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आपराधिक कानून
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के अधीन समन जारी करने से पहले प्रस्तुत साक्ष्य दोषसिद्धि के लिये अपर्याप्त है
01-Jun-2026
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प्रमोद कुमार सिंह उर्फ गुड्डू सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य "जिस समय अपीलकर्त्ता को विचारण न्यायालय द्वारा समन नहीं किया गया था और वह इस कारण से विचारण के दौरान उपस्थित नहीं था, उस दौरान अभिलिखित किये गए साक्ष्य पर विचारण न्यायालय द्वारा विश्वास नहीं किया जा सकता है।" न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की खंडपीठ ने प्रमोद कुमार सिंह उर्फ गुड्डू सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले में हत्या के अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया, जिसे धारा 319 दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 358 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अधीन विचारण का सामना करने के लिये समन किया गया था । न्यायालय ने माना कि किसी अभियुक्त को समन किये जाने से पहले अभिलिखित किये गए साक्ष्य उसकी दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते, क्योंकि इस पर विश्वास करना धारा 273 दण्ड प्रक्रिया संहिता का सीधा उल्लंघन है, जिसमें यह अनिवार्य है कि सभी साक्ष्य अभियुक्त की उपस्थिति में अभिलिखित किये जाएं।
प्रमोद कुमार सिंह उर्फ गुड्डू सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- विजय कुमार सिंह की हत्या के संबंध में एक मामला दर्ज किया गया है, जिनकी कथित तौर पर चार अभियुक्त द्वारा चलाई गई गोली लगने से मृत्यु हो गई।
- आरोपपत्र में अपीलकर्त्ता (प्रमोद कुमार सिंह उर्फ गुड्डू सिंह) का नाम नहीं था, क्योंकि पुलिस घटना में उसकी संलिप्तता साबित नहीं कर सकी।
- आरोपपत्र में शामिल चारों अभियुक्त के विचारण के दौरान, अपीलकर्त्ता को समन करने के लिये दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के अधीन एक आवेदन दायर किया गया था, जिसे जून 2012 में मंजूर कर लिया गया था।
- धारा 319 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर आवेदन घायल परिवादकर्त्ता/PW-1 (पिंटू सिंह), मृतक के चाचा (इंद्रपाल सिंह; परिसाक्ष्य 2011 में अभिलिखित किया गया था) और एक स्वतंत्र साक्षी (अजय कुमार सिंह; परिसाक्ष्य 2009 में अभिलिखित किया गया था) की पिछले परिसाक्ष्य पर आधारित था।
- अपीलकर्त्ता को समन किये जाने के बाद, PW-1 और मृतक के चाचा, जिनकी 2013 में पुनः परीक्षा की गई थी, अपने पूर्ववर्ती कथनों से पूरी तरह मुकर गए और मामले में अपीलकर्त्ता की संलिप्तता से इंकार किया।
- PW-1 ने स्पष्ट रूप से कहा कि उसने दबाव में आकर अपने पूर्व के कथन में अपीलकर्त्ता को मिथ्या फंसाया था।
- अपीलकर्ता को समन भेजे जाने के बाद स्वतंत्र गवाह दोबारा गवाही देने के लिए कभी आगे नहीं आया।
- इसके होते हुए भी, विचारण न्यायालय ने मृतक के चाचा और स्वतंत्र साक्षी के पूर्व-समन कथनों पर विश्वास करते हुए अपीलकर्त्ता को धारा 302 के साथ पठित धारा 149, धारा 307 के साथ पठित धारा 149, धारा 148 और धारा 506(2) भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की दण्ड दिया।
- विचारण न्यायालय ने तर्क दिया कि एक बार जब किसी अभियुक्त को धारा 319 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन समन करने के लिये परिसाक्षियों पर कार्रवाई की जा चुकी है, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और वे दोषसिद्धि का आधार बन सकती हैं।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
