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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

पक्षद्रोही साक्षियों की उपस्थिति के होते हुए भी डीएनए साक्ष्य ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत अभियुक्त की दोषसिद्धि की पुष्टि की

 06-Jun-2026

मुरुगन बनाम राज्य 

"विचारण न्यायालय ने DNA रिपोर्ट पर विश्वास करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचने में पूरी तरह से सही काम किया कि बालक अपीलकर्त्ता और पीड़ित लड़की से पैदा हुआ था और इसने स्पष्ट रूप से पीड़ित लड़की के विरुद्ध लैंगिक उत्पीड़न के आरोप को साबित करने के लिये आधारभूत तथ्य प्रदान किया।" 

न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के.के. रामकृष्णन 

स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ नेमुरुगन बनाम राज्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि अवयस्क पीड़िता से जन्मे बच्चे के पितृत्व को स्थापित करने वाले फोरेंसिक DNA साक्ष्यलैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 5()(ii) के अधीन दोषसिद्धि को बरकरार रखने के लिये पर्याप्त हैंभले ही विचारण के दौरान पीड़िता और उसके माता-पिता ने विरोध जताया हो। न्यायालय ने दोषसिद्धि को बरकरार रखालेकिन दण्ड को आजीवन कारावास से संशोधित करके बीस वर्ष के कठोर कारावास में परिवर्तित कर दिया और साथ ही सहायक साक्ष्यों के अभाव में धारा 506 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया। 

मुरुगन बनाम राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला 2020 की शुरुआत में दायर कराए गए एक परिवाद से प्रारंभ हुआजिसमें एक तेरह वर्षीय लड़की के साथ बार-बार लैंगिक उत्पीड़न किया गया था। पीड़िता के गर्भवती होने का पता चलने परउसकी माता ने पुलिस में औपचारिक परिवाद दर्ज करायाजिसके परिणामस्वरूप लगभग चालीस वर्ष के अभियुक्त मुरुगन को गिरफ्तार किया गया। 
  • विचारण के दौरानपीड़िता और उसके परिवार के सदस्य पक्षद्रोही हो गए और अभियोजन पक्ष के मामले से काफी हद तक अलग हो गएजिससे दोषसिद्धि को चुनौती मिली। यद्यपिविचारण न्यायालय ने फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला द्वारा प्रस्तुत DNA रिपोर्ट पर विश्वास कियाजिससे यह साबित हुआ कि पीड़िता से पैदा हुए बच्चे का पिता अभियुक्त ही थाऔर उसे लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन आजीवन कारावास का दण्ड दिया 
  • अभियुक्त ने मद्रास उच्च न्यायालय में दोषसिद्धि और दण्ड को चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि पीड़िता और उसके माता-पिता की पक्षद्रोही परिसाक्ष्य ने अभियोजन पक्ष के मामले को अस्थिर बना दिया है और इसके अलावा अभिरक्षा श्रृंखला में कथित कमियों और दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अधीन दस्तावेज़ों को प्रस्तुत करने में प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के आधार पर DNA साक्ष्य पर भी प्रश्न उठाया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • DNA साक्ष्य के प्रमाणिक महत्त्व पर:न्यायालय ने माना कि पितृत्व स्थापित करने वाली सकारात्मक DNA रिपोर्ट निर्णायक फोरेंसिक साक्ष्य है जो लैंगिक उत्पीड़न के मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखने में सक्षम हैभले ही प्रत्यक्ष पक्षद्रोही साक्षियों के परिसाक्ष्यों के कारण कमजोर पड़ जाए। फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के उप निदेशक (PW13) ने विचारण न्यायालय के समक्ष DNA परिणामों की पर्याप्त व्याख्या की थीऔर वे निष्कर्ष निर्विवाद रहे। 
  • अभिरक्षा श्रृंखला की अखंडता पर:न्यायालय ने वर्तमान मामले को करनदीप शर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य के मामले से अलग बतायाजिसमें दूषित संग्रह प्रक्रियाओं के कारण DNA साक्ष्य को खारिज कर दिया गया था। वर्तमान मामले मेंबच्चे के जन्म के बाद रक्त के नमूने उचित सावधानी के साथ एकत्र किये गए और उनका प्रबंधन किया गयाऔर कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में अभियुक्त द्वारा संग्रह प्रक्रिया के संबंध में कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थी। इसलिये न्यायालय ने अभिरक्षा श्रृंखला को देर से दी गई चुनौती को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।      
  • पीड़ित के धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दिये गए कथन पर:न्यायालय ने माना कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अधीन पीड़ित द्वारा अभिलिखित किया गया स्वैच्छिक कथन बरकरार है और इसका उपयोग अभिलेख पर विद्यमान अन्य साक्ष्यों के खंडन और पुष्टि दोनों के लिये किया जा सकता हैजिससे DNA रिपोर्ट के साथ-साथ अभियोजन पक्ष के मामले को बनाए रखने के लिये एक अतिरिक्त आधार मिलता है। 
  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अधीन प्रक्रियात्मक आपत्ति पर:न्यायालय ने पाया कि अभियुक्त को विशेषज्ञ साक्षियों से प्रतिपरीक्षा करने का पर्याप्त अवसर दिया गया था और उसने वास्तव में उस अधिकार का प्रयोग किया था। इसलियेदण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अधीन दस्तावेज़ों को प्रस्तुत करने संबंधी आपत्ति को खारिज कर दिया गया क्योंकि इससे अभियुक्त को कोई नुकसान नहीं हुआ था।  
  • दण्ड में संशोधन:लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 5()(ii) के अधीन दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुएन्यायालय ने दण्ड सुनाते समय संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। साक्षियों के पक्षद्रोही स्वभाव और विचारण की समग्र परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुएन्यायालय ने आजीवन कारावास के दण्ड को बीस वर्ष के कठोर कारावास में संशोधित किया। आपराधिक अभित्रास के लिये भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के अधीन दोषसिद्धि को साक्ष्य के अभाव में अपास्त कर दिया गयाक्योंकि पीड़िता के पक्षद्रोही परिसाक्ष्य से उस आरोप की पुष्टि नहीं हो पाई थी 
  • तदनुसारन्यायालय ने लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन दोषसिद्धि को बरकरार रखादण्ड को संशोधित करके बीस वर्ष के कठोर कारावास में परिवर्तित कर दिया और धारा 506 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 क्या है? 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 का परिचय 

