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अंतर्राष्ट्रीय नियम

तालिबान की नई दण्ड संहिता: अफगानिस्तान में लैंगिक भेदभाव को संस्थागत रूप देना

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 24-Feb-2026

स्रोत:टाइम्स ऑफ इंडिया 

परिचय 

हाल ही मेंतालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने चुपचाप ' दे महाकुमु जज़ाई ओसुलनामा'  (न्यायालयों के लिये आपराधिक प्रक्रिया विनियम) पर हस्ताक्षर कर इसे लागू कर दिया। यह 119 अनुच्छेदों वाली 90 पृष्ठों की एक व्यापक दण्ड संहिता हैजो बिना किसी लोक घोषणातर्क-वितर्क या परामर्श के तत्काल प्रभाव से लागू हो गई। यह विनियम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तभी चर्चा में आया जब अफ़गान मानवाधिकार संगठन रावदारी ने इसका पश्तो पाठ प्रकाशित किया। 

  • मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इस संहिता को "भय के माध्यम से शासन करने का खाका" बताया हैजो दमन को औपचारिक रूप से राज्य नीति में परिवर्तित कर देता हैऔर जिसके सबसे विनाशकारी परिणाम अफ़गान महिलाओं और लड़कियों को भुगतने पड़ते हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने इस ढाँचे को "भयानक" बताया है और इसे तत्काल निरस्त करने की अपील की है। 

तालिबान की नई दण्ड संहिता क्या है? 

अवलोकन और उत्पत्ति:  

  • 'दे महाकुमु जज़ाई ओसुलनामा' (आपराधिक प्रक्रियाओं के सिद्धांत) शीर्षक वालायह दस्तावेज़ 58 पृष्ठों, 10 अध्यायों और 119 अनुच्छेदों में विस्तृत है।  
  • इसे तालिबान के सर्वोच्च नेता द्वारा एकतरफा रूप से अधिनियमित किया गया और कार्यान्वयन के लिये प्रत्यक्षत: देशभर के न्यायालयों में भेज दिया गया। 
  • यह संहिता मुख्य रूप से तालिबान द्वारा शरिया विधि के अपने निर्वचन पर आधारित है और इसका उद्देश्य सर्वोच्च नेता के प्राधिकार के प्रति पूर्ण एवं निरपेक्ष आज्ञापालन सुनिश्चित करना है। । 
  • यह संहिता वर्ष 2009 के महिलाओं के विरुद्ध हिंसा उन्मूलन अधिनियम (EVAW) का स्थान लेती है- जो पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई के कार्यकाल में अधिनियमित एक ऐतिहासिक विधायी प्रावधान था। उक्त अधिनियम के अंतर्गत बलात् विवाहलैंगिक हमला तथा घरेलू हिंसा को—यहाँ तक कि प्रत्यक्ष शारीरिक क्षति के अभाव में भी—दण्डनीय अपराध घोषित किया गया था।   
  • यह नवीन संहिता पूर्ववर्ती प्रशासन के अधीन विकसित एक दशक की विधिक संरक्षण-व्यवस्था को प्रभावतः ध्वस्त कर देती है।  

चार स्तरीय जाति व्यवस्था: 

  • संहिता की सर्वाधिक चिंताजनक विशेषताओं में से एक अनुच्छेद हैजिसके द्वारा अफ़ग़ान समाज को औपचारिक रूप से चार-स्तरीय पदानुक्रम में विभाजित किया गया है—शीर्ष स्तर पर धार्मिक विद्वान (उलेमा)तत्पश्चात जनजातीय सरदारों एवं व्यापारियों (अशराफ) जैसे अभिजात वर्गउसके बाद मध्यम वर्गऔर अंततः निम्न वर्ग 
  • दण्ड का निर्धारण अपराध की गंभीरता के आधार पर न होकरअभियुक्त की सामाजिक स्थिति के आधार पर किया गया है। धार्मिक विद्वानों को मात्र चेतावनी दी जाती हैअभिजात वर्ग को न्यायालय में उपस्थित होने हेतु समन जारी किया जाता हैमध्यम वर्ग को कारावास का दण्ड दिया जाता हैजबकि निम्न वर्ग को कारावास के साथ-साथ शारीरिक दण्डजिसमें सार्वजनिक कोड़े मारना भी सम्मिलित हैआरोपित किया जाता है 
  • यह संरचना प्रभावी रूप से विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को लगभग पूर्ण रूप से दण्ड से मुक्ति प्रदान करती हैजबकि सबसे कठोर दण्ड सबसे हाशिए पर रहने वालों पर केंद्रित होते हैं। 
  • धार्मिक एवं राजनीतिक प्राधिकार से व्यवस्थित रूप से बहिष्कृत महिलाओं को प्रायः निम्नतम श्रेणी में रखा गया है 

