9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से






करेंट अफेयर्स और संग्रह

होम / करेंट अफेयर्स और संग्रह

आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180

 03-Aug-2026

आतिश उर्फ ​​कृष्णकांत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 

"पुलिस को साक्षी का अपना कथन अभिलिखित करना चाहियेन कि दोष साबित करने वाली सामग्री का सुझाव देना चाहिये।" - 

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ नेआतिश उर्फ ​​कृष्णकांत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामलेमें उत्तर प्रदेश के DGP को सभी पुलिस अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी करने का निदेश दिया जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन कथन अभिलिखित करते समयवे साक्षियों से दोषारोपणकारी प्रश्न न पूछेंअपितु कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगने के अलावासाक्षी द्वारा अपनी भाषा में दिये गए कथन को ही अभिलिखित करें। 

आतिश उर्फ ​​कृष्णकांत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला जमानत याचिका से जुड़ा है जिसमें अभियुक्त दहेज मृत्यु के आरोपों का सामना कर रहा था। 
  • इससे पहले की सुनवाई मेंन्यायालय ने राज्य को धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन अभिलिखित किये गए प्रथम सूचनाकर्त्ता और उसकी पत्नी के कथनों की ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग पेश करने का निदेश दिया था। 
  • न्यायालय ने मृतक की भाभी के कॉल डिटेल रिकॉर्ड और मेडलीएपीआर (MedLEapr) डिजिटल प्लेटफॉर्म को क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS) के साथ एकीकृत करने के संबंध में भी निर्देश मांगे थे। 
  • अन्वेषण अधिकारी और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहने का निदेश दिया गया। 
  • इन निर्देशों के अनुसारयह पाया गया कि अन्वेषण के दौरान मृतक की भाभी के कॉल डिटेल रिकॉर्ड प्राप्त नहीं किये गए थेप्राप्त होने परउनसे मृतक या उसके ससुराल वालों की कोई कॉल का पता नहीं चलाऔर घटना से एक दिन पहले दहेज उत्पीड़न के संबंध में की गई कॉल का आरोप साबित नहीं हो सका। 
  • यह भी बताया गया कि MedLEapr CCTNS के साथ एकीकृत नहीं हैयद्यपि स्वास्थ्य विभाग से अनुरोध करने पर CCTNS के माध्यम से पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त की जा सकती है।  
  • रिकॉर्डिंग की परीक्षा करने परपीठ ने पाया कि कथन अभिलिखित करने वाले पुलिस अधिकारी नेप्रथम सूचनाकर्त्ता और उसकी पत्नी द्वारा बताई गई घटना के विवरण को अभिलिखित करने के बजायदोषारोपणकारी प्रकृति के भ्रामक प्रश्न पूछे थे। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • दोषारोपणकारी प्रश्न पूछने की अनुचितता पर:न्यायालय ने साक्षियों को दोषारोपणकारी सामग्री सुझाने की प्रथा को "बिल्कुल गलत" करार दियायह मानते हुए कि आपराधिक न्याय प्रशासन का उद्देश्य केवल दोषियों को दण्डित करना नहीं अपितु निर्दोषों की रक्षा करना भी हैऔर पुलिस को किसी साक्षी को अभियुक्त के विरुद्ध सामग्री सुझाने का सुझाव नहीं देना चाहिये 
  • कथन अभिलिखित करने के तरीके पर:न्यायालय ने माना कि धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन कथन साक्षी द्वारा बताई गई भाषा और संस्करण में लिखे जाने चाहियेकेवल कुछ स्पष्टीकरण मांगने के लिये ही इसमें छूट की अनुमति है। 
  • जारी निर्देश पर:न्यायालय ने लखनऊ के DGP को सभी पुलिस अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी करने का निदेश दिया कि धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन कथन अभिलिखित करते समयउन्हें दोष सिद्ध करने वाले प्रश्न नहीं पूछने चाहियेऔर कुछ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगने के अलावासाक्षी द्वारा अपनी भाषा में दिये गए कथन को ही अभिलिखित करना चाहिये 
  • जमानत याचिका के गुण-दोष पर :विचार करते हुए न्यायालय ने पाया कि मृतक की मृत्यु विषैले पदार्थ के सेवन से हुई थी, FIR लगभग तीन महीने बाद विसरा रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद अभिलिखित की गई थीइस विलंब का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया थाप्रथम सूचनादाता और उसकी पत्नी के कथनों में विसंगतियां थींऔर घटना से एक दिन पहले मृतक द्वारा अपनी भाभी को किये गए फोन कॉल के आरोप की पुष्टि करने वाला कोई सबूत नहीं था। गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किये बिनान्यायालय ने आवेदक को जमानत दे दी। 
  • लंबित तकनीकी विवाद्यक पर:यह देखते हुए कि MedLEapr, CCTNS और CIS के बीच डेटा ट्रांसफर से संबंधित प्रश्नों की आगे परीक्षा की आवश्यकता हैन्यायालय ने इस सीमित उद्देश्य के लिये मामले को लंबित रखा और उप महानिदेशक, NIC, नई दिल्लीऔर अतिरिक्त महानिदेशक (तकनीकी)उत्तर प्रदेश पुलिस से अगली तारीख को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होकर तकनीकी विवाद्यकों को हल करने में सहायता करने का अनुरोध किया।  