क्रमांक 

पहलू 

जानकारी 

  1.  

शीर्षक 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 

  1.  

अधिनियम संख्या 

अधिनियम सं. 32, 2012 

  1.  

अधिनियमित होने की तिथि 

19 जून, 2012 

  1.  

प्रवर्तन की तिथि  

14 नवंबर, 2012 

  1.  

स्थानीय विस्तार 

यह अधिनियम संपूर्ण भारत पर लागू होता है। 

  1.  

उद्देश्य 

लैंगिक हमलालैंगिक उत्पीड़न और अश्लील साहित्य के अपराधों से बालकों का संरक्षण करने और ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना तथा उनसे संबंधित या आनुषंगिक विषयों के लिये उपबंध करने के लिये अधिनियम 

  1.  

कुल धाराएँ एवं कुल अध्याय 

कुल धाराएँ46 

कुल अध्याय: 9 

  1.  

महत्त्वपूर्ण संशोधन 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2019 अधिनियमन की तिथि5 अगस्त 2019 

प्रवर्तन की तिथि 

16 अगस्त, 2019 

महत्त्वपूर्ण धाराएँ: 

  • धारा 2(1)(घ): "बालक की परिभाषा" - 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को बालक के रूप में परिभाषित किया गया है। 
  • धारा 3: "प्रवेशन लैंगिक हमला" - इसमें किसी बालक के शारीरिक छिद्रों में लिंग या गैर-लिंग द्वारा प्रवेश करने का कोई भी कृत्यया बालक के लैंगिक अंगों पर मुँह लगाना शामिल हैचाहे वह प्रत्यक्ष रूप से किया गया हो या बालक को यह कृत्य करने के लिये विवश करके किया गया हो। 
  • धारा 4: " प्रवेशन लैंगिक हमला के लिये दण्ड" - कम से कम 10 वर्ष का कारावासजिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। यदि बालक 16 वर्ष से कम आयु का हैतो न्यूनतम कारावास 20 वर्ष है। 
  • धारा 5: "गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमला" - यह तब लागू होता है जब अपराध किसी लोक सेवकसशस्त्र बलों के सदस्यगिरोहरिश्तेदार या विश्वास के पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा किया जाता हैया जिसके परिणामस्वरूप गर्भावस्था, HIV, घोर उपहति या मृत्यु होती हैया बालक 12 वर्ष से कम आयु का होता है। 
  • धारा 6: " गुरुतर प्रवेशन लैंगिक हमले के लिये दण्ड" - कम से कम 20 वर्ष का कठोर कारावासजिसे आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड तक बढ़ाया जा सकता हैऔर पीड़ित को पुनर्वास के लिये जुर्माना देय होगा। 
  • धारा 7: "लैंगिक हमला" — इसमें बच्चे के जननांगों को छूना या लैंगिक आशय से किया गया कोई भी शारीरिक संपर्क शामिल हैजिसमें प्रवेशन शामिल नहीं है। त्वचा से त्वचा का संपर्क आवश्यक नहीं हैलैंगिक असशी ही निर्णायक कारक है। 
  • धारा 8: "लैंगिक हमले के लिये दण्ड" - कम से कम वर्ष का कारावासजिसे वर्ष तक बढ़ाया जा सकता हैऔर जुर्माना। 
  • धारा और 10: "गुरुतर लैंगिक हमला और उसका दण्ड" - धारा में लैंगिक हमले के मामले में धारा के समान गुरुतर परिस्थितियों का उल्लेख है। धारा 10 में से वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का उपबंध है। 
  • धारा 11 और 12: "लैंगिक उत्पीड़न और उसका दण्ड" - धारा 11 में लैंगिक आशय से इशारे करनाबार-बार संपर्क करनाधमकी देना या बहकाना जैसे कृत्य शामिल हैं। धारा 12 में वर्ष तक की कारावास और जुर्माने के उपबंध है। 
  • धारा 13-15: "बाल अश्लीलता" - धारा 13 अश्लील प्रयोजनों के लिये बालक के उपयोग को दण्डनीय बनाती है। धारा 14 में से वर्ष के कारावास का उपबंध है। धारा 15 ऐसी सामग्री के भंडारण को दण्डनीय बनाती हैऔर वाणिज्यिक कब्जे के लिये दण्ड का प्रावधान अधिक है। 
  • धारा 16-18: "दुष्प्रेरण और प्रयत्न" - अधिनियम के अधीन किसी भी अपराध को करने के लिये दुष्प्रेरण और प्रयत्न करना स्वतंत्र रूप से दण्डनीय हैजिसमें मूल अपराध के लिये निर्धारित अधिकतम दण्ड के आधे तक का दण्ड दिया जा सकता है। 
  • धारा 19 और 21: "अनिवार्य रिपोर्टिंग" - धारा 19 के अधीन किसी भी अपराध की जानकारी रखने वाले व्यक्ति के लिये पुलिस को इसकी सूचना देना अनिवार्य है। धारा 21 के अधीन सूचना न देना दण्डनीय अपराध हैयद्यपि बालकों को इससे छूट दी गई है। 
  • धारा 28 और 35: "विशेष न्यायालय और समय सीमा" - धारा 28 प्रत्येक जिले में एक विशेष न्यायालय की नियुक्ति अनिवार्य करती है। धारा 35 के अनुसारसाक्ष्य 30 दिनों के भीतर दर्ज किये जाने चाहिये और संज्ञान प्राप्त होने के एक वर्ष के भीतर विचारण पूर्ण होना चाहिये 
  • धारा 29 और 30: "उपधारणा" - यह माना जाता है कि अभियुक्त ने अपराध किया है और उसने दोषी मानसिक स्थिति के साथ काम किया हैजब तक कि उचित संदेह से परे अन्यथा साबित न हो जाए। 
  • धारा 33 और 36: "बाल-हितैषी विचारण" — धारा 33 बाल-हितैषी न्यायालय वातावरण अनिवार्य करती हैआक्रामक पूछताछ पर रोक लगाती है और बालक की पहचान की सुरक्षा करती है। धारा 36 परिसाक्ष्य के दौरान बालक को अभियुक्त के सीधे संपर्क में आने से रोकती है। 

आपराधिक कानून

आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम अभियुक्तों को आरोपपत्र संबंधी दस्तावेज़ उपलब्ध कराने में बाधक नहीं है

 06-Jun-2026

वी.के. सिंह बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और अन्य 

"केवल इस आधार पर अपीलकर्त्ताओं को दस्तावेज़ों की आपूर्ति से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उनके विरुद्ध शासकीय गुप्त बात के प्रावधानों को लागू किया गया है।" 

