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करेंट अफेयर्स और संग्रह
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आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38
28-Jul-2026
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आंध्र प्रदेश राज्य बनाम सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागा राजू "पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार" न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने आंध्र प्रदेश राज्य बनाम सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागा राजू (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 38 गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार देती है, लेकिन यह अधिकार अधिवक्ता को प्रत्येक पूछताछ सत्र की पूरी अवधि के लिये निरंतर और शारीरिक रूप से उपस्थित रहने तक विस्तारित नहीं होता है।
आंध्र प्रदेश राज्य बनाम सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागा राजू (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्थी -अभियुक्त की पुलिस अभिरक्षा से संबंधित मामले पर सुनवाई करते हुए अभियोजन पक्ष को दो अधिवक्ताओं को नामित करने का निदेश देते हुए एक शर्त अधिरोपित की थी, जो अभियुक्त की पुलिस अभिरक्षा के दौरान जेल में मौजूद रहेंगे।
- उच्च न्यायालय ने आगे यह भी अनुमति दी थी कि अभियुक्त से पूछताछ के दौरान नामित दो अधिवक्ताओं में से एक "किसी भी समय" उपस्थित रह सकता है।
- इस निदेश से असंतुष्ट होकर आंध्र प्रदेश राज्य ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि यह शर्त अत्यधिक है और इससे अभियुक्तों की अभिरक्षा में पूछताछ में व्यावहारिक बाधाएं उत्पन्न होंगी।
- राज्य ने तर्क दिया कि पूछताछ के दौरान एक अधिवक्ता की निरंतर उपस्थिति विधि द्वारा अनुमत सीमा से परे थी और इससे अन्वेषण प्रक्रिया की प्रभावशीलता प्रभावित होगी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 के दायरे पर: न्यायालय ने माना कि धारा 38 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता को सीधे पढ़ने से पता चलता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को दिया गया अधिकार पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार है, और यह उपबंध प्रत्येक पूछताछ सत्र की संपूर्ण अवधि के लिये अधिवक्ता की निरंतर, सतत शारीरिक उपस्थिति का बिना शर्त अधिकार प्रदान नहीं करता है।
- उच्च न्यायालय के निदेश पर: न्यायालय ने पाया कि यदि उच्च न्यायालय के उस निदेश को, जिसमें पूछताछ के दौरान किसी भी समय अधिवक्ता की उपस्थिति की अनुमति दी गई है, निर्बाध निरंतर उपस्थिति का अधिकार प्रदान करने के रूप में समझा जाए, तो ऐसा अर्थ धारा 38 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में परिकल्पित उपबंध से अधिक होगा।
- राज्य की आशंका पर: राज्य से सहमत होते हुए, न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय द्वारा मूल रूप से निर्धारित शर्तें अभिरक्षा में अन्वेषण के लिये व्यावहारिक बाधाएं उत्पन्न करेंगी और तदनुसार अत्यधिक थीं।
- संशोधित निदेश पर: उच्च न्यायालय के उस निदेश के सार को बरकरार रखते हुए, जिसमें एक अधिवक्ता की उपस्थिति की अनुमति दी गई थी, न्यायालय ने इसे संशोधित करते हुए निदेश दिया कि अधिवक्ता को केवल पूछताछ स्थल के भीतर उपस्थित रहने की अनुमति होगी, इस प्रकार से कि वह अभियुक्त को देख सके, न कि पूरी पूछताछ के दौरान निरंतर और शारीरिक रूप से उसके साथ उपस्थित रहने की।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 क्या है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 गिरफ्तार व्यक्ति के अपनी पसंद के विधिक व्यवसायी से परामर्श करने और उसके द्वारा प्रतिरक्षा किये जाने के अधिकार को संरक्षित करती है और पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने के अधिकार को भी मान्यता देती है।