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180 - पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा: 

उपधारा (1) – परीक्षा करने की शक्ति 

  • किसी मामले का अन्वेषण कर रहा कोई भी पुलिस अधिकारीया राज्य सरकार द्वारा निम्नतर पंक्ति का कोई भी पुलिस अधिकारीजो अन्वेषण अधिकारी के अनुरोध पर कार्य कर रहा होमामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित माने जाने वाले किसी भी व्यक्ति से मौखिक रूप से परीक्षा कर सकता है। 

उपधारा (2) – सत्य उत्तर देने का कर्त्तव्य  

  • जिस व्यक्ति की परीक्षा की जा रही हैवह मामले से संबंधित पूछे गए सभी प्रश्नों का सत्यपूर्वक उत्तर देने के लिये बाध्य है। 
  • अपवाद: उसे ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं है जिनके उत्तर देने से उस पर आपराधिक आरोपदण्ड या संपत्ति समपहरण की आशंका हो सकती है (आत्म- अभिशंसन के विरुद्ध संरक्षण)। 

उपधारा (3) – कथनों को अभिलिखित करना 

  • पुलिस अधिकारी कथन को लिखित रूप में अभिलिखित कर सकता हैऔर यदि वह ऐसा करता हैतो उसकी परीक्षा किये गए प्रत्येक व्यक्ति के लिये एक पृथक् और सटीक रिकॉर्ड रखना होगा। 
  • प्रथम परंतुक :कथन को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक साधनों द्वारा भी अभिलिखित किया जा सकता है। 
  • द्वितीय परंतुक:जहाँ कथित अपराध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, 65, 66, 67, 68, 69, 70, 71, 74, 75, 76, 77, 78, 79, या 124 (महिलाओं के विरुद्ध अपराधमुख्य रूप से लैंगिक अपराध) के अंतर्गत हैवहाँ महिला पीड़ित का कथन महिला पुलिस अधिकारी या महिला अधिकारी द्वारा अभिलिखित किया जाना चाहिये 

सिविल कानून

पूर्व-न्याय (Res Judicata) के सिद्धांत के कारण पश्चातवर्ती पक्षकार बनाए जाने का आवेदन वर्जित है

 03-Aug-2026

संजीव कुमार बनाम शकुंतला देवी और अन्य 

"विभिन्न सिविल प्रक्रिया संहिता प्रावधानों के अधीन दायर किये गए पश्चातवर्ती पक्षकार बनाए जाने आवेदनों पर पूर्व-न्याय लागू होता है।" 