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ नेवी.के. सिंह बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो एवं अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 (OSA) के अधीन अभियुक्त व्यक्ति को आरोपपत्र में उल्लिखित दस्तावेज़ों की प्रतियाँ केवल इस आधार पर देने से इंकार नहीं किया जा सकता कि उनकी आपूर्ति देश की सुरक्षा और संप्रभुता को खतरे में डाल सकती है। दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त करते हुएजिसमें अभियुक्त को केवल दस्तावेज़ों के निरीक्षण तक सीमित कर दिया गया थान्यायालय ने CBI को निदेश दिया कि वह अभियुक्त केधारा 207 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 230) के अधीन दायर आवेदन में उल्लिखित सभी दस्तावेज़ों की टाइप की हुई प्रतियाँ दो महीने के भीतर उपलब्ध कराए। 

वी.के. सिंह बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता वी.के. सिंहजो भारतीय सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल और नवंबर 2000 से जून 2004 तक कैबिनेट सचिवालय (R&AW) में पूर्व संयुक्त सचिव थेपर शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 की धारा और तथा भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 409 और 120ख के अधीन मामला दर्ज किया गया था। 
  • अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि अपीलकर्त्ता ने "भारत की बाहरी खुफिया जानकारी - अनुसंधान और विश्लेषण विंग (RAW) के रहस्य" नामक एक पुस्तक प्रकाशित की थीजिसमें सेना के बारे में वर्गीकृत जानकारी का प्रकटन किया गया था और राज्य के गुप्त मामलों को आम जनता और विदेशी देशों के लिये सुलभ बनाया गया थाजिससे भारत की सुरक्षा और संप्रभुता खतरे में पड़ गई थी। 
  • CBI ने आरोपपत्र दाखिल किया और विचारण न्यायालय से अनुरोध किया कि आरोपपत्र में शामिल सभी गोपनीय दस्तावेज़ों को सीलबंद लिफाफे में रखा जाए। 
  • विचारण न्यायालय ने संज्ञान लिया और उसके बाद धारा 207 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर आवेदन के अनुसार अभियुक्त को दस्तावेज़ उपलब्ध कराने का निदेश दिया। 
  • इस निदेश से असंतुष्ट होकर अभियोजन पक्ष ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील कीजिसने विचारण न्यायालय के आदेश में संशोधन किया और अभियुक्त को दस्तावेज़ों की प्रतियाँ प्राप्त करने के बजाय केवल विचारण न्यायालय के पास विद्यमान दस्तावेज़ों का निरीक्षण करने की अनुमति दी। 
  • अपीलकर्त्ता ने उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दीयह तर्क देते हुए कि शासकीय गुप्त बात अधिनियम का आह्वान करने से अभियुक्त का आरोपपत्र का भाग बनने वाले दस्तावेज़ों की प्रतियाँ प्राप्त करने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अधीन अभियुक्त के दस्तावेज़ों के अधिकार पर:न्यायालय ने माना कि यह स्थापित विधि है कि अभियुक्त को आरोपपत्र के दस्तावेज़ों तक पहुँच से वंचित नहीं किया जा सकता हैजिनमें सामान्य डायरी के दस्तावेज़ भी शामिल हैंयदि ऐसे दस्तावेज़ सद्भावना से प्राप्त किए गए होंअभियोजन पक्ष के मामले से संबंधित होंऔर लोक अभियोजक द्वारा न्याय और निष्पक्ष विचारण के हित में उनका प्रकटन आवश्यक समझा जाता हो। ऐसे दस्तावेज़ों को रोकना अभियुक्त के निष्पक्ष विचारण के अधिकार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।  
