान 1,500-2,000 टन से बढ़कर लगभग 5,400 टन हो सकती है।
- कैमेको के साथ हुआ यह समझौता व्यापक विविधीकरण रणनीति का हिस्सा है, जिसमें कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और रूस के साथ हुई संविदा भी शामिल हैं। भारत आपूर्ति में व्यवधान से बचाव के लिये पाँच वर्ष का रणनीतिक यूरेनियम भंडार भी बना रहा है।
भारत का परमाणु कार्यक्रम किस प्रकार संरचित है?
- भारत भौतिक विज्ञानी होमी जे. भाभा द्वारा परिकल्पित एक अद्वितीय त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम का अनुसरण करता है, जिसे अंततः भारत के विशाल थोरियम भंडार का दोहन करने के लिये डिज़ाइन किया गया है - जिसका अनुमान वैश्विक कुल का 20-25% है।
- पहले चरण में, दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर बिजली उत्पादन के लिये प्राकृतिक यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और उप-उत्पाद के रूप में प्लूटोनियम-239 प्राप्त करते हैं।
- दूसरे चरण में, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड ईंधन का प्रयोग करके खपत से अधिक ईंधन का उत्पादन करते हैं।
- तीसरे चरण में, उन्नत भारी जल रिएक्टर ईंधन के रूप में थोरियम-232 और प्लूटोनियम-239 का प्रयोग करेंगे, जिससे भारत के थोरियम भंडार का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हो सकेगा।
- भारत वर्तमान में चरण 1 से चरण 2 में संक्रमण कर रहा है।
- कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर चालू होने के उन्नत चरण में है, तथापि इस कार्यक्रम में काफी देरी और लागत में वृद्धि हुई है - डिजाइन और 2019 के बीच इसकी लागत लगभग दोगुनी हो गई है। बड़े पैमाने पर थोरियम का प्रयोग कम से कम 2060 के दशक तक होने की उम्मीद नहीं है।
- 2025-26 के केंद्रीय बजट में छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के विकास के लिये 20,000 करोड़ रुपए आवंटित किये गए हैं, और शक्ति (SHAKTI) अधिनियम 2025 ने इस क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिये खोल दिया है।
भारत-कनाडा संबंधों का व्यापक महत्त्व क्या है?
- भारत और कनाडा के बीच 75 वर्षों से अधिक पुराने राजनयिक संबंध हैं, जिन्हें 2018 में एक रणनीतिक भागीदारी के रूप में औपचारिक रूप दिया गया था।
- यह संबंध मजबूत आर्थिक पूरकता पर आधारित है: कनाडाई पेंशन फंडों ने भारत में 75 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश किया है, और 2024 में दोनों देशों के बीच व्यापार 30.9 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें भारत ने वस्तुओं के व्यापार में अधिशेष दर्ज किया। कनाडा की इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत को एक महत्त्वपूर्ण भागीदार के रूप में स्पष्ट रूप से पहचाना गया है, और दोनों देश संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और ICAO में घनिष्ठ सहयोग करते हैं।
- कनाडा में रहने वाले भारतीय प्रवासी - जिनकी संख्या 18 लाख से अधिक है, जो कि जनसंख्या का लगभग 4% है - लोगों के बीच और आर्थिक संबंधों के लिये एक महत्त्वपूर्ण सेतु का काम करते हैं, जबकि भारत कनाडाई विश्वविद्यालयों के लिये अंतरराष्ट्रीय छात्रों का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है।
क्या चुनौतियाँ अभी बाकी हैं?
- कूटनीतिक संबंधों में नरमी के होते हुए भी, कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। खालिस्तानी उग्रवाद और 2023-24 के संकट के अनसुलझे परिणाम संवेदनशील दबाव बिंदु बने हुए हैं।
- व्यापार बाधाएं, वीजा प्रसंस्करण में देरी और परमाणु सहयोग करार की वह शर्त जिसके अधीन भारत को कनाडा को विखंडनीय सामग्री का हिसाब देना होता है - जिसे आलोचक संप्रभुता का उल्लंघन मानते हैं - ये सभी कारक संबंधों को जटिल बनाते रहते हैं।
- कार्नी की यात्रा से प्राप्त लाभों को सुदृढ़ करने के लिये मजबूत सुरक्षा सहयोग, CEPA पर शीघ्र प्रगति और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में निरंतर सहभागिता आवश्यक होगी।
निष्कर्ष
कार्नी की यात्रा महज़ एक कूटनीतिक सुलह का प्रयास नहीं है—यह इस बात का संकेत है कि दोनों राष्ट्र अलगाव की रणनीतिक कीमत को समझते हैं। भारत के लिये, ये करार स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन के लिये यूरेनियम ईंधन से लेकर महत्त्वपूर्ण खनिजों तक, आवश्यक संसाधनों को सुलभ बनाते हैं, साथ ही रक्षा प्रौद्योगिकी, नवाचार और व्यापार में नए रास्ते खोलते हैं। कनाडा के लिये, भारत तेजी से बढ़ता बाजार और तेजी से प्रतिस्पर्धी होते इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक विश्वसनीय लोकतांत्रिक भागीदार प्रदान करता है। यह संबंध तनाव से मुक्त नहीं होगा—खालिस्तानी राजनीति की छाया और परमाणु लेखांकन को लेकर संप्रभुता संबंधी चिंताएँ रातोंरात दूर नहीं होंगी। लेकिन मार्च 2026 में निर्मित ढाँचा एक ऐसी भागीदारी की विश्वसनीय नींव प्रदान करता है, जो यदि कायम रहती है, तो आने वाले दशक के सबसे महत्त्वपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों में से एक बन सकती है।
.jpg)