न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और संजय करोल 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ नेसंजीव कुमार बनाम शकुंतला देवी और अन्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया गया कि सिविल प्रक्रिया संहिता के किसी ऐसे उपबंध के अधीन दायर किया गया कोई भी पश्चातवर्ती पक्षकार बनाए जाने का आवेदनजो पहले लागू किये गए प्रावधान से भिन्न होपूर्व-न्याय द्वारा वर्जित हैयदि पहले आवेदन पर पहले ही गुण-दोष के आधार पर विनिश्चय किया जा चुका हैभले ही वह पहले का निर्णय तथ्यों की गलत समझ पर आधारित हो। 

संजीव कुमार बनाम शकुंतला देवी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

यह विवाद पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस निर्णय से उत्पन्न हुआ जिसमें प्रत्यर्थियों द्वारा आदेश 22 नियम 10 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर की गई पश्चातवर्ती पक्षकार बनाए जाने की याचिका को स्वीकार करते हुए उन्हें लंबित द्वितीय अपील में रिकॉर्ड पर लाया गया था। 

  • यह घटना तब हुई जब इससे पहले इन्हीं प्रत्यर्थियों द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम 10 के अधीन पक्षकार बनने की मांग करते हुए दायर किया गया एक आवेदन गुण-दोष के आधार पर खारिज कर दिया गया था। 
  • उच्च न्यायालय ने यह राय व्यक्त की कि चूँकि पहले की अस्वीकृति तथ्यों के गलत आकलन पर आधारित थीइसलिये एक अलग प्रावधान के अधीन पश्चातवर्ती  आवेदन पूर्व-न्याय के दायरे से बाहर नहीं होगा। 
  • उच्चतम न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या पूर्व-न्याय का सिद्धांत किसी पश्चातवर्ती आवेदन को रोकने के लिये लागू होता हैजहाँ पहले का निर्णययद्यपि गुण-दोष के आधार पर दिया गया थातथ्यों के गलत दृष्टिकोण पर आधारित था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • तथ्यात्मक त्रुटि के होते हुए भी पूर्व-न्याय की प्रयोज्यता पर:न्यायालय ने माना कि एक बार आदेश नियम 10 सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन पहले के आवेदन पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जा चुका हैतो निष्कर्ष पक्षकारों पर बाध्यकारी होंगेभले ही वह निर्णय तथ्यों की गलत समझ पर आधारित हो। 
  • गलत आदेश के लिये उचित उपचार के संबंध में:न्यायालय ने टिप्पणी की कि यदि प्रत्यर्थियों का मानना ​​है कि पहले की अस्वीकृति तथ्यात्मक रूप से गलत थीतो उचित तरीका उस आदेश के विरुद्ध विधिक उपचारों का सहारा लेना थान कि उसी अनुतोष की मांग करते हुए किसी अन्य प्रावधान के अधीन एक नया आवेदन दाखिल करना। 
  • पश्चातवर्ती आवेदन की प्रकृति पर:न्यायालय ने पश्चातवर्ती आदेश 22 नियम 10 सिविल प्रक्रिया संहिता आवेदन को पक्षकारों के बीच पहले से ही तय किये गए विवाद्यक का एक अग्राह्य पुन: विवाद्यक उठाना बतायाजिसे केवल एक अलग सांविधिक प्रावधान के माध्यम से उठाया गया था।  
  • अंतिम परिणाम पर:न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया और यह माना कि प्रत्यर्थियों का पक्षकार बनने का आवेदन पूर्व-न्याय के अधीन वर्जित था। 

पूर्व-न्याय (Res Judicata) क्या है? 