  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम के लागू होने के प्रभाव पर:न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी अभियुक्त के विरुद्ध शासकीय गुप्त बात अधिनियम के प्रावधानों का मात्र प्रयोगआरोपपत्र में उल्लिखित दस्तावेज़ों की आपूर्ति से इंकार करने का आधार नहीं हो सकता। शासकीय गुप्त बात अधिनियम देश के आपराधिक विधि के अंतर्गत अभियुक्त के सांविधिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता। 
  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम की धारा 14 के अधीन CBI की दलील पर:न्यायालय ने CBI के इस तर्क को खारिज कर दिया कि दस्तावेज़ों की आपूर्ति से देश के सुरक्षा हितों को खतरा होगाइसे केवल एक आशंका करार दिया जो अभियुक्त के सांविधिक अधिकार को कम या समाप्त नहीं कर सकती।पश्चिम बंगाल के विधिक मामलों के अधीक्षक एवं सलाहकार बनाम सत्येन भौमिक एवं अन्य (1981)के मामले पर विश्वास करते हुए न्यायालय ने कहा कि यदि अभियुक्त को संबंधित दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं कराए जाते हैंतो उसके लिये अपने अधिवक्ता को प्रभावी ढंग से निदेश देना और अभियोजन पक्ष के साक्षियों से प्रतिरक्षा करना असंभव हो जाता है। 
  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम की धारा के अधीन सुरक्षा उपायों की पर्याप्तता पर:न्यायालय ने पाया कि शासकीय गुप्त बात अधिनियम की धारा के अधीन पर्याप्त सुरक्षा उपाय पहले से ही मौजूद हैंजिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति – अधिवक्ता सहित - द्वारा न्यायालय के बाहर कार्यवाही के दौरान प्राप्त संवेदनशील जानकारी का प्रकटन करना अपराध है। यह प्रावधान स्वयं ही गोपनीय सामग्री के किसी भी प्रकार के रिसाव को रोकने का काम करता है। 
  • जारी निर्देशों पर:न्यायालय ने CBI को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्त्ता के धारा 207 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर आवेदन में उल्लिखित दस्तावेज़ों की टाइप की हुई प्रतियाँ दो महीने के भीतर उपलब्ध कराए। न्यायालय ने यह भी निदेश दिया कि यदि आवश्यक हो तो विचारण न्यायालय द्वारा कार्यवाही के दौरान ऐसे दस्तावेज़ों का निरीक्षण करने की अनुमति दी जाए। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 230 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 230, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 207 का उत्तराधिकारी उपबंध है। 
  • इसमें पुलिस रिपोर्ट के आधार पर दर्ज किये गए मामलों में अभियुक्त और पीड़ित (यदि किसी अधिवक्ता द्वारा प्रतिनिधित्व किया जा रहा हो) को पुलिस रिपोर्ट और साथ में संलग्न दस्तावेज़ों की प्रतियाँ नि:शुल्क और निर्धारित समय सीमा के भीतर उपलब्ध कराने का प्रावधान है। 
  • यह एक मूलभूत उपबंध है जो निष्पक्ष विचारण की सांविधानिक प्रत्याभूति को प्रभावी बनाता है। 