घरेलू हिंसा को विधिक मान्यता देना: 

  • उक्त संहिता के अंतर्गत पतियों एवं पिताओं को अपनी पत्नियों तथा संतानों के विरुद्ध शारीरिक दण्डात्मक बल प्रयोग की स्पष्ट अनुमति प्रदान की गई हैबशर्ते कि ऐसे आघात के परिणामस्वरूप अस्थि-भंग (हड्डी टूटना) या खुला घाव उत्पन्न न हो। अनुच्छेद 32 के अधीन, "अत्यधिक बल प्रयोग" के मामलों में भी – जहाँ हिंसा के परिणामस्वरूप हड्डियां टूटती हैं या दिखाई देने वाले घाव होते हैं - पति के लिये अधिकतम दण्ड केवल 15 दिन का कारावास है। 
  • आलोचकों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस संहिता में पशुओं के प्रति क्रूरता के लिये महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की तुलना में अधिक कठोर दण्ड हैंएक ऐसी असमानता जिसे जॉर्जटाउन के इंस्टीट्यूट फॉर विमेनपीस एंड सिक्योरिटी ने "काहिरा घोषणा में निहित मानवीय गरिमा की पुष्टि के स्पष्ट विरोधाभास" के रूप में वर्णित किया है। 
  • अब गंभीर अपराधों का निर्णय पेशेवर न्यायिक या सुधारात्मक संस्थानों के बजाय इस्लामी धर्मगुरुओं द्वारा किया जाता हैजिससे दण्डात्मक शक्ति पक्षपातपूर्ण हाथों में और अधिक केंद्रित हो जाती है। 

दास प्रथा का पुनरुद्धार: 

  • यह संहिता बार-बार गुलाम (दास) शब्द का विशेष रूप से प्रयोग करती है , जो "स्वतंत्र" व्यक्तियों और दास की श्रेणी में रखे गए व्यक्तियों के अधिकारों में अंतर करती है। अनुच्छेद 4(5) आगे "स्वामियों" को अपने नियंत्रण में रहने वालों पर मनमाना दण्ड अधिरोपित करने का अधिकार देता हैजो प्रभावी रूप से गुलामी और मानव शोषण को राष्ट्रीय विधिक व्यवस्था की एक विशेषता के रूप में वैध ठहराता है। 
  • रावदारी समेत मानवाधिकार संगठनों ने इसे अंतरराष्ट्रीय विधि के अधीन लंबे समय से प्रतिबंधित एक अवधारणा का औपचारिक पुनरुद्धार बताया है। 

असहमति का दमन: 

  • इस संहिता के अधीन तालिबान अधिकारियों की आलोचना करनाविपक्ष के कथित क्रियाकलापों की सूचना न देना और यहाँ तक ​​कि असहमति के सामने चुप रहना भी अपराध माना जाता है। 
  • तालिबान नेताओं का अपमान करना 20 कोड़े और छह मास के कारावास से दण्डनीय घोषित किया गया है। अनुच्छेद 16 तालिबान के सर्वोच्च नेता को कम से कम 11 व्यापक और जानबूझकर अस्पष्ट श्रेणियों में फाँसी के दण्ड को मंजूरी देने का व्यक्तिगत अधिकार देता हैजिनमें "तालिबान का विरोध करना", "गैर-इस्लामी माने जाने वाले विश्वासों को बढ़ावा देना" और अपरिभाषित "नैतिक अपराध" सम्मिलित हैं। 

अफगान महिलाओं के लिये इसके क्या परिणाम होंगे? 