- अधिकार की प्रकृति: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 के अधीन अधिकार पूछताछ के दौरान एक अधिवक्ता से मिलने का अधिकार है, न कि पूछताछ प्रक्रिया के दौरान अधिवक्ता की निरंतर, निर्बाध शारीरिक उपस्थिति का अधिकार।
- तर्क: इस उपबंध का उद्देश्य गिरफ्तार व्यक्ति को अभिरक्षा में दुर्व्यवहार से बचाना और विधिक सलाह तक पहुँच सुनिश्चित करना है, साथ ही पुलिस के लिये उपलब्ध अन्वेषण उपकरण के रूप में अभिरक्षा में पूछताछ की प्रभावशीलता को बनाए रखना है।
नोट: धारा 38 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 41घ के अनुरूप है, जिसे दण्ड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2010 द्वारा सम्मिलित किया गया था, और यह उसी अंतर्निहित सुरक्षा उपाय को जारी रखता है जिसे उच्चतम न्यायालय ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) में मान्यता दी थी।
आपराधिक कानून
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 457
28-Jul-2026
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कृष्णन नारायण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य "रजिस्ट्रीकरण एक सुसंगत कारक है, लेकिन यह साक्ष्य मात्र है, अंतरिम कब्जे के अधिकार का निश्चायक सबूत नहीं है।" न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने कृष्णन नारायण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 451 और 457 (धारा 497 और 503 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अधीन जब्त वाहनों की अंतरिम अभिरक्षा के हकदार होने का निर्णय करते समय रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्र को एकमात्र या निश्चायक कारक नहीं माना जा सकता है, और ऐसे अवधारण के लिये सभी संबंधित परिस्थितियों का संचयी मूल्यांकन आवश्यक है।
कृष्णा नारायण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता मेसर्स प्योर मिनरल्स के निदेशक थे और साथ ही प्रत्यर्थी कंपनी मेसर्स अर्थ स्टीन प्राइवेट लिमिटेड में 80% शेयरधारिता भी रखते थे।
- उक्त वाहन, जिनमें एक बोलेरो सिटी पिक-अप, तीन एक्सकेवेटर और एक अशोक लेलैंड टिपर शामिल हैं, को 2014 और 2022 के बीच मेसर्स प्योर मिनरल्स के नाम पर खरीदा गया था।
- अपीलकर्त्ता ने आरोप लगाया कि 31 अगस्त, 2023 को प्रत्यर्थियों ने आपराधिक अतिचार द्वारा उसकी फैक्ट्री में घुसपैठ की और जबरन वाहन ले गए।
- प्रत्यर्थी कंपनी द्वारा एक जवाबी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई गई जिसमें आरोप लगाया गया कि अपीलकर्त्ता ने कंपनी से ₹1,73,11,894 का गबन किया और इन धनराशि का उपयोग अपनी कंपनी के नाम पर वाहन खरीदने के लिये किया।
- अपीलकर्त्ता और प्रत्यर्थी दोनों ने विचारण न्यायालय के समक्ष वाहनों की वापसी की मांग करते हुए अलग-अलग आवेदन दायर किये; उनके आवेदनों को खारिज किये जाने पर, उन्होंने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया।
- एक सामान्य आदेश द्वारा, उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्थियों को वाहनों की अंतरिम अभिरक्षा प्रदान की, जिसमें कथित दुर्विनियोग के लिये अपीलकर्त्ता के विरुद्ध लंबित आपराधिक कार्यवाही और जब्ती के समय प्रत्यर्थियों द्वारा अपने खनन कार्यों के लिये वाहनों के निरंतर उपयोग का हवाला दिया गया।