अर्थ: 

  • "Res" का अर्थ है विषयवस्तु, "judicata" का अर्थ है निर्णीत — दोनों मिलकरएक ऐसा मामला जिसका निर्णय पहले ही हो चुका है। इसेसिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 11 के अंतर्गत संहिताबद्ध किया गया है।  

मूल सिद्धांत: 

  • एक बार किसी सक्षम न्यायालय द्वारा किसी मामले पर अंतिम निर्णय हो जाने के पश्चातकोई भी पक्षकार पश्चातवर्ती वाद में उस मामले को दोबारा नहीं उठा सकता। 
  • इससे मुकदमों की बहुलता को रोका जा सकता है और पक्षकारों को एक ही मामले में दो बार परेशान होने से बचाया जा सकता है। 

अंतर्निहित सूक्ति : 

  • Nemo debet bis vexari pro una et eadem causa- किसी को भी एक ही कारण से दो बार परेशान नहीं किया जाना चाहिये।  
  • Interest reipublicae ut sit finis litium- यह राज्य के हित में है कि मुकदमेबाजी समाप्त होनी चाहिये 
  • Res judicata pro veritate occipitur – न्यायिक निर्णय को सही माना जाना चाहिये 

आवश्यक तत्त्व: 

  • विवादित विषय प्रत्यक्षत: और सारतः पूर्ववर्ती वाद के समान होना चाहिये 
  • वही पक्ष (या उनके माध्यम से दावा करने वाले पक्षकार)। 
  • दोनों वादों में हक एक ही होना चाहिये 
  • पूर्ववर्ती न्यायालय के पास बाद के मामले का विचारण करने की पर्याप्त अधिकारिता होनी चाहिये 
  • मामले की सुनवाई हो चुकी होगी और अंततः निर्णय भी हो चुका होना चाहिये 

विस्तार: 

  • यह न केवल सिविल वादों पर लागू होता है अपितु निष्पादन कार्यवाहीकराधान मामलोंऔद्योगिक न्यायनिर्णयप्रशासनिक आदेशों और अंतरिम आदेशों पर भी लागू होता है। 
  • धारा 11 इस सिद्धांत का संपूर्ण विवरण नहीं है। 

स्पष्टीकरण 1 – "पूर्ववर्ती वाद": 

  • पहले से विनिश्चित किया गया वाद "पूर्ववर्ती वाद" कहलाता हैचाहे वह कभी भी दायर किया गया हो। 
  • महत्त्वपूर्ण निर्णय की तिथि हैन कि संस्थित की गई तिथि। 

व्याख्या 4  – आन्वयिक पूर्व-न्याय  

  • इसमें न केवल उन विवाद्यकों को वर्जित किया गया है जिन पर वास्तव में विनिश्चय किया जा चुका हैअपितु उन विवाद्यकों को भी वर्जित किया जाता है जिन्हें पूर्ववर्ती वाद में उठाया जा सकता था और उठाया जाना चाहिये थालेकिन नहीं उठाया गया। 
  • यह उसी लोकनीति के तर्क पर आधारित है जिस पर पूर्व-न्याय स्वयं आधारित है। 

व्याख्या 6 – प्रतिनिधि वाद: 

  • जहाँ किसी साझा निजी/सार्वजनिक अधिकार के लिये सद्भावनापूर्वक वाद दायर किया जाता हैवहाँ निर्णय उस अधिकार में हित रखने वाले सभी व्यक्तियों पर बाध्यकारी होता है। 
  • शर्तें: स्वयं और अज्ञात अन्य व्यक्तियों के लिये संयुक्त रूप से दावा किया गया अधिकारसभी संबंधित पक्षकारों की ओर से सद्भावनापूर्वक चलाया गया वादयदि आदेश नियम सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन दायर किया गया हैतो इसकी आवश्यकताओं का कठोरता से पालन किया जाना चाहिये 

अपवाद: 

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका। 
  • कपट या मिलीभगत से प्राप्त निर्णय। 
  • पर्याप्त नए साक्ष्य जो पहले सम्यक सतर्कता के होते हुए भि नहीं मिल सकते थे। 
  • मूल न्यायालय के पास उचित अधिकारिता नहीं थी