विधिक विलोपन: 

  • यह संहिता महिलाओं को विधिक प्रतिनिधित्व के अधिकारचुप रहने के अधिकार और जबरन कबूलनामे से सुरक्षा सहित मूलभूत विधिक सुरक्षा से वंचित करती है। 
  • दुर्व्यवहार के लिये विधिक न्याय पाने की इच्छुक महिलाओं को न्यायालय में पूरी तरह से ढके हुए और एक पुरुष संरक्षक के साथ पेश होना होगा - भले ही वह संरक्षक स्वयं कथित दुर्व्यवहारकर्ता ही क्यों न हो। 
  • मानवाधिकार समूहों का कहना है कि इस शर्त के कारण अभियोजन लगभग असंभव हो जाता है। अनुच्छेद 58 के अधीनइस्लाम छोड़ने के आरोप में महिलाओं को आजीवन कारावास और हर तीन दिन में दस कोड़े मारने का दण्ड दिया जाता हैजब तक कि वे इस्लाम में वापस नहीं आ जातींजबकि संहिता में पुरुषों के लिये कोई स्पष्ट दण्ड निर्धारित नहीं है। 

मानवीय प्रभाव का व्यापक प्रभाव: 

  • यह नवीन संहिता कई वर्षों से चले आ रहे संकट को और गहरा कर देता है। अगस्त 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद सेलड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा से वंचित कर दिया गया हैमहिलाओं को अधिकांश सरकारी पदों से हटा दिया गया है और गैर सरकारी संगठनों और संयुक्त राष्ट्र अभिकरणों के साथ काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। 
  • बढ़ती हुई कठोरता के साथ प्रवर्तित मेहरम नियम (Mahram Rule) के अनुसार महिलाओं को चिकित्सालयोंशासकीय कार्यालयों अथवा सार्वजनिक परिवहन जैसी आवश्यक सेवाओं तक पहुँच प्राप्त करने हेतु भी किसी पुरुष संरक्षक के साथ ही यात्रा करना अनिवार्य किया गया है 
  • कुछ प्रांतों मेंमहिलाओं को पुरुष डॉक्टरों से चिकित्सा उपचार प्राप्त करने की मनाही हैसाथ ही उन्हें स्वयं डॉक्टर बनने से भी रोक दिया गया है - जिससे वे स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच से पूरी तरह वंचित रह जाती हैं। 
  • संयुक्त राष्ट्र महिला ने चेतावनी दी है कि 2026 में मातृ मृत्यु दर में 50 प्रतिशत और बाल विवाह में 25 प्रतिशत की वृद्धि होगीजो प्रत्यक्ष परिणाम स्वरूप होगी। 
  • अफगानिस्तान की लगभग 80 प्रतिशत महिलाएँ वर्तमान में शिक्षा या नियोजन से बाहर हैंजिससे देश की संभावित कार्यबल का आधा हिस्सा आर्थिक जीवन से प्रभावी रूप से बाहर हो गया है। 

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया: 

  • इन प्रावधानों की गंभीरता के होते हुए भीअंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया काफी हद तक शांत रही है। 
  • अफगानिस्तान पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टियर रिचर्ड बेनेट ने इस संहिता की निंदा की हैऔर फेमिनिस्ट मेजॉरिटी फाउंडेशन और जॉर्जटाउन के GIWPS सहित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों ने इसे तत्काल निरस्त करने की मांग की है। यद्यपिइसके चलते कोई समन्वित बहुपक्षीय कार्रवाई नहीं हुई है। 
  • तालिबान ने आलोचकों को "काफिर" कहकर खारिज कर दिया है और अपनी विधि का विरोध करने को ही एक आपराधिक कृत्य के रूप में पेश किया है। 
  • मानवाधिकार संगठनों का तर्क है कि नई संहिता और पूर्व के आदेशों का संयुक्त भार मानवता के विरुद्ध अपराधों की विधिक सीमा को पूरा करता है और लैंगिक रंगभेद की एक औपचारिक प्रणाली का गठन करता है। 

तालिबान के बारे में: पृष्ठभूमि और सत्ता में उदय 

तालिबान—जिसका पश्तो भाषा में अर्थ "छात्र" होता है—का उदय 1990 के दशक की शुरुआत में अफगानिस्तान से सोवियत सैनिकों की वापसी के बाद उत्तरी पाकिस्तान में हुआ। यह एक इस्लामी कट्टरपंथी राजनीतिक और सैन्य संगठन है जिसने दशकों तक अफगान राजनीति को आकार दिया है और अंतरराष्ट्रीय मामलों में इसकी नियमित रूप से भूमिका रहती है। 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 