समन जारी होने से पूर्व के साक्ष्य दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकते:
- न्यायालय ने माना कि विचारण न्यायालय ने मृतक के चाचा के उस कथन पर विश्वास करने में गंभीर त्रुटी की, जिसमें अपीलकर्त्ता को फंसाया गया था, क्योंकि यह कथन अपीलकर्त्ता को अतिरिक्त अभियुक्त के रूप में समन किये जाने से पूर्व अभिलिखित किया गया था।
- इस प्रकर के कथन को अपीलकर्त्ता के विरुद्ध नहीं पढ़ा जा सकता, क्योंकि यह उस समय अभिलिखित किया गया था जब वह न तो न्यायालय के सामने उपस्थित था और न ही कार्यवाही में पक्षकार था।
- विचारण न्यायालय ने समन जारी होने से पूर्व अभिलिखित किये गए कथन पर कार्रवाई की, जबकि उसी साक्षी के पश्चात्वर्ती कथन को नजरअंदाज कर दिया, जिसमें अपीलकर्त्ता को स्पष्ट रूप से निर्दोष साबित किया गया था।
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 273 का उल्लंघन:
- न्यायालय ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 273 के अधीन अनिवार्य आवश्यकता पर बल दिया कि किसी विचारण या कार्यवाही के दौरान लिये गए सभी साक्ष्य अभियुक्त की उपस्थिति में अभिलिखित किये जाएंगे।
- जब अपीलकर्त्ता को अभी तक समन नहीं किया गया था और वह न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं था, उस समय अभिलिखित किये गए साक्ष्यों पर विचारण न्यायालय द्वारा उसकी दोषसिद्धि अभिलिखित करने के लिये विधिक रूप से विश्वास नहीं किया जा सकता था।
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 — दोषसिद्धि पर कोई राय नहीं:
- हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य, 2014 के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने दोहराया कि धारा 319 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन कार्रवाई करने वाले न्यायालय के पास समन जारी करने के प्रक्रम में अभियुक्त के अपराध के संबंध में कोई राय बनाने का कोई अवसर नहीं है।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के अधीन दी गई शक्ति केवल किसी अभियुक्त को विचारण का सामना करने के लिये जोड़ने की है और यह अपराध के प्रश्न को पूर्व निर्धारित नहीं करती है।
परिणाम:
- अपीलकर्त्ता की कथित अपराध में संलिप्तता साबित करने के लिये अभिलेख पर कोई अन्य सबूत न मिलने पर, न्यायालय ने उसकी अपील मंजूर कर लिया और दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया।
- न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष अपीलकर्त्ता के अपराध को साबित करने में असफल रहा है, और उक्त पहलुओं पर ध्यान दिये बिना दिया गया विचारण न्यायालय का निर्णय विधि की दृष्टि से अस्थिर है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 358 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 358— अपराध के दोषी प्रतीत होने वाले अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की शक्ति
- (यह दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 319 के अनुरूप है)
उपधारा (1) — कार्यवाही करने की शक्ति:
- यदि किसी जांच या विचारण के दौरान साक्ष्य से यह पता चलता है कि किसी ऐसे व्यक्ति ने, जिसका नाम मूल रूप से अभियुक्त के रूप में नहीं लिया गया था, कोई ऐसा अपराध किया है जिसके लिये उस पर अन्य अभियुक्तों के साथ विचारण चलाया जा सकता है, तो न्यायालय ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है।
उपधारा (2) — गिरफ्तारी या समन:
- यदि ऐसा व्यक्ति न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता है, तो मामले की परिस्थितियों के आधार पर उसे गिरफ्तार किया जा सकता है या समन किया जा सकता है।
उपधारा (3) — उपस्थित व्यक्ति का निरोध:
- न्यायालय में उपस्थित होने वाले किसी भी व्यक्ति को, भले ही वह गिरफ्तार न हो या उसे समन न दिया गया हो, उसके द्वारा किये गए अपराध की जांच या विचारण के प्रयोजन से न्यायालय द्वारा निरुद्ध किया जा सकता है।
उपधारा (4) — नई कार्यवाही:
- जहाँ न्यायालय उपधारा (1) के अंतर्गत ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करता है:
- कार्यवाही नए सिरे से शुरू की जाएगी और साक्षियों की पुन: सुनवाई की जाएगी।
- उपरोक्त के अधीन रहते हुए, मामला इस प्रकार आगे बढ़ेगा मानो न्यायालय द्वारा अपराध का संज्ञान लेने के समय वह व्यक्ति अभियुक्त था।
सिविल कानून
अतिरिक्त लिखित कथन से पूर्व के अभिवचनों को वापस नहीं लिया जा सकता
01-Jun-2026
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मोंदिरा घोष बनाम चैताली घोष "प्रतिवादी ने कब्जे के संबंध में अपनी स्थिति और दावे को पूरी तरह से परिवर्तित करना चाहा। पहले उसने कहा था कि वह विवादित परिसर की वास्तविक सह-भागीदार है, लेकिन अतिरिक्त लिखित कथन के माध्यम से उसने पूरी तरह से पलटवार करते हुए दावा किया कि वह वादी की किराएदार है।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मोंडीरा घोष बनाम चैताली घोष (2026) के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें सिविल कार्यवाही के उन्नत प्रक्रम में प्रतिवादी को अतिरिक्त लिखित कथन दाखिल करने की अनुमति दी गई थी। न्यायालय ने माना कि कोई भी पक्षकार आदेश 8 नियम 9 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन अतिरिक्त लिखित कथन का उपयोग मूल प्रतिरक्षा के पूर्णतः विपरीत मामला पेश करने के लिये नहीं कर सकता है, और विचारण की शुरुआत के बाद किया गया ऐसा प्रयास, आदेश 6 नियम 17 सिविल प्रक्रिया संहिता के परंतुक के अधीन निषेध को दरकिनार करने के उद्देश्य से प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है।
मोंदिरा घोष बनाम चैताली घोष (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- मोंडीरा घोष ने एक सिविल वाद दायर कर यह घोषणा करने की मांग की कि चैताली घोष विवादित संपत्ति पर अवैध रूप से कब्जा कर रही हैं और उन्हें बेदखल किया जाए।
- दिसंबर 2022 में दायर अपने मूल लिखित कथन में, प्रतिवादी ने दावा किया कि वह विवादित संपत्ति की एक वास्तविक सह-हिस्सेदार है और उसने वादी के विधिविरुद्ध कब्जे के दावे को खारिज कर दिया।
- मामले से संबंधित विवाद्यक मई 2023 में तैयार किये गए थे, जिसके बाद वादी के साक्षी से विस्तृत रूप से प्रतिपरीक्षा की गई।
- विचारण के प्रारंभ होने के बाद, प्रतिवादी ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 8 नियम 9 के अधीन एक आवेदन दायर कर प्रतिदावे के साथ एक अतिरिक्त लिखित कथन दाखिल करने की अनुमति मांगी।
- प्रस्तावित अतिरिक्त लिखित कथन के माध्यम से, प्रतिवादी ने अपनी स्थिति को पूरी तरह से बदलने और यह दावा करने की कोशिश की कि वह वादी के अधीन एक किराएदार थी - एक ऐसा रुख जो सह-हिस्सेदार होने के उसके मूल प्रतिरक्षा के साथ पूरी तरह से असंगत है।
- विचारण न्यायालय ने आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि प्रतिवादी अपने पूर्व के कथनं से पीछे नहीं हट सकती और उसकी जगह असंगत मामला नहीं रख सकती, इसके लिये उसने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 7 का हवाला दिया, जो संशोधन के अलावा पूर्व के कथनों के साथ असंगत आरोप लगाने पर रोक लगाता है।
- कलकत्ता उच्च न्यायालय ने प्रतिवादी की चुनौती को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए, 15,000 रुपए के खर्च के भुगतान पर अतिरिक्त लिखित कथन दाखिल करने की अनुमति दी, जबकि प्रतिदावे पर विचार करने से इंकार कर दिया।
- इससे व्यथित होकर वादी मोंदिरा घोष ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं:
