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सांविधानिक विधि

पंजाब राज्य एवं अन्य बनाम दविंदर सिंह एवं अन्य (2024)

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 20-Aug-2025

परिचय 

उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय ने आरक्षण के लिये अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को उप-वर्गीकृत करने की सांविधानिक वैधता पर विचार किया। सात न्यायाधीशों की पीठ ने चिन्नैया मामले के उस पूर्व निर्णय को खारिज कर दिया जिसमें अनुसूचित जातियों को एकरूप माना गया था, और यह स्थापित किया कि इन समुदायों के सबसे पिछड़े वर्गों तक आरक्षण का लाभ पहुँचाने के लिये उप-वर्गीकरण सांविधानिक रूप से स्वीकार्य है। 

तथ्य 

  • सात जजों की बेंच में पूर्व पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, विक्रम नाथ, बेला एम. त्रिवेदी, पंकज मिथल, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा सम्मिलित थे। 
  • पंजाब विधानमंडल ने पंजाब अनुसूचित जाति एवं पिछड़ा वर्ग (सेवाओं में आरक्षण) अधिनियम, 2006 पारित किया। 
  • अधिनियम में बाल्मीकि और मजहबी सिख समुदायों के लिये 50% अनुसूचित जाति कोटा रिक्तियों को प्रथम वरीयता के रूप में निर्धारित किया गया था। 
  • पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने इसे असांविधानिक घोषित कर दिया। 
  • हरियाणा सरकार की अधिसूचना 1994 ने अनुसूचित जातियों को ब्लॉक A और B में वर्गीकृत किया था - जिसे भी उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया। 
  • तमिलनाडु अरुंथथियार अधिनियम 2009 ने शैक्षणिक संस्थानों में अरुंथथियारों के लिये अनुसूचित जातियों की 16% सीटें आरक्षित कीं। 
  • ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2005) ने अनुसूचित जाति के उप-वर्गीकरण को असांविधानिक करार दिया था। 
  • 2020 में संविधान पीठ ने मामले को पुनर्विचार के लिये सात न्यायाधीशों वाली बड़ी पीठ को भेज दिया। 

विवाद्यक 

  • क्या अनुच्छेद 14, 15 और 16 के अंतर्गत आरक्षित वर्गों का उप-वर्गीकरण स्वीकार्य है। 
  • क्या अनुसूचित जातियाँ समरूप या विषमांगी समूह हैं। 
  • क्या अनुच्छेद 341 काल्पनिकता के माध्यम से समरूप वर्ग का निर्माण करता है। 
  • क्या उप-वर्गीकरण के दायरे पर सीमाएँ हैं। 
  • अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजातिउप-वर्गीकरण को सक्षम करने वाले राज्य विधान की सांविधानिक वैधता। 

न्यायालय की टिप्पणियाँ 

पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा ने कहा: 

  • अनुच्छेद 14 वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति देता है, यदि विधि के प्रयोजन के लिये समरूप न हो। 
  • उप-वर्गीकरण अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के अधीन लाभार्थी वर्गों पर लागू होता है, यह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित नहीं है। 
  • अनुच्छेद 341(1) यह कल्पना नहीं करता कि अनुसूचित जातियाँ एक समरूप वर्ग हैं। 
  • अनुसूचित जाति के उप-वर्गीकरण पर रोक लगाने वाला ई.वी. चिन्नैया का निर्णय खारिज किया जाता है। 
  • राज्यों को पिछड़ेपन के सूचक के रूप में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर अनुभवजन्य आँकड़े एकत्र करने चाहिये 
  • अनुच्छेद 335, अनुच्छेद 16(1) और 16(4) को सीमित किये बिना लोक सेवाओं में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के दावों पर विचार करने की पुष्टि करता है। 

न्यायमूर्ति बी.आर. गवई ने कहा: 