  • अफगानिस्तान में तालिबान का पहला शासनकाल 1996 से 2001 तक चलाजो महिलाओं पर गंभीर प्रतिबंधोंसार्वजनिक फाँसी और सांस्कृतिक विरासत के विनाश से चिह्नित था। 
  • उन्हें सत्ता से हटाने की घटना 11 सितंबर, 2001 को संयुक्त राज्य अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों के बाद घटीजिसमें लगभग 3,000 लोग मारे गए थे। 
  • एक महीने के भीतर ही अमेरिका ने अफगानिस्तान के विरुद्ध ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम शुरू कर दिया। नाटो (NATO) गठबंधन की सेनाओं ने युद्ध की घोषणा कीतालिबान शासन को उखाड़ फेंका और काबुल में एक अंतरिम सरकार की स्थापना की। 

शांति वार्ता और अमेरिका की वापसी: 

  • लगभग दो दशकों के युद्ध के बादअमेरिका इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि सैन्य समाधान असंभव है। 2015 मेंतालिबान और अफ़गान सरकार के बीच पहली बार वार्ता की मेज़बानी पाकिस्तान ने मुर्री में की। 
  • 2020 की दोहा वार्ता अधिक निर्णायक साबित हुईजहाँ तालिबान ने यह बनाए रखा कि वे केवल संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ सीधे बातचीत करेंगे - काबुल सरकार को मान्यता देने से इंकार कर दिया। 
  • परिणामस्वरूप हुए दोहा करार के अधीनअमेरिका ने मई, 2021 तक सभी सैनिकों को वापस बुलाने की प्रतिबद्धता जताईजिसे बाद में बढ़ाकर 11 सितंबर, 2021 कर दिया गया। 

सत्ता में वापसी: 

  • जुलाई 2021 तकअमेरिका ने अपनी लगभग 90 प्रतिशत सेना वापस बुला ली थी। इस बीचतालिबान ने तेजी से क्षेत्रीय नियंत्रण मजबूत कर लिया। 
  • अगस्त 2021 मेंतालिबान लड़ाके बिना किसी खास प्रतिरोध के काबुल में प्रवेश कर गए और 20 वर्ष पहले सत्ता से बेदखल होने के बाद प्रथम बार शहर पर नियंत्रण हासिल कर लिया। 
  • इस तख्तापलट ने तत्काल मानवीय और आर्थिक संकट को जन्म दिया और बड़े पैमाने पर विस्थापन को प्रेरित किया - विशेष रूप से महिला पेशेवरोंकार्यकर्ताओंपत्रकारों और छात्रों के बीच - जिन्हें 1990 के दशक में तालिबान शासन को परिभाषित करने वाले दमन की वापसी का भय था। 
  • वे आशंकाएँ पूरी तरह से सच साबित हुईंअपितु उससे भी कहीं अधिक भयावह हो गईं। सत्ता पुनः प्राप्त करने के बाद सेतालिबान ने अफ़गानिस्तान के इस्लामी अमीरात पर निरंतर फरमान और आदेश जारी करके शासन किया है - जिनमें से नई दण्ड संहिता नवीनतम और सबसे औपचारिक रूप से संहिताबद्ध अभिव्यक्ति है। 

निष्कर्ष 

तालिबान की नई दण्ड संहिता महज एक विधिक सुधार से कहीं अधिक है — यह एक वैचारिक व्यवस्था का संस्थागतकरण है जिसमें हिंसानिगरानी और विभेद विधि में अंतर्निहित हैं। लिंग आधारित दण्ड को औपचारिक रूप देकरगुलामी की अवधारणाओं को पुनर्जीवित करके और उचित विधिक प्रक्रिया को समाप्त करकेतालिबान ने दमन को राज्य का कर्त्तव्य बना दिया है। अफ़गान महिलाओं और लड़कियों के लियेजिन्हें 2021 से ही सार्वजनिकपेशेवरशैक्षिक और सामाजिक जीवन से निरंतर हाशिए पर धकेला जा रहा हैयह नई संहिता उस बात की पुष्टि करती है जो उनके दैनिक जीवन में लंबे समय से संकेत दे रही है: कि तालिबान शासन मेंमहिलाओं के विरुद्ध हिंसा वैध हैआज्ञापालन अनिवार्य हैऔर अस्तित्व को ही अपराध घोषित किया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मंद प्रतिक्रिया जवाबदेहीतालिबान के साथ राजनयिक संबंधों की सीमाओं और व्यवस्थित लिंगभेद के सामने मानवाधिकार तंत्र के भविष्य के बारे में गंभीर प्रश्न उठाती है।