मुख्य उपबंध: 

  • दस्तावेज़ उपलब्ध कराने की समय सीमा: मजिस्ट्रेट को अभियुक्त के न्यायालय में पेश होने या उपस्थित होने की तारीख से चौदह दिनों के भीतर बिना किसी विलंब के दस्तावेज़ उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यह विशिष्ट समय सीमा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन एक महत्त्वपूर्ण संशोधन हैजो धारा 207 दण्ड प्रक्रिया संहिता में विउद्यमान नहीं था। 
  • उपलब्ध कराए जाने वाले दस्तावेज़: निम्नलिखित दस्तावेज़ अभियुक्त और पीड़ित (यदि किसी अधिवक्ता द्वारा प्रतिनिधित्व किया जा रहा हो) को नि:शुल्क उपलब्ध कराए जाने चाहिये: पुलिस रिपोर्टधारा 173 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्टउन सभी व्यक्तियों के कथन जो अभियोजन पक्ष साक्षियों के रूप में पेश करना चाहता हैधारा 180(3) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन अभिलिखित किये गए हैंजिसमें वह भाग शामिल नहीं है जिसके लिये पुलिस अधिकारी ने धारा 193(7) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन छूट मांगी हैधारा 183 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन अभिलिखित संस्वीकृति और कथनयदि कोई होऔर कोई अन्य दस्तावेज़ या सुसंगत अंश जो धारा 193(6) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन पुलिस रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को भेजा गया हो। 
  • प्रथम परंतुक - बहिष्कृत कथनों का आंशिक प्रकटीकरण: जहाँ किसी पुलिस अधिकारी ने किसी साक्षी के कथन के किसी भाग को बहिष्कृत करने की मांग की हैवहाँ मजिस्ट्रेट उस भाग का अवलोकन करने और बहिष्करण के लिये दिये गए कारणों पर विचार करने के बाद यह निदेश दे सकता है कि उस भाग की प्रति या उसके ऐसे भाग की प्रतिजिसे मजिस्ट्रेट उचित समझेफिर भी अभियुक्त को उपलब्ध कराई जाए। 
  • दूसरा परंतुक – विशाल दस्तावेज़: यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट है कि कोई दस्तावेज़ विशाल हैतो वह भौतिक प्रति उपलब्ध कराने के बजायइलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रतियाँ उपलब्ध करा सकता है या निदेश दे सकता है कि अभियुक्त और पीड़ित को केवल व्यक्तिगत रूप से या किसी अधिवक्ता के माध्यम से न्यायालय में दस्तावेज़ का निरीक्षण करने की अनुमति दी जाएगी। 
  • तीसरा परंतुक - इलेक्ट्रॉनिक आपूर्ति: इलेक्ट्रॉनिक रूप में दस्तावेज़ों की आपूर्ति को स्पष्ट रूप से वैध माना जाता है और इस धारा के प्रयोजनों के लिये इसे विधिवत प्रस्तुत किया गया माना जाएगा। 
  • पीड़ित को शामिल करना — दण्ड प्रक्रिया संहिता से प्रमुख अंतर: दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के विपरीतजिसमें केवल अभियुक्त को ही दस्तावेज़ों की आपूर्ति अनिवार्य थीभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 230 पीड़ित को भी इन दस्तावेज़ों की प्रतियाँ प्राप्त करने का अधिकार देती हैबशर्ते पीड़ित का प्रतिनिधित्व एक अधिवक्ता द्वारा किया जा रहा हो। यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के पीड़ित-केंद्रित न्याय पर व्यापक बल को दर्शाता है। 

शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 क्या है? 

बारे में: 

  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 (OSA) औपनिवेशिक काल का एक विधान है जिसकी उत्पत्ति भारतीय शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1889 से हुई हैजिसे मुख्य रूप से प्रेस की असहमति को दबाने के लिये लागू किया गया था। लॉर्ड कर्ज़न के नेतृत्व में 1904 में इसे और अधिक कठोर बनाया गया और अंततः 1923 में इसे संशोधित और समेकित करके इसके वर्तमान स्वरूप में लाया गया। यह जासूसीगोपनीय सूचना और संवेदनशील राजकीय रहस्यों के अनधिकृत प्रकटीकरण को नियंत्रित करने वाला भारत का प्राथमिक विधि है। 

उद्देश्य एवं प्रयोज्यता: 

  • शासकीय गुप्त बात अधिनियम का उद्देश्य जासूसी और गोपनीय एवं संवेदनशील सूचनाओं के अनधिकृत प्रकटीकरण को रोकना हैजिससे भारत की संप्रभुताक्षेत्रीय अखंडता और रणनीतिक हितों की रक्षा हो सकेविशेष रूप से विदेशी खतरों से। यह अधिनियम सभी भारतीय नागरिकों पर लागू होता हैजिनमें सरकारी अधिकारी भी शामिल हैंचाहे वे भारत में कार्यरत हों या विदेश मेंऔर गैर-नागरिकों पर भी लागू होता है यदि वे जासूसी क्रियाकलापों में संलिप्त पाए जाते हैं। 

मुख्य उपबंध: 

  • धारा 3 — जासूसी और राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध कृत्य: यह धारा जासूसी और राज्य की सुरक्षा के लिये हानिकारक क्रियाकलापों को अपराध घोषित करती हैजिसमें संवेदनशील दस्तावेज़ों का कब्ज़ा और गुप्त कोड या वर्गीकृत जानकारी को अनधिकृत व्यक्तियों के साथ साझा करना शामिल है। इसके लिये अधिकतम चौदह वर्ष तक की कारावास के दण्ड का उपबंध है। 
  • धारा 5 — अनधिकृत प्रकटीकरण और कब्ज़ा: यह धारा आधिकारिक दस्तावेज़ों या सूचनाओं के अनधिकृत प्रकटीकरणकब्ज़ेप्रतिधारण या उन्हें वापस न करने पर दण्ड का प्रावधान करती है। इसमें वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो जानबूझकर ऐसी गोपनीय जानकारी प्राप्त करते हैंजिससे प्रकटीकरणकर्ता और प्राप्तकर्ता दोनों अधिनियम के अंतर्गत उत्तरदायी ठहराए जाते हैं। 
  • धारा 10 - जासूसों को शरण देना: यह धारा उन व्यक्तियों को शरण देने या छिपाने के अपराध से संबंधित है जिनके बारे में यह ज्ञात हो या उचित रूप से संदेह हो कि वे जासूसी या राज्य की सुरक्षा के लिये हानिकारक अन्य क्रियाकलापों में संलग्न हैं।