  • राज्य को अपर्याप्त प्रतिनिधित्व दर्शाने वाले अनुभवजन्य आंकड़ों के आधार पर अधिमान्य उपचार को उचित ठहराना चाहिये 
  • सूची में अन्य को छोड़कर उप-वर्ग के लिये 100% अनुसूचित जाति की सीटें आरक्षित नहीं की जा सकतीं। 
  • उप-वर्गीकरण की अनुमति केवल तभी दी जाती है जब उप-वर्ग और बड़े वर्ग दोनों के लिये आरक्षण विद्यमान हो। 
  • क्रीमी लेयर सिद्धांत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर लागू होना चाहिये 

न्यायमूर्ति पंकज मिथल ने सुझाव दिया 

  • वंचित समूहों के लिये आरक्षण नीतियों का नए सिरे से मूल्यांकन। 
  • आरक्षण केवल प्रथम पीढ़ी के लाभार्थियों तक सीमित है। 
  • उच्चतर दर्जा प्राप्त परिवारों को बाहर करने के लिये आवधिक समीक्षा। 
  • जिन लोगों को अब आरक्षण लाभ की आवश्यकता नहीं है, उनका नियमित मूल्यांकन किया जाएगा। 

न्यायालय का निर्णय: 

  • अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के बीच उप-वर्गीकरण को 6:1 बहुमत सेबरकरार रखा गया । 
  • ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2005) के पूर्व निर्णय कोखारिज कर दिया गया । 
  • यह माना गया किउप-वर्गीकरण सामाजिक पिछड़ेपन को दर्शाने वाले तर्कसंगत आधार पर आधारित होना चाहिये 
  • दो मॉडलस्थापित किये गए : वरीयता मॉडल (उप-जातियों को प्राथमिकता देना) या अनन्य मॉडल (विशिष्ट सीट आरक्षण)। 
  • अपर्याप्त प्रतिनिधित्व दर्शाने वाले राज्यों द्वारा अनुभवजन्य डेटा संग्रहणअनिवार्य किया गया । 
  • बहुमत के अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर क्रीमी लेयर सिद्धांतलागू किया गया । 

असहमतिपूर्ण राय - न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी: 

  • अनुच्छेद 341 के अंतर्गत राष्ट्रपति सूची अधिसूचना के पश्चात् अंतिम हो जाती है। 
  • केवल संसद ही अनुसूचित जातियों की सूची में जातियों को सम्मिलित/अपवर्जित  कर सकती है। 
  • राज्यों के पास अनुच्छेद 341 में उल्लिखित जातियों को उप-वर्गीकृत करने की विधायी क्षमता का अभाव है। 
  • अनुसूचित जातियाँ अलग-अलग मूल के होते हुए भी समरूप वर्ग बनाती हैं। 
  • कोई भी राज्य उप-वर्गीकरण सांविधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है। 
  • अनुच्छेद 142 की शक्तियां असांविधानिक राज्य कार्यों को वैध नहीं ठहरा सकतीं। 
  • ई.वी. चिन्नैया मामले के पूर्व निर्णय को बरकरार रखा जाना चाहिये 

निष्कर्ष  

यह ऐतिहासिक निर्णय अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के उप-वर्गीकरण के लिये सांविधानिक ढाँचा स्थापित करता है और साथ ही यह सुनिश्चित करता है कि आरक्षण के लाभ सबसे वंचित वर्गों तक पहुँचें। न्यायालय का 6:1 बहुमत वाला निर्णय राज्यों को सांविधानिक सीमाओं के अधीन, अनुभवजन्य आँकड़ों के आधार पर लक्षित सकारात्मक कार्रवाई लागू करने की लचीलापन प्रदान करता है। यह निर्णय सामाजिक न्याय के उद्देश्यों को सांविधानिक सिद्धांतों के साथ संतुलित करता है, आरक्षण न्यायशास्त्र में महत्वपूर्ण विकास को चिह्नित करता है और साथ ही मनमाने वर्गीकरण के विरुद्ध सुरक्षा उपायों को भी बनाए रखता है।