अतिरिक्त लिखित कथन विरोधाभासी मामला पेश नहीं कर सकता:
- न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय ने अतिरिक्त लिखित कथन की अनुमति देकर त्रुटी की, क्योंकि प्रतिवादी अपनी स्थिति को एक वास्तविक सह-हिस्सेदार से बदलकर वादी की किराएदार बनकर पूरी तरह से पलटवार करने की कोशिश कर रही थी।
- यह मूल लिखित कथन से तथ्यों के अनजाने में छूट जाने का मामला नहीं था; अपितु, यह पहले के रुख को वापस लेने और उसके स्थान पर पूरी तरह से विरोधाभासी अभिवचन पेश करने का जानबूझकर किया गया प्रयास था।
- ऐसा करना सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 7 के आदेश के विपरीत है, जो किसी पक्षकार को औपचारिक संशोधन की मांग किये बिना अपने पहले के कथनों के साथ असंगत तथ्यों को प्रस्तुत करने से रोकता है।
प्रक्रिया का दुरुपयोग — आदेश 6 नियम 17 का उल्लंघन:
- न्यायालय ने पाया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 8 नियम 9 के अधीन आवेदन केवल सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 17 के परंतुक में निहित प्रतिबंध को दूर करने के लिये दायर किया गया था, जो विचारण के प्रारंभ के बाद अभिवचनों में संशोधन को प्रतिबंधित करता है।
- इस तरह का आवेदन दाखिल करना - विशेष रूप से तब जब प्रतिवादी उचित समय पर अपने लिखित कथन में संशोधन की मांग करने में विफल रही थी - प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग माना गया।
- इस प्रकार की प्रक्रिया की अनुमति देने से विचारण के पश्चात् संशोधन पर लगे प्रतिबंध अर्थहीन हो जाएंगे।
विचारण न्यायालय के आदेश की बहाली:
- उच्चतम न्यायालय ने वादी की अपील को मंजूर करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय के 3 सितंबर, 2025 के आदेश को अपास्त कर दिया और प्रतिवादी के आवेदन को खारिज करने वाले विचारण न्यायालय के आदेश को बहाल कर दिया।
लिखित कथन क्या होता है?
बारे में:
- लिखित कथन प्रतिवादी द्वारा वादी के वादपत्र का उत्तर होता है। इससे संबंधित सभी प्रावधान सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 8 के अंतर्गत आते हैं।
मुख्य नियम एक दृष्टि में
- नियम 1 — समय सीमा:
- समन की तामील होने के 30 दिनों के भीतर इसे दाखिल करना होगा ।
- न्यायालय सुनवाई को 90 दिनों तक बढ़ा सकता है (कारणों को अभिलिखित करते हुए)।
- वाणिज्यिक वाद: 120 दिनों तक का अतिरिक्त विस्तार; जिसके बाद वाद दायर करने का अधिकार समाप्त हो जाता है ।
- नियम 2 — नए तथ्य: प्रतिरक्षा के सभी आधार (कपट, परिसीमा, अवैधता, आदि) स्पष्ट रूप से बताए जाने चाहिये; अन्यथा उन्हें बाद में नहीं उठाया जा सकता।
- नियम 3 — विशिष्ट खंडन: सामान्य खंडन अपर्याप्त है; प्रत्येक आरोप से विशिष्ट रूप से निपटना होगा।
- नियम 4 — टालमटोल वाला इंकार नहीं: इंकार आरोप के सार पर आधारित होना चाहिये, न कि केवल आरोप के सटीक रूप पर।
- नियम 6 — मुजरा : प्रतिवादी वादी के दावे के विरुद्ध एक निर्धारित राशि के मुजरा का दावा कर सकता है, लेकिन केवल प्रथम सुनवाई में, जब तक कि बाद में इसकी अनुमति न दी जाए।
- नियम 6ख — प्रतिदावा: लिखित कथन में इसे प्रतिदावे के रूप में स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिये।
- नियम 10 - दाखिल करने में विफलता: न्यायालय चूक करने वाले पक्षकार के विरुद्ध निर्णय सुना सकता है या कोई उपयुक्त आदेश पारित कर सकता है।
विधिक मामले
- कैलाश बनाम नानखु (2005): नियम 1, आदेश 8 का परंतुक निर्देशात्मक है , अनिवार्य नहीं।
- सलेम एडवोकेट बार एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2005): नियम 10 के तहत समय का विस्तार सामान्य रूप से नहीं दिया जा सकता; केवल असाधारण रूप से कठिन मामलों में ही दिया जा सकता है।