- उच्च न्यायालय के आदेश से असंतुष्ट होकर, अपीलकर्त्ता ने सुंदर भाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य (2002) पर विश्वास करते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया, जिसमें यह तर्क दिया गया कि अंतिम निपटान लंबित रहने तक जब्त किये गए वाहनों को रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्र के अनुसार वास्तविक स्वामी को सौंप दिया जाना चाहिये।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- अपीलकर्त्ता द्वारा सुंदर भाई अंबालाल देसाई पर निर्भरता के संबंध में: न्यायमूर्ति मसीह द्वारा लिखित निर्णय में न्यायालय ने अपीलकर्त्ता द्वारा इस पूर्व निर्णय पर निर्भरता को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह कोई अटल नियम नहीं है कि अन्य परिस्थितियों के होते हुए भी अभिरक्षा हमेशा रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्र के बाद ही होनी चाहिये, अपितु यह न्यायालयों से अपेक्षा करता है कि वे संपत्ति के दुरुपयोग और क्षरण को रोकने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए शीघ्रता और विवेकपूर्ण ढंग से कार्य करें।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 451 और 457 के दायरे पर: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ये प्रावधान न्यायालयों को स्वामित्व या मालिकाना हक के प्रश्नों का निर्णय किये बिना, जब्त संपत्ति पर अंतरिम कब्जे का सबसे योग्य व्यक्ति निर्धारित करने का अधिकार देते हैं। न्यायालय ने कहा कि "कब्जा" और "अभिरक्षा" शब्दों का प्रयोग इस बात पर बल देता है कि यह कार्यवाही स्वामित्व का निर्णय नहीं है, अपितु केवल संपत्ति के मूल्य में गिरावट और क्षय को रोकने के उद्देश्य से अंतरिम कब्जे का निर्धारण है।
- न्यायालय के मूल्यांकन की प्रकृति पर: न्यायालय ने माना कि इस शक्ति के प्रयोग के लिये केवल इस बात का प्रथम दृष्ट्या आकलन आवश्यक है कि संपत्ति की प्रकृति, ज़ब्ती की परिस्थितियों और अभिलेख में मौजूद सामग्री को ध्यान में रखते हुए, कब्जे का सबसे अच्छा हकदार कौन है, और इसमें स्वामित्व का निर्णय शामिल नहीं है, जो कि एक सक्षम नागरिक मंच के अनन्य अधिकारिता में आता है।
- प्रत्यर्थी कंपनी के पक्ष में परिस्थितियों के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि वाहन प्रत्यर्थी के परिचालन स्थल से जब्त किये गए थे, जहाँ वे निरंतर उपयोग में थे; अपीलकर्त्ता ने कंपनी को हिसाब-किताब निपटाने तक वाहनों का उपयोग करने की अनुमति देते हुए एक वचनपत्र निष्पादित किया था; और वाहनों के लिये ऋण की किश्तें प्रत्यर्थी कंपनी के खाते से चुकाई गई थीं। यद्यपि अपीलकर्त्ता ने वचनपत्र को कूटरचित बताया, न्यायालय ने माना कि ऐसे विवादों का निपटारा पृथक् कार्यवाही में किया जाना चाहिये।
- रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्र के महत्त्व पर: न्यायालय ने माना कि निरंतर कब्ज़ा, EMI किश्तों का निर्विवाद संदाय और रिकॉर्ड पर मौजूद वचनबद्धता ने अपीलकर्त्ता के अनन्य व्यक्तिगत अधिकार के दावे को काफी कमजोर कर दिया और निरंतर लाभकारी उपयोग और नियंत्रण के प्रत्यर्थियों के मामले को विश्वसनीयता प्रदान की, जो केवल रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्रों पर अपीलकर्त्ता की निर्भरता से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।
- अनुतोष प्रदान करने पर: यह मानते हुए कि प्रत्यर्थी कंपनी के पक्ष में परिस्थितियाँ अपीलकर्त्ता के पक्ष में परिस्थितियों से अधिक थीं, न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और प्रत्यर्थियों को वाहनों की अंतरिम अभिरक्षा प्रदान करने वाले उच्च न्यायालय के आदेश की पुष्टि की।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 497 और 503 क्या हैं?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 497 - कतिपय मामलों में विचारण लंबित रहने तक सम्पत्ति की अभिरक्षा और व्ययन के लिए आदेश:
- उपधारा (1) – जब कोई संपत्ति, किसी दण्ड न्यायालय या विचारण के लिये मामले का संज्ञान या सुपूर्द करने हेतु सशक्त मजिस्टेट के समक्ष किसी अन्वेषण, जांच या विचारण के दौरान पेश ऐसी संपत्ति की उचित अभिरक्षा के लिये ऐसा आदेश जैसा वह ठीक समझे, कर सकता है और की जाती है तब वह न्यायालय या मजिस्टेट उस अन्वेषण जांच या विचारण के समाप्त होने तक यदि वह संपत्ति शीघ्रतया या प्रकृत्या क्षयशील है या यदि ऐसा करना अन्यथा समीचीन है तो वह न्यायालय या मजिस्ट्रेट ऐसा साक्ष्य अभिलिखित करने के पश्चात जैसा वह आवश्यक समझे, उसके विक्रय या उसका अन्यथा व्ययन किये जाने के लिये आदेश कर सकता है।
- उपधारा (1) का स्पष्टीकरण– "संपत्ति" का अर्थ: इस धारा के प्रयोजनों के लिये, "संपत्ति" में (क) किसी भी प्रकार की संपत्ति या न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत या उसकी अभिरक्षा में मौजूद दस्तावेज, तथा (ख) कोई भी संपत्ति जिसके संबंध में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है, या जिसका उपयोग अपराध करने के लिये किया गया प्रतीत होता है, शामिल है।
- उपधारा (2) – संपत्ति का विवरण तैयार करना: न्यायालय या मजिस्ट्रेट को संपत्ति की प्रस्तुति के चौदह दिनों के भीतर, राज्य सरकार द्वारा विहित प्ररूप और तरीके से, संपत्ति का विवरण तैयार करना होगा।
- उपधारा (3) – फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी: यदि आवश्यक हो, तो न्यायालय या मजिस्ट्रेट को संपत्ति की फोटो खींचनी होगी और मोबाइल फोन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर वीडियोग्राफी करानी होगी।
- उपधारा (4) – साक्ष्य मूल्य: उपधारा (2) के अधीन तैयार किया गया कथन, उपधारा (3) के अधीन ली गई तस्वीर या वीडियोग्राफी के साथ, संहिता के अधीन किसी भी जांच, परीक्षण या अन्य कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में प्रयोग किया जाएगा।
- उप-धारा (5) – निपटान आदेश के लिये समयसीमा: न्यायालय या मजिस्ट्रेट को उप-धारा (2) के अधीन कथन तैयार करने और उप-धारा (3) के अधीन फोटो या वीडियोग्राफी लेने के तीस दिनों के भीतर, बाद के उपबंधों के अधीन विनिर्दिष्ट तरीके से संपत्ति के निपटान, नष्ट, अधिहृत या परिदान का आदेश देना होगा।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 503 – संपत्ति के अभिग्रहण पर पुलिस द्वारा प्रक्रिया:
- उपधारा (1) – मजिस्ट्रेट को अभिग्रहण की सूचना देना: जब कभी किसी पुलिस अधिकारी द्वारा किसी संपत्ति के अभिग्रहण की रिपोर्ट इस संहिता के उपबंधों के अधीन मजिस्ट्रेट को की जाती है और जांच या विचारण के दौरान ऐसी संपत्ति दण्ड न्यायालय के समक्ष पेश नहीं को ऐसी संपत्ति का परिदान किये जाने के बारे में या यदि ऐसा व्यक्ति अभिनिश्चित नहीं किया की जाती है तो मजिस्टेट ऐसी संपत्ति के व्ययन के, या उस पर कब्जा करने के हकदार व्यक्ति जा सकता है तो ऐसी संपत्ति की अभिरक्षा और पेश किये जाने के बारे में ऐसा आदेश कर सकता जो वह ठीक समझे।
- उपधारा (2) – यदि ऐसा हकदार व्यक्ति ज्ञात है, तो मजिस्ट्रेट वह संपत्ति उसे उन शर्तों पर (यदि कोई हो। जो मजिस्ट्रेट ठीक समझे परिदत्त किये जाने का आदेश दे सकता है और यदि ऐसा व्यक्ति अज्ञात है तो मजिस्टेट उस संपत्ति को निरुद्ध कर सकता है और ऐसी दशा में एक उदघोषणा जारी करेगा, जिसमें उस संपत्ति की अंगभूत वस्तुओं का विनिर्देश हो, और जिसमें किसी व्यक्ति से, जिसका उसके ऊपर दावा है, यह अपेक्षा की गई हो कि वह उसके समक्ष हाजिर हो और ऐसी उद्घोषणा की तारीख से छह मास के अंदर अपने दावे को सिद्ध करे।